धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, December 6, 2015

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का मंदिर सांस्कृतिक भारत के पुनरुत्थान के लिये आवश्यक आवश्यकता ram temple

श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, हमारी संस्कृति के आदर्श हैं. समूचे भारत में उनके चिन्ह हैं. वह समाज के सभी वर्गों को जोड़ते हैं. राजकुमार होते हुए भी 14 वर्ष तक समाज के सामान्य पुरुष की तरह रहना सहर्ष स्वीकार करते हैं. वह शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं. रावण को हराने में अकेले सक्षम होते हुए भी स्थानीय नर-वानर-भालुओं का सहयोग लेते हैं. वह रावण के भाई विभीषण को सहर्ष शरण देते हैं. स्वर्णमयी लंका को जीतने के बाद वहाँ से कुछ नहीं लेते और राज्य विभीषण को सौंपकर अपनी जन्मभूमि वापस लौट आते हैं.


ऐसे यशस्वी राजा का स्मृति मंदिर उनके जन्म स्थान श्री अयोध्या जी में था. बिना वह प्रतीक चिन्ह ढ़्हाये भारत की संस्कृति को मिटाना असंभव था. अत: सन 1528 ईसवी में विदेशी आक्रमणकारी बाबर के वंशजो ने भव्य राममंदिर तोड़कर उसके स्थान पर एक ढ़ाचा बना दिया. राष्ट्र के जागे स्वाभिमान के कारण 6 दिसंबर 1992 को वह ढ़ाचा गिरा दिया गया.


कायदे से तो यह बहुत सामान्य सी अराजनैतिक बात होनी चाहिये थी. कारण कि इस देश में रहने वाले सभी पंथो-वर्गो के पूर्वज राम हैं, बाबर नहीं. उनका मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहाँ बनेगा.


वर्तमान में रामलला तम्बू में विराजमान हैं. भारत सहित समूचे विश्व के सत्य सनातन धर्म के अनुयायियों के लिये यह मंदिर श्रद्धा का केन्द्र है. यदि यह मंदिर भव्य बनता है, तो एक बड़े भूभाग की आर्थिक संरचना भी बदल जायेगी. सोचिये कि प्रतिदिन कितने लोग वहाँ दर्शन करने को आयेंगे. उन्हे कितने लीटर दूध चाहिये, कितनी सब्जियाँ, पुष्प अथवा अन्य वस्तुये चाहिये होंगी. यह वहाँ के किसान ही तो देंगे. वहाँ स्थित धर्मशालायें, होटल, भोजनालय, परिवहन सहित अन्य सेवाओं की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये लाखों युवक-युवतियों को रोज़गार भी मिलेगा.

किन्तु यह सब रुका हुआ है कारण कि इस बड़े सामाजिक मुद्दे को उतना ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया है. श्रद्देय अशोक सिंहल जी जिन्होने राष्ट्र के जागे स्वाभिमान का नेतृ्त्व किया था, अब हमारे बीच नहीं हैं. प्रश्न यह है कि पुन: उतना ही बड़ा जनज्वार कौन उठायेगा, कौन कोटि कोटि जनता को श्रीराम जन्मभूमि के भव्य मंदिर का सामाजिक एवं आर्थिक महत्व समाझायेगा.

यह भी अखण्ड सत्य हैं कि राममंदिर बनना तय है, लेकिन इसका यश किसके भाग्य में लिखा है यह प्रश्न अनुत्तरित है.........


अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
9958092091   

Tuesday, October 6, 2015

सहानुभूति किसको :- गौरक्षक अथवा गौभक्षक (Feeling pain for Manoj_mishra)

पापा एक बार बोल दो, फिर कभी न बोलना पापा..... बलिदानी दरोगा मनोज मिश्र की आठ वर्षीय बेटी.




क्या मिला ईमानदारी का फल... जिंदगी से हाथ धो बैठे... बहुत ड्यूटी के पाबंद थे. मनोज मिश्र की पत्नी फिर दहाड़े मारकर शव से लिपट कर रोने लगती है.




गौ हत्यारों की गोली से उत्तर प्रदेश पुलिस के दरोगा कि मौत की खबर हमें तब पता चली हैं, जब भीड़ द्वारा पीटने से तथाकथित पशु तस्कर अखलाक की मौत हुई. मुख्य धारा की मीडिया और नेताओं ने हंगामा मचा कर इस घटना को विश्व मंच पर पहुँचा दिया है. मुआवजे की राशि भी पहले 10 लाख, फिर 20 लाख और उसके बाद 45 लाख तक पहुँच चुकी है. सोचता हूँ कि यह लोग कितने संगठित हैं. कितने ध्येय निष्ठ हैं. उनकी खातिर सभी बड़े नेताओं ने बिसहड़ा-दादरी का दौरा किया. राजनीति में कितना भूचाल आया. कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का काम है, लेकिन अपनी अपनी ही सरकार की बदनामी की परवाह किये बिना मुस्लिम मंत्री आज़म खान मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की बात कह रहे हैं. अंधविश्वास के चलते प्रदेश के मुख्यंमत्री भले न गौतमबुद्ध नगर आये हों, लेकिन उन्होने परिवार को एमएलसी के माध्यम से अपने पास बुलवाया और भारी भरकम मुआवजे सहित न्याय देने की बात कही है. जबकि एक आरोपी का आरोप भी लगभग छुपा लिया गया है.




