धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, June 24, 2011

उत्तर प्रदेश का जंगलराज!! जिम्मेदार कौन? (Law and Order issue in UP, Who's responsible)

मीडिया में आज कल उत्तरप्रदेश छाया हुआ है, यहाँ जिनके ऊपर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी है वही उसे पलीता लगा रहे हैं, अचानक ही अपराध की खबरों का ग्राफ बहुत उपर चढ गया है, जैसे विगत चार वर्षों से प्रदेश शान्त रहा हो और अब एकाएक अपराधों की बाढ सी आ गयी हो. लेकिन इसका उत्तर तो निश्चय ही नहीं है. वास्तव में अपराध का स्तर तो पिछले दशक से घटने की बजाय और बढता जा रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी सरकार अपराध पर नियंत्रण करने में असमर्थ ही होगी ऐसा जान पडता है.

मीडिया में खबरें बनने का कारण अपराध नहीं, प्रदेश का चुनावी माहौल है. बडा से बडा नेता छोटी से छोटी घटनाओं पर हो हल्ला मचा रहा है और उसका राजनीतिक लाभ लेने के लिये उसे मीडिया के द्वारा खूब प्रचारित प्रसारित करवा रहा है. इस मामले में काँग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा लाभ की स्थिति में है और उसका देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया पर अघोषित नियंत्रण है. इसलिये उसके नेताओं को मीडिया में प्रमुखता से कवरेज दी जा रही है. भट्टा पारसोल और मीडिया के दम पर काँग्रेस पार्टी प्रदेश की चुनावी राजनीति में मुख्य लडाई में आ गयी है और अब मीडिया के सहयोग से अगले विधानसभा चुनावों तक कमोवेश यही स्थिति बनी रहेगी.

उत्तरप्रदेश के विगत चुनावों मे मायाराज समाजवादी पार्टी के गुण्डाराज के विरुद्ध आया था और माया ने जाति व्यवस्था (जिसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया) और एक नारे "चढ गुण्डन की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर" के दम पर जनता का विश्वास जीता. यह गुण्डे कोई और नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के नेता लोग थे. आज भी देखें तो समाजवादी पार्टी इससे मुक्त होने का कोई विचार रखती है, ऐसा प्रतीत भी नहीं होता. लेकिन समाजवादी पार्टी को हराने के लिये माया ने भी जमकर गुण्डों का सहारा लिया था, जिसे अब प्रदेश की जनता भुगत रही है. बीते चार वर्षों में शासनकाल में प्रदेश के कई मंत्री व विधायक कानून को ठेंगा दिखा चुके हैं. यह बात और है कि बीएसपी में माया जैसा दूसरा नेता न होने की वजह से म‌ाया ने जिसे चाहा, बाहर फेंक दिया और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर उन्हे जेल भी भेजा. उनका यह निर्णय बहुत कुछ उनकी प्रतिष्ठा बचाने में उपयोगी साबित हुआ.

अपराध और राजनीति में के मूल में नेता अफसर और अपराधियों का गठजोड है, जिसने आम व्यक्ति को राजनीति से लगभग दूर कर दिया है. चुनाव में होने वाले खर्च और और जोखिम को देखते हुए राजनीति में आना आसान भी नहीं. जनता भी पोस्टर बैनर देखती है, व्यक्ति की नियत नहीं, इसलिये प्रचार प्रसार का खर्च वहन करना सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं, अत: जनता के पास चुनने के लिये विकल्प कम ही होते हैं. चुनावों में विभिन्न दलों और निर्दलीय किन्तु मजबूत प्रत्याशियों की हत्या होना भी उतरप्रदेश में आम बात है, जो एक आम व्यक्ति को राजनीति से दूर करती है. 2004 के लोकसभा चुनावों में गोण्डा से भाजपा प्रत्याशी घनश्याम शुक्ला की मौत की सीबीआई जाँच अभी भी अधूरी है इण्डियन जस्टिस पार्टी के बहादुर सोनकर की हत्या के राज से पर्दा उठेगा, यह कहना मुश्किल है. भाजपा तो घनश्याम शुक्ला की हत्या को भूल चुकी है तो उनकी पत्नी नन्दिता आज उसी समाजवादी पार्टी की विधायक हैं, जिसके नेता पर घनश्याम शुक्ला की हत्या का आरोप लगा था.

