धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, December 31, 2012

ईसवी सन 2013

ईसवी सन 2013 की आपको हार्दिक शुभकामनायें,
इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

अंग्रेजों ने दे दी हमें, जो लूट की संस्कृति,
जीवन मूल्य बढाकर, अब पायें इससे मुक्ति.
स्वाधीन हुए हैं हम, फिर जीते क्यों परतंत्र में,
जागो मित्रों अब तो, फिर से अपना तंत्र बनायें.

इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

रहे सदा हमको, मानवता का ध्यान,
सब रहें सदा संपन्न, ऐसा हो विज्ञान.
जिस माटी ने हमको पाला, सोचो भूले क्या उसको,
संस्कारित हो जीवन अपना, शक्तिशाली भारत बनायें,

इस बार अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

Sunday, December 30, 2012

चैनल शर्मिंदा है

दामिनी की चिता अभी ठण्डी भी न हुई,
हीरो ग्लैमर लेके निकले हैं, मैयत में शामिल हाकिम.
दावा करते हैं जो चैनल, समाज की पीड़ा दिखाने का,
ये वही लोग है जो, लड़कियाँ स्वाहा करते चलते हैं.

घड़ियाली आँसू चाहे जितना ये बहा लें लेकिन,
टुकड़ा मिलते ही, थूक के चाट लेते हैं.
बदलना है समाज को, तो इनको बदलना होगा,
वर्ना ये जो लोग हैं, मुर्दे का कफन बेच लेते हैं.

इन भेडियों के चक्कर में न आना कभी बहनों,
दामिनी नाम की लड़कियाँ, इनके घर पे नहीं होती.
पीड़ा तुम्हे ही होगी, बच के रहना सीखो,
जागरुक रहकर जीनें में, कोई बुराई नहीं होती.

:- अवधेश पाण्डेय

 

बदलाव की आँधी (Badlav ki andhiyan)

बदन हमारा करके, दरिंदो के हवाले,
वे चैन से बैठे हैं, हम गुस्सा भी न करें.

इन जख्मों का मरहम, उसकी हैसियत में नहीं,
जिसने कुर्सी के लिये, अपना ईमान बेच डाला है.

इतिहास पलट के देखो, ऐ मुल्क के हुक्मरानों,
खुद को जलाकर हमने, बादशाहों को मिटाया है.

मुगालते में हैं वे, जो सोचते हैं अक्सर,
कि मोमबत्ती जलाकर, हम घर को लौट जायेंगे.




कमज़ोर दरख्तों को आँधी उखाड़ती है जैसे,
तुमको उखाड़ने के लिये, वैसी हवा अब आयी है.

कर रहे हैं इन्तज़ार, अब चुनाव के मौसम का,
कि लोकतंत्र की जड़ें, इस दिल में गहरे समाई है.

अपने बच्चों के लिये मुल्क बेचने वालों, संभलो!
भारत का हर बच्चा, मिलकर कसम खाता है,

इस बार ताज़ रखेगा, उस गरीब के सर पर,
जिसकी हर इबादत में, मुल्क का नाम होता है.

:- अवधेश पाण्डेय

Thursday, October 11, 2012

भारतीय राजनीति के आदर्श पुरुष: नाना जी देशमुख (nana ji deshmukh)

11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभणी के कडोली गाँव मे जन्मे और अपना सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक रहे नाना जी देशमुख का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. बचपन में ही माता पिता को खोने के बाद उनका लालन-पालन अपने मामा जी के यहाँ हुआ. संघ संस्थापक डा. हेडगेवार के संपर्क में आने के बाद उन्हे जैसे जीवन का लक्ष्य मिल गया. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में संघ कार्य का विस्तार करने के साथ ही उन्होने देश के बच्चों में राष्ट्र-समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति जागृ्ति फैलाकर उत्तम गुणवत्ता वाली  शिक्षा देने के लिये गोरखपुर में ही प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की. आज देशभर में ऐसे अनगिनत विद्यालय चल रहे हैं और इन विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करके निकले विद्यार्थी राष्ट्र और समाज के विकास के लिये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं.

1952 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद नाना जी को उत्तर प्रदेश का दायित्व सौंपा गया. भारत में पहली गैर काँग्रेसी सरकार बनवाने का श्रेय नाना जी को ही है. जेपी, लोहिया जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होने इन्दिरा गाँधी के कुशासन और आपातकाल को चुनौती दी. बाद में 1977 में बनी पहली गैर काँग्रेसी सरकार में उन्हे मंत्रीपद का दायित्व संभालने का अवसर मिला, किन्तु उनका यह मानना था कि 60 वर्ष के पश्चात व्यक्ति को समाज का ही कार्य करना चाहिये न कि राजनीति और उन्होने स्वयं मंत्री पद अस्वीकार करके इसका उदाहरण पेश किया. आज जब आयु के 80वें पड़ाव में खड़े लोग जब राजनीति में अपनी महात्वाकांक्षा के कारण कुछ भूमिका तलाशते हुए नज़र आते हैं तब नाना जी के त्याग का अनायाश स्मरण हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार बलरामपुर के जानकीनगर को नाना जी अपनी कर्मस्थली चुना था. वहाँ पहुँचने के पश्चात उन्होने वहाँ के निवासियों को देव स्वरूप बता उनकी सेवा में अपना जीवन बिताने का निश्चय किया. उस समय वह बलरामपुर के सांसद थे और चुनाव के पूर्व उन्होने बलरामपुर के लोगों को वचन दिया था कि वह अब उन लोगों का जीवन स्तर सुधार कर ही अन्यत्र कहीँ जायेंगे. अभी बीते दिनों बलरामपुर के जयप्रभा ग्राम (जानकीनगर) जाने का सौभाग्य मिला. 80 के दशक में जो कार्य वहाँ नाना जी ने किया उसे देखकर नाना जी की आधुनिक एवं वैग्यानिक सोच का पता चलता है. नाना जी जयप्रभा ग्राम में सरकारी बैंक, डाकघर, टेलीफोन, सरस्वती विद्यालय एवं कृषि एवं पशुपालन के क्षेत्र में अनुकरणीय प्रयोगों को स्थापित किया. नाना जी ने पाया कि  उस क्षेत्र की मूल समस्या सिंचाई सुविधा का न होना था. अत: उन्होने बैंक से किसानों को कर्ज़ दिलाकर जमीन में 70-80 हज़ार नलकूप लगवाये, जिससे किसानों की मेहनत उनकी फसल बिन पानी बर्बाद न हो. आज भी बलरामपुर गन्ने के उत्पादन में अग्रणी है, जिससे वहाँ के किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरी है. किसानों में आध्यात्मिक चेतना जगाने के लिये नाना जी ने वहाँ एक सुंदर मंदिर भी बनवाया, जिसमें भारत के सभी तीर्थस्थलों का लघु चित्रण किया गया है. आज भी जय-प्रभा ग्राम संघ व अन्य समाज से जुड़े संगठनों के लिये प्रेरणाश्रोत है.

