धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, July 14, 2013

हिन्दू शब्द ही राष्ट्रीयता का प्रतीक है (hindu nationalist )

नरेन्द्र भाई बड़े चतुर राजनीतिग्य हैं, अभी रायटर्स को दिये गये ताज़ा साक्षात्कार में उन्होने स्वयं के लिये हिन्दू राष्ट्रवादी शब्द का उल्लेख किया साथ ही कहा कि अगर कार के नीचे एक पिल्ला भी आकर मर जाता है तो दु:ख होता है. इस बात पर तमाम राजनीतिक विरादरी के कान खड़े हो गये और सब के सब नमो विरोध में बेतहासा चिल्लाने लगे. नमो ने जो कहा, उस पर सार्थक बहस प्रांरभ होने की बजाय, एक खास धर्म का तुष्टिकरण करने की कोशिश में उसे पिल्ले के समान बताने की कोशिश की जाने लगी. यही नहीं तमाम बुद्धिजीवियों ने भी नरेन्द्र भाई की आलोचना प्रारंभ कर दी. मीडिया ने भी हर उस नमो विरोधी सुलभ नेता का बयान लिया एवं बड़ी बड़ी बहसें चलाई, किन्तु किसी ने भी हिन्दू राष्ट्रवाद के मूल में जाने की कोशिश नहीं की.

प्राचीन काल में हिन्दू शब्द धर्म का प्रतीक न होकर राष्ट्रीयता का प्रतीक हुआ करता था. "हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्. तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते.." अर्थात  हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है. हिमालय का हि और इन्दु (हिन्द महासागर) हा न्दु मिलकर ही हिन्दू शब्द की उत्पत्ति हुई एवं इस हिन्दुस्थान में सिर्फ अमुक धर्म के लोग रहते थे, यह प्रसंग कभी नहीं आया. उल्लेखनीय यह भी है कि सनातन धर्म या वैदिक धर्म जैसे प्राचीनतम धर्म को मानने वाले लोग इस धरती के इस भूभाग में रहते थे, दूसरा अन्य कोई धर्म यहाँ नहीं था, अत: सभी हिन्दू थे, सभी राष्ट्रवादी थे और उस राष्ट्र का नाम हिन्दुस्थान था. अत: भारत में रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इस पर सार्थक बहस होने की बजाय, एक काल्पनिक पिल्ले की मौत पर जानबूझ कर विवाद पैदा किया गया.

वास्तव में देखा जाय तो हिन्दू धर्म होने की बजाय एक जीवन पद्यति है और इस जीवन पद्यति को अपनाकर एक निश्चित भूभाग में रहने वाले लोग ही हिन्दू कहलाते थे. हमारे ऋषियों ने स्पष्ट रूप के हिन्दू शब्द को परिभाषित किया है, उन्होने कहा है कि "हिंसायाम दूयते या सा हिन्दु" अर्थात् जो अपने मन, वचन, कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है. एक अन्य व्याख्या के अनुसार "हीनं दूषयति स हिन्दु" अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दू है. मतलब साफ है कि हिन्दू जीवन पद्यति में स्वार्थ के हिंसा का कोई स्थान नहीं. किन्तु कई बार सीमित शक्तियाँ होने के कारण होने वाली हिंसा को रोकना हमारे वश में नहीं अत: हमें दु:ख होता ही है. अत: नमो ने एक पिल्ले के मौत पर भी दु:ख की जो बात कही, वह भी हमारी जीवन पद्यति का ही भाग है.

सोचिये, अगर भारत में रहने वाले लोग चाहे किसी भी धर्म-जाति संप्रदाय आदि के हों और अगर उनके लिये राष्ट्र सर्वोपरि हो, उनमें त्याग हो, अहिंसा हो, तो क्या भारत अपनी क्षमता और यहाँ रहने वाले लोगों की दक्षता का पूर्ण उपयोग नहीं कर विश्व का सर्वाधिक गौरवशाली राष्ट्र न होगा. राष्ट्र के लिये कार्य करने वाले संगठनों को इस विषय पर ध्यान देना चाहिये, यह एक सार्थक विषय है, जिसे लेकर जगह जगह गोष्ठियाँ कराने की आवश्यकता वर्तमान समय पर भारत की माँग है.
!! भारत माता की जय !!