देश में बढते अपराध, भ्रष्टाचार आदि के लिये जिम्मेदार वह व्यक्ति नहीं जिसे आपने चुना है, जिम्मेदार वह लोग हैं, जिन्होने उस व्यक्ति को चुन कर अपना प्रतिनिधि बनाया है. मुझे बतायें कि कितने स्थानों पर जनता खुद जाकर किसी ईमानदार व्यक्ति से चुनाव लडने के लिये प्रेरित करती या कहती है. कितनी पार्टियाँ अपने ईमानदार कार्यकर्ता को टिकट देती हैं. वस्तुत: ईमानदार व्यक्ति को यह बताया जाता है कि राजनीति तुम्हारे लिये नहीं है. अब जब आप प्रामाणिक व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि नहीं बना सकते तो बदले में एक अच्छी सरकार की कल्पना व्यर्थ है. सरकार का मुखिया चाहकर भी ऐसे अपराधी जनप्रतिनिधियों पर अंकुश नहीं लगा सकता और उत्तरप्रदेश सरकार इसका उदाहरण है.

वर्तमान में प्रदेश के राजनीतिक परिदृ्श्य को देखें तो हमें मुख्य रूप से चार दल बसपा, सपा, काँग्रेस और भाजपा नज़र आते हैं. पश्चिम में रालोद तो पूर्व में नवोदित पीस पार्टी की भूमिका सीमित ही होगी. सपा और बसपा में नेतृत्व संकट नहीं है, यहाँ निर्विवाद रूप से माया और मुलायम परिवार का ही कब्जा रहेगा. काँग्रेस तो राहुल के नेतृत्व में ही लडेगी, और जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री राहुल की ही पसंद का होगा, इसमें कोई संशय नहीं. सबसे दयनीय स्थिति भाजपा की है, अपने वास्तविक मुद्दों को तिलांजली देकर, बहुत से जनाधार विहीन नेताओं वाली यह पार्टी कल्याण सिंह का कोई विकल्प नहीं तैयार कर सकी. वर्तमान में योगी आदित्यनाथ को छोड कोई अन्य नेता अपनी भी सीट जीतने की स्थिति में नहीं दिखाई देता.

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर विष्लेषण करने से पता चलता है कि कम से कम आने वाले चुनाव में हमें विधानसभा में साफ सुथरे लोग दिखेंगे ऐसा असंभव सा लगता है, क्योकि सभी पार्टियों को चुनाव जिताऊ उम्मीदवार चाहिये, जनप्रतिनिधि नहीं. ऐसे में फिर से जिम्मेदारी जनता पर है कि वह अपने आने वाले समय को कैसा बनाना चाहती है, अगर विधानसभा में अपराधियों को भेजेगी तो लचर कानून व्यवस्था की जिम्मेदार वह खुद होगी कोई और नहीं. जनता का एक मन होना चाहिये कि किसी भी सूरत में अपराधी चुनाव न जीतने पायें. अगर अपराधी आपके प्रतिनिधि नहीं होंगे तो यकीनन प्रदेश की स्थिति में सुधार होना तय ही है और अगर फिर से अपराधी सदन में पहुचे तो क्या होगा यह आप देख सुन ही रहें हैं....

Sunday, June 19, 2011

काँग्रेस को संघ से क्यों डर लगता है. (Congress, RSS Fobia and Fear)

आजकल भ्रष्टाचार से लडाई चल रही है, सभी के निशाने पर केन्द्र की यूपीए सरकार और काँग्रेस पार्टी है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी ने कमर कस ली है. बाबा रामदेव जी हों या अन्ना हजारे, संघ ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई में सबको सहयोग और नैतिक समर्थन देने की बात की है. अब काँग्रेस और सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि इन सबके पीछे संघ है. वैसे तो संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि इन आंदोलनों को संघ का सिर्फ नैतिक समर्थन है. लेकिन अगर संघ या कोई भी अन्य संस्था भष्टाचार के विरुद्ध लडाई लड रही है या इसमें सहयोग कर रही है तो इसमे गलत क्या है?

अन्ना हजारे जी की जन लोकपाल की माँग में पेचीदा कुछ नहीं. क्या आपको अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेंविस्की प्रकरण याद नहीं जब अमेरीकी राष्ट्रपति को महाभियोग का सामना करना पडा था. जन-लोकपाल सिर्फ प्रधानमंत्री के गलत कार्यों की निगरानी करेगा, ठीक वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री के आयकर में कुछ गलत सूचना देने पर आयकर अधिकारी उनसे पूछताछ कर सकता है. अब अगर देश के लिये मह्त्वपूर्ण इस मुद्दे पर संघ अन्ना का समर्थन करता है तो इसमें क्या गलत है ?

