धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, December 26, 2011

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव (UP Assembly polls)

1) माया मैडम सत्ता खोने के भय से परेशान होकर अपने भ्रष्टाचारी मंत्रियों को बर्खास्त करती जा रहीं हैं, उन्हे अपना खुद का भ्रष्टाचार अभी तक नहीं दिख रहा है. चुनाव पूर्व की गयी यह कवायद अब जनता को रास नहीं आने वाली. बिना किसी पूर्व तैयारी के प्रदेश को बाँटने का उनका फार्मुला भी बेअसर रहा है.

2) भाजपा के पास कोई करिश्माई नेतृ्त्व नहीं है किन्तु बाबा-अन्ना इफेक्ट से पार्टी की सीटें बढ सकती हैं. पार्टी के लिये सत्ता की राह बहुत कठिन है, चुनाव सर पर हैं लेकिन पार्टी की तैयारी को देखते हुए लगता है जैसे चुनाव उन पर थोप दिये गयें हैं. विधान सभा चुनावों मे पार्टी की हार कई बडे नेताओं का राजनीतिक भविष्य खतरे में डाल देगी, लेकिन फिर भी अभी तक पार्टी एकजुट नहीं हो पायी है.

3) मोदी की विराट इमेज पर भाजपा के अति महात्वाकांक्षी नेताओं ने खुद ही झाडू मार दिया है. पार्टी अगर अपना भला चाहती है तो मोदी को उत्तर प्रदेश चुनाव में उतारना ही होगा. वैसे अटल जी के जन्मदिवस पर समाचार पत्रों में अटल गाथा प्रकाशित कर पार्टी ने एक सराहनीय कदम उठाया है.

4) रालोद के अजीत सिंह ने हैण्डपंप कांग्रेस के हाथ को पकडाकर केंद्र में मंत्री पद झटक लिया है, चुनाव बाद मुलायम और उनकी सपा की साईकिल भी काँग्रेस के हाथ में ही होगी. कांग्रेस और सपा में अपनी सीटें अधिक करने की लडाई चल रही है, ताकि चुनाव बाद अपना मुख्यमंत्री बनाया जा सके. काँग्रेस ने कई सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं जो सपा को हराने का कार्य करेंगे.

5) उत्तर प्रदेश में अपना दल, पीस पार्टी और बुंदेल खण्ड काँग्रेस के गठबन्धन की ताकत को भी नकारा नहीं जा सकता. पूर्वांचल की कई सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी मजबूत स्थिति में हैं और विधानसभा में पहुंच भी सकते हैं. अन्य पार्टियों के कई प्रत्याशियों को यह गठबंधन विधानसभा में पहुचने से रोक सकता है.

Thursday, December 22, 2011

नखडू किसान और मनरेगा (kisan and MNREGA)

नखडू एक छोटा किसान था और गाँव में रहकर खेती एवम पशुपालन करते हुए अपनी छोटी-मोटी जीविका चला रहा था, संपन्न नही था फिर भी खुशहाल जीवन जी रहा था, खेती से उसे बहुत प्यार था और किसान होने पर गर्व, कहता हम किसान अनाज न पैदा करें तो दुनिया भूख से मर जायेगी, जीवन में भोजन की आवश्यकता सबसे पहले और बाकी चीजें बाद में होती है. सत्य ही है, इतनी बडी दुनिया को अगर अनाज न मिले तो लोग पेट की आग शान्त करने के लिये एक दूसरे को मार कर खाने लगेंगे. नखडू खुद अपनी और बच्चों की तरक्की के लिये नित नये सपने देखता रहता था. कहता बच्चों को पढा लिखा कर बडा आदमी बनाउंगा, चाहे मुझे जितनी मेहनत करनी पडे लेकिन मुझे अपनी गरीबी दूर करना ही है.