 

Sunday, June 16, 2013

तार तार रिश्ते (एक मार्मिक कहानी)

बैंक में अधिकारी रामबाबू गुप्ता को किसी चीज़ की कमी न थी, जयपुर जैसे शहर में आलीशान मकान, अच्छी पत्नी, दो बेटे, अनिल और सुनील, अनिल इंजीनियर था और सुनील इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र था, बड़ा बेटा अनिल कम्पनी की तरफ से लन्दन जा रहा था, बेटे के इतनी दूर जाने की चिंता थी, किन्तु एक तो लन्दन की मोटी तनख्वाह, उपर से मोहल्ले एवं परिचितों में जमने वाली धाक, अत: घर हर व्यक्ति प्रसन्न था.

एक बेटा विदेश तो दूसरा कॉलेज़ में, हँसता खेलते घर पर धीरे धीरे शांति छाने लगी, छोटा बेटा सुनील कभी कभार छुट्टियों में आ जाता तो पति-पत्नी के चेहरे पर कुछ दिनों के लिये मुस्कान आ जाती. इस बीच बड़े बेटे के लिये बहुत से रिश्ते आते थे, किन्तु वह तैयार नहीं था, उसने तो अब फोन करना भी लगभग बंद कर दिया था. कभी कभार जब माँ का मन होता तो वह अनिल को फोन मिला लेती किन्तु उन्हे यह ध्यान रखना होता था कि घड़ी में कितने बजे हैं और उस समय अनिल कहीं कार्यालय में न हो.

साल बीतते गये, सुनील की भी नौकरी लग गई और रामबाबू सेवानिवृत्त हो गये किन्तु अपने कैरियर की चिंता में अनिल ने फिर भारत का रूख नहीं किया, बेटे के विवाह और पोते का मुँह देखने को तरसते तरसते एक दिन रामबाबू की पत्नी स्वर्ग सिधार गयीं, किन्तु तब भी आवश्यक मीटिंग और उसके निरस्त होने पर होने वाले नुकसान का हवाला देकर, बड़ा बेटा माँ के अन्तिम संस्कार में भी नहीं आया. पत्नी की मौत के बाद रामबाबू भी अकेले पड़ गये, एक दिन छोटे बेटे का फोन आया कि वह भी कुछ महीनों के लिये अमेरिका जा रहा है, रामबाबू ने उसे मना करने का हर संभव प्रयास किया किन्तु कैरियर और दौलत की चाह में पिता की बाधा बेटे को बहुत नागवार गुजरी. सुनील के सामने अमेरिका के सुहाने सपने थे, उन सपनों को पूरा करने के लिये उसने पिता की बातों की परवाह नहीं की.
सुनील के अमेरिका जाने के बाद रामबाबू चिंतित रहने लगे, वह बार बार बेटों से भारत आने का आग्रह करते तो बेटों ने उन्हे फोन करना ही बंद कर दिया, कुछ समय तक रामबाबू अपनी तरफ से बेटों को फोन कर वापस आने के लिये कहते रहे किन्तु धीरे धीरे उन्होने भी कलेज़े पर पत्थर रख लिया, बेटे आये नहीं तो रामबाबू ने अपना घर बार बेचकर, सारा पैसा एक वृ्द्धाश्रम को दान कर दिया और वहीं रहने लगे. उन्होने फिर बेटों से संपर्क करने की कोशिश न की, न ही बेटों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि उनके पिता कहाँ है.
एक बार रामबाबू बीमार पड़े तो अंतिम समय निकट जान वृ्द्धाश्रम वालों ने रामबाबू द्वारा बताये गये परिचित मित्र को फोन किया, मित्र के पास रामबाबू के छोटे बेटे सुनील का संपर्क सूत्र था, उन्होने उसे फोन करके बताया कि तुम्हारे पिता बीमार हैं, जल्दी आ जाओ. सुनील ने कहा कि आप उन्हे अस्पताल में दाखिल कराओ, मैं आ रहा हूँ. किन्तु अनिल व सुनील आपस में यह तय न कर सके कि पिताजी को देखने कौन जायेगा और रामबाबू चल बसे. पिता के मित्र ने सुनील को सूचना दी कि तुम्हारे पिता नहीं रहे, कम से कम अंतिम संस्कार करने तो आ जाओ, इस पर सुनील ने कहा कि आप पिताजी के शरीर को बर्फ में रखवा दीजिये, मैं कुछ कोशिश करता हूँ. सुनील अमेरिका से सीधे भारत न आकर भाई के पास लंदन गया, वहाँ अनिल ने स्पष्ट रूप से भारत वापस जाने से मना कर दिया, दोनों भाईयों में बहस के बाद कुछ समझौता हुआ, जिसके फलस्वरूप सुनील को ही भारत आना पड़ा. भारत आकर सुनील ने पिता का अंतिम संस्कार किया, पिता के अंतिम संस्कार के बाद उसे पता चला कि उसके पिता ने अपनी सारी दौलत वृ्द्धाश्रम को दान कर दी थी. पता नहीं सुनील के मन में कैसे कैसे भाव उमड़ रहे थे.............

