धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Tuesday, October 6, 2015

सहानुभूति किसको :- गौरक्षक अथवा गौभक्षक (Feeling pain for Manoj_mishra)

पापा एक बार बोल दो, फिर कभी न बोलना पापा..... बलिदानी दरोगा मनोज मिश्र की आठ वर्षीय बेटी.




क्या मिला ईमानदारी का फल... जिंदगी से हाथ धो बैठे... बहुत ड्यूटी के पाबंद थे. मनोज मिश्र की पत्नी फिर दहाड़े मारकर शव से लिपट कर रोने लगती है.




गौ हत्यारों की गोली से उत्तर प्रदेश पुलिस के दरोगा कि मौत की खबर हमें तब पता चली हैं, जब भीड़ द्वारा पीटने से तथाकथित पशु तस्कर अखलाक की मौत हुई. मुख्य धारा की मीडिया और नेताओं ने हंगामा मचा कर इस घटना को विश्व मंच पर पहुँचा दिया है. मुआवजे की राशि भी पहले 10 लाख, फिर 20 लाख और उसके बाद 45 लाख तक पहुँच चुकी है. सोचता हूँ कि यह लोग कितने संगठित हैं. कितने ध्येय निष्ठ हैं. उनकी खातिर सभी बड़े नेताओं ने बिसहड़ा-दादरी का दौरा किया. राजनीति में कितना भूचाल आया. कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का काम है, लेकिन अपनी अपनी ही सरकार की बदनामी की परवाह किये बिना मुस्लिम मंत्री आज़म खान मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की बात कह रहे हैं. अंधविश्वास के चलते प्रदेश के मुख्यंमत्री भले न गौतमबुद्ध नगर आये हों, लेकिन उन्होने परिवार को एमएलसी के माध्यम से अपने पास बुलवाया और भारी भरकम मुआवजे सहित न्याय देने की बात कही है. जबकि एक आरोपी का आरोप भी लगभग छुपा लिया गया है.




अब आप उत्तर प्रदेश पुलिस के इंस्पेक्टर मनोज मिश्र की मौत देखिये, मनोज अपना कर्तव्य निभा रहे थे, उन्हे अपने दायित्व की परवाह थी, बेचारे पिछली 9 सितंबर को मारे गये. घटना स्थानीय अखबारों में दब कर रह गयी. अंतिम संस्कार में कोई नेता नहीं पहुँचा, अपने प्रदेश में कुछ बड़े नेता हैं, चर्चित घटनाओं का लाभ लेने शीघ्र पहुँच जाते हैं, किन्तु मनोज मिश्र जैसों की मौत पर चर्चा कराने की चाह उनमें नहीं है. कारण कि उत्तर प्रदेश में जुगाडु राजनीति चलती है. बड़े नेताओं से आपका परिचय आपको उच्च सिंहासन पर बिठा सकता है. अत: लगभग प्रतिदिन नगर-जिला-प्रदेश के नेताओं को अपने से बड़े स्तर के नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाकर गौरवान्वित होते हुए देखता हूँ. इनमें राजनीतिक नेतृ्त्व करने वाले तो शामिल हैं हीं, सामाजिक एवं नैतिक नेतृ्त्व करने वाले भी शामिल हैं.


सोचता हूँ कि अखलाक की मौत का राजनीतिक लाभ लेने वाले नेताओं में यदि व्यापक हिन्दू हित अथवा गौरक्षा का अंश मात्र भी संकल्प होता तो क्या मनोज मिश्र का बलिदान व्यर्थ जाता. अत: कहना चाहता हूँ कि जिस दिन समाज ने अपने नेताओं को राष्ट्र और हिन्दुत्व की कसौटी पर कसना प्रारंभ किया अथवा हिन्दुत्व विरोधी नेता छल करते हुए किसी अखलाक की बजाय कर्तव्यनिष्ठ मनोज को भाव देने लगे, उस दिन झूठे और फरेबी नेताओं के दम पर खड़ी इमारत को धूल धूसरित होने में देर नहीं लगेगी. फिर भी आशा है कि जब कभी धर्मचक्र घूमेगा तो अच्छे लोगों के त्याग के कारण अपने राष्ट्र का पूर्ण वैभव के साथ फिर से खड़ा होना भी तय है. उस काल प्रतीक्षा करते हुए यक्ष प्रश्न यह है कि वह समय कब आयेगा और किनके भाग्य में इसका यश लिखा होगा.




अवधेश कुमार
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 9958092091

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