धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, May 29, 2011

इण्डिया अगेंस्ट करप्शन और जन लोकपाल आन्दोलन

विगत दिनो श्री अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को खूब समर्थन मिला. मिलना भी चाहिये था, क्योकि जनता भ्रष्टाचार पर होने वाले रोज रोज के खुलासे से परेशान थी. लेकिन अब आन्दोलन पर सवाल भी हो रहे हैं. आंदोलन के बाद राजनेता भी परेशान थे, क्योकि अन्ना ने सबको भ्रष्ट बता दिया था. इसका मतलब यह था कि ए. राजा और और आज भी झोली में डायरी पेन लेकर चलने वाले नेता बराबर हैं.
अन्ना के आन्दोलन के पीछे कौन है और कौन नही, इस विवाद से आम लोगो का क्या लेना देना. यह तो राजनीतिज्ञ सोचे कि किसका लाभ हुआ और किसकी हानि, लेकिन क्रिकेट का विश्वकप जीतने के बाद और आईपीएल के पहले तक पूरे आन्दोलन का प्रबन्धन जिस प्रकार से किया गया, उसमे कुछ न कुछ अस्वाभविक जरूर है. मीडिया ने आन्दोलन के पक्ष मे हवा बनायी और कुछ लोगो ने इसके जरिये अपना खूब प्रचार प्रसार किया.
भ्रष्टाचार की सारी सीमाये तोडने वाली काँग्रेस सरकार इस आन्दोलन के बाद सबसे ज्यादा फ़ायदे मे दिखी और अन्ना की सभी माँगे स्वीकार कर ली गयी. मतलब अन्ना ने जन लोकपाल नहीं एक कमेटी माँगी और कमेटी के सदस्य माँगे. काँग्रेस का क्या बिगडा? कुछ नहीं, उसके सदस्य तो कमेटी में बने ही हैं, कमेटी की बात करें तो एक शब्द आता है सिविल सोसाईटी, अब सोचिये यह सोसाईटी क्या है?  क्या ये जनता के प्रतिनिधि हैं, जब उत्तर नहीं है तो ये जनता के लिये जवाबदेह होंगे क्या? अरे जब आपने जिसे चुन कर संसद और विधानसभा में भेजा वही आपके प्रति जवाबदेह नही तो सिविल सोसाईटी क्या कर लेगी. फिर भी जनता को लग रहा था कि उसे बहुत कुछ मिल गया, और वास्तव मे सरकार के प्रति जनता का आक्रोश अब पहले जैसा नही रहा. अभी पिछले महीने एक विचार गोष्ठी मे युवाओ ने कहा कि भ्रष्टाचार अब समस्या नही रहेगा, जैसे इस दानव पर विजय प्राप्त कर ली गयी हो. कुल मिलाकर सरकार और काँग्रेस ने स्थिति अपने नियन्त्रण मे कर ली थी. मीडिया भी आन्दोलन का समर्थन कर खूब वाहवाही लूटी और अन्ना ने उसे फ़िर लोक तन्त्र के चौथे स्थान पर बैठा दिया था. लेकिन मेरे दिल मे टीस रह गयी थी, कि देश और जनता से छल करने वालो के नकाब को उतार फ़ेकने वाले डा. सुब्रमण्यम स्वामी के या देश भर मे भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबा रामदेव और स्वर्गीय् श्री राजीव जी दीक्षित के पक्ष मे यह मीडिया कभी इस तरह खडा नही दिखा.
अब फिर से आंदोलन की परिस्थितियों पर गौर करें, तो पता चलेगा कि उस समय बाबा रामदेव की सभाओं में भारी भीड उमड रही थी, बाबाजी दिल्ली में एक बड़ी सभा कर अपनी योजनाओं का संकेत दे चुके थे,  ईजिप्ट में तब तक क्रांति हो चुकी थी और कुछ कुछ वैसी ही परिस्थितियाँ भारत में भी बन रही थी. फिर अचानक एक आंदोलन हुआ और मीडिया ने उसे खूब हवा दी. मुख्य विपक्ष गैर राजनीतिक संगठन हो गया और बाबा रामदेव एक दम से हासिये पर पहुच गये. जिस सरकार के पास भ्रष्टाचार के मामले में बोलने के लिये कुछ नही था, उसने एकदम से सिविल सोसाईटी और जन लोकपाल के माध्यम से जनता को संदेश दिया कि सरकार भ्रष्टाचार से लडने को गंभीर है. जनता से छल करने का यह काँग्रेसी खेल बहुत पहले से चला आ रहा है और आगे भी काँग्रेस का आपदा नियत्रंण तंत्र ऐसे ही काम करता रहेगा, क्योकि जनता फिर से अपनी रोजी रोटी में मस्त हो गयी है.
अभी विगत दिनों अन्ना गुजरात गये, उन्होने जाते ही मोदी सरकार पर तड़ से आरोप भी जड़ दिये, लेकिन जनता को विश्वास नही हुआ. जनता के इसी विश्वास के कारण मोदी जी अपने विरोधियों को कई बार धूल चटा चुके हैं. इसके बाद लोगो का इण्डिया अगेंस्ट करप्शन पर से विश्वास घटता जा रहा है. बेचारे अग्निवेश जी को तो थप्पड़ भी खाना पड़ गया. बाकी सबकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लग रहा है.
वास्तव में भारत की विडम्बना यही है कि यहाँ सब कुछ इंडिया के लिये होता है, भारत के लिये नहीं, करप्शन के विरुद्ध इंडिया खड़ा हुआ और शान्त भी हो गया. भारत तो बाबा रामदेव के साथ है, इसलिये सरकार को भी खतरा दिख रहा है, और बाबा जी के आंदोलन की राह में बाधायें पैदा की जा रही हैं, क्योंकि बाबाजी पर काँग्रेस का कोई दाँव काम करेगा इसकी उम्मीद कम ही है. 
पहले अन्ना और फिर बाबाजी के द्वारा लड़ी जा रही लडा़ई को जनता का अपार सहयोग मिल रहा है और इन आंदोलनों की परिणीति के रूप में देश में एक सशक्त वर्ग तैयार हो रहा है. यही वह समय है कि देश का राजनीतिक नेतृ्त्व यह समझ ले कि अगर वो अभी भी नहीं चेता तो देश का यही सशक्त वर्ग उनसे नेतृ्त्व ही छीन लेगा इसमें मुझे कोई संशय नही़.

