धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, December 31, 2012

ईसवी सन 2013

ईसवी सन 2013 की आपको हार्दिक शुभकामनायें,
इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

अंग्रेजों ने दे दी हमें, जो लूट की संस्कृति,
जीवन मूल्य बढाकर, अब पायें इससे मुक्ति.
स्वाधीन हुए हैं हम, फिर जीते क्यों परतंत्र में,
जागो मित्रों अब तो, फिर से अपना तंत्र बनायें.

इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

रहे सदा हमको, मानवता का ध्यान,
सब रहें सदा संपन्न, ऐसा हो विज्ञान.
जिस माटी ने हमको पाला, सोचो भूले क्या उसको,
संस्कारित हो जीवन अपना, शक्तिशाली भारत बनायें,

इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

Sunday, December 30, 2012

चैनल शर्मिंदा है

दामिनी की चिता अभी ठण्डी भी न हुई,
हीरो ग्लैमर लेके निकले हैं, मैयत में शामिल हाकिम.
दावा करते हैं जो चैनल, समाज की पीड़ा दिखाने का,
ये वही लोग है जो, लड़कियाँ स्वाहा करते चलते हैं.

घड़ियाली आँसू चाहे जितना ये बहा लें लेकिन,
टुकड़ा मिलते ही, थूक के चाट लेते हैं.
बदलना है समाज को, तो इनको बदलना होगा,
वर्ना ये जो लोग हैं, मुर्दे का कफन बेच लेते हैं.

इन भेडियों के चक्कर में न आना कभी बहनों,
दामिनी नाम की लड़कियाँ, इनके घर पे नहीं होती.
पीड़ा तुम्हे ही होगी, बच के रहना सीखो,
जागरुक रहकर जीनें में, कोई बुराई नहीं होती.

:- अवधेश पाण्डेय

 

बदलाव की आँधी (Badlav ki andhiyan)

बदन हमारा करके, दरिंदो के हवाले,
वे चैन से बैठे हैं, हम गुस्सा भी न करें.

इन जख्मों का मरहम, उसकी हैसियत में नहीं,
जिसने कुर्सी के लिये, अपना ईमान बेच डाला है.

इतिहास पलट के देखो, ऐ मुल्क के हुक्मरानों,
खुद को जलाकर हमने, बादशाहों को मिटाया है.

मुगालते में हैं वे, जो सोचते हैं अक्सर,
कि मोमबत्ती जलाकर, हम घर को लौट जायेंगे.




कमज़ोर दरख्तों को आँधी उखाड़ती है जैसे,
तुमको उखाड़ने के लिये, वैसी हवा अब आयी है.

कर रहे हैं इन्तज़ार, अब चुनाव के मौसम का,
कि लोकतंत्र की जड़ें, इस दिल में गहरे समाई है.

अपने बच्चों के लिये मुल्क बेचने वालों, संभलो!
भारत का हर बच्चा, मिलकर कसम खाता है,

इस बार ताज़ रखेगा, उस गरीब के सर पर,
जिसकी हर इबादत में, मुल्क का नाम होता है.

:- अवधेश पाण्डेय