बाबा रामदेव जी का काले धन के खिलाफ चलाया जा रहा आंदोलन नया नहीं है, न ही वर्तमान में हुए घोटालों से इसका संबंध है. यह आंदोलन पिछले २ वर्षों से सतत रूप से पूरे देश में चल रहा था, लेकिन नित नये खुलासों से त्रस्त जनता ने बाबा का समर्थन किया तो काँग्रेसी नेतृ्त्व के पसीने छूट गये. क्या काला धन को भारत से बाहर भेजे जाने पर रोक नहीं लगनी चाहिये और क्या गया धन वापस नहीं आना चाहिये. यह अवैध रूप से लूटी गयी जनता की सम्पत्ति है, इसे वापस लाने में अगर संघ बाबा रामदेव के साथ खडा है तो क्या गलत है. लेकिन देश के चाटुकार और ख्याति प्राप्त करने के लालच में लगे बुद्धिजीवी जनता को लगातार गुमराह कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि जनता अगर खुद से सोच विचार करने लगी तो टीवी पर चलने वाली इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकाने बंद हो जायेंगी.

कुल मिलाकर हम देखेंगे कि काँग्रेस के निशाने पर हमेशा संघ रहा है, इसका कारण संघ के पीछे हिन्दुत्व की वह विचारधारा है जो भारतीय जनमानस में या कहें कि भारत के कण कण में व्याप्त है. संघ ने अपनी कोई विचारधारा नहीं बनायी, वह उन्हीं विचारों को लेकर चला जिसे लोग सदियों से मानते थे, समझते थे और दैनिक जीवन में उसका पालन करते थे. संघ ने बस ऐसे ही लोगों को एकत्र कर एक अनुशासित संगठन का रूप दे दिया या यह कहें कि संघ ऐसे ही जागरुक व्यक्तियों के द्वारा समाज का निर्माण करने में लगा है.

पीछे कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो समाज स्वयं ही अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध खडा होने लगा है, चाहे जम्मू में बाबा अमरनाथ के लिये भूमि आंदोलन हो,  दक्षिण में हुआ रामसेतु आंदोलन हो या अभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन, इन आंदोलनों का नेतृ्त्व करने वाले आम समाज के लोग हैं, जिन्हे संघ ने अपना नैतिक समर्थन दिया है.

देश के विकास में संघ का योगदान विद्या भारती द्वारा चलाये जा रहे २८ हजार से ज्यादा विद्यालयों से समझा जा सकता है जिसमें लाखों विद्यार्थी उचित शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र निर्माण में लगे हैं. पूरे देश में १.५ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प चलाने वाला यह संगठन देश समाज को नयी दिशा देने में लगा है और यही काँग्रेस की सबसे बडी परेशानी है. आदिवासियों के बीच वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य हो या आसपास की बस्तियों में किया जाने वाला सेवा कार्य, संघ के स्वयंसेवकों का नि:स्वार्थ भाव से किया गया कार्य सबका मन मोह लेता है. चाहे चीन के साथ युद्ध हो या चरखी दादरी का विमान दुर्घटना काण्ड हो, देश समाज पर आने वाले संकट के समय भी संघ के स्वयंसेवकों की सेवा एवं त्याग भावना अद्वितीय है. चीन के साथ युद्ध के समय स्वयंसेवको के योगदान को देखते हुए काँग्रेसी प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने संघ के स्वयंसेवकों को गणतन्त्र दिवस के अवसर पर होने वाली परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया था और अल्पकालीन सूचना पर भी ३००० स्वयंसेवकों ने परेड में हिस्सा भी लिया था.

सुबह लगने वाली प्रभात शाखा में भाग लेने से लेकर अपने घर, पास पडोस और कार्यालयों में एक स्वयंसेवक अपने दैनिक क्रिया कलापों के द्वारा समाज में एक अमिट छाप छोडता है और समाज को अपना बनाने में कोई कसर नहीं छोडता,  इन्ही कारणों से समाज हमेशा संघ के साथ रहता है और संघ के स्वयंसेवकों  को इस बात का गर्व भी होता है और स्वयंसेवक हमेशा इस बात का ध्यान भी रखता है कि उसे अपने क्रिया कलाप द्वारा समाज में एक आदर्श प्रतिस्थापित करना होता है.

