धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, June 16, 2013

तार तार रिश्ते (एक मार्मिक कहानी)

बैंक में अधिकारी रामबाबू गुप्ता को किसी चीज़ की कमी न थी, जयपुर जैसे शहर में आलीशान मकान, अच्छी पत्नी, दो बेटे, अनिल और सुनील, अनिल इंजीनियर था और सुनील इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र था, बड़ा बेटा अनिल कम्पनी की तरफ से लन्दन जा रहा था, बेटे के इतनी दूर जाने की चिंता थी, किन्तु एक तो लन्दन की मोटी तनख्वाह, उपर से मोहल्ले एवं परिचितों में जमने वाली धाक, अत: घर हर व्यक्ति प्रसन्न था.

एक बेटा विदेश तो दूसरा कॉलेज़ में, हँसता खेलते घर पर धीरे धीरे शांति छाने लगी, छोटा बेटा सुनील कभी कभार छुट्टियों में आ जाता तो पति-पत्नी के चेहरे पर कुछ दिनों के लिये मुस्कान आ जाती. इस बीच बड़े बेटे के लिये बहुत से रिश्ते आते थे, किन्तु वह तैयार नहीं था, उसने तो अब फोन करना भी लगभग बंद कर दिया था. कभी कभार जब माँ का मन होता तो वह अनिल को फोन मिला लेती किन्तु उन्हे यह ध्यान रखना होता था कि घड़ी में कितने बजे हैं और उस समय अनिल कहीं कार्यालय में न हो.

साल बीतते गये, सुनील की भी नौकरी लग गई और रामबाबू सेवानिवृत्त हो गये किन्तु अपने कैरियर की चिंता में अनिल ने फिर भारत का रूख नहीं किया, बेटे के विवाह और पोते का मुँह देखने को तरसते तरसते एक दिन रामबाबू की पत्नी स्वर्ग सिधार गयीं, किन्तु तब भी आवश्यक मीटिंग और उसके निरस्त होने पर होने वाले नुकसान का हवाला देकर, बड़ा बेटा माँ के अन्तिम संस्कार में भी नहीं आया. पत्नी की मौत के बाद रामबाबू भी अकेले पड़ गये, एक दिन छोटे बेटे का फोन आया कि वह भी कुछ महीनों के लिये अमेरिका जा रहा है, रामबाबू ने उसे मना करने का हर संभव प्रयास किया किन्तु कैरियर और दौलत की चाह में पिता की बाधा बेटे को बहुत नागवार गुजरी. सुनील के सामने अमेरिका के सुहाने सपने थे, उन सपनों को पूरा करने के लिये उसने पिता की बातों की परवाह नहीं की.
सुनील के अमेरिका जाने के बाद रामबाबू चिंतित रहने लगे, वह बार बार बेटों से भारत आने का आग्रह करते तो बेटों ने उन्हे फोन करना ही बंद कर दिया, कुछ समय तक रामबाबू अपनी तरफ से बेटों को फोन कर वापस आने के लिये कहते रहे किन्तु धीरे धीरे उन्होने भी कलेज़े पर पत्थर रख लिया, बेटे आये नहीं तो रामबाबू ने अपना घर बार बेचकर, सारा पैसा एक वृ्द्धाश्रम को दान कर दिया और वहीं रहने लगे. उन्होने फिर बेटों से संपर्क करने की कोशिश न की, न ही बेटों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि उनके पिता कहाँ है.
एक बार रामबाबू बीमार पड़े तो अंतिम समय निकट जान वृ्द्धाश्रम वालों ने रामबाबू द्वारा बताये गये परिचित मित्र को फोन किया, मित्र के पास रामबाबू के छोटे बेटे सुनील का संपर्क सूत्र था, उन्होने उसे फोन करके बताया कि तुम्हारे पिता बीमार हैं, जल्दी आ जाओ. सुनील ने कहा कि आप उन्हे अस्पताल में दाखिल कराओ, मैं आ रहा हूँ. किन्तु अनिल व सुनील आपस में यह तय न कर सके कि पिताजी को देखने कौन जायेगा और रामबाबू चल बसे. पिता के मित्र ने सुनील को सूचना दी कि तुम्हारे पिता नहीं रहे, कम से कम अंतिम संस्कार करने तो आ जाओ, इस पर सुनील ने कहा कि आप पिताजी के शरीर को बर्फ में रखवा दीजिये, मैं कुछ कोशिश करता हूँ. सुनील अमेरिका से सीधे भारत न आकर भाई के पास लंदन गया, वहाँ अनिल ने स्पष्ट रूप से भारत वापस जाने से मना कर दिया, दोनों भाईयों में बहस के बाद कुछ समझौता हुआ, जिसके फलस्वरूप सुनील को ही भारत आना पड़ा. भारत आकर सुनील ने पिता का अंतिम संस्कार किया, पिता के अंतिम संस्कार के बाद उसे पता चला कि उसके पिता ने अपनी सारी दौलत वृ्द्धाश्रम को दान कर दी थी. पता नहीं सुनील के मन में कैसे कैसे भाव उमड़ रहे थे.............

नोट:--यह कहानी एक मित्र द्वारा बताई गयी सच्ची घटना पर आधारित है, पात्रों के नाम बदल दिये गये हैं. यदि इस कहानी आपके हृदय को स्पर्श किया है, तो मुझे अवश्य बतायें.
पत्र व्यवहार का पता.
अवधेश पाण्डेय
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