अब आप उत्तर प्रदेश पुलिस के इंस्पेक्टर मनोज मिश्र की मौत देखिये, मनोज अपना कर्तव्य निभा रहे थे, उन्हे अपने दायित्व की परवाह थी, बेचारे पिछली 9 सितंबर को मारे गये. घटना स्थानीय अखबारों में दब कर रह गयी. अंतिम संस्कार में कोई नेता नहीं पहुँचा, अपने प्रदेश में कुछ बड़े नेता हैं, चर्चित घटनाओं का लाभ लेने शीघ्र पहुँच जाते हैं, किन्तु मनोज मिश्र जैसों की मौत पर चर्चा कराने की चाह उनमें नहीं है. कारण कि उत्तर प्रदेश में जुगाडु राजनीति चलती है. बड़े नेताओं से आपका परिचय आपको उच्च सिंहासन पर बिठा सकता है. अत: लगभग प्रतिदिन नगर-जिला-प्रदेश के नेताओं को अपने से बड़े स्तर के नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाकर गौरवान्वित होते हुए देखता हूँ. इनमें राजनीतिक नेतृ्त्व करने वाले तो शामिल हैं हीं, सामाजिक एवं नैतिक नेतृ्त्व करने वाले भी शामिल हैं.


सोचता हूँ कि अखलाक की मौत का राजनीतिक लाभ लेने वाले नेताओं में यदि व्यापक हिन्दू हित अथवा गौरक्षा का अंश मात्र भी संकल्प होता तो क्या मनोज मिश्र का बलिदान व्यर्थ जाता. अत: कहना चाहता हूँ कि जिस दिन समाज ने अपने नेताओं को राष्ट्र और हिन्दुत्व की कसौटी पर कसना प्रारंभ किया अथवा हिन्दुत्व विरोधी नेता छल करते हुए किसी अखलाक की बजाय कर्तव्यनिष्ठ मनोज को भाव देने लगे, उस दिन झूठे और फरेबी नेताओं के दम पर खड़ी इमारत को धूल धूसरित होने में देर नहीं लगेगी. फिर भी आशा है कि जब कभी धर्मचक्र घूमेगा तो अच्छे लोगों के त्याग के कारण अपने राष्ट्र का पूर्ण वैभव के साथ फिर से खड़ा होना भी तय है. उस काल प्रतीक्षा करते हुए यक्ष प्रश्न यह है कि वह समय कब आयेगा और किनके भाग्य में इसका यश लिखा होगा.




अवधेश कुमार
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 9958092091

Saturday, June 13, 2015

किसानों के सपने kisaan dream

चली है शीतल मंद बयार, जलधि लेकर आये उपहार.
धरा मन प्यासा था तरसे, स्वर्ण बन अब बूँदे बरसे.
हरित हो उठे सूखते धान, लौटती खेतों में मुस्कान.
हुए हैं इंद्र देव अपने, किसानों के जागे सपने.

चलो! अब लौटें अपने गाम, करेंगे योजन से कुछ काम.
चुनेंगे मिलकर सब एक नाम, गाँव की होगी वह पहचान.
मिलाते हुए हाथ से हाथ, चलेंगे मिलकर सब एक साथ.
भोर से होगा श्रम अविराम, सुफल होगा इसका परिणाम.

कृषि का होगा वहाँ विकास, पशुधन होगा सबके पास.
इसमें फूलवाड़ी का योग, पलायित कु-पोषण के रोग.
फसल जब खेतों में दमके, किसानों के चेहरे चमके.
दूध की नदियाँ बहें अनन्त, प्रसन्न हों ग्रामों के भगवन्त.

सहज जब गाँवों का जीवन, सुखी तब हर शरीर और मन.
सुमति से रहें सभी परिवार, मनाते हँसी-खुशी त्योहार.
धरती भी उगले सोना, राष्ट्र का समृद्ध हर कोना.
नहीं जब शहरों की चाहत, बनेगा तभी स्वच्छ भारत.
 
अवधेश पाण्डेय
सी-185, ग्रेटर नोएडा.
9958092091.

Thursday, June 11, 2015

अब बिस्मिल की चिता पर मेले नहीं जुड़ते.