महाराष्ट्र के बीड और उत्तर प्रदेश के गोण्डा-बलरामपुर में कार्य करने के पश्चात जब उन्होने पूर्ण राजनीतिक वनवास लिया तो उन्होने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की वनवास स्थली चित्रकूट को अपने कार्य के लिये चुना और जीवन के शेष वर्ष वहीं बिताने का निश्चय किया. उनका कहना था कि हम अपने लिए नही, अपनों के लिए हैं, अपने वे हैं जो पीडि़त व उपेक्षित हैं. चित्रकूट में उन्होने देश के प्रथम ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की. उनका स्वप्न था हर हाथ को काम और हर खेत को पानी.

ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने को स्वप्न आँखों में सँजोये नाना जी का देहावसान 27 फरवरी 2010 को चित्रकूट में हुआ. अपना जीवन भारत के लोगों और तत्पश्चात मृत शरीर भी अखिल भारतीय आर्युविग्यान संस्थान को दान कर उन्होने भारत की ऋषि परंपरा का अनुपम उदाहरण हमारे सामने रखा.

मौन तपस्वी साधक बनकर हिमगिरि सा चुप चाप गले. इन पक्तियों को अपने जीवन में उतार राष्ट्र का कार्य करने वाले नाना जी से जब थोड़ा बहुत कार्य कर प्रचार पाने वाले समाजसेवियों को देखता हूँ, तो नाना जी की महानता को अनगिनत बार नमन करने को मन करता है.

अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर-37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 91-99580-92091





 

Tuesday, October 9, 2012

भारत बनाना रिपब्लिक नहीं, कुप्रबंधन का शिकार है. (India-banana-bad-mgmt)

121 करोड़ सक्षम लोगों के देश को बनाना रिपब्लिक का नाम दे दिया है राबर्ट वाड्रा ने. यह हमारे देश के लोगों की प्रशासनिक क्षमता पर करारा प्रहार है. हम केले जैसे एक-दो उत्पाद बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं चला रहे, बल्कि सदियों से विश्व को बहुत से संसाधन उपलब्ध कराते रहे हैं. फिर भी राबर्ट वाड्रा ऐसे अकेले शख्श नहीं है, जिन्होने देश को ऐसा नाम दिया है. देश में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर और जनता का खून चूसकर अपनी तिजोरी भरने वाले, पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित अनेक लोगों का यही मत है. यह भी पूर्ण सत्य है कि देश पर सबसे ज्यादा शासन गाँधी परिवार के किसी न किसी प्रतिनिधि ने किया और अपनी खराब प्रशासनिक क्षमता और चाटुकारिता प्रेम के कारण वह देश को अच्छा प्रबंधन न दे सकने के कारण वह लोग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, किन्तु ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि सिर्फ गाँधी परिवार को देश के कुप्रबंधन के लिये दोष देना समस्या का समाधान नहीं है.

इन सबके मूल में चिंतन करने से मुझे लगता है कि देश की असली समस्या, देश को आगे ले जाने की सोच रखने वाले महापुरुषों का अपने अपने अहम के कारण एक संगठित प्रयास न करना है. सभी अपने अपने अहम की तुष्टी के लिये अपने अपने को श्रेष्ठ बताते रहे और देश अपेक्षित गति से तरक्की न कर सका. आज भी कमोवेश वही स्थिति है, जब देश को काँग्रेस के कुशासन के विरुद्ध संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है, तब लोग अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अपनाये हुए अपरोक्ष रूप से काँग्रेस को ही फायदा पहुँचाने वाली बात कर देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं.

1857 (ईसवी सन ) का प्रथम स्वतंत्रता समर याद कीजिये, सभी सेनानी देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे, किन्तु समय से संगठित प्रयास न करने के कारण उन्हे असफलता हाथ लगी थी. उस समर के परिणाम, ईस्ट इण्डिया कंपनी व ब्रतानिया शासन से हमने कभी सबक नहीं लिया, क्या अंग्रेज़ों में आपस में मतभेद न रहे होंगे, क्या राबर्ट क्लाइव की अपनी महात्वाकांक्षा न रही होगी, वह चाहता तो ब्रतानिया हूकुमत से हज़ारों मील दूर स्वयं की सत्ता कायम करने का प्रयास कर सकता था. किन्तु उन सबने अपनी राजसत्ता ( परम लक्ष्य) के लिये अपने अहम को भुला दिया. इतिहास साक्षी है कि अंग्रेज़ो ने किसी भी आधार पर कभी भी आपस में मतभेद के चलते या जाने-अनजाने कभी भी स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे भारतीयों का सहयोग नहीं किया.

अभी बीते दिनों राष्ट्रवादियों का दिल्ली में एक बड़ा सम्मेलन हुआ था, संपूर्ण देश से 150 के लगभग प्रतिभाशाली लोग आये थे, ऐसा नहीं था कि आये हुए लोगों में देशभक्ति नहीं थी, किन्तु निश्चय ही उनमें अपने लक्ष्य के प्रति सही साधना व समग्र प्रयास का अभाव था. परिणाम स्वरूप उस बैठक के निष्कर्ष के बारे में किसी ने चिंता नहीं की. आज भी देश में अलग अलग देश को आगे ले जाने वाले कई प्रयास चल रहे हैं, किन्तु जिस समग्र प्रयास की आवश्यकता है वह नहीं हो पा रहा है और यह समस्या अनुभवहीन व्यक्तियों की ही नहीं है, यह समस्या देश के लिये अपना जीवन होम करने वालों में भी दिखती है.

आने वाला समय चुनौती पूर्ण है, जो भविष्य के भारत की नींव का निर्माण करेगा. हमारे देश के युवक-युवतियों के सामने व्यक्तिगत लक्ष्य जैसे अच्छी आजीविका, अच्छा जीवन साथी, अच्छा घर आदि तो है किन्तु एक अच्छा व विकसित देश बनाने का राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं है. बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हे भारत की वर्तमान व्यवस्था से चिढ़ हुई भी तो उन्हे भारत को अच्छा बनाने लिये आवश्यक परिवर्तन करने के बजाय विदेशों में रहना ज्यादा श्रेयस्कर लगा.

कहने का अभिप्राय यह है कि देश में अच्छे लोगों या संसाधनों की कमी कभी नहीं रही, किन्तु जब तक कुछ वर्षों के लिये सभी लोग अपना अहम भुलाकर समग्र प्रयास नहीं करेंगे, वह परिवर्तन नहीं हो सकता जैसा वह खुद करना चाहते हैं.

!! भारत माता की जय !! 

