धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, October 11, 2012

भारतीय राजनीति के आदर्श पुरुष: नाना जी देशमुख (nana ji deshmukh)

11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभणी के कडोली गाँव मे जन्मे और अपना सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक रहे नाना जी देशमुख का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. बचपन में ही माता पिता को खोने के बाद उनका लालन-पालन अपने मामा जी के यहाँ हुआ. संघ संस्थापक डा. हेडगेवार के संपर्क में आने के बाद उन्हे जैसे जीवन का लक्ष्य मिल गया. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में संघ कार्य का विस्तार करने के साथ ही उन्होने देश के बच्चों में राष्ट्र-समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति जागृ्ति फैलाकर उत्तम गुणवत्ता वाली  शिक्षा देने के लिये गोरखपुर में ही प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की. आज देशभर में ऐसे अनगिनत विद्यालय चल रहे हैं और इन विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करके निकले विद्यार्थी राष्ट्र और समाज के विकास के लिये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं.

1952 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद नाना जी को उत्तर प्रदेश का दायित्व सौंपा गया. भारत में पहली गैर काँग्रेसी सरकार बनवाने का श्रेय नाना जी को ही है. जेपी, लोहिया जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होने इन्दिरा गाँधी के कुशासन और आपातकाल को चुनौती दी. बाद में 1977 में बनी पहली गैर काँग्रेसी सरकार में उन्हे मंत्रीपद का दायित्व संभालने का अवसर मिला, किन्तु उनका यह मानना था कि 60 वर्ष के पश्चात व्यक्ति को समाज का ही कार्य करना चाहिये न कि राजनीति और उन्होने स्वयं मंत्री पद अस्वीकार करके इसका उदाहरण पेश किया. आज जब आयु के 80वें पड़ाव में खड़े लोग जब राजनीति में अपनी महात्वाकांक्षा के कारण कुछ भूमिका तलाशते हुए नज़र आते हैं तब नाना जी के त्याग का अनायाश स्मरण हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार बलरामपुर के जानकीनगर को नाना जी अपनी कर्मस्थली चुना था. वहाँ पहुँचने के पश्चात उन्होने वहाँ के निवासियों को देव स्वरूप बता उनकी सेवा में अपना जीवन बिताने का निश्चय किया. उस समय वह बलरामपुर के सांसद थे और चुनाव के पूर्व उन्होने बलरामपुर के लोगों को वचन दिया था कि वह अब उन लोगों का जीवन स्तर सुधार कर ही अन्यत्र कहीँ जायेंगे. अभी बीते दिनों बलरामपुर के जयप्रभा ग्राम (जानकीनगर) जाने का सौभाग्य मिला. 80 के दशक में जो कार्य वहाँ नाना जी ने किया उसे देखकर नाना जी की आधुनिक एवं वैग्यानिक सोच का पता चलता है. नाना जी जयप्रभा ग्राम में सरकारी बैंक, डाकघर, टेलीफोन, सरस्वती विद्यालय एवं कृषि एवं पशुपालन के क्षेत्र में अनुकरणीय प्रयोगों को स्थापित किया. नाना जी ने पाया कि  उस क्षेत्र की मूल समस्या सिंचाई सुविधा का न होना था. अत: उन्होने बैंक से किसानों को कर्ज़ दिलाकर जमीन में 70-80 हज़ार नलकूप लगवाये, जिससे किसानों की मेहनत उनकी फसल बिन पानी बर्बाद न हो. आज भी बलरामपुर गन्ने के उत्पादन में अग्रणी है, जिससे वहाँ के किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरी है. किसानों में आध्यात्मिक चेतना जगाने के लिये नाना जी ने वहाँ एक सुंदर मंदिर भी बनवाया, जिसमें भारत के सभी तीर्थस्थलों का लघु चित्रण किया गया है. आज भी जय-प्रभा ग्राम संघ व अन्य समाज से जुड़े संगठनों के लिये प्रेरणाश्रोत है.

महाराष्ट्र के बीड और उत्तर प्रदेश के गोण्डा-बलरामपुर में कार्य करने के पश्चात जब उन्होने पूर्ण राजनीतिक वनवास लिया तो उन्होने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की वनवास स्थली चित्रकूट को अपने कार्य के लिये चुना और जीवन के शेष वर्ष वहीं बिताने का निश्चय किया. उनका कहना था कि हम अपने लिए नही, अपनों के लिए हैं, अपने वे हैं जो पीडि़त व उपेक्षित हैं. चित्रकूट में उन्होने देश के प्रथम ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की. उनका स्वप्न था हर हाथ को काम और हर खेत को पानी.

ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने को स्वप्न आँखों में सँजोये नाना जी का देहावसान 27 फरवरी 2010 को चित्रकूट में हुआ. अपना जीवन भारत के लोगों और तत्पश्चात मृत शरीर भी अखिल भारतीय आर्युविग्यान संस्थान को दान कर उन्होने भारत की ऋषि परंपरा का अनुपम उदाहरण हमारे सामने रखा.

मौन तपस्वी साधक बनकर हिमगिरि सा चुप चाप गले. इन पक्तियों को अपने जीवन में उतार राष्ट्र का कार्य करने वाले नाना जी से जब थोड़ा बहुत कार्य कर प्रचार पाने वाले समाजसेवियों को देखता हूँ, तो नाना जी की महानता को अनगिनत बार नमन करने को मन करता है.

अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर-37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 91-99580-92091





 

Tuesday, October 9, 2012

भारत बनाना रिपब्लिक नहीं, कुप्रबंधन का शिकार है. (India-banana-bad-mgmt)

121 करोड़ सक्षम लोगों के देश को बनाना रिपब्लिक का नाम दे दिया है राबर्ट वाड्रा ने. यह हमारे देश के लोगों की प्रशासनिक क्षमता पर करारा प्रहार है. हम केले जैसे एक-दो उत्पाद बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं चला रहे, बल्कि सदियों से विश्व को बहुत से संसाधन उपलब्ध कराते रहे हैं. फिर भी राबर्ट वाड्रा ऐसे अकेले शख्श नहीं है, जिन्होने देश को ऐसा नाम दिया है. देश में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर और जनता का खून चूसकर अपनी तिजोरी भरने वाले, पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित अनेक लोगों का यही मत है. यह भी पूर्ण सत्य है कि देश पर सबसे ज्यादा शासन गाँधी परिवार के किसी न किसी प्रतिनिधि ने किया और अपनी खराब प्रशासनिक क्षमता और चाटुकारिता प्रेम के कारण वह देश को अच्छा प्रबंधन न दे सकने के कारण वह लोग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, किन्तु ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि सिर्फ गाँधी परिवार को देश के कुप्रबंधन के लिये दोष देना समस्या का समाधान नहीं है.

इन सबके मूल में चिंतन करने से मुझे लगता है कि देश की असली समस्या, देश को आगे ले जाने की सोच रखने वाले महापुरुषों का अपने अपने अहम के कारण एक संगठित प्रयास न करना है. सभी अपने अपने अहम की तुष्टी के लिये अपने अपने को श्रेष्ठ बताते रहे और देश अपेक्षित गति से तरक्की न कर सका. आज भी कमोवेश वही स्थिति है, जब देश को काँग्रेस के कुशासन के विरुद्ध संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है, तब लोग अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अपनाये हुए अपरोक्ष रूप से काँग्रेस को ही फायदा पहुँचाने वाली बात कर देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं.

1857 (ईसवी सन ) का प्रथम स्वतंत्रता समर याद कीजिये, सभी सेनानी देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे, किन्तु समय से संगठित प्रयास न करने के कारण उन्हे असफलता हाथ लगी थी. उस समर के परिणाम, ईस्ट इण्डिया कंपनी व ब्रतानिया शासन से हमने कभी सबक नहीं लिया, क्या अंग्रेज़ों में आपस में मतभेद न रहे होंगे, क्या राबर्ट क्लाइव की अपनी महात्वाकांक्षा न रही होगी, वह चाहता तो ब्रतानिया हूकुमत से हज़ारों मील दूर स्वयं की सत्ता कायम करने का प्रयास कर सकता था. किन्तु उन सबने अपनी राजसत्ता ( परम लक्ष्य) के लिये अपने अहम को भुला दिया. इतिहास साक्षी है कि अंग्रेज़ो ने किसी भी आधार पर कभी भी आपस में मतभेद के चलते या जाने-अनजाने कभी भी स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे भारतीयों का सहयोग नहीं किया.

अभी बीते दिनों राष्ट्रवादियों का दिल्ली में एक बड़ा सम्मेलन हुआ था, संपूर्ण देश से 150 के लगभग प्रतिभाशाली लोग आये थे, ऐसा नहीं था कि आये हुए लोगों में देशभक्ति नहीं थी, किन्तु निश्चय ही उनमें अपने लक्ष्य के प्रति सही साधना व समग्र प्रयास का अभाव था. परिणाम स्वरूप उस बैठक के निष्कर्ष के बारे में किसी ने चिंता नहीं की. आज भी देश में अलग अलग देश को आगे ले जाने वाले कई प्रयास चल रहे हैं, किन्तु जिस समग्र प्रयास की आवश्यकता है वह नहीं हो पा रहा है और यह समस्या अनुभवहीन व्यक्तियों की ही नहीं है, यह समस्या देश के लिये अपना जीवन होम करने वालों में भी दिखती है.

आने वाला समय चुनौती पूर्ण है, जो भविष्य के भारत की नींव का निर्माण करेगा. हमारे देश के युवक-युवतियों के सामने व्यक्तिगत लक्ष्य जैसे अच्छी आजीविका, अच्छा जीवन साथी, अच्छा घर आदि तो है किन्तु एक अच्छा व विकसित देश बनाने का राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं है. बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हे भारत की वर्तमान व्यवस्था से चिढ़ हुई भी तो उन्हे भारत को अच्छा बनाने लिये आवश्यक परिवर्तन करने के बजाय विदेशों में रहना ज्यादा श्रेयस्कर लगा.

कहने का अभिप्राय यह है कि देश में अच्छे लोगों या संसाधनों की कमी कभी नहीं रही, किन्तु जब तक कुछ वर्षों के लिये सभी लोग अपना अहम भुलाकर समग्र प्रयास नहीं करेंगे, वह परिवर्तन नहीं हो सकता जैसा वह खुद करना चाहते हैं.

!! भारत माता की जय !!