आज 11 जून है, पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का जन्मदिवस, सभी जानते हैं कि बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों का स्वप्न एवं एकमेव लक्ष्य स्वराज्य की प्राप्ति था. वह अंग्रेज़ी राज्य की दासता में कदापि नहीं जीना चाहते थे और  स्वतंत्र होने के लिये तड़पते रहते थे. बिस्मिल का जोश क्षणिक आवेग नहीं था, उनकी रचनाओं में उनकी पीड़ा झलकती है. पंक्तियाँ देखिये:-

मुर्गे दिल मत रो यहाँ, आँसू बहाना है मना,
अंदलीबों को कफस में, चहचहना है मना.....
हाय जल्लादी तो देखो कह रहा जल्लाद यह,
वक्ते-जिब्ह बुलबुलों का फ़ड़फड़ाना है मना..... (अंदलीब:- बुलबुल, कफस:- पिजरा, जिब्ह:-कत्ल)
----> स्रोत:- मुर्गे-दिल, मन की लहर.

अंग्रेजी शासन में जनता पर नये नये तरीकों से प्रतिदिन जुल्म ढ़ाये जाते थे,  बिस्मिल का क्रांतिकारी मन भी प्रतिदिन तड़पता था. अपनी बेचारगी को उन्होने निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त किया है....

जुल्म हमसे नित नये, अब तो सहे जाते नहीं
कब तलक हे दीन बन्धो! दिन वही आते नहीं.......
----> स्रोत:- विश्वास का अंत, मन की लहर.

अंग्रेज़ों के सामने झुकने के बजाय वह मृत्यु का आलिंगन पसंद करते थे, तत्कालीन नेताओं का अंग्रेज़ों के सामने लाचार रवैया उन्हे पसंद नहीं था. वह कायरता को अंहिसा नहीं मानते थे.

फँस दया-अहिंसा फन्दे में, हो गये हीज़ड़े ये पक्के,
कुछ जगे जोश मर्दों वाला, अब ऐसा जोर लगा बाबा!
----> स्रोत:- फकीरों की फेरी, क्रान्ति गीतांजलि.

तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर आकलन है कि उपर्युक्त पंक्तियों में आया बाबा शब्द संभवत: उन्होने गाँधी जी के लिये किया था.

कहते हैं कि मन में जो भाव होता है, उसे शब्दश: कहना मुश्किल है और कलम बद्ध करना और भी मुश्किल फिरभी उनके मन में देश के लिये जो तड़प थी, वह निम्न पंक्तियाँ देखने से पता चलता है.

जगदीश! यह विनय है, जब प्राण से तन से निकलें
प्रिय देश! देश! रटते, यह प्राण तन से निकलें...
----> स्रोत:- जब प्राण से तन से निकलें, संगीत सरोवर.

वह देश के लिये अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर चुके थे, उन्हे मृत्यु का भी भय नहीं था. वह किसी भी प्रकार स्वराज्य की प्राप्ति चाहते थे.

क्या हुआ गर मिट गये अपने वतन के वास्ते,
बुलबुलें कुर्बान होती हैं चमन के वास्ते
----> स्रोत:- वतन के वास्ते, राष्ट्रीय गीत.

निराशा के इस माहौल में जब क्रांतिकारियों को जन-समर्थन नहीं था, लेकिन उन्हे आशा एवं प्रबल विश्वास था कि भारतवासियों के भाग्य से हमारी मातृभूमि पुन: सुखी होगी. निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिये.

मादरे हिन्द! गमगीन न हो, अच्छे दिन आने वाले हैं,
आज़ादी का पैगाम तुझे, हम जल्द सुनाने वाले हैं.
----> स्रोत:- अच्छे दिन आने वाले हैं, मन की लहर.

फाँसी की सजा पाने के बाद मातृभूमि के वियोग में दु:खी बिस्मिल को अफसोस था कि वह जन्मभूमि के लिये कुछ न कर सके. वह कहते हैं कि बस यही संतोष है कि हम स्वयं का बलिदान दे रहे हैं.

हाय! जननी जन्मभूमि! छोड़कर जाते हैं हम,
वश नहीं चलता है, रह रह करके पछताते हैं हम...

कुछ भलाई भी न हम, तुम सब की खातिर कर सके,
हो गये बलिदान बस, संतोष यूँ पाते हैं हम.
----> स्रोत:- मातृ-भूमि वियोग, मन की लहर.

देश के लिये जीने-मरने के बाद भी, उनके मन में यश की आकांक्षा नहीं थी, न ही वह स्वर्ग के सुख की चाह थी. उनके मन में सिर्फ भारत के लिये चाह थी.

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता, रहूँ भारत पे दीवाना.....
----> स्रोत:- मेरी  भावना, मन की लहर.

उपर्युक्त पंक्तियों को ब्लॉग में संकलित करते समय मन में बिस्मिल के प्रति अपार श्रद्धा भाव है अत: इन्हे विश्राम देने का मन नहीं है. लेकिन इसकी भी सीमा है. वह क्रांतिकारियों से कहते थे, आज भले ही हमें जन-समर्थन न हो, किन्तु हमारी कहानियाँ प्रेरणा स्रोत होंगी.