पूर्वोत्तर में अलगाववाद से जूझती कांग्रेस सरकार और देशी मीडीया को भले ही यह सांप्रदायिक लगता हो, लेकिन संघ ने विभिन्न स्थानों पर पूर्वोत्तर के छात्रों के लिये आवासीय विद्यालयों की स्थापना की है, जिसमें पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को आधुनिक एवं रोज़गार परक शिक्षा के साथ साथ भारत माता की जय बोलना सिखाया जाता है. इसका जीता जागता प्रमाण मेरठ के शताब्दी विहार में स्थित माधव कुन्ज में देखा जा सकता है. आप खुद सोचिये, मेरठ में भारत माता की जय बोलना सीखकर एक बच्चा पूर्वोत्तर के अपने राज्य में जाकर जब अपनी रोज़ी रोटी कमाता हुए भारत माता की जय बोलेगा तो आपको कैसा लगेगा. क्या यह अलगाववाद पर एक कारगर प्रहार नहीं है.

जागरूक जनता पर शासन करना आसान नहीं इसलिये भारत माता की जय, और वन्देमातरम जैसे क्रांतिकारी शब्द काँग्रेस को सांप्रदायिक लगते है और इन्ही कारणो से एक सशक्त विचारधारा वाला यह संगठन काँग्रेस की नज़र मे खटकता रहता है और काँग्रेस नेतृ्त्व इसे बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडना चाहता.
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी त्याग, बलिदान और सेवा के प्रतीक स्वयंसेवकों एवं जीवनव्रती प्रचारकों के दम पर अपना लोहा मनवाने वाला यह संगठन देश को परम वैभव पर ले जाने के लिये कृ्त संकल्पित है.
मन मस्त फकीरी धारी है, बस एक ही धुन है जय भारत.
भारत माता की जय.

Sunday, June 12, 2011

लोकतंत्र के हत्यारे और उनका लूटतंत्र

हमारा देश भारत गणराज्य कहने को तो विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है, लेकिन यहाँ लोकतंत्र की धज्जियाँ रोज़ उडते हुए देखी जा सकती हैं. रामलीला मैदान पर सोये हुए निहत्थे लोगों पर पुलिसिया प्रहार इसकी बानगी भर है. रोज़मर्रा के जीवन में हमें हमारा अधिकार कितना मिलता है, यह सोचनीय है.

जिस देश का प्रधानमंत्री कहता है कि अपनी ही जनता पर लठियाँ चलाने के आलावा उसके पास कोई विकल्प नहीँ था, तो उससे बडा धोखेबाज व्यक्ति कोई दूसरा नहीं. बाबा रामदेव और उनके साथ अनशन पर बैठी जनता ने ऐसा क्या गलत माँगा जिसे पूरा करना प्रधानमंत्री के बस की बात नहीं थी. सिर्फ अपने आका और सरकार में शामिल भ्रष्ट लोगों एवं खुद को बचाने के लिये लिये गये निर्णय को मजबूरी का नाम देना तर्कसंगत नहीं. बाबा रामदेव ने जब से अनशन का एलान किया तभी से, सरकार और भ्रष्ट लोग उनके खिलाफ आग उगल रहें रहे हैं, बिना यह बताये हुए वह क्या गलत माँग रहे हैं.

जनता को लोकपाल बिल का सपना दिखाने वाले अन्ना हजारे, बाबा को आंदोलन के लिये अनुपयुक्त बता रहे हैं, मुझे तो लगता है कि अन्ना को अपनी टोपी उतार वहीं चले जाना चाहिये जहाँ से वह आये थे. उन्हे अपना खुद का इतिहास देखना चाहिये कि उन्हे इस मुकाम पर पहुचाने में किसकी भूमिका रही. क्या वह अनुभव लेकर पैदा हुए थे. मेरी नज़र में तो ऐसे समाजसेवी को शर्म से डूब मरना चाहिये जो यह सोचता है कि अनुभवहीन व्यक्ति को घर में चुप बैठ जाना चाहिये और उसे आंदोलन या उसका नेतृ्त्व नहीं करना चाहिये. बाबा रामदेव कि माँग में कुछ गलत नहीं, रही नेतृ्त्व की बात तो जैसे सूरज का प्रकाश अपना मार्ग ढूँढ लेता है, वैसे ही इस आंदोलन से निकले हजारों लोग अपना रास्ता खुद ढूँढ लेंगे. जेपी आंदोलन की उपज रहे कई नेता यूपी और बिहार की राजनीति में काँग्रेस को धूल चटा चुके हैं.