Sunday, August 5, 2012

वर्तमान भारत में राजनीति से कल्याण की अपेक्षा करना व्यर्थ

राजनीति के माध्यम से सेवा करने का फैसला करने वाले नये नेता श्री केशु भाई पटेल जी है, राजनीति करते हुए उम्र बीत गयी और सेवा का फैसला अब लिया है. अभी तक सत्ता की राजनीति कर रहे थे अब सेवा की राजनीति करने जा रहे हैं. अपनी राजनीति चमकाने ले लिये ऐसा कहने वाले केशुभाई पहले नेता नहीं हैं. यह हमारे अधिकांश नेताओं का वास्तविक चरित्र है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वीतिय सर संघ चालक परम पूज्य श्री गुरु जी गोलवरकर ने कहा था कि राजनीति केमाध्यम से देश और समाज का कल्याण करने की अपेक्षा करना वैसे ही है जैसे हथेली पर सरसों उगाना.
 देश को निश्चय ही अच्छे राजनीतिक नेता चाहिये, किन्तु अच्छे नेताओं की आवश्यकता हर क्षेत्र में है, सिर्फ राजनीति में नहीं. बिना प्रचार प्रसार ऐसे प्रयास देश भर में होते रहे हैं और होते रहेंगे. भारत का दुर्भाग्य यह है कि अधिकांशत: लोग सिर्फ सत्ता के जरिये परिवर्तन चाहते हैं, जिससे उनकी सही मंशा भी शक की निगाह से देखी जाने लगती है. अन्ना जी के आंदोलन से बड़ा परिवर्तन हो सकता था और उनके प्रभाव से देशवासियों में राजनैतिक चेतना जागी भी है किन्तु यह जागृति अभी सीमित है. इस दिशा में और प्रयास करने की आवश्यकता है. श्री अरविंद केजरीवाल बेहद प्रतिभाशाली हैं किन्तु अगर उनका उद्देश्य वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन है तो उन्हे देश के हर गली कूचे में अपने जैसे नौजवान खड़े करने चाहिये जो एक समय के बाद विलासिता से भरी नौकरी को त्याग देश समाज के लिये कार्य करने में जुट जायें. सत्ता के माध्यम से परिवर्तन चाहने की अपेक्षा उनकी अपनी प्रतिभा से न्याय नहीं होगा.
दुर्भाग्य से देश में कोई संगठन ऐसा नहीं है, जो जन-जन में राजनैतिक चेतना जगाने के लिये कार्य कर रहा हो, कुछ संगठन इस दिशा में कार्य कर रहे हैं किन्तु किसी विचार या मार्ग के चलते उनका झुकाव एक खास राजनैतिक दल की ओर ज्यादा होता है जिससे उस दल के द्वारा किये गये गलत कार्यों को वह लगातार नज़र अंदाज करते जाते हैं और परिणामस्वरूप देश-समाज में जैसा परिवर्तन वह चाहते हैं वह नहीं हो पाता. ऐसे  संगठन अपनी कार्यशैली में लचीलापन नहीं ला पाते जिससे समय समय पर मिले अवसरों को वह गँवाते रहे हैं.
राज्य सत्ता में आमूल चूल परिवर्तन शिवाजी महाराज ने किया था, जब मुगल साम्राज्य से त्रस्त जनता को उन्होने हिन्दू साम्राज़्य की कल्पना दी थी और फिर अवसर मिलने पर उन्हे साकार भी किया था. उन्होने अपने राज्यनिवासियों को यह करके दिखाया था कि स्वराज मुगलों से बहुत बेहतर है और इसी कारण उनके सैनिक व जनता उन पर जान न्यौछावर करने में संकोच नहीं करते थे. व्यवस्था परिवर्तन चाहने वाले लोगों को शिवाजी महाराज के कार्यकाल का अवश्य अध्ययन करना चाहिये.
राजनीतिक चालें चलने में मशहूर व्यक्ति को आज भी चाणक्य उपनाम से संबोधित किया जाता है, किन्तु कितने लोग ऐसे हैं जो सत्ता प्राप्ति के पश्चात महात्मा चाणक्य जैसा जीवन जी सकते हैं. महात्मा चाणक्य के शब्दों में " जिस देश का प्रधानमंत्री कुटी में निवास करता है, उस देश की जनता महलों में रहती है और जिस देश का प्रधानमंत्री महलों मे रहता है, उस देश की जनता को कुटियों में निवास करना पड़ता है."
किसी भी माध्यम से जन कल्याण चाहने वाले लोग अगर तपस्वी जीवन छोड़ विलासिता भरा जीवन जीते हुए अगर परिवर्तन की चाह रखते हैं तो भारत जैसे देश में यह बहुत कठिन है. ऐसा भी नहीं है भारत जैसा देश सदैव ऐसे ही रहेगा, कुछ समय के पश्चात भारत में व्यक्ति पहचान का संकट आ सकता है, जिससे लोग समाज में अपनी पहचान बनाने के लिये अच्छे कार्य करना शुरु कर सकते हैं. देश के लिये यह आदर्श स्थिति होगी, जब भारतीय युवक अपनी मेधा का उपयोग धन के लिये कम और राष्ट्रनिर्माण के लिये अधिक करेंगे.
उसी घड़ी की प्रतीक्षा में....
आपका अवधेश.

Saturday, March 10, 2012

उत्तर प्रदेश में भाजपा क्यों हारी (BJP loss in UP)

बहुप्रतिक्षित उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2012 संपन्न हो गये, आशा के विपरीत समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला, बसपा क्यों हारी, राहुल का जादू क्यों नहीं चला या अखिलेश ने पार्टी को बदल दिया, यह विषय टीवी और अखबारों पर खूब देखा सुना, लेकिन भाजपा क्यों हारी, इस पर मंथन नहीं हुआ.

वास्तव में चुनावों के पूर्व बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाकर तो भाजपा ने अपनी हार के लिये सिर्फ एक बहाना ढूँढा था अन्यथा पार्टी ने अपनी हार की पटकथा पहले ही लिख दी थी.

सत्य यह है भाजपा अब नेताओं की पार्टी बन चुकी है,  अब वह कैडर और कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रही. नेताओं के भाषण और कृति में बडा फर्क हो चुका है. कार्यकर्ताओं एवं समाज को एकता व सद्भाव का पाठ पढाने वाले नेताओं मे ही आपसी फूट है. पार्टी पर वंशवाद और टिकट वितरण में धाँधली के आरोप लगते रहे हैं.

आज पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता को यह विश्वास नहीं है कि जमीन पर मेहनत करने से उसकी तरक्की हो सकती है, जोडतोड कर सरकार बनाने वाली यह पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से जोडतोड की अपेक्षा ही रखती है. पार्टी में आगे बढने का मार्ग सेवा एवं कर्तब्य भावना नहीं चापलूसी हो चुकी है.

वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा का ही नम्बर था, लेकिन फिर भी पार्टी अपने आप को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश नहीं कर सकी. इसके लिये पार्टी को उत्तर प्रदेश की जनता एवं अपने समर्थकों से क्षमा याचना करनी चाहिये.

वैसे उमा जी को उत्तरप्रदेश की जनता ने विधानसभा में भेजकर लम्बे समय में पार्टी की संभावनायें बलवती कर दी हैं, साफ है कि पार्टी के पास विधानसभा में अब अखिलेश का एक मजबूत विकल्प मौजूद है. अब पार्टी को एक सवर्ण युवा नेतृत्व ढूँढना होगा, जो बिखरे सवर्ण मतदाताओं को एक कर सके.

बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर पार्टी का एक संदेश साफ था कि अब वह पिछडों की राजनीति करने जा रही है जो इस दिशाविहीन पार्टी के लिये शुभसंकेत है. वैसे भी काँग्रेस ने लम्बे समय के लिये पिछडे और मुस्लिमों के बीच आरक्षण का शिगूफा छोडकर उनके बीच में जो खाई खोदी है, उसे पाटने के लिये अखिलेश सक्षम नहीं हैं.

आने वाले लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं और उनकी राय को प्राथमिकता दे कर पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में फिर से जान डाल सकती है. अगर भाजपा लोकसभा चुनावों का इस्तेमाल नहीं पायी तो उत्तर प्रदेश में संगठन को फिर से खडा करना बहुत मुश्किल कार्य होगा और कम से कम 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी से बहुत ज्यादा अपेक्षा रखना व्यर्थ ही होगा.

Monday, February 27, 2012

अरविन्द केजरीवाल ने क्या गलत कहा है? (What's went wrong in Kejriwal's statement)

संसद और साँसदो पर अरविन्द केजरीवाल की टिप्पणी जनता की आवाज है, लेकिन मीडिया और राजनीतिक दल इसे हल्के में लेने की भूल कर रहे हैं, अरविन्द ने जो कहा उसे कहने वाले प्रत्येक गली कूचे में मिल जायेंगे, अरविन्द ने उनकी आवाज़ को सिर्फ एक मंच दिया है.

मीडिया ने राजनेताओं को लेकर जितना हल्ला मचाया है, उसका 10% भी अगर वो सडक पर निकलकर जनता से पूछें तो सच्चाई सामने आ जायेगी. सत्य यही है कि जनता संसद और साँसदो से ऊब चुकी है और वह सभी नेताओं को अब एक ही तराजू पर तौलने लगी है. क्या यह सच नहीं है, कि एक बार वोट देने के बाद जनता को अपने उसी प्रतिनिधि के हाथपैर जोडने पडते हैं, अगर यह सच है तो इसे स्वीकार करने से परहेज क्यों.

संसद में बैठे साँसदों का लेखा जोखा तो मेरे पास नहीं, लेकिन सत्य यह है कि अव्वल तो राजनेताओं पर म‌ामले दर्ज ही नहीं होते और अगर दर्ज‌ हो भी गये तो निष्पक्ष जाँच नहीं होती, फिर सजा का प्रश्न तो उठता ही नहीं है. अगर जनप्रतिनिधियों पर दर्ज मामलों की ईमानदारी से जाँच की जाये तो संसद का बडा ही वीभत्स चेहरा सामने आयेगा.

पिछले वर्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ हो हल्ला मचाने वाले राजनीतिक दलों ने क्षणिक फायदे के लिये उत्तरप्रदेश में भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को गले लगाने में देर नहीं लगाई. जनता के अपराधियों को गले लगाते वक्त उन्होने अपने ईमानदार कैडर की भी परवाह नहीं की. मुझे संदेह ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि किसी राजनीतिक नेता ने अपने उन कैडरों का दर्द जानने की कोशिश नहीं की होगी.

निश्चय ही देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं जिसके नेताओं में परिवर्तन का दम हो, अत: परिवर्तन का स्वप्न दिखाने वाले बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे आज जनता के नेता हैं, अरविन्द केजरीवाल सिर्फ एक चेहरा ही नहीं, वह देश में फैली हुई अराजकता और अव्यवस्था के खिलाफ युवाओं की आवाज़ बन चुके हैं, उनपर आरोप लगाकर आप सच्चाई से मुंह नहीं मोड सकते. यह बात मीडिया और राजनीतिक दलों को जितनी जल्दी समझ आ जाये लोकतंत्र के लिये उतना ही अच्छा है.

Monday, January 30, 2012

अंगार और श्रृंगार के कवि: 'क्रान्त'जी ('Krant' M.L.Verma)

डॉ. मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' (अंग्रेजी: Krant M. L.Verma, जन्म: २० दिसम्बर १९४७[1], शाहजहाँपुर) हिन्दी के कवि तथा लेखक हैं। हिन्दी के अतिरिक्ति उन्होंने उर्दू , संस्कृत तथा अंग्रेजी में भी कवितायें[2] लिखी हैं। काव्य का छन्दानुवाद करने में उन्हें महारत हासिल है[3]। उनका पहला खण्डकाव्य सन १९७८ में ललिता के आँसू[4] के नाम से प्रकाशित हुआ। लालबहादुर शास्त्री जी के जीवन पर आधारित यह करुण काव्यकृति साहित्य जगत में बहुचर्चित रही। महान   क्रान्तिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' के व्यक्तित्व और कृतित्व[5] पर उनके द्वारा स्वतन्त्र रूप से किये गये एकादशवर्षीय ऐतिहासिक शोधकार्य[6] सरफरोशी की तमन्ना का विमोचन भारत के पूर्व प्रधान मन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी[7] ने किया। क्रान्तिकारी हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना [8] विषय पर अतिविशिष्ट अनुसन्धान के लिये उन्हें भारत सरकार के संस्कृति विभाग ने वर्ष 2004 में हिन्दी साहित्य की "सीनियर फैलोशिप" [9] प्रदान की। उन्हें स्थानीय स्तर से लेकर जनपद, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार व सम्मान[10] मिल चुके हैं जिनमें उनकी काव्यकृति वेदना के दीप पर भवानी प्रसाद मिश्र[11] सम्मान तथा शाहजहाँपुर का "जनपद रत्न" सम्मान प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी अन्य प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ है:  धूप के आइने (हिन्दी गजल), अर्चना (संस्कृत/हिन्दी), तथा स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास[12]
अनुक्रम 

1 जीवन परिचय
(प्रारम्भिक शिक्षा, पहली कविता सातवीं में, गोदाम में रहकर पढाई, इण्टर में फेल, रिकार्ड के साथ प्रथम)

2 प्रथम प्रयास में ही नौकरी
(बैंक में भी विद्रोह, राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये संघर्ष, दण्ड भी वरदान, रामप्रसाद बिस्मिल पर ऐतिहासिक शोध)

3 लेखन के लिये नौकरी को त्यागा
(सरकारी अनुदान से प्रकाशन)

4 कृतियाँ[17]
(प्रकाशित,सम्पादित, शोध एवं सम्पादन)

5 सन्दर्भ

जीवन परिचय मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' का जन्म २० दिसम्बर १९४७[13] को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के ग्राम तिलोकपुर में हुआ। उनकी माताजी का नाम राम दुलारी और पिताजी का नाम राम लाल था। माता-पिता दोनों ही निरक्षर होने के बावजूद कर्तव्यनिष्ठ और धर्मपरायण थे। उनका पुश्तैनी व्यवसाय कृषि था। क्रान्तजी के पिता व फूफाजी नत्थूलाल दोनों ही शाहजहाँपुर के खिरनीबाग स्थित राम प्रसाद बिस्मिल के मकान पर प्राय: आया-जाया करते थे। बिस्मिलजी को जब गोरखपुर में फाँसी दे दी गयी तो ये दोनों ही व्यक्ति उनके अन्तिम संस्कार में भाग लेने वहाँ गये थे। बाद में नत्थूलालजी ने अपना खिरनीबाग वाला किराये का मकान छोड दिया और मुन्नूगंज के फाटक के पास भारद्वाजी मोहल्ले में रहने लगे।


