धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, April 29, 2011

"भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार आवश्यक" प्रस्ताव पर उचित कार्यवाही शुरु करे संघ

विगत दिनों से भ्रष्टाचार पर खूब हमला हो रहा है, अन्ना हजारे जी का आंदोलन भी हुआ, मीडिया ने भी आंदोलन को खूब हवा दी. 4 दिनों बाद अन्ना की माँगे मान ली गयी, जैसे लगा जनता की कितनी बडी जीत हुई, चैनलों पर 9 अप्रैल को ऎतिहासिक दिन बताया जाने लगा. जनलोकपाल बिल के लिये एक कमेटी बनायी गयी जिसमें काँग्रेस के लोग और तथा कथित सिविल सोसाइटी के लोग बैठ गये, लेकिन असल में आम जनता को वहाँ भी प्रतिनिधित्व नहीं मिला. जनता को लगा कि अब भ्रष्टाचार के दिन लद गये. अब तो जन लोकपाल आयेगा और भ्रष्टाचारी सलाखों के अंदर होंगे. यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि लोगों में सरकार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जो गुस्सा था, उसकी आग शान्त होने लगी थी. एक बैठक में मुझसे एक युवा इन्जीनियर ने कहा कि जनलोकपाल बिल आने से अब भ्रष्टाचार देश की बडी समस्या नहीं रही.
प्रथम दृ्ष्टया सरकार और कांग्रेस दोनों इस आंदोलन के पश्चात लाभ की स्थिति में रही. अन्ना के जूस पीते ही काँग्रेस और केन्द्र सरकार प्रसन्न हो गये क्योंकि उन्होने जनता के आक्रोश को नयी और गैर राजनीतिक दिशा देकर विपक्ष खासतौर पर भाजपा को इसका लाभ लेने से वंचित कर दिया. इसके लिये कहीं न कहीं भाजपा भी दोषी है, समय रहते भाजपा ने जनता के मिजाज को नहीं समझा और काँग्रेस येदुरप्पा पर आरोप लगा, जनता को यह बताने में सफल रही कि भाजपा भी दूध की धुली नहीं है. खैर आरोप तो सिविल सोसाइटी के भी सदस्यो पर लगने शुरु हो गये, लेकिन जैसे तैसे सिविल सोसाइटी अभी तक अपना अस्तित्व बचाये हुए है. लेकिन जनता फिर से सोने लगी है. अब अन्ना हजारे जी का इन्डिया अगेंस्ट करप्शन क्या कर रहा है, इसमें जनता की रुचि घटने लगी है, वह फिर से अपने रोजी रोटी में मस्त है, मीडिया को भी उसके कार्य का इनाम मिल चुका होगा. अत: उसे अब ज्यादा हो हल्ला मचाने की जरूरत नहीं रही और भ्रष्टाचारी खुले आम जनतन्त्र का मजाक उडा रहे हैं. अभी कल पीएसी की बैठक में मचा हो हल्ला और उसके बाद पीएसी की जाँच रिपोर्ट खारिज होना इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है. जिस तरह से काँग्रेस, द्रमुक, सपा और बसपा ने एक सोची समझी रणनीति के तहत पीएसी का अपमान किया, वह वास्तव में शर्मनाक है.
उपरोक्त घटना क्रम को देखते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि अब समय आ गया है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में पारित प्रस्ताव - 1 (12.03.11) "भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार आवश्यक" पर उचित कार्यवाही शुरु करे. संघ के किसी व्यक्ति विशेष के पीछे चलने से देश की जनता को भ्रष्टाचार के दंश से मुक्ति मिलना असंभव है. वर्तमान राजनीतिक दलों के अधिकांश नेता भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं. अन्ना हजारे जी का आन्दोलन कमजोर पड चुका है. देश को वर्तमान परिस्थितियों से निकालने की जिम्मेदारी संघ की है, समूचा राष्ट्र संघ की तरफ देख रहा है. मैं राष्ट्र के एक आम नागरिक के नाते माननीय सरकार्यवाह जी से निवेदन करता हूँ कि अब विलम्ब न करें. देश को भ्रष्टाचारी  राक्षसों से मुक्त कराने के लिये अतिशीघ्र जन आंदोलन की शुरुआत का विगुल बजना जरूरी है.

2 comments:

निर्झर'नीर said...

Avdesh ji

satya vachan ..aapka vichar uchit hai .
koshish kijiye safalta jaroor milegi
hamari duayen aapke sath hai

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

सही कहा है आपने अवधेश भाई...केवल एक जन लोकपाल विधेयक हमारा लक्ष्य नहीं है...यह तो पहला कदम था...हमें तो भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाना है...देश की जनता को भी चाहिए कि बाबा रामदेव द्वारा शुरू किया गया यह आन्दोलन अन्ना हजारे तक सीमित न करे...और साथ ही संघ को भी अब अपने समूचे प्रयास के साथ कोई निर्णायक कदम उठाना चाहिए...भारत स्वाभिमान और संघ को अब मिल कर प्रयास करने का समय आ गया है...राष्ट्रवादी शक्तियों का केन्द्रीयकरण आवश्यक है...