धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, July 10, 2011

किसानों के स्वयंभू नेता. (So called farmer leaders )

उत्तरप्रदेश के ग्रेटरनोएडा में भूमि अधिग्रहण और उसके बाद उपजे विवाद ने किसानों के नये नये नेता पैदा कर दिये हैं. जिसे देखो वही खुद को किसानों का नेता साबित करना चाहता है. देश की राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा तक बन रहे यमुना एक्सप्रेस वे के आसपास की जमीन पर प्रदेश सरकार और बिल्डरों की ललचाई नज़र ने यहाँ के किसानों को विभिन्न प्रलोभनों द्वारा अपनी जमीन बेचने के लिये सोचने पर विवश कर दिया है. जिस देश की अर्थव्यस्था में कृषि का सबसे ज्यादा महत्व हो उस देश में गंगा-यमुना के दोआब में स्थित इस उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण आने वाले समय के लिये बहुत ही घातक सिद्ध होने वाला है.

राहत की बात यह है कि अभी माननीय उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय ने इस साठगाँठ पर विराम लगाते हुए, ग्रेटर नोएडा के कुछ गाँवों की भूमि का अधिग्रहण रद्द कर दिया है. किसानों को मिला यह न्याय किसी नेता ने नहीं खुद उनके द्वारा लडी गयी लडाई ने दिलाया है.

किसानों की वास्तविक समस्याओं पर गौर करें तो दिल्ली के आसपास हुआ अधिग्रहण वास्तव में उत्तर प्रदेश के सभी किसानों की समस्या नहीं, यहाँ के किसान तो खुद अपनी जमीन विभिन्न प्राधिकरणों को बेचना चाहते हैं, यहाँ की असली समस्या यह है, किसानों से बेहद सस्ते दर पर जमीन खरीद, बिना कुछ किये हुए प्राधिकरण ने उस जमीन को बिल्डर को 10 गुने दाम पर बेच दिया और बिल्डर ने उसी जमीन को फिर से मोटे मुनाफे पर खुले मार्केट पर बेचना शुरु कर दिया. मतलब किसानों को उनकी जमीन का प्रति वर्ग मीटर मूल्य मिला लगभग 1000 रुपये, बिल्डर ने उस जमीन को प्राधिकरण से खरीदा 10000 रुपये में और फिर उसी जमीन को 15000 रुपये में खुले मार्केट में बेचना शुरु कर दिया. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि उस जमीन पर अभी विकास कार्य शुरु भी नही हुआ था. इसी वजह से किसानों को अपने ठगे जाने का एहसास हुआ और उन्होने आंदोलन की राह पकड ली. वास्तव में यह समस्या किसानों की नही, व्यापरियों बने किसानों, बिल्डरों और प्रदेश सरकार के एजेन्ट प्राधिकरणों के बीच मुनाफे को लेकर हुई रस्साकसी है. किसानों की असली समस्या तो यह तब होती जब किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देना ही नही चाह रहे होते.

वास्तव में प्रदेश की जनता को यह समझने की जरूरत है कि किसानों के नये नेता के रूप में अपनी ताजपोसी कराने वाले राहुल गाँधी पहले विदर्भ जाकर वहाँ के किसानों की समस्या सुलझाते, लेकिन वहाँ उनकी अपनी सरकार ही किसानों के उपर जुल्म ढा रही है और अमूल बेबी के नाम से विख्यात राहुल बाबा को किसानों की वह समस्या नहीं दिखाई दे रही.

