धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, August 5, 2012

वर्तमान भारत में राजनीति से कल्याण की अपेक्षा करना व्यर्थ

राजनीति के माध्यम से सेवा करने का फैसला करने वाले नये नेता श्री केशु भाई पटेल जी है, राजनीति करते हुए उम्र बीत गयी और सेवा का फैसला अब लिया है. अभी तक सत्ता की राजनीति कर रहे थे अब सेवा की राजनीति करने जा रहे हैं. अपनी राजनीति चमकाने ले लिये ऐसा कहने वाले केशुभाई पहले नेता नहीं हैं. यह हमारे अधिकांश नेताओं का वास्तविक चरित्र है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वीतिय सर संघ चालक परम पूज्य श्री गुरु जी गोलवरकर ने कहा था कि राजनीति केमाध्यम से देश और समाज का कल्याण करने की अपेक्षा करना वैसे ही है जैसे हथेली पर सरसों उगाना.
 देश को निश्चय ही अच्छे राजनीतिक नेता चाहिये, किन्तु अच्छे नेताओं की आवश्यकता हर क्षेत्र में है, सिर्फ राजनीति में नहीं. बिना प्रचार प्रसार ऐसे प्रयास देश भर में होते रहे हैं और होते रहेंगे. भारत का दुर्भाग्य यह है कि अधिकांशत: लोग सिर्फ सत्ता के जरिये परिवर्तन चाहते हैं, जिससे उनकी सही मंशा भी शक की निगाह से देखी जाने लगती है. अन्ना जी के आंदोलन से बड़ा परिवर्तन हो सकता था और उनके प्रभाव से देशवासियों में राजनैतिक चेतना जागी भी है किन्तु यह जागृति अभी सीमित है. इस दिशा में और प्रयास करने की आवश्यकता है. श्री अरविंद केजरीवाल बेहद प्रतिभाशाली हैं किन्तु अगर उनका उद्देश्य वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन है तो उन्हे देश के हर गली कूचे में अपने जैसे नौजवान खड़े करने चाहिये जो एक समय के बाद विलासिता से भरी नौकरी को त्याग देश समाज के लिये कार्य करने में जुट जायें. सत्ता के माध्यम से परिवर्तन चाहने की अपेक्षा उनकी अपनी प्रतिभा से न्याय नहीं होगा.
दुर्भाग्य से देश में कोई संगठन ऐसा नहीं है, जो जन-जन में राजनैतिक चेतना जगाने के लिये कार्य कर रहा हो, कुछ संगठन इस दिशा में कार्य कर रहे हैं किन्तु किसी विचार या मार्ग के चलते उनका झुकाव एक खास राजनैतिक दल की ओर ज्यादा होता है जिससे उस दल के द्वारा किये गये गलत कार्यों को वह लगातार नज़र अंदाज करते जाते हैं और परिणामस्वरूप देश-समाज में जैसा परिवर्तन वह चाहते हैं वह नहीं हो पाता. ऐसे  संगठन अपनी कार्यशैली में लचीलापन नहीं ला पाते जिससे समय समय पर मिले अवसरों को वह गँवाते रहे हैं.
राज्य सत्ता में आमूल चूल परिवर्तन शिवाजी महाराज ने किया था, जब मुगल साम्राज्य से त्रस्त जनता को उन्होने हिन्दू साम्राज़्य की कल्पना दी थी और फिर अवसर मिलने पर उन्हे साकार भी किया था. उन्होने अपने राज्यनिवासियों को यह करके दिखाया था कि स्वराज मुगलों से बहुत बेहतर है और इसी कारण उनके सैनिक व जनता उन पर जान न्यौछावर करने में संकोच नहीं करते थे. व्यवस्था परिवर्तन चाहने वाले लोगों को शिवाजी महाराज के कार्यकाल का अवश्य अध्ययन करना चाहिये.
राजनीतिक चालें चलने में मशहूर व्यक्ति को आज भी चाणक्य उपनाम से संबोधित किया जाता है, किन्तु कितने लोग ऐसे हैं जो सत्ता प्राप्ति के पश्चात महात्मा चाणक्य जैसा जीवन जी सकते हैं. महात्मा चाणक्य के शब्दों में " जिस देश का प्रधानमंत्री कुटी में निवास करता है, उस देश की जनता महलों में रहती है और जिस देश का प्रधानमंत्री महलों मे रहता है, उस देश की जनता को कुटियों में निवास करना पड़ता है."
किसी भी माध्यम से जन कल्याण चाहने वाले लोग अगर तपस्वी जीवन छोड़ विलासिता भरा जीवन जीते हुए अगर परिवर्तन की चाह रखते हैं तो भारत जैसे देश में यह बहुत कठिन है. ऐसा भी नहीं है भारत जैसा देश सदैव ऐसे ही रहेगा, कुछ समय के पश्चात भारत में व्यक्ति पहचान का संकट आ सकता है, जिससे लोग समाज में अपनी पहचान बनाने के लिये अच्छे कार्य करना शुरु कर सकते हैं. देश के लिये यह आदर्श स्थिति होगी, जब भारतीय युवक अपनी मेधा का उपयोग धन के लिये कम और राष्ट्रनिर्माण के लिये अधिक करेंगे.
उसी घड़ी की प्रतीक्षा में....
आपका अवधेश.

1 comment:

NS said...

Be positive. The change is coming.