Sunday, May 8, 2011

भारत तो ब्रिटिश देश लगता है (India looks like a british country)

अभी मेरे एक फ्रांसीसी मित्र कम्पनी के कार्य से भारत आये थे, कल उन्हे जाना था अत: बचे समय में उन्होने मुझसे दिल्ली घूमने की इच्छा जाहिर की, उनके पास मात्र कुछ घंटे थे और कुछ खरीददारी भी करनी थी. समय कम था अत: मैं उन्हे सबसे पहले इंडिया गेट ले गया. मैने उन्हे बताया कि यहाँ 24 घंटे जलती अमर जवान ज्योति देश के लिये बलिदान हुए लोगों को समर्पित है, मैने उन्हे पत्थरों पर खुदे नाम भी दिखाये. उन्होने इस बात का संज्ञान लेते हुए पूछा, कि यह नाम व सूचना किसी भारतीय भाषा में क्यों नही हैं?. उनका यह प्रश्न मुझे असहज करने के लिये काफी था. वास्तव में देखा जाये तो इंडिया गेट ब्रिटिश राज्य के लिये बलिदान हुए लोगों की स्मृ्ति में बनायी गयी इमारत है, लेकिन हम गुलामी की निशानियों को सजोने में अव्वल हैं और इस पर गर्व महसूस करते हैं, इसलिये यह इमारत हमारे लिये अब भी बहुत महत्वपूर्ण है.
इंडिया गेट के बाद हमने बाहर से राष्ट्रपति भवन देखा और फिर स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर गये. मंदिर की चाक चौबंद सुरक्षा  देख कर वह विस्मित से हो गये, उन्हे यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी सुंदर इमारत और करोडो लोगों के आस्था के केन्द्र को कोइ नुकसान भी पहुँचा सकता है. जनपथ पर भोजन और कुछ खरीददारी करने के बाद जब मैं उन्हे पुन: उसके होटल छोडने गया तो मैने उनसे पूछा कि अभी तक देखा गया भारत आपको कैसा लगा, उन्होने बहुत सीधा सादा उत्तर दिया कि भारत एक ब्रिटिश देश लगता है, जबकि यह स्वतंत्र है. उन्होने कहा यहाँ सब कुछ अंग्रेज़ी में है, लोग एक दूसरे से अंग्रेज़ी में बात करते हैं और बताया कि फ्राँस में ऐसा नही है, वहाँ आपस में लोग अंग्रेज़ी में बात करना पसन्द नहीं करते.
फ्राँसीसी मित्र की यह बातें सत्य ही हैं, हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं. अंग्रेजियत ने सही अर्थों में हमारा स्वाभिमान छीन लिया है. इससे बचने के लिये अंग्रेजियत का खात्मा जरूरी है, हमें अमेरिका के लिये नहीं भारत के लिये इंजीनियर बनाने चाहिये. ऐसे संस्थानों को बन्द करना चाहिये जिसका फायदा विदेशी अर्थव्यवस्था को हो रहा है. आखिर हम कब जागेंगे. सोचो अगर चंद पैसों के लिये डा. कलाम जैसे लोग अमेरिका चले गये होते तो क्या देश इतना ताकतवर होता. क्या ये सही नहीं कि देश के सबसे अच्छे इंजीनियर अपने भविष्य की शुरुआत ही विदेशी धरती पर करना चाहते हैं. मूल्यों में हो रही गिरावट के कारण ही अपराध और भ्रष्टाचार पनप रहे हैं. आखिर कब तक हम नकल करके पास होते रहेंगे. क्या नकल करके पास होने वाला व्यक्ति आपकी नज़रों में सम्मान प्राप्त कर सकता है. अगर नहीं तो अंग्रेजियत की नकल करके भारत देश विश्व में अपना सम्मान कैसे बचा सकता है?.