शहीदों की चिताओं पर, जुड़ेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निशाँ होगा.
कभी वह दिन भी आयेगा, जब अपना राज देखेंगे,
कि जब 'बिस्मिल' जमीं अपनी औ अपना आस्माँ होगा......
----> स्रोत:- उम्मीदे-सुखन, मन की लहर.


पिता की गोद में बिस्मिल का मृत शरीर
उपर्युक्त पंक्तियों का संकलन डा. मदन लाल वर्मा 'क्रान्त' ने सरफरोसी की तम्मना नामक पुस्तक में किया है. वह ग्रेटर नोएडा में रहते हैं, प्रत्येक वर्ष बिस्मिल के जन्मदिवस(11 जून) एवं बलिदान दिवस (19 दिसम्बर) पर कार्यक्रम करते हैं. वह अपने देश के लिये बलिदान होने वाले क्रांतिकारियों की उपेक्षा पर बहुत निराश दिखे. उन्होने बताया कि बिस्मिल जब 'शहीदों की चिताओं पर' वाला गीत गाते थे तो प. चन्द्र शेखर आज़ाद उनसे कहते थे कि

शहीदों की चिताओं पर, पड़ेंगे राख के ढ़ेले,
वतन पर मरने वालों का, नहीं नामों निशाँ होगा.......

क्या सच नहीं? कभी सोचियेगा!

अंत में बिस्मिल की निम्नलिखित पंक्तियों के साथ........

उठो नींद से, अब सहर हो रही है,
उठो! रात सारी बसर हो रही है........

अवधेश पाण्डेय,
सी-185, ग्रेटर नोएडा.
मो:- 9958092091.

Sunday, May 24, 2015

मोदी सरकार का एक वर्ष (Modi_Govt_1year)

मैं कोई पत्रकार नहीं, संस्था नहीं बल्कि भारत का आम नागरिक हूँ. मोदी सरकार ने देश विदेश में क्या किया? क्या नहीं किया? क्या करना चाहिये? क्या नहीं करना चाहिये? इसका आकलन भी नहीं कर रहा हूँ. मैं बेहिचक स्वीकार करता हूँ कि भारत के आम नागरिक की तरह उम्मीदों की लहर पर सवार होकर मैने ग्रेटर नोएडा से 700 किमी दूर और लगभग 10 किमी पैदल चलकर श्री नरेन्द्र मोदी के लिये उस प्रत्याशी को अपना मत दिया था, जिसे मैं, मेरा परिवार या मेरा गाँव कतई पसंद नहीं करता.

16 मई 2014 को ऐतिहासिक जनमत द्वारा भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला. मन अत्यंत प्रसन्न हुआ. अगले ही दिन जीत के बाद भावी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने काशी जाकर जब गंगा आरती की और गंगा को माँ कहकर उसे स्वच्छ बनाने का संकल्प लिया तो उस क्षण का गौरव भी मेरे लिये ऐतिहासिक था. आभास हुआ कि वास्तव में हमारा नेता जनता से जुड़ा हुआ है एवं अब मेरी भारत माँ को उसका खोया गौरव अवश्य वापस मिल जायेगा.

प्रधानमंत्री सहित पूरी सरकार ने 26 मई 2014 को शपथ ली. आम जनता कि तरह मेरे मन में भी स्वाभाविक अपेक्षायें थी. नौकरी पेशा होने के कारण तब प्रसन्नता मिली जब सरकार ने गृहऋण और 80सी की सीमा बढ़ा दी और इससे मेरी आय में लगभग 100 रुपये प्रतिदिन की वृद्धि हो गयी.

इसके बाद प्रधानमंत्री जी ने जब जनता से सरकार को सुझाव देने के लिये कहा तो मैने भी अपना कर्तव्य समझते हुए सरकार को http://pgportal.gov.in/Grievance.aspx के माध्यम से सुझाव और शिकायतें भेजीं. जिनमें से कुछ का विवरण निम्नलिखित है.

परिवहन भत्ते से संबधित सुझाव
1) कर्मचारी को उसके मासिक वेतन में कार्यालय आने जाने के लिये मिलने वाला परिवहन भत्ता, जो पिछले कई वर्षों से 800 रुपये ही है, जबकि ईंधन/किराया कई बार बढ़ चुका है. अत: इसे बढ़ाया जाना चाहिये. परिणाम स्वरूप बीते बजट में यह सुझाव मान लिया गया और इस भत्ते को बढ़ाकर 1600 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है. संदर्भ:-CBODT/E/2014/04355.