प्रारम्भिक शिक्षा तिलोकपुर गाँव शाहजहाँपुर जिले के अत्यधिक पिछडे हुए गाँवों में से एक था। उन दिनों शिक्षा के लिये कोई विद्यालय गाँव में न था। कभी किसी की चौपाल पर, तो कभी किसी खण्डहर में, या फिर कभी किसी बाग में बच्चे पढा करते और अपना बस्ता तथा बैठने की टाट-पट्टी अपने साथ घर ले जाया करते।  उन्होंने पाँचवीं कक्षा तक अपने गाँव के प्राइमरी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्हें  जूनियर हाई स्कूल काँट के छात्रावास (बोर्डिंग हाउस)  में भर्ती करा दिया गया। पाँचवीं कक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के कारण उन्हें  छ्ठी क्लास से सरकारी छात्रवृत्ति मिलने लगी.

पहली कविता सातवीं में जब वे  सातवीं कक्षा के विद्यार्थी थे उन्होंने पहली कविता "कृष्णावतार" लिखी। अपने इंग्लिश टीचर श्रीकृष्ण शर्माजी को दिखायी तो वे उनकी प्रतिभा को देखकर अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें  विद्यालय की अन्त्याक्षरी टीम में शामिल कर लिया। उन्हें  सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता "झाँसी की रानी" कण्ठस्थ थी अत: उनके विद्यालय ने अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता में सर्वाधिक प्रथम पुरस्कार जीते। पुरस्कारों का यह सिलसिला इण्टरमीडिएट तक जारी रहा।

गोदाम में रहकर पढाई आठवीं की परीक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर शाहजहाँपुर के राजकीय विद्यालय में छात्रवृत्ति के साथ प्रवेश तो मिल गया किन्तु छात्रावास का व्यय वहन करने की सामर्थ्य न होने के कारण  किसी प्रकार जिला परिषद की गोदाम में मुफ्त रहने का प्रबन्ध कर दिया गया किन्तु अब समस्या थी खाना बनाने की। घर से खाने-पीने का सामान पिताजी बैलगाडी में लादकर गोदाम में पहुँचा देते परन्तु खाना  स्वयं बनाना पडता। किसी तरह एक वक्त खिचडी खाकर दो साल काटे किन्तु जब परिणाम आया तो परीक्षा में इस बार भी प्रथम उत्तीर्ण हुए।

इण्टर में फेल   उनके युवा मन में कविता हिलोरें ले रही थी, देशभक्ति की अंगार उगलती कवितायें सुनकर सहपाठी  उकसाते। जिससे उत्साहित होकर उन्होंने नेताओं, समाज-सुधारकों यहाँ तक पथभ्रष्ट ट्यूशन पढाने वाले अपने ही शिक्षकों के खिलाफ कविता में बोलना शुरू कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि आंतरिक परीक्षकों ने  भौतिक विग्यान और रसायन शास्त्र की प्रायोगिक परीक्षा में उन्हें अनुत्तीर्ण करवा  दिया यद्यपि  लिखित परीक्षा में प्रथम श्रेणी के अंक थे किन्तु नियमानुसार विग्यान के दो-दो विषयों की प्रायोगिक परीक्षा में वांछित अंक न होने से इण्टरमीडिएट में फेल करार दिया गया।

रिकार्ड के साथ प्रथम मदन के मन में आक्रोश था अतः उन्होंने दैवी सम्पद इन्टर कालेज  मुमुक्षु आश्रम छोड दिया और तिलहर के एक अन्य विद्यालय (आर० वी० एम० कालेज) में प्रवेश ले लिया। अब उनके मन में एक ही लक्ष्य था सर्वाधिक अंकों के साथ इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करना। इसके लिये उन्होंने एक प्रयोग किया परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी चुना क्योंकि शेष सभी छात्र प्रश्न पत्र का उत्तर हिन्दी में लिखते थे  इसका परिणाम आश्चर्यजनक हुआ। उन्होंने विग्यान का विद्यार्थी होने के बावजूद हिन्दी साहित्य में विशेष योग्यता के साथ प्रान्त भर में एक रिकार्ड स्थापित किया क्योंकि उन दिनों साइन्स के विद्यार्थी बडी मुश्किल से हिन्दी विषय में उत्तीर्ण हो पाते थे।

प्रथम प्रयास में ही नौकरी जब वे बरेली कालेज बरेली में  बी०एससी० अन्तिम वर्ष के  छात्र थे  कैम्फर एण्ड एलाइड प्रोडक्ट्स लिमिटेड में कैमिस्ट के पद पर उनका चयन हो गया। घर पर भाई-भाभियों के तानों से परेशान होकर उन्हों ने नौकरी ज्वाइन कर ली। रात में ड्यूटी जाना दिन में कालेज; सोने की फुर्सत न मिलती। एक दिन आकस्मिक निरीक्षण के दौरान सोते हुए पाये  गये । कम्पनी के डायरेक्टर से कहा-सुनी हो गयी। उन्होंने तत्काल  त्यागपत्र दे दिया। बाद में बैंकिंग सर्विस कमीशन में परीक्षा दी वहाँ भी चयन हो गया। किन्तु मन था सेना में भर्ती होकर सीमा पर शत्रु से दो-दो हाथ करने का। शादी तय हो चुकी थी तभी सेना के शार्ट सर्विस कमीशन से इण्टरव्यू का बुलावा आ गया होने वाली पत्नी से पत्र लिखकर पूछा- "जाऊँ कि न जाऊँ?" वहाँ से सकारात्मक उत्तर मिलने पर जबलपुर चले  गये सारी परीक्षाओं में सफल होने के बावजूद नॉक नीज (घुटने मिलने) की वाधा आडे आ गयी वरना सेलेक्ट हो गये होते तो सन १९७१ की लडाई में देश के काम आ जाते, पर विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था।