नोट:--यह कहानी एक मित्र द्वारा बताई गयी सच्ची घटना पर आधारित है, पात्रों के नाम बदल दिये गये हैं. यदि इस कहानी आपके हृदय को स्पर्श किया है, तो मुझे अवश्य बतायें.
पत्र व्यवहार का पता.
अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा. पिन:- 201310
ईमेल:- pandey.awadhesh@gmail.com
मो. 9958092091
 

Tuesday, January 1, 2013

ईसवी सन परिवर्तन को नववर्ष कहना अनुचित एवं अव्यवहारिक(2012-13)

ईसवी सन 2012 चला गया और नया ईसवी सन 2013 आ गया, ईसवी सन का महत्व दैनिक जीवन में है और रहेगा भी, इसको सभी ने स्वीकार कर लिया है, इसका विरोध करने वाले भी इसे अच्छी तरह जानते हैं, ऐसे लोग सांस्कृतिक राष्ट्र गौरव के कारण ईसवी सन का विरोध करते हैं, अन्यथा इसके विरोध का अन्य कोई औचित्य नहीं.
 
मेरी अपनी राय में यह सन परिवर्तन का यह क्षण है, साथ ही ईसाइयों के लिये मौज़ मस्ती का सप्ताह. भारतीय सभ्यता में इसे सिर्फ सन परिवर्तन की दृष्टि से देखा जाना चाहिये और अगर आवश्यक है तो स्नेही स्वजनों को भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों में नववर्ष की बजाय, ईसवी सन् का अवश्य उल्लेख होना चाहिये.
 
यह नववर्ष कदापि नहीं है, नववर्ष जब आता है तब प्रकृ्ति अपने आप संदेश देने लगती है, पेडों पर नये पत्ते लगना, ऋतु परिवर्तन, फसलें पकना, जीव जंतुओं के अंदर नई उर्ज़ा आना आदि घटनायें आदि इसके स्पष्ट लक्षण हैं. जरा सोचिये सर्वे भवंतु सुखिन: वाली भारतीय संस्कृति को आधार मानें और सोचें कि यह कैसा नववर्ष है जब प्रकृ्ति का एक बड़ा जीवन वर्ग (सरीसृप वर्ग) निर्जीव होकर सोता रहता हो. अगर यह नववर्ष होता तो अर्थ प्रधान इस युग में समूचा विश्व अपना वाणिज्य वर्ष अप्रैल से न शुरु करता.
 
भारतीय नववर्ष का महत्व जानने के लिये पहले इसके प्रति श्रद्धाभाव रख अध्ययन करना होगा और तब आपको प्रकृति स्वयं जनवरी और मार्च-अप्रैल का फर्क अनुभव कराने लगेगी. मेरे लेख का आशय 2013 का विरोध करना कदापि नहीं, मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि ईसवी सन का सम्मान आतिथ्य भाव से करें, किन्तु नववर्ष गर्व के साथ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही मनायें.
 
ईसवी सन 2012 में जो हमें महान आत्मायें हमें छोड़ कर चली गयीं, उन्हे सादर हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि.
 
!! भारत माता की जय !!