धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, January 9, 2011

कम्बल वाले मसीहा

आजकल जबरदस्त सर्दी का मौसम चल रहा है, कुछ नेता जिन्हें अपनी राजनीति चमकानी होती है वो शहर के आसपास की झुग्गियों में कम्बल बाँटते हैं. उनका यह कदम बेहद सराहनीय है. वास्तव में सच भी है इस ठण्ड में अगर कम्बल मिल जाए तो क्या कहने. कुछ समाजसेवी जो वास्तव में जन कल्याण में लगे होते हैं, जब हजारों कम्बल बाँटते हैं तो आम लोगों को नहीं पता चलता, लेकिन छुटभैये नेता १-२ दर्जन कम्बल बाँटकर सुर्ख़ियों में छा जाते हैं. इसके लिए वह बाकायदा मीडिया को सूचित करते हैं कि आज हम कम्बल बाँटने जा रहें हैं, अगले दिन क्षेत्रीय समाचार पत्रों में नेताजी तस्वीर के साथ गरीबों के मसीहा बन जाते हैं.
जनसेवा में आगे बढ़ा नेताजी का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसका फायदा वही झुग्गी वाले उठा पाते हैं जो शहर के बिलकुल पास रहते हैं, शहर के पास वाले गरीब हर एक ठंडी में दसियों कम्बल और गरम कपडे झटक लेते हैं और शहर से थोड़ी दूरी पर रहने वालों को इंतज़ार होता है ऐसे समाजसेवी का, जिसका मकसद कम्बल बाँटना हो सुर्खियाँ बटोरना नहीं.
खैर, नेताजी हों या समाजसेवी, सर्दी शरू होते ही गरीबों को कम्बल बाँटने वाले लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं, क्योंकि लोग सर्दी से नहीं गरीबी से मरते हैं, अमीर देशों में ऋणात्मक तापमान होने पर भी लोग मस्त रहते हैं और हमारे देश में पारा लुढ़कते ही शामत आ जाती है. 

1 comment:

निर्मला कपिला said...

हम भी जा रहे हैं कम्बल बाँटने --- खबर दे रहे हैं--- सही मे लोग दान इस लिये करते हैं कि समाज मे दानी कहे जायें और नेता अपने चेहरो0ं पर इस दान का नकाब ओढ कर जेबें भरते हैं।