धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, January 1, 2012

भारत की हत्यारी काँग्रेस (Congress: the killer of nation)

एक फेसबुक मित्र ने अपनी वाल पर लिखा कि अगर आपको आत्महत्या करना हो तो काँग्रेस को वोट दे दीजिये. उस मित्र से एक कदम आगे बढकर मुझे लगता है कि अगर आपको देश के हत्या करनी हो तो काँग्रेस को वोट दे दीजिये. अगर आपको यह सही नहीं लगता तो खुद सोचिये कि काँग्रेस को देश की जनता ने जितनी बार वोट दिया, उतना शायद किसी को नहीं दिया होगा और आगे भी किसी पार्टी को इतनी बार मौका नहीं मिलेगा, यह ध्रुव सत्य है, लेकिन बदले में काँग्रेस ने प्रत्येक बार देश की हत्या करने की कोशिश की और देश को वेंटिलेटर पर छोड दिया है.

काँग्रेस यह दावा करती है कि उसी पार्टी ने देश को स्वंतत्र कराया, लेकिन सच यह है कि काँग्रेस ने आजादी के लिये कोई लडाई लडी ही नहीं, सिर्फ काँग्रेस के धूर्त और चालाक नेताओं ने आजादी का आंदोलन हाईजैक कर लिया था. 1885 में काँग्रेस की स्थापना का उद्देश्य उसके नेताओं की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना था. कारण साफ था, अंग्रेज 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से बेहद डर चुके थे, अत: उन्होने कुछ अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों को सत्ता में पद देकर मिलाने की चाल रची और काँग्रेस का जन्म हुआ. तब से काँग्रेस उसी फार्मुले पर चलते हुए येन केन प्रकारेण सत्ता पर अपनी पकड बनाये रखना चाहती है. कुछ समय पश्चात काँग्रेस का ब्रिटिश सत्ता के साथ विरोध बढता गया और काँग्रेस में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्टृवादी नेता भी जुडते गये और अंग्रेजों का प्रबल विरोध करने लगे इसके साथ ही काँग्रेस गरम दल और नरम दल में बँट गयी. गरम दल का नेतृत्व तिलक कर रहे थे तो नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले कर रहे थे. तिलक की लोकप्रियता बढती जा रही थी, यह कहें कि उनके जैसा नेता कोई और न था तो अतिशयोक्ति न होगी. इसी समय अंग्रेजो ने फिर चाल चली और 1915 में महात्मा के रूप में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से वापस आ गये. उन्होने नरम दल का साथ देना शुरु कर दिया. देश के दुर्भाग्य से तिलक की मृत्यु हो गयी और गाँधी जी काँग्रेस पर हावी हो गये. उसके बाद काँग्रेस ने खिलाफत आंदोलन, नमक सत्याग्रह आदि आंदोलन किये जिनका देश की आजादी से संबंध न होकर कुछ और था. 1920 में तिलक की मृत्यु के बाद देश की आजादी की माँग क्रांतिकारियों ने की और बहुत सारे काँतिकारियों ने देश के लिये सर्वोच्च बलिदान भी किया. बिस्मिल की सक्रियता के कारण शाहजहाँपुर उस समय क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र था. 1927 में काकोरी काण्ड के क्रांतिकारियों को फाँसी के साथ ही पूरे देश में आजादी के लिये उबाल आ गया और उसी का फायदा उठाने के लिये 26 जनवरी 1929 को जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में काँग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की माँग कर डाली. पूर्ण स्वराज्य का मतलब आजादी न होकर एक स्वायत्त शासन व्यवस्था की माँग थी. 1942 का असहयोग आंदोलन मुख्य रूप से डा. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायन और अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं ने चलाया और काँग्रेस इस आंदोलन से खुद को अलग तो नहीं कर पायी लेकिन उनके नेताओं में आंदोलन को लेकर मतभेद बना रहा.