सर्वविदित है कि हम उस देश में रहते हैं जहाँ रत्नाकर अपने अच्छे कर्मों की वजह से बाल्मिकि बन कर पूजे जाते हैं तो बाबा रामदेव पर इतने आरोप क्यों? बाबा रामदेव के आलोचक इसका क्या जबाब देंगे, क्या वह इस बात से सहमत नहीं कि काला धन देश में वापस आये?.

बाबा रामदेव के आलोचकों में या तो वे काँग्रेसी हैं जिनका काला धन विदेशों में जमा है या वह नेता जो आने वाले समय में सत्ता प्राप्त कर जनता को लूटने का मंसूबा पाले हुए हैं. भले ही बाबा का अनशन टूट चुका है लेकिन आम जनता के दिल में तो बाबा रामदेव जगह बना चुके हैं और जनता लोकतंत्र के लूटेरों को सबक जरूर सिखायेगी, इसमें कोई संशय नहीं.

Saturday, June 11, 2011

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Bismil), बाबा रामदेव जी (Baba Ramdev) और देश की बेचारी जनता

11 जून यानि पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जन्म दिवस, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. देश के लिये सर्वोच्च बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों और वास्तविक आज़ादी का सपना देखने वाले भारत माता के सपूतों मे बिस्मिल का नाम बडे ही आदर के साथ लिया जाता है. मेरे इस लेख का ध्येय यह नहीं कि आप सभी का बिस्मिल के जीवन से परिचय कराया जाये, बस मैं यह चाहता हूँ कि हम उन परिस्थितियों पर गौर करें, जब बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों को सर्वोच्च बलिदान करना पडा था.

डा. मदन लाल वर्मा जी 'क्रांत'  के प्रयास से
ग्रेटर नोएडा के एक उद्यान का नामकरण
बिस्मिल के नाम पर किया गया.

हमने जवाहर लाल नेहरू का नाम खूब सुना है लेकिन लाला जगत नारायण मुल्ला का नाम बहुत नहीं सुना,  आपको बता दूं कि लाला जगत नारायण नेहरू के साले साहब थे. अब लाला जी और बिस्मिल का संबध यहाँ देखें.

"सन् १९१६ के काँग्रेस अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष जगतनारायण 'मुल्ला' के आदेश की धज्जियाँ बिखेरते हुए रामप्रसाद ने जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में शोभायात्रा निकाली तो सभी नवयुवकों का ध्यान उनकी दृढता की ओर गया।"

यह अवश्य बताना चाहुँगा कि अपने समय में लोकमान्य जितने लोकप्रिय थे, उतने गाँधी जी कभी नही रहे.

आप सभी यह भी जानते हैं कि अमर हुतात्माओं बिस्मिल, अशफाक, राजेन्द्र लहिडी और ठाकुर रोशन सिंह को काकोरी कांड में फाँसी की सजा हुई थी, लेकिन सजा दिलाने में योगदान किसका था, आप यह भी देखें.

"इस एतिहासिक मुकदमे में सरकारी खर्चे से हरकरननाथ मिश्र को क्रान्तिकारियों का वकील नियुक्त किया गया जबकि जवाहरलाल नेहरू के साले जगतनारायण 'मुल्ला' को एक सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत सरकारी वकील बनाया गया जिन्होंने अपनी ओर से सभी क्रान्तिकारियों को कड़ी से कडी सजा दिलवाने में कोई कसर बाकी न रक्खी। यह वही जगतनारायण थे जिनकी मर्जी के खिलाफ सन् १९१६ में बिस्मिल ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा पूरे लखनऊ शहर में निकाली थी."

विकिपीडिया में जाकर सब आप सब कुछ देख सकते हैं कि कैसे लाला जगत नारायण ने एक कांग्रेसी बनारसी लाल को वादामाफ गवाह बना कर देश के वीर सपूतों को असमय चिर निद्रा में सुला दिया था. देशवासियों के कल के लिये उन्होने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था. ज्यादा जानकारी के लिंक देखें.
 http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_'%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2'

वास्तव में अगर देश की स्वतन्त्रता और उसके बाद का सही इतिहास देखें तो नेहरू-गांधी परिवार से घिन आने लगेगी. लेकिन फिर भी यह परिवार भारत भाग्य विधाता बना हुआ है. चाहे बिस्मिल को मिली फाँसी की सजा हो, आज़ाद की अल्फ्रेड पार्क में हुई मौत हो या सरदार भगत सिंह को पथभ्रष्ट युवा कह कर बचाने से इंकार करना हो. प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं यही परिवार जुडा नज़र आता है. आज़ादी के बाद डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री,  दीन दयाल उपाध्याय आदि नेताओं की मृ्त्यु के प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं.

