धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Wednesday, January 26, 2011

एक क्रांति की राह पर उत्सव शर्मा (Utsav Sharma on the way of revolution)

पहले पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर और अब डा. राजेश तलवार पर हमला कर उत्सव शर्मा ने खुद के क्रांतिवीर होने का परिचय दे दिया है. राठौर और तलवार कौन हैं इसकी चर्चा की जरूरत नहीं, मन में पीड़ा इस बात की होती है ऊँची पहुँच वाले भ्रष्ट लोगों से मिलकर देश की न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ाते है और आम आदमी मन मसोस कर रह जाता है. उत्सव शर्मा का उपरोक्त दोनों व्यक्तियों पर हमला देश की उस पंगु व्यवस्था पर हमला है, जिसके बारे में गंभीरता से चिंतन करना अत्यंत आवश्यक हो चुका है.
उत्सव शर्मा के बारे में खोजें तो पता चलता है कि वह होनहार एवं प्रतिभाशाली युवा है, उसके माता-पिता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में ऊँचे ओहदे पर कार्यरत हैं. इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उसने एनआईडी अहमदाबाद से पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा प्रोग्राम इन एनीमेशन फिल्म डिजाइन का कोर्स भी किया है। (लिंक देंखे)
http://www.bhaskar.com/article/NAT-talwar-attacker-is-gold-medalist-from-bhu-1789800.html
इसके आलावा उसने कई एनीमिशन फिल्मो पर काम भी किया है. (विडिओ देंखे)
http://www.ndtv.com/video/player/news/video-story/127362
साफ़ है की उत्सव शर्मा एक शिक्षित एवं जिम्मेदार परिवार से है. वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं, लेकिन उसका कृत्य उसके क्रांतिकारी होने का परिचय देता है. मेरा कहने का मतलब यह नहीं की उत्सव ने जो किया वह सही है लेकिन उसे ऐसा करने की जरूरत क्यों पडी, यह विचारणीय विषय है. जब प्रजातंत्र के स्तंभों ( विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, और मीडिया) पर से आम आदमी का विश्वास उठ चुका हो तो इस पुण्य भूमि भारत में ऐसे क्रांतिवीर पैदा होना कोई अचरज की बात नहीं. यहाँ इसका भी उल्लेख करना ठीक होगा कि आजकल सुर्ख़ियों में ऐसे युवा भी होते हैं जो स्वयं के स्वार्थ के लिए अपने माता पिता या समाज से बगावत करते हैं और उत्सव जैसे भी हैं जिन्होंने समाज के लिए बगावत कर खुद का अस्तित्व मिटा दिया.
देश का बिकाऊ मीडिया ४० से ज्यादा बसंत पार कर चुके राहुल गांधी को युवाओं का नेता मानता है, तिरंगा यात्रा से चर्चा में आये हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के पुत्र एवं सांसद अनुराग ठाकुर भी युवाओं के नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं. देश की इन्हें कितनी चिंता है यह इन ख़बरों से पता चलता है कि एक अपना जन्मदिन मनाने लन्दन जाता है, तो दूसरा भाजयुमो अध्यक्ष बनने के जश्न में इतना व्यस्त होता है कि उसे पता नहीं चलता कि बगल में देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले एक वीर सैनिक की चिता जल रही है.
मैंने तो अपने मन की पीड़ा को लेख के रूप में उतार दिया, लेकिन उत्सव शर्मा अभी कारागार में है, उसका केस भी उसी न्यायपालिका एवं पुलिस व्यवस्था के पास जाएगा जिसके कारण वह क्रांतिकारी बना. अगली बार जब उत्सव टीवी पर आये तो गौर से देखिएगा क्या पता आपको उसके चेहरे में सरदार भगत सिंह, आज़ाद, विस्मिल या अशफाक उल्ला खान जैसे किसी महान क्रांतिकारी का अक्स दिख जाए.

Sunday, January 9, 2011

कम्बल वाले मसीहा

आजकल जबरदस्त सर्दी का मौसम चल रहा है, कुछ नेता जिन्हें अपनी राजनीति चमकानी होती है वो शहर के आसपास की झुग्गियों में कम्बल बाँटते हैं. उनका यह कदम बेहद सराहनीय है. वास्तव में सच भी है इस ठण्ड में अगर कम्बल मिल जाए तो क्या कहने. कुछ समाजसेवी जो वास्तव में जन कल्याण में लगे होते हैं, जब हजारों कम्बल बाँटते हैं तो आम लोगों को नहीं पता चलता, लेकिन छुटभैये नेता १-२ दर्जन कम्बल बाँटकर सुर्ख़ियों में छा जाते हैं. इसके लिए वह बाकायदा मीडिया को सूचित करते हैं कि आज हम कम्बल बाँटने जा रहें हैं, अगले दिन क्षेत्रीय समाचार पत्रों में नेताजी तस्वीर के साथ गरीबों के मसीहा बन जाते हैं.
जनसेवा में आगे बढ़ा नेताजी का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसका फायदा वही झुग्गी वाले उठा पाते हैं जो शहर के बिलकुल पास रहते हैं, शहर के पास वाले गरीब हर एक ठंडी में दसियों कम्बल और गरम कपडे झटक लेते हैं और शहर से थोड़ी दूरी पर रहने वालों को इंतज़ार होता है ऐसे समाजसेवी का, जिसका मकसद कम्बल बाँटना हो सुर्खियाँ बटोरना नहीं.
खैर, नेताजी हों या समाजसेवी, सर्दी शरू होते ही गरीबों को कम्बल बाँटने वाले लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं, क्योंकि लोग सर्दी से नहीं गरीबी से मरते हैं, अमीर देशों में ऋणात्मक तापमान होने पर भी लोग मस्त रहते हैं और हमारे देश में पारा लुढ़कते ही शामत आ जाती है.