कुछ वर्ष पहले केन्द्र सरकार ने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना (मनरेगा) बनाई तो नखडू बडा प्रसन्न हुआ कि अब गाँव के लडकों को शहरों मे मजदूरी करने की बजाय गाँव में ही रोजगार मिल सकेगा और गाँव की उन्नति भी होगी, लेकिन मनरेगा धरातल पर आते ही अन्य सरकारी योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ गयी. गाँव के लोग ग्राम प्रधान की मिली भगत से योजना में अपना नाम लिखवा लेते और बिना काम किये ही आधी मजदूरी झटक लेते और केन्द्र सरकार का गुणगान करते न थकते.

इधर योजना के दुष्प्रभाव के कारण नखडू जैसे किसानों को खेती के लिये मजदूर मिलना मुश्किल होता जा रहा था, गाँव के मजदूर अब नरेगा के बराबर मजदूरी व काम में ज्यादा सहूलियत माँग रहे थे. मरता क्या न करता, नखडू ने भी मजदूरों की बात मानते हुए उन्हे ज्यादा मजदूरी देनी शुरु कर दी, जिससे खेती की लागत तो बढ ही गयी, समय से काम भी न हो पाता.  खेती में लगातार घाटा होने से नखडू जैसे न जाने कितने किसान मनरेगा की भेंट चढ गये. मजदूरों की रोज रोज बढती हुई माँगो से तंग आ नखडू और बहुत से अन्य किसानों ने अपने खेत बँटाई*  पर दे दिये. जब खेती बंद हुई तो जानवरों के लिये भूसा-चारा मिलना भी महंगा हो गया, लिहाजा नखडू ने अपने पालतू जानवरों को भी एक एक कर बेच दिया.

नखडू के पास अब कोई विशेष काम नहीं था, तो उसकी संगति भी गाँव के नेता टाईप लोगों से हो गयी, उन लोगों ने कुछ ले दे कर नखडू का नाम पहले नरेगा और फिर बीपीएल में लिखवा दिया.  बिना कुछ किये आधी मजदूरी और लगभग मुफ्त मिलने वाले अनाज से उसके जीवन की गाडी चलने लगी थी. जो नखडू तरक्की की बात करता था, वह अब सरकारी योजनाओं से कैसे लाभ लिया जाये इसकी बात करता था. बच्चों को उसने उनके हाल पर छोड दिया था, कहता इनके भाग्य में होगा तो कमा-खा लेंगे.

मनरेगा ने नखडू जैसे लाखों किसानों का जीवन बदल दिया था, जो नखडू पहले मेहनत से अपने परिवार का जीवन बदलना चाहता था, वह अब भाग्य भरोसे बैठ गया था.

(बँटाई => गाँव में जो किसान किसी कारण वश खेती नहीं कर पाते, वह अपने खेतों को किसी और किसान को दे देते है जिससे उन्हे खेत में होने वाली कुल उपज का लगभग आधा हिस्सा मिल जाता है, इसी प्रथा को बँटाई या अधिया कहते हैं)

Wednesday, August 31, 2011

मृत्युदंड के बाद की राजनीति बंद करो. (stop politics with death sentence)

महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा पूर्व प्रधान मंत्री स्व. श्री राजीव गाँधी के हत्यारों की दया याचिका खारिज करते ही भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही डीएमके ने तमिल राजनीति में खुद को फिर से स्थापित करने के लिये इसमें मौका तलाशना शुरु कर दिया. उधर पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने भुल्लर और फिर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुल्ला ने भी अफजल गुरु को लेकर अपने तेवर दिखाने शुरु कर दिये तो कुछ स्वघोषित बुद्धिजीवी भी इस सजा का विरोध कर रहे हैं.

अगर मृत्युदंड की सजा पाये व्यक्ति को लेकर राजनीति करनी हो, तो यह सजा बंद क्यों नहीं कर देते. क्यों नही कानून बना देते कि व्यक्ति की सजा उसके द्वारा किये गये अपराध नहीं, उसकी भाषा, धर्म और जाति के आधार पर तय की जायेगी.