2) मैने कुछ पुस्तकें मँगाई थी, प्रकाशक ने पंजीकृत डाक से भेजी किन्तु डाक विभाग की लापरवाही के कारण मुझे नहीं मिली. मैंने पंजीकरण का संदर्भ देकर पोर्टल पर शिकायत की. ऊपर से जाँच आ गयी और मेरा पार्सल मेरे पास पहुँच गया. जिले के प्रधान डाकघर से फोन एवं पत्र द्वारा असुविधा के लिये खेद प्रकट किया गया एवं शिकायत के निपटान की सूचना भी दी गई. संदर्भ:- DPOST/E/2014/04079

3) मैं 2007 में बैंगलूरू में था, दिल्ली से कैफियत एक्सप्रेस ट्रेन का कन्फर्म न होने के कारण टिकट रद्द करा कर टीडीआर फाइल कर दी थी. पैसे वापस नहीं मिले थे. नई सरकार से इसकी भी शिकायत कर दी. शिकायत को समझने एवं उसके निपटान के लिये रेल मंत्रालय से दो बार फोन आया किन्तु बहुत पुराना मामला होने के कारण अधिकारी ने खेद प्रकट करते हुए पैसे वापस करने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. शायद शिकायत पैसे वापसी के लिये थी भी नहीं, किन्तु लगा कि मंत्रालय द्वारा शिकायत के निपटान के लिये प्रयास किया गया है. संदर्भ:- MORLY/E/2014/08469.

4) ग्रेटर नोएडा में बीएसएनएल का कार्यालय, स्वयं का बड़ा परिसर होते हुए भी किराये के एक परिसर में चलता है. पोर्टल पर शिकायत कर दी. मंत्रालय द्वारा जाँच हुई और मुझे बताया गया कि दोनों अलग अलग कार्य हैं, जो एक परिसर से संचालित नहीं हो सकते. संदर्भ:- DOTEL/E/2014/23486.

भारत पेट्रोलियम द्वारा शिकायत निपटान
5) मेरे भारत गैस एलपीजी वितरक ने डीबीटीएल योजना का हवाला देकर मुझे गैस आपूर्ति बंद कर दी और कहा कि आप अपने बैंक खाते का विवरण जमा कर दीजिये, तभी आपको गैस मिलेगी. आवश्यक विवरण देने के बाद भी जब कई दिनों तक गैस नहीं मिली तो वितरक ने कहा कि आपकी गैस उपर से ही नहीं आ रही, जब आयेगी तब दे देंगे. मैने कहा कि भैया! सरकार बदल गई है, अब ऊपर वालों को दोष देना बंद कर दीजिये, वर्ना आपकी शिकायत कर दूँगा. मैनेजर साहब ने कहा कि शौक से कीजिये सर! हम चाहते हैं कोई हमारी शिकायत कर दे. अत: मैने शिकायत कर दी. उपर से जाँच आ गयी, उसी बुकिंग पर एक नहीं दो दो बार गैस भेजी और जब वितरक ने तीन बार अपने प्रतिनिधि को भेजा तब लिखकर दिया कि गैस मिल गयी है. संदर्भ:- MPANG/E/2015/01717.

उपर्युक्त कुछ उदाहरण हैं, जिनसे मुझे लगा कि सरकार कार्य कर रही है. इसके अतिरिक्त मैने कुछ और सुझाव भी भेजे हैं, जिनमें से कुछ को स्वीकार कर लिया गया है, किन्तु उन पर अभी वास्तविक कार्य नहीं हुआ है. कुछ मामले अभी सिस्टम में लंबित हैं एवं उन पर क्या कार्यवाही हुई, मुझे अवगत भी नहीं कराया गया है. उम्मीद है कि देर सबेर उन पर भी कुछ कार्यवाही अवश्य होगी.

कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, अत: सरकार से भी पूर्णता की उम्मीद नहीं. अत: कई मुद्दों पर विद्वान लोगों द्वारा सरकार की जो आलोचना हुई, उसका सच भी स्वीकार किया जाना चाहिये. व्यक्तिगत रूप से मुझे सरकार में शामिल लोगों के द्वारा निम्नलिखित आचरण करने से दु:ख हुआ.

1) क्रिकेट की राजनीति में गलत लोगों का साथ देना.
2) भूमि बिल मुद्दे पर शहरी नेताओं द्वारा किसानों का हितैषी बनने की कोशिश करना एवं
3) उन पत्रकारों के साथ गलबहियाँ करना, जिनका आचरण पिछली सरकार में संदिग्ध था.

अंत में सरकार के एक वर्ष पूर्ण होने पर यही कहना है कि जब सरकार का आकलन करें तो स्वयं का भी आकलन कीजिये. मैने सरकार को लिखा और प्राप्त परिणाम से व्यक्ति के रूप संतुष्ट हूँ. राष्ट्र के रूप में निर्णय लेने का अधिकार राष्ट्र को है. अत: मुझे इस सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल पर गर्व होता है.

अवधेश कुमार पाण्डेय.
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
दूरभाष:- 9958092091.

