धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, June 11, 2015

अब बिस्मिल की चिता पर मेले नहीं जुड़ते.

आज 11 जून है, पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का जन्मदिवस, सभी जानते हैं कि बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों का स्वप्न एवं एकमेव लक्ष्य स्वराज्य की प्राप्ति था. वह अंग्रेज़ी राज्य की दासता में कदापि नहीं जीना चाहते थे और  स्वतंत्र होने के लिये तड़पते रहते थे. बिस्मिल का जोश क्षणिक आवेग नहीं था, उनकी रचनाओं में उनकी पीड़ा झलकती है. पंक्तियाँ देखिये:-

मुर्गे दिल मत रो यहाँ, आँसू बहाना है मना,
अंदलीबों को कफस में, चहचहना है मना.....
हाय जल्लादी तो देखो कह रहा जल्लाद यह,
वक्ते-जिब्ह बुलबुलों का फ़ड़फड़ाना है मना..... (अंदलीब:- बुलबुल, कफस:- पिजरा, जिब्ह:-कत्ल)
----> स्रोत:- मुर्गे-दिल, मन की लहर.

अंग्रेजी शासन में जनता पर नये नये तरीकों से प्रतिदिन जुल्म ढ़ाये जाते थे,  बिस्मिल का क्रांतिकारी मन भी प्रतिदिन तड़पता था. अपनी बेचारगी को उन्होने निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त किया है....

जुल्म हमसे नित नये, अब तो सहे जाते नहीं
कब तलक हे दीन बन्धो! दिन वही आते नहीं.......
----> स्रोत:- विश्वास का अंत, मन की लहर.

अंग्रेज़ों के सामने झुकने के बजाय वह मृत्यु का आलिंगन पसंद करते थे, तत्कालीन नेताओं का अंग्रेज़ों के सामने लाचार रवैया उन्हे पसंद नहीं था. वह कायरता को अंहिसा नहीं मानते थे.

फँस दया-अहिंसा फन्दे में, हो गये हीज़ड़े ये पक्के,
कुछ जगे जोश मर्दों वाला, अब ऐसा जोर लगा बाबा!
----> स्रोत:- फकीरों की फेरी, क्रान्ति गीतांजलि.

तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर आकलन है कि उपर्युक्त पंक्तियों में आया बाबा शब्द संभवत: उन्होने गाँधी जी के लिये किया था.

कहते हैं कि मन में जो भाव होता है, उसे शब्दश: कहना मुश्किल है और कलम बद्ध करना और भी मुश्किल फिरभी उनके मन में देश के लिये जो तड़प थी, वह निम्न पंक्तियाँ देखने से पता चलता है.

जगदीश! यह विनय है, जब प्राण से तन से निकलें
प्रिय देश! देश! रटते, यह प्राण तन से निकलें...
----> स्रोत:- जब प्राण से तन से निकलें, संगीत सरोवर.

वह देश के लिये अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर चुके थे, उन्हे मृत्यु का भी भय नहीं था. वह किसी भी प्रकार स्वराज्य की प्राप्ति चाहते थे.

क्या हुआ गर मिट गये अपने वतन के वास्ते,
बुलबुलें कुर्बान होती हैं चमन के वास्ते
----> स्रोत:- वतन के वास्ते, राष्ट्रीय गीत.

निराशा के इस माहौल में जब क्रांतिकारियों को जन-समर्थन नहीं था, लेकिन उन्हे आशा एवं प्रबल विश्वास था कि भारतवासियों के भाग्य से हमारी मातृभूमि पुन: सुखी होगी. निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिये.

मादरे हिन्द! गमगीन न हो, अच्छे दिन आने वाले हैं,
आज़ादी का पैगाम तुझे, हम जल्द सुनाने वाले हैं.
----> स्रोत:- अच्छे दिन आने वाले हैं, मन की लहर.

फाँसी की सजा पाने के बाद मातृभूमि के वियोग में दु:खी बिस्मिल को अफसोस था कि वह जन्मभूमि के लिये कुछ न कर सके. वह कहते हैं कि बस यही संतोष है कि हम स्वयं का बलिदान दे रहे हैं.