सीमाओं पर बलिदान होने वाले देश के वीर सपूतों से कोई नहीं पूछता कि इनकी भाषा, धर्म और जाति क्या है. आतंकियों की गोलियाँ भाषा, जाति या धर्म पूछ कर नहीं चलती. देश पर जान न्योछावर करने बलिदानियों के माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी और बच्चों का कोई मानवाधिकार नहीं है क्या?

बिना किसी ठोस कारण के अफजल गुरु की फाँसी की सजा रोकी गयी है. यह धार्मिक तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है, सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के कारण देश की धर्मनिरपेक्षता के साथ खेला जा रहा है. देश का दुर्भाग्य यह भी है कि वोट के इन सौदागरों की चाल भी सफल होती है और वोट की गन्दी राजनीति के बल पर यह राजनीतिक दल उस खास वर्ग का समर्थन लेने में सफल हो जाते हैं.

घिनौनी राजनीति का यह खेल भारत की एकता और अखंडता के लिये बडा खतरा बनता जा रहा है, खास वर्ग की जनसंख्या वृद्धि के साथ इसका रूप और वीभत्स होता जा रहा है. अभी साल भर पहले बरेली में हुए दंगो में एक वर्ग को खुश करने के लिये दंगो के जिम्मेदार व्यक्ति को छोड दिया गया था. अगर भाषा, जाति-धर्म को आधार बना कर हम इसी तरह अपराधियों को क्षमादान देते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब अपराधी अपने जाति-धर्म के आधार पर अपराध करने के बाद खुले घूमेंगे और भाषा, जाति या धर्म के नाम पर अलगाववादी भारत के टुकडे करने से भी परहेज नहीं करेंगे.

धर्म के आधार पर भारत के कई विभाजन हो चुके हैं, क्या हमने कभी सोचा कि क्यों चुनते हैं हम ऐसे लोगों को जिन्होने अपनी राजनीतिक भूख शान्त करने के लिये देश के टुकडे कर दिये, आज भी बटवारे के लिये जिम्मेदार लोग हमारे आदर्श बने हुए हैं. इतिहास से सबक लेने की आवश्यकता है और जब तक हम ऐसे लोगों को जड से उखाड कर नहीं फेकेंगे तब तक घिनौनी राजनीति करने वाले लोग सत्ता के लिये देश को बाँटते रहेंगे.

Sunday, August 21, 2011

एक सिविल सोसाईटी का काला सच: आँखो देखी (Civil Society: A black truth)

आज ग्रेटर नोएडा में सिविल सोसाईटी के लोगों की एक गोष्ठी हुई, विषय था "Anti Corruption movement in India :its Outcome". टीम अन्ना के श्रीमान मनु सिंह भी थे, बताता चलूँ कि मनु जी अग्निवेश के सहयोगी हैं और जैसा बताया गया, जनलोकपाल आंदोलन के नींव भी हैं.  हम सभी जानते हैं कि अग्निवेश देश के लिये कितने श्रद्धावान हैं तो उनके सहयोगी भी उतने ही पुण्यात्मा होंगे ऐसी मेरी कल्पना है. वहाँ राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि भी थे और समाजसेवी, पत्रकार, उद्यमी एवं वरिष्ठ सेवानिवृत्त नौकरशाह भी.

बुद्धिजीवियों को जब मंच मिल जाता है तो वह खूब बोलते हैं. वे इतना बोले के श्रोताओं एवम कुछ राष्ट्रवादी वक्ताओं को वक्त ही नहीं मिला. भ्रष्टाचार पर हुई चर्चा में काला धन और बाबा रामदेव नदारद रहे. किसी भी वक्ता ने उनका जिक्र तक करना उचित नहीं समझा. सब कुछ प्रायोजित सा चल रहा था, बीच बीच में कुछ श्रोता वक्ताओं को टोकना चाहते थे तो माननीय अध्यक्ष जी ने मना कर दिया और कहा कि उन्हे बोलने का वक्त दिया जायेगा. बाद में कोई प्रश्नोत्तर भी नहीं हुआ, सिविल सोसाईटी के बेचारे श्रोता मनमसोस कर रह गये. जिस तरह कार्यक्रम की गरिमा के नाम पर सबको चुप करा दिया गया वह आम आदमी की आवाज़ को दबाने का प्रयास नहीं तो और क्या था.