बैंक में भी विद्रोह यह उन दिनों की बात है जब बैंकों के काम काज में हिन्दी का प्रयोग बिल्कुल न था। एक ग्राह्क ने ड्राफ्ट बनवाने का वाउचर हिन्दी में भरकर दिया उन्होंने हिन्दी में ड्राफ्ट बनाकर दे दिया। इस पर बैंक के केन्द्रीय कार्यालय से उन्हें चेतावनी दी गयी तो उन्होंने  हिन्दी अधिकारी बनने के लिये आवेदन किया तो उत्तर दिया गया कि वे केवल  साइन्स ग्रेजुएट है हिन्दी अधिकारी बनने के लिये बी०ए० में हिन्दी व अंग्रेजी तथा एम०ए० हिन्दी से होना अनिवार्य है। फिर क्या था, उन्होंने प्राइवेट परीक्षा देकर दोनों ही डिग्रियाँ बैंक को सौंप दीं। फिर भी उन्हें हिन्दी अधिकारी यह कहकर नहीं बनाया गया कि पहले से ही जो अधिकारी वर्ग में है उसे हिन्दी अधिकारी के विशेष वर्ग में नहीं लिया जा सकता।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये संघर्ष जब बैंक ने उन्हें हिन्दी अधिकारी नहीं बनाया तो उन्होंने मुरादाबाद के  कुछ हिन्दी प्रेमियों व हिन्दी साहित्यकारों को साथ जोडकर "राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति" की स्थापना कर डाली और प्रत्येक माह की चौदह तारीख को नियमित रूप से विचार गोष्ठी व काव्य गोष्ठी की परम्परा डाली और वर्ष में एक वार चौदह सितम्बर को "हिन्दी दिवस" मनाना प्रारम्भ कर दिया। इन्दिरा गान्धी की हत्या के पश्चात "हत्यारिन राजनीति" शीर्षक से प्रकाशित एक कविता के कारण उन्हें दण्डित करके उत्तर प्रदेश के एक कोने गोरखपुर ट्रान्स्फर कर दिया गया

दण्ड भी वरदान मुरादाबाद में रहकर दिल्ली में होने वाले राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय आयोजनों में भाग ने सकें  इस कारण ही उन्हें  गोरखपुर पदोन्नति देकर भेजा गया था किन्तु जब उन्हें  "भारत और विश्व साहित्य पर प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी"  में एक भारतीय प्रतिनिधि[14] की हैसियत से सम्मिलित होने का अवसर मिला तो यही दण्ड उनके लिये वरदान सिद्ध हुआ। इस संगोष्ठी में उन्होंने "कलम और पिस्तौल के पुरोधा - पं० रामप्रसाद बिस्मिल"  शीर्षक से एक शोध-पत्र प्रस्तुत कर विश्व भर के विद्वानों का ध्यान इस ओर खीचा। संयोग से उस संगोष्ठी में सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी और लेखक मन्मथनाथ गुप्त[15] भी उपस्थित थे। गुप्तजी ने जब यह कहा कि क्रान्तजी ने तो आज भगतसिंह की तरह विस्फोट करके क्रान्ति कर दी तो उनका सीना गर्व से फूल गया।

विग्यान भवन नई दिल्ली में उपस्थित कई साहित्यकारों ने संगोष्ठी-कक्ष के बाहर आकर क्रान्तजी को  यह सलाह दी कि रामप्रसाद बिस्मिल को लोग केवल एक क्रान्तिकारी के रूप में ही जानते हैं,  साहित्यकार के रूप में नहीं;  बेहतर होगा कि उनके जब्तशुदा साहित्य का अनुसन्धान व उसके प्रकाशन की चिन्ता करो। बस यहीं से उनके मन में कविता छोड शोध करने की धुन सवार हो गयी।

रामप्रसाद बिस्मिल पर ऐतिहासिक शोध सन १९८५ में गोरखपुर से शुरू हुई उनकी यह शोध-यात्रा पूरे ग्यारह साल बाद १९९६ में सम्पन्न हुई। नौकरी में इधर उधर घूमते हुए आखिर ८०० पृष्ठों का शोधग्रन्थ तैयार हुआ जिसे नई दिल्ली के एक प्रकाशक ने ४ खण्डों में छापा और इसका विधिवत विमोचन किया भारत के पूर्व प्रधान मन्त्री माननीय अटलबिहारी वाजपेयीजी ने। विमोचन करते हुए अटलजी ने कहा "इस ग्रन्थ के विषय में टिप्पणी करने के लिये मुझे अंग्रेजी का सहारा लेना ही पडेगा। निस्संदेह क्रान्तजी ने यह मोनूमेण्टल वर्क किया है।" १९ दिसम्बर १९९६ की यह घटना है; उस समारोह में परम पूज्य रज्जू भैया सहित देश के नामी गिरामी साहित्यकार उपस्थित थे। प्रख्यात पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ग्रन्थ की समीक्षा करते हुए टिप्पणी की कि इसमें कोई दो राय नहीं , लेखक के स्वतन्त्र व श्रमसाध्य प्रयास को देखते हुए इस ग्रन्थ पर कम से कम ग्यारह पी०एचडी० अवार्ड हो सकती हैं। ये कोई अतिशयोक्ति नहीं अपितु  रिकार्डेड तथ्य हैं।


लेखन के लिये नौकरी को त्यागा जब उन्होंने हिन्दी साहित्य में एम० ए० किया तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य भी पढना पडा। उन्हें लगा कि इसमें क्रान्तिकारी हिन्दी साहित्य का कहीं कोई उल्लेख है ही नहीं। इसके पश्चात उन्होंने भारत सरकार को वरिष्ठ अध्येतावृत्ति (सीनियर फैलोशिप) के अन्तर्गत अतिविशिष्ट अनुसन्धान (पोस्ट डाक्टोरल रिसर्च) करने के लिये अपना प्रस्ताव भेजा तो नियमत:  नौकरी आडे आ गयी। क्योंकि एक प्रतिष्ठान से वेतन लेते हुए दूसरे आर्थिक लाभ नहीं लिये जा सकते अत:  एम० एल० वर्माजी ने सेण्ट्रल बैंक ऑफ़ इण्डिया के प्रबन्धकीय वर्ग की प्रतिष्ठित नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति[16] लेकर अपना प्रस्ताव पुन: भेजा जिसे संस्कृति विभाग ने स्वीकार किया और "क्रान्तिकारियों के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना" विषय पर शोध करने के लिये सीनियर फैलोशिप प्रदान की।

सरकारी अनुदान से प्रकाशन शुरू-शुरू में उन्होने अपनी पुस्तकें स्वयं प्रकाशित कीं किन्तु बिक्रय व्यवस्था में सफलता न मिलती देख प्रकाशन व्यवसाय से हाथ वापस खींच लिया। बाद में जब उन्हें पता चला कि हिन्दी अकादमी दिल्ली आर्थिक अनुदान देकर उत्कृष्ट पुस्तकें छापने में सहायता देती है तो उन्होंने वर्षों पूर्व १९६५-७० के मध्य लिखी गयी अपने गीतों की पहली कृति "वेदना के दीप" भेजी। यह कृति न केवल प्रकाशित हुई अपितु "भवानीप्रसाद मिश्र सम्मान" से पुरस्कृत भी हुई। यह सम्मान उन्हें सुप्रसिद्ध कन्नड साहित्यकार व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह  माननीय हो० वे० शेषाद्रिजी  ने २००२ में प्रदान किया। उस समारोह में सुप्रसिद्ध उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली सहित बहुत बडी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे।


प्रकाशित कृतियाँ[17]

ललिता के आँसू (प्रबन्ध काव्य)

धूप के आइने (गजल संग्रह)

अर्चना ( हस्तलिखित बाल संस्कार रचनावली संस्कृत/हिन्दी में )

सरफरोशी की तमन्ना (शोध ग्रन्थावली)

क्रान्तिकारी बिस्मिल और उनकी शायरी (उर्दू गजलें हिन्दी काव्यानुवाद सहित)

