धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Wednesday, August 31, 2011

मृत्युदंड के बाद की राजनीति बंद करो. (stop politics with death sentence)

महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा पूर्व प्रधान मंत्री स्व. श्री राजीव गाँधी के हत्यारों की दया याचिका खारिज करते ही भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही डीएमके ने तमिल राजनीति में खुद को फिर से स्थापित करने के लिये इसमें मौका तलाशना शुरु कर दिया. उधर पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने भुल्लर और फिर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुल्ला ने भी अफजल गुरु को लेकर अपने तेवर दिखाने शुरु कर दिये तो कुछ स्वघोषित बुद्धिजीवी भी इस सजा का विरोध कर रहे हैं.

अगर मृत्युदंड की सजा पाये व्यक्ति को लेकर राजनीति करनी हो, तो यह सजा बंद क्यों नहीं कर देते. क्यों नही कानून बना देते कि व्यक्ति की सजा उसके द्वारा किये गये अपराध नहीं, उसकी भाषा, धर्म और जाति के आधार पर तय की जायेगी.

सीमाओं पर बलिदान होने वाले देश के वीर सपूतों से कोई नहीं पूछता कि इनकी भाषा, धर्म और जाति क्या है. आतंकियों की गोलियाँ भाषा, जाति या धर्म पूछ कर नहीं चलती. देश पर जान न्योछावर करने बलिदानियों के माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी और बच्चों का कोई मानवाधिकार नहीं है क्या?

बिना किसी ठोस कारण के अफजल गुरु की फाँसी की सजा रोकी गयी है. यह धार्मिक तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है, सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के कारण देश की धर्मनिरपेक्षता के साथ खेला जा रहा है. देश का दुर्भाग्य यह भी है कि वोट के इन सौदागरों की चाल भी सफल होती है और वोट की गन्दी राजनीति के बल पर यह राजनीतिक दल उस खास वर्ग का समर्थन लेने में सफल हो जाते हैं.

घिनौनी राजनीति का यह खेल भारत की एकता और अखंडता के लिये बडा खतरा बनता जा रहा है, खास वर्ग की जनसंख्या वृद्धि के साथ इसका रूप और वीभत्स होता जा रहा है. अभी साल भर पहले बरेली में हुए दंगो में एक वर्ग को खुश करने के लिये दंगो के जिम्मेदार व्यक्ति को छोड दिया गया था. अगर भाषा, जाति-धर्म को आधार बना कर हम इसी तरह अपराधियों को क्षमादान देते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब अपराधी अपने जाति-धर्म के आधार पर अपराध करने के बाद खुले घूमेंगे और भाषा, जाति या धर्म के नाम पर अलगाववादी भारत के टुकडे करने से भी परहेज नहीं करेंगे.

धर्म के आधार पर भारत के कई विभाजन हो चुके हैं, क्या हमने कभी सोचा कि क्यों चुनते हैं हम ऐसे लोगों को जिन्होने अपनी राजनीतिक भूख शान्त करने के लिये देश के टुकडे कर दिये, आज भी बटवारे के लिये जिम्मेदार लोग हमारे आदर्श बने हुए हैं. इतिहास से सबक लेने की आवश्यकता है और जब तक हम ऐसे लोगों को जड से उखाड कर नहीं फेकेंगे तब तक घिनौनी राजनीति करने वाले लोग सत्ता के लिये देश को बाँटते रहेंगे.

1 comment:

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

बेहतरीन लिखा हुआ लेख, बिगाड नहीं सकता कोई कुछ इनका