कार्यक्रम एक नामी गिरामी कालेज में हो रहा था. वहाँ कुछ कालेज और एक बडे निजी अस्पताल के कर्ता धर्ता भी थे. एक वक्ता ने कटाक्ष करते हुए कहा कि अगर आप भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते ही हो तो प्रवेश के समय डोनेशन लेना बंद कर दो. अस्पताल के मालिक को भी उन्होने खरी खोटी सुनाई, वास्तव में एक राजनीतिक व्यक्ति द्वारा चलाये जा रहे ग्रेटर नोएडा के उस अस्पताल में आम आदमी अपना इलाज करा ही नहीं सकता.

इन सभी सिविल सोसाईटी के माननीय सदस्यों ने बहस का सार भी निकाला. जिसमें ज्यादा से ज्यादा घिसेपिटे मुद्दे थे. उसको वह टीम अन्ना और सरकार को भेजेंगे. सरकार भी खुश चलो सिविल सोसाईटी ने फिर काले धन के मुद्दे को छोड दिया और टीम अन्ना भी, क्योंकि उनके जनलोकपाल को एक और समर्थन मिल जायेगा.

बडे बडे लोग थे, आई आई एम टापर, आई ए एस, सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक भी थे. लेकिन मूल्य और नैतिकता की कोई बात नहीं हुई, शायद वह यह भूल गये कि अन्ना अपने नैतिक बल के कारण ही इतनी जल्दी लोकप्रिय हो गये.

उस सिविल सोसाईटी में वंदेमातरम बोलना सांप्रदायिकता थी. यह सब सडक पर अच्छा लगता है, सफलता के घोडे पर सवार टीम अन्ना ने भी अपने अनशन स्थल से भारत माता का चित्र हटा लिया है, गाँधी फिर देश से बडे हो गये. मीडिया देर सबेर गाँधीवाद को फिर से स्थापित कर देगा. उसके बाद काँग्रेस के वंशवादी नेता फिर से जनता को वही टोपी पहनाना शुरु कर देंगे.

क्रांतिकारी आंदोलन का स्वप्न लिये बाबा रामदेव फिर सरकार की नीतियों के कारण दंडित किये जा चुके हैं, यानि गाँधी फिर सरदार भगत सिंह पर हावी हो गये. जनता गाँधी टोपी पहने मस्त है बिना सोचे कि जब धारा 302 के होते हुए कत्ल करके लोग बच निकलते हैं तो जनलोकपाल क्या कर पायेगा.

आने वाले भविष्य के बडे सपने जनता फिर से काँग्रेस को सत्ता सौपने की तैयारी कर ले क्योंकि सिविल सोसाईटी का हित काँग्रेस से ही सधता है. भूल जाओ 1948 के जीप घोटाले से लेकर, 2जी, कामनवेल्थ, आदर्श आदि घोटालों को और उनके दोषियों को क्योंकि अब आपका जनलोकपाल आने वाला है, जो उनके लिये कोई खतरा नहीं है.

आपके घर के बाहर एक चौकीदार बैठा रहेगा. अब आराम से बिना ताला लगाये सो जाओ. आपका घर यानि भारत अब सुरक्षित है. जनलोकपाल इसी व्यवस्था परिवर्तन का सपना दिखाता है.
यह और बात है कि राजा, कलमाडी, कनिमोझी और बडे बडे लोग उसी पूराने कानून की वजह से जेल में हैं, जिसको टीम अन्ना हवा में उडाती है.