Friday, April 24, 2015

छला जाता किसान (farmer and leader)

22 अप्रैल 2015 को तथाकथित किसान गजेन्द्र सिंह ने आत्महत्या कर ली. खूब चर्चा हुई, संसद में प्रधानमंत्री जी ने भी दु:ख व्यक्त किया. वैसे इस देश में किसान का मरना नई बात नहीं, लेकिन जंतर मंतर जैसी जगह पर केजरीवाल जैसे खबर बनाने वाले नेता की रैली में किसान की मौत ने उन लोगों के बीच चर्चा करा दी, जिन्हे किसान और किसानों की समस्याओं के कोई सरोकार नहीं. गजेन्द्र की मौत का प्रभाव इतना है कि उसने कुछ चेहरों को बेनकाब कर दिया है. अगर इस चर्चा का मतलब किसानों का हित होता तो भला किसान मरता क्यों.
 
बात 1998 की है, पिताजी की मृत्यु के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए थे, थोड़ी जमीन थी तो किसानी करने की सोची. हमारे यहाँ धान की फसल को रोपने से 21 दिन पहले उसे अंकुरित कर छोटे खेत में बोया जाता है. फिर तैयार पौध (बियाड़) को उन खेतों में रोपा जाता है, जहाँ फसल लेनी होती है. मैने भी बियाड़ सर पे उठाया और टप टप टपकते मटमैले पानी से भीगते बदन उसे तैयार केतों में पहुँचाया और इसी प्रकार पूरे सीजन धान पैदा करने के लिये जमकर मेहनत की. फसल तैयार हुई, गाँव वालों ने बताया कि तुम्हारी फसल बहुत अच्छी हुई है. मैने लागत मूल्य और तैयार फसल के मूल्य का जब पूरा हिसाब किताब लगाया तो मेरी दिहाड़ी 100 रुपये प्रतिदिन भी नहीं पड़ी थी. यह भी बताना आवश्यक है कि जब खराब फसल होती है तो लगाई गयी लागत भी बैठ जाती है और बेचारा किसान हुए घाटे में अपने श्रम का भी मूल्य नहीं लगाता.
 
मित्रों! ठीक इसी प्रकार दो वर्ष तक खेती करने के खराब अनुभव के बाद मैने सन 2000 से अपनी छूट चुकी पढ़ाई फिर से शुरु की और अब नौकरी करके जीविकोपार्जन कर रहा हूँ. मन के अंदर किसानों के लिये सदैव पीड़ा रहती है. अत: लिख रहा हूँ. जानता हूँ कि बेचारे किसान अपना दर्द स्वयं नहीं समझते, वह स्वयं की दिहाड़ी नहीं तय करते, वह तो बस अपना व अपने परिवार का पेट पालने के लिये खेती करते हैं. जो बच जाता है, उसे औने पौने भाव बाज़ार में बेचकर उससे हल्दी-मसाला, चीनी-चायपत्ती आदि खरीद लेते है. देश को आज़ाद हुए इतने वर्ष हो गये, जनता सोचती है कि इस देश को नेता और अफसर चला रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इस देश को अंदर किसान और सीमा पर जवान चला रहे हैं. लाल बहादुर शास्त्री जी ने यह बात समझी थी अत: 18 महीने के अपने छोटे से कार्यकाल में ही वह अमर हो गये. एक कड़वा सच यह है कि आज किसान दूध पैदा करना बंद कर दे तो आप हज़ार रुपये देकर भी एक लीटर दूध नहीं खरीद सकते. आकँड़े गवाह है कि भारत विश्व के बहुत से देशों को भोजन हेतु माँस उपलब्ध कराता है और यह माँस इस देश का किसान पैदा करता है. उन बूचडों के पास एक पशु भी नहीं होगा, जो इसे निर्यात करते हैं. यहाँ भी किसान को अपने दूध न देने वाले जानवर औने पौने भाव पर बेचने पड़ते हैं, क्योंकि यहाँ उसकी अपनी खुद की आस्था का प्रश्न उठता है, जबकि सच यही है कि दूध न देने वाले जानवर का आखिरी पड़ाव बूचड़खाना ही है. अंदरखाने किसान भी यह जानता है, लेकिन जानवर बेचकर वह अपना पिण्ड छुड़ा लेता है, वह अपने श्रम का मूल्य यहाँ भी नहीं लगाता.
 
हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने उस देश में जन्म लिया जहाँ बहुत बड़े भूभाग पर खेती होती है और खाने के लिये अनाज उपलब्ध है. किसान इस धरती का देवता है, लेकिन वह किसान के नाम पर संगठित नहीं है. उसका जाति, धर्म, विचार के नाम पर उपयोग किया जाता है. यदि ऐसा न होता तो राहुल गाँधी, जेटली, केजरीवाल, अखिलेश जैसे शहरी नेता किसानो के हितैषी होने का दावा न करते. अंत में यही कहना है कि किसानों को स्वयं अपना नेता बनना होगा, अन्यथा शहरी कार्पोरेट किसानों और उनके आंदोलनों के राजनीतिक लाभ कमा लेंगे और किसान सदैव की भाँति छला जाता रहेगा.
 
अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 9958092091

Tuesday, February 17, 2015

शिव भाव महिमा (shiv emotional intelligence)

कब करना मुझको विषपान, कब करना किसका संहार,
कब बनना है बाबा भोला, कब करना किसका उद्धार,

कब विचरूँ कैलाश पर जाकर, कब कर दूँ डमरू का नाद,
तांडव कब करना है शिवजी, कब चुप बैंठूँ आँखें साध....
 
तुम गृहस्थ हो और विरक्त हो, हे शिव! तेरे रूप अनेक,
तुम्हरी महिमा कैसे जानें, प्रश्न यही है मन में एक,

चन्द्रमौलि कब दर्शन दोगे, सहज बता दो मुझको आज,
मन को इतना कैसे साधें, तुमसे पूछूँगा यह राज.
 
अवधेश पाण्डेय.
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.

Thursday, February 12, 2015

सोशल मीडिया के धुरधंरो के साथ चाय पर चर्चा कब? chai par charcha

मोदी जी ने एक एक कर सबके साथ चाय पी. नहीं पी तो सोशल मीडिया के उन लोगों के साथ जो रात दिन एक करके देश को एक सक्षम प्रधानमंत्री देना चाहते थे. क्या अच्छा न होता कि एक दिन इन लोगों को खुला न्योता देकर उनके बीच में मोदी जी का संबोधन होता. बहुत से लोग उपेक्षा का दर्द सहकर भी कार्य करते रहे, किन्तु बहुत सी आवाज़ें खामोश हो गयीं. कम लिखना ज्यादा अच्छा है. एक पुरानी पोस्ट पढिये, पहले फेसबुक पर थी. आज ब्लॉग पर डाल रहा हूँ.
 
दिल्ली में हुए ऐतिहासिक सम्मेलन का आयोजन अभूतपूर्व अनुभव रहा, आयोजकों के लिये भी और सम्मेलन में उपस्थित हो माँ भारती का गौरव बढ़ाने वाले भाई-बह्नों के लिये भी. देश के विभिन्न भागों से स्वत: प्रेरणा से आये लोगों का संगम अविस्मरणीय घटना है. आज जब जन-सामान्य राजनीति से घृणा करता है, तब देश को आगे ले जाने का संकल्प लेकर लोग किसी नेता के लिये अपना काम-धाम छोड़ दिल्ली आते हैं तो यह बहुत बड़ी बात है. सम्मेलन में जहाँ सोशल मीडिया के नामी धुरंधर उपस्थित हुए, वहीं अन्य राष्ट्रभक्त भी पीछे न रहे. लगभग 150 के आसपास की संख्या रही होगी. जो लोग सम्मेलन में नहीं आ सके उनके लिये कार्यक्रम विवरण कलमबद्ध करने का परम सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, जो आप सभी को आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित है.
कार्यक्रम महन्त नित्यानंददास जी एवं एक अन्य उपस्थित बुजुर्ग द्वारा माँ भारती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित करने के साथ प्रारंभ हुआ. दो सत्रों में संपन्न कार्यक्रम के प्रथम सत्र में देश की विभिन्न समस्याओं पर चिंता जताते हुए, वक्ताओं ने मोदी जी के द्वारा किये गये विकास कार्यों, समाज के लोगों में जाति-धर्म आदि का भेद न करते हुए सभी का समान विकास करने की भावना, पारदर्शी व कुशल प्रशासन, आतंकवाद से सख्ती से निपटने, नशाबंदी व गौरक्षा आदि के लिये मोदी जी के कार्यों जैसे अनेकों कारण गिनाये. मोदी जी की कार्यक्षमता का लोहा मानते हुए सभी ने माँ भारती के मंदिर के लिये मोदी जी को ही उपयुक्त पुजारी बताया.
 
प्रथम सत्र के बाद भोजन की व्यवस्था भी थी. भोजन के उपरांत दूसरे सत्र में मोदी जी को राष्ट्र का नेतृत्व सौपने के मार्गों पर उपस्थित राष्ट्रवादियों ने निम्नलिखित सुझाव दिये. सुझाव अनंतिम है और आप लोग टिप्पणी के रूप में अपने बहुमूल्य सुझाव देने की कृपा करें तो यह राष्ट्रकार्य थोड़ा आसान हो सकता है.