हाय! जननी जन्मभूमि! छोड़कर जाते हैं हम,
वश नहीं चलता है, रह रह करके पछताते हैं हम...

कुछ भलाई भी न हम, तुम सब की खातिर कर सके,
हो गये बलिदान बस, संतोष यूँ पाते हैं हम.
----> स्रोत:- मातृ-भूमि वियोग, मन की लहर.

देश के लिये जीने-मरने के बाद भी, उनके मन में यश की आकांक्षा नहीं थी, न ही वह स्वर्ग के सुख की चाह थी. उनके मन में सिर्फ भारत के लिये चाह थी.

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता, रहूँ भारत पे दीवाना.....
----> स्रोत:- मेरी  भावना, मन की लहर.

उपर्युक्त पंक्तियों को ब्लॉग में संकलित करते समय मन में बिस्मिल के प्रति अपार श्रद्धा भाव है अत: इन्हे विश्राम देने का मन नहीं है. लेकिन इसकी भी सीमा है. वह क्रांतिकारियों से कहते थे, आज भले ही हमें जन-समर्थन न हो, किन्तु हमारी कहानियाँ प्रेरणा स्रोत होंगी.

शहीदों की चिताओं पर, जुड़ेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निशाँ होगा.
कभी वह दिन भी आयेगा, जब अपना राज देखेंगे,
कि जब 'बिस्मिल' जमीं अपनी औ अपना आस्माँ होगा......
----> स्रोत:- उम्मीदे-सुखन, मन की लहर.


पिता की गोद में बिस्मिल का मृत शरीर
उपर्युक्त पंक्तियों का संकलन डा. मदन लाल वर्मा 'क्रान्त' ने सरफरोसी की तम्मना नामक पुस्तक में किया है. वह ग्रेटर नोएडा में रहते हैं, प्रत्येक वर्ष बिस्मिल के जन्मदिवस(11 जून) एवं बलिदान दिवस (19 दिसम्बर) पर कार्यक्रम करते हैं. वह अपने देश के लिये बलिदान होने वाले क्रांतिकारियों की उपेक्षा पर बहुत निराश दिखे. उन्होने बताया कि बिस्मिल जब 'शहीदों की चिताओं पर' वाला गीत गाते थे तो प. चन्द्र शेखर आज़ाद उनसे कहते थे कि

शहीदों की चिताओं पर, पड़ेंगे राख के ढ़ेले,
वतन पर मरने वालों का, नहीं नामों निशाँ होगा.......

क्या सच नहीं? कभी सोचियेगा!

अंत में बिस्मिल की निम्नलिखित पंक्तियों के साथ........

उठो नींद से, अब सहर हो रही है,
उठो! रात सारी बसर हो रही है........

अवधेश पाण्डेय,
सी-185, ग्रेटर नोएडा.
मो:- 9958092091.

2 comments:

KRANT M.L.Verma said...

प्रिय वत्स अवधेश!
तुम्हारी भावना का सम्मान करते हुए क्रान्ति-सखा अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी 'हसरत'की चन्द पंक्तियाँ दे के जा रहा हूँः
"किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाये,
ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शवाब अपना।
मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें सिर्फ़ तुमसे हैं,
जबाँ तुम हो लबे-बाम आ चुका है आफ़ताब अपना।।"
शुभ कामनाएँ
डॉ मदनलाल वर्मा क्रान्त
Krant M.L.Verma

KRANT M.L.Verma said...

प्रिय वत्स अवधेश!
तुम्हारी भावना का सम्मान करते हुए क्रान्ति-सखा अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी 'हसरत'की चन्द पंक्तियाँ दे के जा रहा हूँः
"किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाये,
ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शवाब अपना।
मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें सिर्फ़ तुमसे हैं,
जबाँ तुम हो लबे-बाम आ चुका है आफ़ताब अपना।।"
शुभ कामनाएँ
डॉ मदनलाल वर्मा क्रान्त
Krant M.L.Verma