इस आंदोलन को मैं भी जी रहा हूँ, क्योंकि मुझे अच्छा लग रहा है कि देश की जनता खासकर युवा वर्ग जाग रहा है. जरूरत है उसे फिर से सोने न देने की. नहीं तो फिर से यही लोग देश को लूटते रहेंगे.

कार्यक्रम से बाहर निकलने के बाद मुझे लगा सिविल सोसाईटी से अच्छे वो आटो वाले हैं जिन्होने आज शहर में अन्ना के समर्थन में एक रैली निकाली. क्योंकि वे देशभक्ति की भावना से भरे हुए थे, उनके मन में कोई कालापन नहीं था.

!! भारत माता की जय !!


Saturday, August 20, 2011

जनलोकपाल तो चाहिये ही काला धन भी वापस लाओ (Janlokpal and black money)

अन्ना हजारे का समर्थन और काँग्रेस का विरोध करना, आज कल यही दिनचर्या है. बीते दिनों बाबा रामदेव के अनशन पर हुए हमले ने लोकतंत्र की जडें हिला दी थी तो अन्ना को अनशन की इजाजत न देने से लेकर उनकी गिरफ्तारी ने देश में लोकतंत्र की बची खुची उम्मीद भी समाप्त कर दी थी. लगातार हो रहे भ्रष्टाचार, महगाँई, तुष्टिकरण और कुशासन से तंग जनता का विश्वास खो चुकी सरकार ने जब इसके लिये जिम्मेदार लोगों को बचाना शुरु किया और जनता की आवाज बने बाबा रामदेव, अन्ना हजारे जैसे लोगों को दबाना शुरु किया तो लोगों ने कहा अब बस और उनका गुस्सा फूट पडा, और वह सडकों पर आ गयी.

मैने आंदोलन को बहुत करीब से देखा है और इसका हिस्सा भी हूँ. भीड जुटाने के लिये आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पडती. आप बस अकेले खडे खडे भारत माता की जय, वंदेमातरम आदि नारे लगाओ लोग अपने आप आंदोलन से जुडते चले जा रहे हैं. कोई नेता नहीं, समाज अपना नेता खुद है.

आंदोलन से निपटने के लिये काँग्रेस सरकार ने जिस तरह से अन्ना को गिरफ्तार कर तिहाड जेल भेज दिया, वह मेरे गले नहीं उतर रहा. कहीं यह काँग्रेस की रणनीति का हिस्सा तो नहीं, जिसे देश की भोली भाली जनता और खुद विपक्ष भी नहीं समझ पाया. मीडिया के समर्थन से आंदोलन दिन दूना रात चौगुना तरक्की कर रहा है. लेकिन आंदोलन की दिशा बदल गयी है. जरा सोचिये काले धन के मुद्दे में सबसे ज्यादा कौन फँस रहा था. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका अपना जनलोकपाल देशद्रोहियों को बच निकलने का एक सुरक्षित मार्ग तो नहीं दे रहा.

आप जनलोकपाल और काला धन में से किस मुद्दे को प्राथमिकता देंगे. उत्तर यह होगा कि दोनों ही मुद्दे बराबर हैं, एक मुद्दा भारत का भविष्य सुरक्षित करता है तो दूसरा भूतकाल में चोरी गये धन को वापस लाकर एवं दोषियों को सजा दिलाकर भविष्य का निर्माण करता है. लेकिन हालात क्या हैं, जनलोकपाल की वजह से काले धन का मुद्दा खो गया है. बाबा रामदेव ने देश की जनता में जो जागरूकता फैलाई थी, उसका फायदा टीम अन्ना ले गयी. अब टीम अन्ना के जनसमर्थन के बल पर काले धन के मुद्दे को जनता में फिर से स्थापित किया जा सकता है.