1) युवाओं को राष्ट्र की समस्याओं से अवगत कराना और उन्हे अपने मताधिकार का प्रयोग करने का प्रोत्साहन देना
2) राष्ट्र के विरोधियों की पोल जनता के सामने खोलना, केन्द्र सरकार के घोटाले व उनके सहयोगियों के बारे में जनता को बताते हुए, मोदी जी के द्वारा कराये गये कार्यों को जनता के समक्ष रखना.
3) किसी भी संगठन से जुड़े लोगों को अपनी अपनी मातृ संस्थाओं पर दबाव डालना होगा.
4) देश में काँग्रेस के विरुद्ध माहौल है अत: मोदी जी को गैर काँग्रेसवाद का प्रतिनिधित्व करना होगा.
5) नारी शक्ति को राष्ट्र की समस्याओं से अवगत करा, उन्हे अपने आसपास चर्चा व मताधिकार का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहन देना होगा.
6) माननीय श्री सुरेश जी सोनी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, केशव कुँज, झण्डेवालान, नयी दिल्ली को पत्र भेज मोदी जी राष्ट्र रक्षा के लिये आगे करने का अनुरोध करना.
7) गली-मुहल्लों में नोटिस बोर्ड लगाकर मोदी जी के द्वारा कराये गये कार्यों का उल्लेख करना.
8) गाँवों और कस्बों में टोलियाँ बना देश की उन्नति के लिये मोदी जी जैसे अनुभवी व प्रामाणिक क्षमता की आवश्यकता के बारे में लोगों को बताना.
9) केन्द्र का रास्ता गुजरात के विधानसभा चुनाव से होकर जाने वाला है, अत: सभी राष्ट्रवादियों को गुजरात विधानसभा चुनाव में अपना समय देने के लिये तैयार रहना होगा.

उपरोक्त प्रस्तावों को वास्तविकता का रूप देने के लिये अगली कार्ययोजना बैठक का भी विचार किया गया.

सम्मेलन में आने वाले राष्ट्रभक्तों का सादर धन्यवाद.

!! भारत माता की जय !!

अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.

Thursday, January 1, 2015

ईसवी सन परिवर्तन का विरोध करना एवं इसे नववर्ष कहना दोनों अनुचित और अव्यवहारिक (20150101).

ईसवी सन 2014 चला गया और नया ईसवी सन 2015 आ गया, इस सन का महत्व दैनिक जीवन में है और रहेगा भी. इसको अंतराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया है. इसका विरोध करने वाले भी इसे अच्छी तरह जानते हैं और दैनिक जीवन में इसका प्रयोग करते हैं. अत: सिर्फ 1 जनवरी के दिन इसका सांकेतिक विरोध अति उत्साह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है. ऐसे लोग सांस्कृतिक राष्ट्र गौरव के नाम पर ईसवी सन का विरोध करते हैं.

मेरी अपनी राय में यह सन परिवर्तन का यह क्षण है, साथ ही ईसाइयों एवं अंग्रेजियत की मानसिकता वाले भारतीयों के लिये मौज़ मस्ती का सप्ताह. भारतीय सभ्यता में इसे सिर्फ सन परिवर्तन की दृष्टि से देखा जाना चाहिये न कि नववर्ष की दृष्टि से. अत: स्नेही स्वजनों को भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों में नववर्ष की बजाय, ईसवी सन् या वर्ष 2015 आदि का उल्लेख होना चाहिये. हमारी संस्कृति में नववर्ष जब आता है तब प्रकृ्ति अपने आप संदेश देने लगती है, पेडों पर नये पत्ते लगना, ऋतु परिवर्तन, फसलें पकना, जीव जंतुओं के अंदर नई उर्ज़ा आना आदि घटनायें इसके स्पष्ट लक्षण हैं. सर्वे भवंतु सुखिन: वाली भारतीय संस्कृति को आधार मानकर विचारें कि यह कैसा नववर्ष है जब प्रकृ्ति का एक बड़ा जीवन वर्ग (सरीसृप वर्ग) निर्जीव होकर सोता रहता है. समय का चक्र प्रकृति के अनुसार चलता है अत: ईसवी सन परिवर्तन को नववर्ष न मानने का प्रबल कारण है. ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इस अर्थ प्रधान युग में समूचा विश्व अपना वाणिज्य वर्ष अप्रैल से शुरु करता है.

लेख का आशय यह है कि भारतीय संस्कृति के नाम पर ईसवी सन का विरोध भी अनुचित है और इसके बदलने पर मौजमस्ती की अति भी. अत: हम ईसवी सन का स्वागत आतिथ्य भाव से करें एवं जैसे अतिथि भी हमारे परिवार का अंग होता है, वैसे इसे सम्मान से स्वीकारें. किन्तु यह भी ध्यान रखें कि हम अपना सबकुछ अतिथि को ही न सौंप दें. भारतीय पंचाग चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सुबह सूर्य की किरणों के साथ प्रारंभ होता है. यही हमारा नववर्ष है. जो प्रकृति के अनूकूल है एवं कालचक्र परिवर्तन का एहसास कराता है.

अंत में ईसवी सन 2015 की हार्दिक शुभकामनायें, इसबार अंग्रेज़ियत छोड़ें और भारतीयता अपनायें. 

!! भारत माता की जय !!