1947 में अगर देश को बाँटने की अंग्रेजो की चाल सफल हुई तो उसके पीछे सिर्फ काँग्रेस के सत्ता लोलूप नेता ही थे, कोई और नहीँ. खैर किसी प्रकार मिली स्वतंत्रता के पश्चात गाँधी जी के अंधप्रेम ने नेहरु जैसे सत्तालोलूप एवम अक्षम नेता को देश की बागडोर दे दी, जबकि काँग्रेस के पास उस समय सरदार पटेल जैसा नेता मौजूद था, जिनके अथक और कूटनीतिक प्रयासों के कारण बहुत से राज्यों ने भारतीय गणतन्त्र में शामिल होना स्वीकार किया, वहीं नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण कश्मीर समस्या देश के सामने आज भी मुँह बाये खडी है.

सरदार पटेल के बाद देश को लाल बहादुर शास्त्री जैसा नेता भी मिला लेकिन बहुत जल्दी ही उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गयी और काँग्रेस ने उन्हे भुलाते देर नहीं लगायी. इसी प्रकार के अन्य राष्ट्रवादी व्यक्तियों को 1947 के बाद की काँग्रेस ने भुला दिया. शास्त्री जी के बाद इन्दिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, उनके इस लोकप्रिय नारे की वजह से काँग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला और इन्दिरा निरंकुश हो गयीं, जिसकी परिणिति 1977 में काँग्रेस की जबरदस्त हार और भारत में प्रथम गैर काँग्रेसी सरकार के रूप में हुई. देश और लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत यह है कि 1977 के बाद काँग्रेस का जो पतन शुरु हुआ वह अभी तक नहीं रुका.
डा. राम मनोहर लोहिया तो काँग्रेस और जवाहरलाल नेहरु से बहुत नफरत करते थे और उन्होने काँग्रेस हटाओ-देश बचाओ का नारा भी दिया था, लेकिन अब उनके नाम पर समाजवाद की राजनीति कर रही सपा अपने नेताओं की स्वार्थ सिद्धि के लिये काँग्रेस के तलवे चाटती रहती है.

काँग्रेस की देशघाती राजनाति इन्दिरा के बाद राजीव के जमाने में भी जारी रही और राजीव गाँधी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय को भी पलट दिया. स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिकता का इससे बडा उदाहरण ढूँढना मुश्किल है. एक बार इन्ही राजीव ने कहा था कि सरकार के यहाँ से चला 1 रुपया जनता के पास पहुँचते पहुँचते 15 पैसे हो जाता है, कारण सिर्फ यही था कि बाकी के 85 पैसे काँग्रेस का हाथ खा जाता था, 1948 में जब पहली बार जीप घोटाला सामने आया था, तब से आज 2जी तक काँग्रेस का हाथ ही खाने और बचाने के लिये जिम्मेदार है. आज भी दिल्ली में लोकायुक्त की जाँच रिपोर्ट धूल खा रही है और काँग्रेस की शीला सरकार वैसे ही बरकरार है, तो 2जी में चिदंबरम तब तक सरकार में बने रहेंगे जब तक माननीय उच्चतम न्यायालय उन्हे दोषी न मान ले.

काँग्रेस की राजनीति का एक पहलू यह भी है कि उसने कई बार संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए चुनी गयी लोकतांत्रिक सरकारों को बर्खास्त कर चुकी है.

अभी बीते दिनों में हमने देखा है कि लोकपाल बिल पर जनभावना और राज्यसभा के बहुमत को काँग्रेस ने किस प्रकार नकारा है. मेरे कहने का सार यही है, कि काँग्रेस का पंजा न जाने कितनी बार लोकतंत्र का गला घोंट चुका है और आने वाले समय में भी यह पंजा लूट खसोट मचाता हुआ देश की हत्या करता रहेगा. बेहतर होगा कि देश के नागरिक यह भूल जाँय कि मतपत्र या वोटिंग मशीन में पंजा भी कोई चुनाव निशान है. देश हित में काँग्रेस जैसी घिनौनी राजनीति करने वाली पार्टी का एक पार्षद भी न जीते तो अच्छा है, लोकसभा में काँग्रेस का प्रतिनिधि तो दूर की बात है.

1 comment:

निर्झर'नीर said...

avdhesh ji ..cunaav aa gaye hai ab .bhi agar .janta nahi jagti hai to koi kuch nahi kar sakta ..