समाज के लिये काम करने वाले संगठनों से मेरा यह अनुरोध रहेगा कि वे अन्ना हजारे के जन समर्थन का उपयोग काले धन के मुद्दे को जीवित रखने में करें. क्योकि सरकार के लिये जनलोकपाल बनाना अपेक्षाकृत आसान होगा, लेकिन साथ ही वह काले धन के मुद्दे को दबाना चाहेगी.
अत: आपसे निवेदन है कि आंदोलन में शामिल होकर यह नारा अवश्य लगायें.
गद्दारो तुम होश‌ में आओ, काला धन वापस लाओ. 
~~~~~~
शीला दीक्षित जी को अन्ना का धन्यवाद देना चाहिये, जिसने उनकी सरकार पर आये खतरे तो टाल दिया है.

Monday, August 15, 2011

स्वतंत्रता का अभिप्राय क्या? (self system)

आज एक और स्वतन्त्रता दिवस आ गया है. एक जागरूक इंसान की विभिन्न कार्यक्रमों में उपस्थिति रही होगी. बिना स्वतंत्रता का मतलब समझे लोग स्वयं को स्वतंत्र समझ रहे हैं. स्वतंत्र शब्द की व्याख्या इस प्रकार से होगी. स्व + तंत्र यानि ऐसा तंत्र जो अपना हो? अब आप खुद सोचिये कि इस तंत्र मे स्व कितना है.

आप अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिये, क्या आप नहीं चाहते कि संसद हमले के दोषी अफजल गुरु सहित, कसाब आदि सभी आतंकियों को फाँसी की सजा हो, सभी भ्रष्टाचारी जेल में हों और आम जनता को न्याय मिल सके. आपकी यह इच्छा जो एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकती है, अगर नहीं पूरी हो सकती, तो आपको यह विचार करना चाहिये कि वास्तव में यह कैसा स्वतंत्र है?

15 अगस्त 1947 को अग्रेजों ने देश की सत्ता हमारे नेताओं को सौंप दी. देश को उसी समय स्वतंत्र से युक्त होना था पर हुआ क्या? हमने वही ब्रिटिश तंत्र अपना लिया, आज भी लगभग 34735 कानून अग्रेजों के बनाये चल रहे हैं. हम अगर इसे ही स्वतंत्र मान खुश होते रहें तो हमसे बडा मुर्ख भला कौन होगा. हमें यह समझने की जरूरत है कि 1947 में गोरे अंग्रेजों ने काले अग्रेजों को सिर्फ सत्ता हस्तांतरण कर दिया था. बाकी कानून उनके, भाषा-भूषा उनकी ही रही. हमारा अपना कुछ नहीं. फलत: एक कृषि प्रधान देश के युवाओं को ऐसी शिक्षा दी जाने लगी जिससे वह कृषि को निम्नतम व्यवसाय मानने लगा. इसका नतीजा यह है कि हम अपने बच्चों को पढा लिखा कर इस काबिल बना रहे हैं कि वह अमेरिका और इंग्लैड की सेवा करें. भारत की नहीं. क्या स्वतंत्र ऐसा होता है जिसमें अपने देश की प्रतिभायें विदेशी अर्थव्यवस्था को मजबूत करें.

बचपन से लेकर अभी तक हर एक भाषण मे यही सुनता आ रहा हूँ कि देश के लिये बलिदान देने वालों का सम्मान होना चाहिये, अब बलिदानियों उन्हे कोई पूछ नही रहा आदि आदि, मन में बहुत पीडा भी होती है, लेकिन अब हममें इतनी समझ होनी चाहिये कि जिनके हाथ में हमने सत्ता दी है वो तो बलिदानियों को आतंकी कहते थे, ऐसी राजसत्ता से हम क्या उम्मीद करेंगे कि वह उन अमर बलिदानियों को सम्मान देगी?.  जो तंत्र जनता की इच्छानुसार अपने इतिहासपुरुषों को सम्मान नहीं दे सकता तो विचार कीजिये कि वह कैसा स्वतंत्र है.