वेदना के दीप (गीत संग्रह)

एक मुट्ठी रोशनी (नवगीत[18] संग्रह)

स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (३ भागों में समालोचना व सन्दर्भ सहित)

सम्पादित कृतियाँ

संकल्पिका

साहित्य संचेतना

प्रगतिका

संस्कृति

वनास मंजूषा

शोध एवं सम्पादन

मन की लहर (रामप्रसाद बिस्मिल की पुस्तक)

बोलशेविकों की करतूत (रामप्रसाद बिस्मिल का उपन्यास)

क्रान्ति गीतांजलि (काकोरी शहीद पं० रामप्रसाद बिस्मिल की जब्तशुदा कृति)

सन्दर्भ

1. हिन्दी साहित्यकार सन्दर्भ कोश (दूसरा भाग) पृष्ठ २६३


2. http://www.tribuneindia.com/2004/20040321/ncr1.htm


3. http://www.parichowk.com/greater-noida-whos-who.aspx


4. नमन माधव सम्पादक आनन्द आदीश पृष्ठ २९१


5. स्वाधीनता सेनानी लेखक-पत्रकार आशारानी व्होरा पृष्ठ १८१


6. हिन्दी साहित्यकार सन्दर्भ कोश (दूसरा भाग) पृष्ठ २६३


7. http://www.parichowk.com/greater-noida-whos-who.aspx


8. स्वाधीनता सेनानी लेखक-पत्रकार आशारानी व्होरा पृष्ठ २०


9. हिन्दी साहित्यकार सन्दर्भ कोश (दूसरा भाग) पृष्ठ २६३


10. http://www.parichowk.com/greater-noida-whos-who.aspx


11. इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती (स्मारिका) प्रधान सम्पादक डा० देवेन्द्र आर्य पृष्ठ ६


12. http://www.parichowk.com/greater-noida-whos-who.aspx


13. समन्वय सम्पादक उमाशंकर मिश्र (परिचय खण्ड) पृष्ठ ५८


14.International Symposium On India & World Literature Dr.A.K.Maurya,1985  पृष्ठ ८१


15.International Symposium On India & World Literature Dr.A.K.Maurya,1985  पृष्ठ ७५


16.हिन्दी साहित्यकार सन्दर्भ कोश (दूसरा भाग) पृष्ठ २६३


17.डा० गिरिराज शरण अग्रवाल एवं डा० मीना अग्रवाल हिन्दी साहित्यकार सन्दर्भ कोश (दूसरा भाग) पृष्ठ २६३


18. समन्वय सम्पादक उमाशंकर मिश्र पृष्ठ ५८

Wednesday, January 11, 2012

मूर्ति या लाचार गरीब: कडकडाती ठण्ड में किसे ढकना जरूरी (murti garib)

उत्तर प्रदेश में चुनाव का मौसम है, चुनाव आयोग ने नोएडा और लखनऊ में मायावती सरकार द्वारा बनवायी गयी मूर्तियों को ढकने का आदेश दे दिया है. अल्टीमेटम भी दे दिया है, आदेश पर कार्यवाही भी की जा रही है, हर समाचार चैनल इसे प्रमुख मुद्दा मानकर प्रमुखता से दिखा रहे हैं, यह भी बता रहें है कि कहाँ किस रंग के कपडे से हाथी की मूर्ति ढकी जा रही है. माया मैडम मस्त हैं, उनके हाथी का मुफ्त में प्रचार-प्रसार हो रहा है. बसपा ने इसे हाथी पर जुल्म बता कर जनता के बीच जाने का फैसला कर लिया है, यानि वोटों का जुगाड और पक्का हो गया है.

अब एक दूसरा पहलू देखें, न जाने कितने गरीब इस देश में भूखे नंगे पडे हैं, उन्हे ढकने के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय भी रैनबसेरे बनाने का आदेश दे चुका है, लेकिन आदेश पर कार्यवाही का कोई अल्टीमेटम नहीं, जब तक प्रशासन आदेश पर अमल करना चाहता है तब तक सर्दी खत्म और सब भूल जाते हैं. इतने बडे देश में चन्द मौतें मायने नहीं रखती. इस कडकडाती ठण्ड में गरीब को ढकना इतना जरूरी नहीं, जितना मूर्तियाँ बनाना या उन्हे ढकना. इसलिये समाचार चैनल के लिये भी यह कोई बडी खबर नहीं. भूखे नंगे व्यक्ति टीवी चैनलों को पैसे भी नहीं दे सकते, इसलिये मीडिया को उनसे कोई सरोकार नहीं.

भारतीय राजनीतिक तंत्र एक लूटतंत्र है, जिसमें विभिन्न दलों के लूटेरे आपके बीच जा कर लूटने का लाइसेंस माँगते हैं. सम्हल कर रहें, कोई हाथ लेकर तो कोई फूल लेकर आयेगा, कोई हाथी पर आयेगा तो कोई साईकिल पर. आप कितना भी लडिये मरिये, चुनाव बाद हाथ-फूल-हाथी-साईकिल सब इकट्ठे होकर आपके खजाने पर डकैती डालना जारी रखेंगे. उन्हे आप‌की चिन्ता नहीं क्योंकि आप अपनी दाल-रोटी से उपर नहीं उठ पाते, इसलिये सत्ता की मोटी मलाई खाना उनका हक बनता है.

Sunday, January 1, 2012

भारत की हत्यारी काँग्रेस (Congress: the killer of nation)

एक फेसबुक मित्र ने अपनी वाल पर लिखा कि अगर आपको आत्महत्या करना हो तो काँग्रेस को वोट दे दीजिये. उस मित्र से एक कदम आगे बढकर मुझे लगता है कि अगर आपको देश के हत्या करनी हो तो काँग्रेस को वोट दे दीजिये. अगर आपको यह सही नहीं लगता तो खुद सोचिये कि काँग्रेस को देश की जनता ने जितनी बार वोट दिया, उतना शायद किसी को नहीं दिया होगा और आगे भी किसी पार्टी को इतनी बार मौका नहीं मिलेगा, यह ध्रुव सत्य है, लेकिन बदले में काँग्रेस ने प्रत्येक बार देश की हत्या करने की कोशिश की और देश को वेंटिलेटर पर छोड दिया है.

