धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, April 24, 2015

छला जाता किसान (farmer and leader)

22 अप्रैल 2015 को तथाकथित किसान गजेन्द्र सिंह ने आत्महत्या कर ली. खूब चर्चा हुई, संसद में प्रधानमंत्री जी ने भी दु:ख व्यक्त किया. वैसे इस देश में किसान का मरना नई बात नहीं, लेकिन जंतर मंतर जैसी जगह पर केजरीवाल जैसे खबर बनाने वाले नेता की रैली में किसान की मौत ने उन लोगों के बीच चर्चा करा दी, जिन्हे किसान और किसानों की समस्याओं के कोई सरोकार नहीं. गजेन्द्र की मौत का प्रभाव इतना है कि उसने कुछ चेहरों को बेनकाब कर दिया है. अगर इस चर्चा का मतलब किसानों का हित होता तो भला किसान मरता क्यों.
 
बात 1998 की है, पिताजी की मृत्यु के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए थे, थोड़ी जमीन थी तो किसानी करने की सोची. हमारे यहाँ धान की फसल को रोपने से 21 दिन पहले उसे अंकुरित कर छोटे खेत में बोया जाता है. फिर तैयार पौध (बियाड़) को उन खेतों में रोपा जाता है, जहाँ फसल लेनी होती है. मैने भी बियाड़ सर पे उठाया और टप टप टपकते मटमैले पानी से भीगते बदन उसे तैयार केतों में पहुँचाया और इसी प्रकार पूरे सीजन धान पैदा करने के लिये जमकर मेहनत की. फसल तैयार हुई, गाँव वालों ने बताया कि तुम्हारी फसल बहुत अच्छी हुई है. मैने लागत मूल्य और तैयार फसल के मूल्य का जब पूरा हिसाब किताब लगाया तो मेरी दिहाड़ी 100 रुपये प्रतिदिन भी नहीं पड़ी थी. यह भी बताना आवश्यक है कि जब खराब फसल होती है तो लगाई गयी लागत भी बैठ जाती है और बेचारा किसान हुए घाटे में अपने श्रम का भी मूल्य नहीं लगाता.
 
मित्रों! ठीक इसी प्रकार दो वर्ष तक खेती करने के खराब अनुभव के बाद मैने सन 2000 से अपनी छूट चुकी पढ़ाई फिर से शुरु की और अब नौकरी करके जीविकोपार्जन कर रहा हूँ. मन के अंदर किसानों के लिये सदैव पीड़ा रहती है. अत: लिख रहा हूँ. जानता हूँ कि बेचारे किसान अपना दर्द स्वयं नहीं समझते, वह स्वयं की दिहाड़ी नहीं तय करते, वह तो बस अपना व अपने परिवार का पेट पालने के लिये खेती करते हैं. जो बच जाता है, उसे औने पौने भाव बाज़ार में बेचकर उससे हल्दी-मसाला, चीनी-चायपत्ती आदि खरीद लेते है. देश को आज़ाद हुए इतने वर्ष हो गये, जनता सोचती है कि इस देश को नेता और अफसर चला रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इस देश को अंदर किसान और सीमा पर जवान चला रहे हैं. लाल बहादुर शास्त्री जी ने यह बात समझी थी अत: 18 महीने के अपने छोटे से कार्यकाल में ही वह अमर हो गये. एक कड़वा सच यह है कि आज किसान दूध पैदा करना बंद कर दे तो आप हज़ार रुपये देकर भी एक लीटर दूध नहीं खरीद सकते. आकँड़े गवाह है कि भारत विश्व के बहुत से देशों को भोजन हेतु माँस उपलब्ध कराता है और यह माँस इस देश का किसान पैदा करता है. उन बूचडों के पास एक पशु भी नहीं होगा, जो इसे निर्यात करते हैं. यहाँ भी किसान को अपने दूध न देने वाले जानवर औने पौने भाव पर बेचने पड़ते हैं, क्योंकि यहाँ उसकी अपनी खुद की आस्था का प्रश्न उठता है, जबकि सच यही है कि दूध न देने वाले जानवर का आखिरी पड़ाव बूचड़खाना ही है. अंदरखाने किसान भी यह जानता है, लेकिन जानवर बेचकर वह अपना पिण्ड छुड़ा लेता है, वह अपने श्रम का मूल्य यहाँ भी नहीं लगाता.
 
हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने उस देश में जन्म लिया जहाँ बहुत बड़े भूभाग पर खेती होती है और खाने के लिये अनाज उपलब्ध है. किसान इस धरती का देवता है, लेकिन वह किसान के नाम पर संगठित नहीं है. उसका जाति, धर्म, विचार के नाम पर उपयोग किया जाता है. यदि ऐसा न होता तो राहुल गाँधी, जेटली, केजरीवाल, अखिलेश जैसे शहरी नेता किसानो के हितैषी होने का दावा न करते. अंत में यही कहना है कि किसानों को स्वयं अपना नेता बनना होगा, अन्यथा शहरी कार्पोरेट किसानों और उनके आंदोलनों के राजनीतिक लाभ कमा लेंगे और किसान सदैव की भाँति छला जाता रहेगा.
 
अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 9958092091

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