धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, May 8, 2011

भारत तो ब्रिटिश देश लगता है (India looks like a british country)

अभी मेरे एक फ्रांसीसी मित्र कम्पनी के कार्य से भारत आये थे, कल उन्हे जाना था अत: बचे समय में उन्होने मुझसे दिल्ली घूमने की इच्छा जाहिर की, उनके पास मात्र कुछ घंटे थे और कुछ खरीददारी भी करनी थी. समय कम था अत: मैं उन्हे सबसे पहले इंडिया गेट ले गया. मैने उन्हे बताया कि यहाँ 24 घंटे जलती अमर जवान ज्योति देश के लिये बलिदान हुए लोगों को समर्पित है, मैने उन्हे पत्थरों पर खुदे नाम भी दिखाये. उन्होने इस बात का संज्ञान लेते हुए पूछा, कि यह नाम व सूचना किसी भारतीय भाषा में क्यों नही हैं?. उनका यह प्रश्न मुझे असहज करने के लिये काफी था. वास्तव में देखा जाये तो इंडिया गेट ब्रिटिश राज्य के लिये बलिदान हुए लोगों की स्मृ्ति में बनायी गयी इमारत है, लेकिन हम गुलामी की निशानियों को सजोने में अव्वल हैं और इस पर गर्व महसूस करते हैं, इसलिये यह इमारत हमारे लिये अब भी बहुत महत्वपूर्ण है.
इंडिया गेट के बाद हमने बाहर से राष्ट्रपति भवन देखा और फिर स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर गये. मंदिर की चाक चौबंद सुरक्षा  देख कर वह विस्मित से हो गये, उन्हे यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी सुंदर इमारत और करोडो लोगों के आस्था के केन्द्र को कोइ नुकसान भी पहुँचा सकता है. जनपथ पर भोजन और कुछ खरीददारी करने के बाद जब मैं उन्हे पुन: उसके होटल छोडने गया तो मैने उनसे पूछा कि अभी तक देखा गया भारत आपको कैसा लगा, उन्होने बहुत सीधा सादा उत्तर दिया कि भारत एक ब्रिटिश देश लगता है, जबकि यह स्वतंत्र है. उन्होने कहा यहाँ सब कुछ अंग्रेज़ी में है, लोग एक दूसरे से अंग्रेज़ी में बात करते हैं और बताया कि फ्राँस में ऐसा नही है, वहाँ आपस में लोग अंग्रेज़ी में बात करना पसन्द नहीं करते.
फ्राँसीसी मित्र की यह बातें सत्य ही हैं, हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं. अंग्रेजियत ने सही अर्थों में हमारा स्वाभिमान छीन लिया है. इससे बचने के लिये अंग्रेजियत का खात्मा जरूरी है, हमें अमेरिका के लिये नहीं भारत के लिये इंजीनियर बनाने चाहिये. ऐसे संस्थानों को बन्द करना चाहिये जिसका फायदा विदेशी अर्थव्यवस्था को हो रहा है. आखिर हम कब जागेंगे. सोचो अगर चंद पैसों के लिये डा. कलाम जैसे लोग अमेरिका चले गये होते तो क्या देश इतना ताकतवर होता. क्या ये सही नहीं कि देश के सबसे अच्छे इंजीनियर अपने भविष्य की शुरुआत ही विदेशी धरती पर करना चाहते हैं. मूल्यों में हो रही गिरावट के कारण ही अपराध और भ्रष्टाचार पनप रहे हैं. आखिर कब तक हम नकल करके पास होते रहेंगे. क्या नकल करके पास होने वाला व्यक्ति आपकी नज़रों में सम्मान प्राप्त कर सकता है. अगर नहीं तो अंग्रेजियत की नकल करके भारत देश विश्व में अपना सम्मान कैसे बचा सकता है?.


3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मुझे तो देश वासियों से हिन्दी में बात करना पसंद है। पर जब हमे अपना आदमी मिल जाता है तो हाडौ़ती में बात करता हूँ।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

बहुत गंभीर प्रश्न किया है आपने...सच ही है कि आज का भारत एक ब्रिटिश देश लगता है...न जाने क्यों इस राष्ट्र ने ब्रिटिश दासता को स्वीकार कर लिया है...पुरानी पीढ़ी तो अपना काम कर के चली गयी, अब बागडोर नयी पीढ़ी के हाथ में है| किन्तु दुःख होता है इस बात पर कि आपकी हमारी पीढ़ी को इस बात का बोध ही नहीं है...फेसबुक पर नित नयी नयी चीज़ें देखने को मिलती हैं| अंग्रेजी में कुछ घपड-झपड़ लिख देते हैं और उसके आगे किसी अंग्रेजी विद्वान् का नाम...लिखा क्या है यह खुद उन्हें भी समझ नहीं आता, किन्तु अंग्रेजी अच्छी लगी तो लिख डाला| किसी भी वाक्य के पीछे का भावार्थ जानना अति आवश्यक है जो केवल मातृभाषा से ही हो सकता है...
रही बात शिक्षण संस्थानों की तो यह सही है कि आज के हमारे शिक्षण संस्थान ब्रिटेन व अमरीका के लिए शिक्षा का व्यवसाय कर रहे हैं...मैं भी एक इंजिनियर हूँ, मैंने कभी अपने अध्ययन काल में यह नहीं सीखा कि कैसे मेरा ज्ञान देश के काम आ सकता है| सीखा तो बस केवल इतना कि कैसे में किसी बहु राष्ट्रीय कंपनी में नौकरी पा सकता हूँ| दुःख है इस व्यवस्था पर...किन्तु हम इसे बदलेंगे...अप हमारा साथ दें तो यह भी संभव है...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बिलकुल सही बात उठाई आपने.
न केवल फ्रांस बल्कि दुनिया के और भी देश जैसे जर्मनी और रूस आदि में भी उनकी मूल भाषा का ही प्रचलन में है .
सोचिये जब हम भारतीय कहलाने के बजाय इन्डियन कहलाना पसंद करते हों ,भारत या हिन्दुस्तान अपना नाम होते हुए भी दुनिया में इण्डिया के नाम से जाना जाता हो तब यह तो होना ही है.
अफ़सोस कि विदेशियों के कटाक्षों से भी हम कुछ सीख नहीं सकते.

सादर