काँग्रेस यह दावा करती है कि उसी पार्टी ने देश को स्वंतत्र कराया, लेकिन सच यह है कि काँग्रेस ने आजादी के लिये कोई लडाई लडी ही नहीं, सिर्फ काँग्रेस के धूर्त और चालाक नेताओं ने आजादी का आंदोलन हाईजैक कर लिया था. 1885 में काँग्रेस की स्थापना का उद्देश्य उसके नेताओं की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना था. कारण साफ था, अंग्रेज 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से बेहद डर चुके थे, अत: उन्होने कुछ अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों को सत्ता में पद देकर मिलाने की चाल रची और काँग्रेस का जन्म हुआ. तब से काँग्रेस उसी फार्मुले पर चलते हुए येन केन प्रकारेण सत्ता पर अपनी पकड बनाये रखना चाहती है. कुछ समय पश्चात काँग्रेस का ब्रिटिश सत्ता के साथ विरोध बढता गया और काँग्रेस में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्टृवादी नेता भी जुडते गये और अंग्रेजों का प्रबल विरोध करने लगे इसके साथ ही काँग्रेस गरम दल और नरम दल में बँट गयी. गरम दल का नेतृत्व तिलक कर रहे थे तो नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले कर रहे थे. तिलक की लोकप्रियता बढती जा रही थी, यह कहें कि उनके जैसा नेता कोई और न था तो अतिशयोक्ति न होगी. इसी समय अंग्रेजो ने फिर चाल चली और 1915 में महात्मा के रूप में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से वापस आ गये. उन्होने नरम दल का साथ देना शुरु कर दिया. देश के दुर्भाग्य से तिलक की मृत्यु हो गयी और गाँधी जी काँग्रेस पर हावी हो गये. उसके बाद काँग्रेस ने खिलाफत आंदोलन, नमक सत्याग्रह आदि आंदोलन किये जिनका देश की आजादी से संबंध न होकर कुछ और था. 1920 में तिलक की मृत्यु के बाद देश की आजादी की माँग क्रांतिकारियों ने की और बहुत सारे काँतिकारियों ने देश के लिये सर्वोच्च बलिदान भी किया. बिस्मिल की सक्रियता के कारण शाहजहाँपुर उस समय क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र था. 1927 में काकोरी काण्ड के क्रांतिकारियों को फाँसी के साथ ही पूरे देश में आजादी के लिये उबाल आ गया और उसी का फायदा उठाने के लिये 26 जनवरी 1929 को जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में काँग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की माँग कर डाली. पूर्ण स्वराज्य का मतलब आजादी न होकर एक स्वायत्त शासन व्यवस्था की माँग थी. 1942 का असहयोग आंदोलन मुख्य रूप से डा. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायन और अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं ने चलाया और काँग्रेस इस आंदोलन से खुद को अलग तो नहीं कर पायी लेकिन उनके नेताओं में आंदोलन को लेकर मतभेद बना रहा.

1947 में अगर देश को बाँटने की अंग्रेजो की चाल सफल हुई तो उसके पीछे सिर्फ काँग्रेस के सत्ता लोलूप नेता ही थे, कोई और नहीँ. खैर किसी प्रकार मिली स्वतंत्रता के पश्चात गाँधी जी के अंधप्रेम ने नेहरु जैसे सत्तालोलूप एवम अक्षम नेता को देश की बागडोर दे दी, जबकि काँग्रेस के पास उस समय सरदार पटेल जैसा नेता मौजूद था, जिनके अथक और कूटनीतिक प्रयासों के कारण बहुत से राज्यों ने भारतीय गणतन्त्र में शामिल होना स्वीकार किया, वहीं नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण कश्मीर समस्या देश के सामने आज भी मुँह बाये खडी है.

सरदार पटेल के बाद देश को लाल बहादुर शास्त्री जैसा नेता भी मिला लेकिन बहुत जल्दी ही उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गयी और काँग्रेस ने उन्हे भुलाते देर नहीं लगायी. इसी प्रकार के अन्य राष्ट्रवादी व्यक्तियों को 1947 के बाद की काँग्रेस ने भुला दिया. शास्त्री जी के बाद इन्दिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, उनके इस लोकप्रिय नारे की वजह से काँग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला और इन्दिरा निरंकुश हो गयीं, जिसकी परिणिति 1977 में काँग्रेस की जबरदस्त हार और भारत में प्रथम गैर काँग्रेसी सरकार के रूप में हुई. देश और लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत यह है कि 1977 के बाद काँग्रेस का जो पतन शुरु हुआ वह अभी तक नहीं रुका.
डा. राम मनोहर लोहिया तो काँग्रेस और जवाहरलाल नेहरु से बहुत नफरत करते थे और उन्होने काँग्रेस हटाओ-देश बचाओ का नारा भी दिया था, लेकिन अब उनके नाम पर समाजवाद की राजनीति कर रही सपा अपने नेताओं की स्वार्थ सिद्धि के लिये काँग्रेस के तलवे चाटती रहती है.

काँग्रेस की देशघाती राजनाति इन्दिरा के बाद राजीव के जमाने में भी जारी रही और राजीव गाँधी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय को भी पलट दिया. स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिकता का इससे बडा उदाहरण ढूँढना मुश्किल है. एक बार इन्ही राजीव ने कहा था कि सरकार के यहाँ से चला 1 रुपया जनता के पास पहुँचते पहुँचते 15 पैसे हो जाता है, कारण सिर्फ यही था कि बाकी के 85 पैसे काँग्रेस का हाथ खा जाता था, 1948 में जब पहली बार जीप घोटाला सामने आया था, तब से आज 2जी तक काँग्रेस का हाथ ही खाने और बचाने के लिये जिम्मेदार है. आज भी दिल्ली में लोकायुक्त की जाँच रिपोर्ट धूल खा रही है और काँग्रेस की शीला सरकार वैसे ही बरकरार है, तो 2जी में चिदंबरम तब तक सरकार में बने रहेंगे जब तक माननीय उच्चतम न्यायालय उन्हे दोषी न मान ले.

काँग्रेस की राजनीति का एक पहलू यह भी है कि उसने कई बार संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए चुनी गयी लोकतांत्रिक सरकारों को बर्खास्त कर चुकी है.

अभी बीते दिनों में हमने देखा है कि लोकपाल बिल पर जनभावना और राज्यसभा के बहुमत को काँग्रेस ने किस प्रकार नकारा है. मेरे कहने का सार यही है, कि काँग्रेस का पंजा न जाने कितनी बार लोकतंत्र का गला घोंट चुका है और आने वाले समय में भी यह पंजा लूट खसोट मचाता हुआ देश की हत्या करता रहेगा. बेहतर होगा कि देश के नागरिक यह भूल जाँय कि मतपत्र या वोटिंग मशीन में पंजा भी कोई चुनाव निशान है. देश हित में काँग्रेस जैसी घिनौनी राजनीति करने वाली पार्टी का एक पार्षद भी न जीते तो अच्छा है, लोकसभा में काँग्रेस का प्रतिनिधि तो दूर की बात है.

ईसवी सन 2012 (New Year )

ईसवी सन 2012 की आपको हार्दिक शुभकामनायें,
लेकिन अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.

अंग्रेजों ने दे दी हमें, लूट की संस्कृति,
जीवन मूल्य बढाकर, अब पायें इससे मुक्ति.

स्वाधीन हुए हैं हम, फिर जीते क्यों परतंत्र में,
जागो मित्रों अब, रहेंगे सच्चे लोकतंत्र में.

रहे सदा हमको, मानवता का ध्यान,
सब रहें सदा संपन्न, ऐसा हो विज्ञान.

प्यार करें अपनी मिट्टी से, शक्तिशाली देश बनायें,
आईये अंग्रेजियत छोडें एवं भारतीयता अपनायें.