एक ऐसा देश जहाँ दिन सूर्य उगने के साथ शुरु होता है, वहाँ देश का सत्ता हस्तांतरण रात में होता है, रात्रि में ही आपातकाल घोषित कर दिया जाता है. अगर आप को लगता है कि यह बातें पुरानी हो चुकी हैं तो अभी 4-5 जून 2011 को बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचला जाना आपको अवश्य याद होगा. भारत ऐसे लोगों का देश है जहाँ बडे फैसले सुबह होने पर लिये जाते हैं तो देश की किस्मत का फैसला रात में क्यों? ऐसी क्या जल्दी और उतावलापन था? हमारे नेताओं मे सत्ता को लेकर कितना उतावलापन था कि उन्होने देश का विभाजन भी स्वीकार कर लिया, एक बार भी नहीं पूछा कि तुम खुद तो युनाईटेड रहते हो तो हमें क्यों बाँट रहे हो. आज उन्ही स्वार्थी नेताओं के वंशज देश सम्हाल रहे हैं तो देश स्वतंत्र कैसे हो सकता है.

देश के उन भाग्यविधाताओं ने इंडिया और भारत को अलग अलग परिपेक्ष्य में देखा, नतीजा क्या हुआ? इंडिया तरक्की करता रहा और भारत पिछडता रहा. अमीर और अमीर होते गये तो गरीबों को दो जून रोटी भी मयस्सर नहीं. भारत की जमीन पर इंडिया खडा होता गया और उसने ऐसे रईसों को जन्म दे दिया जो भारत के बारे में सोचना तो दूर उसके लोगों से घृणा करने लगे. क्या आप इसे ही स्वतंत्र कहेंगे, जहाँ एक भाई दूसरे भाई का खून चूस रहा है.

विभाजन की त्रासदी झेलने वालों से पूछिये कि उन्होने स्वतंत्र होने के लिये कितनी बडी कीमत चुकाई है. लेकिन अभी भी क्या वह कह सकते है कि हम स्वतंत्र हैं. स्वतंत्रता हमारा भ्रम है और हमें यह समझने की जरूरत है कि 15 अगस्त 1947 को सिर्फ सत्ता हस्तांतरण हुआ था, स्वतंत्र तो हम तब होंगे जब गुलामी के सारे प्रतीकों को जड से उखाड फेंककर एक नये भारत के निर्माण का संकल्प लेंगे. संकल्प लीजिये एक नये भारत के निर्माण का, जिसमें सब कुछ हमारा अपना हो और हम गर्व से कह सकें कि हमारे पास स्वंतत्र है.....
शायद आपको लोकमान्य तिलक का यह नारा याद होगा " स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे ले कर रहूंगा". अब इस नारे का फिर उपयोग करने का समय आ रहा है.

!! भारत माता की जय !!

Wednesday, August 10, 2011

लोकशाही के लिये अन्ना का सहयोग आवश्यक (Support Anna to save democracy)



जनलोकपाल के लिये अन्ना का आंदोलन चरम पर है, लेकिन अभी भी आंदोलन की आलोचना
करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग सक्रिय है. यह बुद्धिजीवी लोगों में संशय की भावना पैदा कर रहे हैं और अपने समर्थन में विभिन्न तर्क दे रहे हैं. कुछ लोग आंदोलन को फिक्स बता रहे हैं, तो कुछ लोग कहते हैं कि आंदोलन अति महत्वाकांक्षी लोगों की देन है.  लेकिन परिस्थितियाँ इससे भिन्न है, अत: इन कथित बुद्दिजीवियों की सलाह पर गौर करने की बजाय इनके अतीत में झाँकने की जरूरत है कि इन्होने टीवी पर भाषण आदि देने की बजाय देश के लिये किया क्या है.