अब अगर हम विगत 5 जून को हुए रामलीला मैदान काण्ड की बात करें तो हमें कांग्रेस का घिनौना चेहरा फिर सामने दिखता है. अभी भी आपातकाल की यादें लोगों के जेहन में ताज़ा हैं. पिछले एक वर्ष से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरी कांग्रेस ने अब जनतंत्र पर ही हमला बोल दिया है. आधी रात को सोते हुए लोगों पर पुलिसिया अत्याचार किसी भी राष्ट्र के लिये कलंक से कम नहीं और दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में ऐसी घटना घटे तो उस राष्ट्र के शासन तंत्र को डूब मरना चाहिये, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. 121 करोड भारतीयों का प्रतिनिधि अगर विकल्पहीन हो कर अपनी ही जनता पर अत्याचार शुरु कर दे तो इसे क्या कहेंगे.

उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसोल में विगत दिनों जो कुछ भी हुआ, वह निंदनीय था. लेकिन अब प्रदेश सरकार पर मनगंढत झूठे आरोप लगा खुद को शर्मिन्दा भारतीय कहने वाले राहुल बाबा नदारद हो गये हैं. रामलीला मैदान के अहिंसक आंदोलन को कुचलने के बाद उन्हे भारतीय होने पर गर्व महसूस हो रहा होगा. राज ठाकरे के लोग जब बिहार के युवकों पर मुंबई में अत्याचार कर रहे थे तब भी यही युवराज गर्व महसूस कर रहे थे. यानि खुद करें तो सब कुछ अच्छा और दूसरों के दोष निकालाना कोई इनसे पूछे.

आज देश की जनता को वास्तविकता का एहसास हो रहा है, लेकिन अब भी वह घर में बैठी है. काँग्रेस के विरोध का माहौल है, लेकिन सडक पर कोई नहीं उतर रहा. भाजपा के नेता भी लगभग चुप हैं, मीडिया के सामने आलोचना कर देने से राजनीति नहीं हो सकती. दुर्भाग्य से यह प्रमुख विपक्षी दल ऐसे नेताओं के हाथ में है, जिनका जनता से सीधे संवाद नहीं है. जनता की आवाज बनने की बजाय भाजपा के नेता फोटो सेशन और नाचने गाने में व्यस्त है. जिस मुद्दे पर काँग्रेस को सफाई देनी थी, वहाँ काँग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने भाजपा से पूछ लिया कि राजघाट पर ऐसी कौन सी खुशी की बात थी कि सुषमा और अनुराग ठाकुर नाच गा रहे थे. उसके बाद आयी सुषमा की सफाई भी चौंकाने वाली थी. भाजपा के नितिन गडकरी जी से सिर्फ इतना कहना सही रहेगा कि लोकतंत्र की मृ्त्यु पर देशभक्ति गीत गाकर नाच गाना करने वाले लोग देश का भविष्य नहीं लिख सकते. इन्हे यह समझने की जरूरत है कि 70 करोड से ज्यादा युवाओं वाला देश इन नेताओं को कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा और आने वाले समय में इनसे नेतृ्त्व ही छीन लेगा.

अंत में बिस्मिल की देशवासियों के नाम लिखित इन अंतिम पक्तियों को देखें.

लिंक:

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी यही तो हृदय पर आघात लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी दल खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राणरक्षा के लिये एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी पाने का मुझे कोई भी शोक नहीं क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।


मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो अधिक उपयोगी सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति अनुकूल न होने से ऐसे आन्दोलनों से अधिकतर परिश्रम व्यर्थ जाता है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों से यही अन्तिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिल कर करें, और सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०

क्या 1927 और 2011 में अंतर नहीं?. क्या हम अब भी अशिक्षित हैं? क्या हमें बाबा जी और अन्ना के द्वारा हमारे लिये चलाये गये आंदोलन में चुप बैठना चाहिय?. अगर उत्तर नहीं है तो हे मेरे देशवासियों. उठो, जागो और निकलो सडक पर, लोकतंत्र पर हमले को बर्दाश्त मत करो, वर्ना एक दिन ऐसा आयेगा कि यही नेता अपने स्वार्थ के लिये देश को बेच देंगे.
...... अवधेश