धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, March 10, 2012

उत्तर प्रदेश में भाजपा क्यों हारी (BJP loss in UP)

बहुप्रतिक्षित उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2012 संपन्न हो गये, आशा के विपरीत समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला, बसपा क्यों हारी, राहुल का जादू क्यों नहीं चला या अखिलेश ने पार्टी को बदल दिया, यह विषय टीवी और अखबारों पर खूब देखा सुना, लेकिन भाजपा क्यों हारी, इस पर मंथन नहीं हुआ.

वास्तव में चुनावों के पूर्व बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाकर तो भाजपा ने अपनी हार के लिये सिर्फ एक बहाना ढूँढा था अन्यथा पार्टी ने अपनी हार की पटकथा पहले ही लिख दी थी.

सत्य यह है भाजपा अब नेताओं की पार्टी बन चुकी है,  अब वह कैडर और कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रही. नेताओं के भाषण और कृति में बडा फर्क हो चुका है. कार्यकर्ताओं एवं समाज को एकता व सद्भाव का पाठ पढाने वाले नेताओं मे ही आपसी फूट है. पार्टी पर वंशवाद और टिकट वितरण में धाँधली के आरोप लगते रहे हैं.

आज पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता को यह विश्वास नहीं है कि जमीन पर मेहनत करने से उसकी तरक्की हो सकती है, जोडतोड कर सरकार बनाने वाली यह पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से जोडतोड की अपेक्षा ही रखती है. पार्टी में आगे बढने का मार्ग सेवा एवं कर्तब्य भावना नहीं चापलूसी हो चुकी है.

वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा का ही नम्बर था, लेकिन फिर भी पार्टी अपने आप को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश नहीं कर सकी. इसके लिये पार्टी को उत्तर प्रदेश की जनता एवं अपने समर्थकों से क्षमा याचना करनी चाहिये.

वैसे उमा जी को उत्तरप्रदेश की जनता ने विधानसभा में भेजकर लम्बे समय में पार्टी की संभावनायें बलवती कर दी हैं, साफ है कि पार्टी के पास विधानसभा में अब अखिलेश का एक मजबूत विकल्प मौजूद है. अब पार्टी को एक सवर्ण युवा नेतृत्व ढूँढना होगा, जो बिखरे सवर्ण मतदाताओं को एक कर सके.

बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर पार्टी का एक संदेश साफ था कि अब वह पिछडों की राजनीति करने जा रही है जो इस दिशाविहीन पार्टी के लिये शुभसंकेत है. वैसे भी काँग्रेस ने लम्बे समय के लिये पिछडे और मुस्लिमों के बीच आरक्षण का शिगूफा छोडकर उनके बीच में जो खाई खोदी है, उसे पाटने के लिये अखिलेश सक्षम नहीं हैं.

आने वाले लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं और उनकी राय को प्राथमिकता दे कर पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में फिर से जान डाल सकती है. अगर भाजपा लोकसभा चुनावों का इस्तेमाल नहीं पायी तो उत्तर प्रदेश में संगठन को फिर से खडा करना बहुत मुश्किल कार्य होगा और कम से कम 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी से बहुत ज्यादा अपेक्षा रखना व्यर्थ ही होगा.

3 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

NICE.
SEE YOUR POST HERE:
http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/03/bjp.html

रविकर said...

sahi vishleshan

Madhusudan Jhaveri said...

sahi mimansa
Dr. Madhusudan