मुझे याद है कि 12-15 वर्ष पहले तक उत्तर प्रदेश के किसानों के लिये गन्ना बेचना सबसे बडी समस्या थी. उस समय गन्ना दफ्तर पर किसानों को गन्ना बेचने के लिये पर्चियाँ मिलती थीं, जिसे गन्ना माफिया, बाबू और दलाल मिलकर असली किसान तक पहुचनें ही नहीं देते थे और अपना गन्ना बेचकर भुगतान ले लेते थे. मतलब पर्ची किसी गरीब किसान की, और गन्ना बेचकर भुगतान लेते थे माफिया.  मैने यह भी देखा है जब साल भर से खडी फसल को किसान न बिकने की स्थिति में पछताते और रोते हुए खुद जला देते और फिर गन्ना न बोने की कसमें खाते थे. लेकिन जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी तो सरकार ने किसानों को देय राशि का भुगतान सरकारी बैंको से किये जाने की व्यवस्था की और सरकार का यह कदम प्रदेश में गन्ना किसानों के लिये सबसे बडी राहत लेकर आया. उस दूरदर्शी निर्णय के कारण किसानों में गन्ना बोने के लिये विश्वास जगा और प्रदेश में बहुत सारी चीनी मिलें स्थापित हुई. आज प्रदेश में गन्ना बेचने और उसका भुगतान लेने में किसान को लगभग कोई समस्या नहीं आती. किसानों के हित में उठाये गये अपनी सरकार के इस कदम को भाजपा खुद ही भूल गयी और अपने आपसी झगडे में इसका लाभ नहीं ले पा रही.

किसानों के हित में लिया गया एक अन्य दूरदर्शी निर्णय भी भाजपा (एनडीए) की केन्द्र सरकार द्वारा लिया गया था, जब उसने 1998-1999 में किसान क्रेडिट कार्ड सुविधा शुरु की थी. फसल की बुवाई के समय महाजनों से ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लेने वाला किसान फसल के पैदा होने के बाद मूलधन के साथ ब्याज के रूप में मुनाफे का बडा हिस्सा चुकाता था. फसल बर्बाद होने की स्थिति में यही कर्ज किसान को जान देने पर मजबूर भी करता था. किसान क्रेडिट कार्ड के आने से किसानों की यह समस्या भी लगभग हल हो गयी है, लेकिन भाजपा इसका भी प्रचार नहीं कर पायी और जाहिर है जब प्रचार नहीं तो लाभ नहीं.


किसानों को स्वावलम्बी बनाने के उपरोक्त दोनों निर्णय ऐसे हैं जिनकी कोई काट नहीं, लेकिन भाजपा इन्हे खुद ही भूल गयी है, तभी तो महलों में रहने वाले लोग किसानों के स्वयंभू नेता बन रहे हैं और मीडिया के सहयोग से खुद को प्रचारित प्रसारित करवा रहे है हैं, जनता भी इनका तमाशा देख रही है. तभी तो राहुल गाँधी की अलीगढ में हुई किसान पंचायत में किसान कम और नेता ज्यादा थे.

इतना सब कुछ हो रहा है लेकिन फिर भी किसानों के हित के लिये अपना जीवन लगाने वाले लोग चुपचाप अपना कार्य कर रहे हैं. अनूकूल परिस्थितियाँ आते ही आपको किसानों के हित में कुछ ऐसे ही दूरगामी परिणाम वाले निर्णय फिर से देखने को मिलेगें. बस जरूरत है इन दोमुहें नेताओं से बचकर रहने की, जिन्हे महाराष्ट्र के किसानों की असली समस्यायें नहीं दिखाई देती लेकिन उत्तरप्रदेश में किसानों के नाम पर राजनीति चमकानी खूब आती है.

3 comments:

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

अवधेश भाई महाराष्ट्र की समस्याएँ अमूल बेबी को कहाँ से दिखेंगी, क्योंकि ये समस्याएँ तो इसकी पार्टी की ही दी हुई हैं, किसानों को| फिर उत्तर प्रदेश में चुनाव भी तो आने वाले हैं| ऐसे समय में तो ये गधे को भी बाप बना लें, वो किसान तो आखिर इंसान हैं|
रही बात भाजपा की तो, मुझ्र तो यही समझ नहीं आता कि आखिर भाजपा चाहती क्या है? अब तो मुर्खता की हद हो गयी|

DR. ANWER JAMAL said...

आखिर भाजपा चाहती क्या है ?
आपकी पोस्ट अच्छी है।

हिंदी ब्लॉगर्स को ‘अमन का पैग़ाम‘ दे रहे हैं जनाब एस. एम. मासूम साहब

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

सही कहा आपने, चर्चा में तो स्‍वयंभू ही रहते हैं।

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