धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, February 27, 2012

अरविन्द केजरीवाल ने क्या गलत कहा है? (What's went wrong in Kejriwal's statement)

संसद और साँसदो पर अरविन्द केजरीवाल की टिप्पणी जनता की आवाज है, लेकिन मीडिया और राजनीतिक दल इसे हल्के में लेने की भूल कर रहे हैं, अरविन्द ने जो कहा उसे कहने वाले प्रत्येक गली कूचे में मिल जायेंगे, अरविन्द ने उनकी आवाज़ को सिर्फ एक मंच दिया है.

मीडिया ने राजनेताओं को लेकर जितना हल्ला मचाया है, उसका 10% भी अगर वो सडक पर निकलकर जनता से पूछें तो सच्चाई सामने आ जायेगी. सत्य यही है कि जनता संसद और साँसदो से ऊब चुकी है और वह सभी नेताओं को अब एक ही तराजू पर तौलने लगी है. क्या यह सच नहीं है, कि एक बार वोट देने के बाद जनता को अपने उसी प्रतिनिधि के हाथपैर जोडने पडते हैं, अगर यह सच है तो इसे स्वीकार करने से परहेज क्यों.

संसद में बैठे साँसदों का लेखा जोखा तो मेरे पास नहीं, लेकिन सत्य यह है कि अव्वल तो राजनेताओं पर म‌ामले दर्ज ही नहीं होते और अगर दर्ज‌ हो भी गये तो निष्पक्ष जाँच नहीं होती, फिर सजा का प्रश्न तो उठता ही नहीं है. अगर जनप्रतिनिधियों पर दर्ज मामलों की ईमानदारी से जाँच की जाये तो संसद का बडा ही वीभत्स चेहरा सामने आयेगा.

पिछले वर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ हो हल्ला मचाने वाले राजनीतिक दलों ने क्षणिक फायदे के लिये उत्तरप्रदेश में भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को गले लगाने में देर नहीं लगाई. जनता के अपराधियों को गले लगाते वक्त उन्होने अपने ईमानदार कैडर की भी परवाह नहीं की. मुझे संदेह ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि किसी राजनीतिक नेता ने अपने उन कैडरों का दर्द जानने की कोशिश नहीं की होगी.

निश्चय ही देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं जिसके नेताओं में परिवर्तन का दम हो, अत: परिवर्तन का स्वप्न दिखाने वाले बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे आज जनता के नेता हैं, अरविन्द केजरीवाल सिर्फ एक चेहरा ही नहीं, वह देश में फैली हुई अराजकता और अव्यवस्था के खिलाफ युवाओं की आवाज़ बन चुके हैं, उनपर आरोप लगाकर आप सच्चाई से मुंह नहीं मोड सकते. यह बात मीडिया और राजनीतिक दलों को जितनी जल्दी समझ आ जाये लोकतंत्र के लिये उतना ही अच्छा है.

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