धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, December 22, 2011

नखडू किसान और मनरेगा (kisan and MNREGA)

नखडू एक छोटा किसान था और गाँव में रहकर खेती एवम पशुपालन करते हुए अपनी छोटी-मोटी जीविका चला रहा था, संपन्न नही था फिर भी खुशहाल जीवन जी रहा था, खेती से उसे बहुत प्यार था और किसान होने पर गर्व, कहता हम किसान अनाज न पैदा करें तो दुनिया भूख से मर जायेगी, जीवन में भोजन की आवश्यकता सबसे पहले और बाकी चीजें बाद में होती है. सत्य ही है, इतनी बडी दुनिया को अगर अनाज न मिले तो लोग पेट की आग शान्त करने के लिये एक दूसरे को मार कर खाने लगेंगे. नखडू खुद अपनी और बच्चों की तरक्की के लिये नित नये सपने देखता रहता था. कहता बच्चों को पढा लिखा कर बडा आदमी बनाउंगा, चाहे मुझे जितनी मेहनत करनी पडे लेकिन मुझे अपनी गरीबी दूर करना ही है.

कुछ वर्ष पहले केन्द्र सरकार ने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना (मनरेगा) बनाई तो नखडू बडा प्रसन्न हुआ कि अब गाँव के लडकों को शहरों मे मजदूरी करने की बजाय गाँव में ही रोजगार मिल सकेगा और गाँव की उन्नति भी होगी, लेकिन मनरेगा धरातल पर आते ही अन्य सरकारी योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ गयी. गाँव के लोग ग्राम प्रधान की मिली भगत से योजना में अपना नाम लिखवा लेते और बिना काम किये ही आधी मजदूरी झटक लेते और केन्द्र सरकार का गुणगान करते न थकते.

इधर योजना के दुष्प्रभाव के कारण नखडू जैसे किसानों को खेती के लिये मजदूर मिलना मुश्किल होता जा रहा था, गाँव के मजदूर अब नरेगा के बराबर मजदूरी व काम में ज्यादा सहूलियत माँग रहे थे. मरता क्या न करता, नखडू ने भी मजदूरों की बात मानते हुए उन्हे ज्यादा मजदूरी देनी शुरु कर दी, जिससे खेती की लागत तो बढ ही गयी, समय से काम भी न हो पाता.  खेती में लगातार घाटा होने से नखडू जैसे न जाने कितने किसान मनरेगा की भेंट चढ गये. मजदूरों की रोज रोज बढती हुई माँगो से तंग आ नखडू और बहुत से अन्य किसानों ने अपने खेत बँटाई*  पर दे दिये. जब खेती बंद हुई तो जानवरों के लिये भूसा-चारा मिलना भी महंगा हो गया, लिहाजा नखडू ने अपने पालतू जानवरों को भी एक एक कर बेच दिया.

नखडू के पास अब कोई विशेष काम नहीं था, तो उसकी संगति भी गाँव के नेता टाईप लोगों से हो गयी, उन लोगों ने कुछ ले दे कर नखडू का नाम पहले नरेगा और फिर बीपीएल में लिखवा दिया.  बिना कुछ किये आधी मजदूरी और लगभग मुफ्त मिलने वाले अनाज से उसके जीवन की गाडी चलने लगी थी. जो नखडू तरक्की की बात करता था, वह अब सरकारी योजनाओं से कैसे लाभ लिया जाये इसकी बात करता था. बच्चों को उसने उनके हाल पर छोड दिया था, कहता इनके भाग्य में होगा तो कमा-खा लेंगे.

मनरेगा ने नखडू जैसे लाखों किसानों का जीवन बदल दिया था, जो नखडू पहले मेहनत से अपने परिवार का जीवन बदलना चाहता था, वह अब भाग्य भरोसे बैठ गया था.

(बँटाई => गाँव में जो किसान किसी कारण वश खेती नहीं कर पाते, वह अपने खेतों को किसी और किसान को दे देते है जिससे उन्हे खेत में होने वाली कुल उपज का लगभग आधा हिस्सा मिल जाता है, इसी प्रथा को बँटाई या अधिया कहते हैं)

2 comments:

Shah Nawaz said...

Dukhad!!!

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

अवधेश भाई, सरकारी नीतियाँ ही जब देश के नागरिकों को भ्रष्ट बनाने पर तुली हों तो कोई भला क्या कर लेगा? मनरेगा ने ही नखडू को भ्रष्ट बना दिया, तो बताइये किस काम की यह परिजोजना?
मैं तो यही कहता हूँ कि सुधारवाद से कभी भी सुधार नहीं हो सकता| हालत इतनी खराब है कि अब सुधारवाद नहीं, परिवर्तनवाद चाहिए|
मनरेगा सुधारवाद का ही एक उदाहरण है|