देशवासियों खासकर युवाओं से अपील है कि वे आंदोलन के समर्थन में आगे आयें जिससे देश का भविष्य सुरक्षित हो सके.  आज प्रत्येक देशवासी को देश के अपने जनलोकपाल का समर्थन करना चाहिये. अन्ना जिस लोकपाल की माँग कर रहे हैं वह भ्रष्टाचार को रोकने में सक्षम होगा या नहीं यह विचार करने के बजाय पहली माँग एक सशक्त लोकपाल ही होनी चाहिये. अगर सरकार झुकी तो जनतंत्र की जीत होगी और जनता में यह विश्वास पैदा होगा कि अगर वह सडक पर आ जाये तो कुछ भी मुश्किल नहीं. साथ ही सरकारों में भी डर पैदा होगा कि अगर जनता भडक गयी तो फिर उनकी खैर नहीं.

यह आंदोलन सफल हुआ तो इसके दूरगामी परिणाम भी होंगे. हम अक्सर देखते हैं कि हमारे अपने चुने नेता चुनाव जीतने के बाद जनता को भूल जाते हैं, जब जनता देश की तानाशाह सरकार को झुका सकती है, तो एक विधायक, सांसद या अन्य जनप्रतिनिधि के विरुद्ध आंदोलन कर उससे भी अपनी माँगें मनवायी जा सकती हैं. यह आंदोलन उन निराश लोगों मे अन्याय के विरुद्ध फिर से चेतना पैदा कर सकता है, जो यह कहते हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता.

जेपी की समग्र क्रांति को हुए बहुत वर्ष बीत चुके, इसी आंदोलन ने काँग्रेस की तानाशाही खत्म कर देश में राजनीतिक चेतना जगायी और आमलोगों ने राजनीति में रुचि लेनी शुरु की, परिणाम स्वरूप देश में अन्य राजनीतिक विचारधाराओं का जन्म हुआ और विकास का मुद्दा धीरे धीरे हावी हो गया. जनलोकपाल के लिये गये इस आंदोलन के परिणाम भी कुछ ऐसे ही होंगे. आज देश के राजनीतिक नेतृत्व में बडे परिवर्तन की आवश्यकता है, अत: लोकतंत्र में लोकशाही के लिये खुद भी खडे हों और समाज को भी इस आंदोलन से जोडें, क्योंकि असली लोकतंत्र वह है, जहाँ जनता की मर्जी चले सरकारों की नहीं.....
आईये मिलकर नारा लगाते हैं:-- अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं.
चलते चलते: आईएसी के सहयोगियों से यह विनती है कि वे अग्निवेश जैसे जनता की भावना से खिलवाड करने वाले और अलगाववादियों का समर्थन करने वाले लोगों से दूरी बना कर चलें.

भारत वंदेमातरम.......

Saturday, July 23, 2011

आजादी के नायकों की याद में (A tribute to national heroes)


सर्वोच्च बलिदान के बाद आज़ाद का चित्र
भारत के नील गगन पर, चमके हैं कुछ बलिदानी,
हम उन्हे चढाते चलते, अपनी आँखों का पानी.
आज़ादी की खातिर जिसने, अपनी जान गवाँ दी,
वरण मृ्त्यु का असमय करके, देश की शान बढा दी.
गोरे भागे देश से लेकिन, गद्दारों को छोड गये हैं,
उन्हे खदेडो मिलकर बन्धु, थोडे से बस और बचे हैं.
बचन माँगती भारत माता, करना है अब श्रम अविराम,
जब तक बच्चे भूखे सोते, नहीं करोगे तुम विश्राम.
राह दिखाई जिसने सच्ची, भूल न जाना देखो उनको,
आज़ादी का काम अधूरा, पूरा करना है अब हमको.

Sunday, July 10, 2011

किसानों के स्वयंभू नेता. (So called farmer leaders )

उत्तरप्रदेश के ग्रेटरनोएडा में भूमि अधिग्रहण और उसके बाद उपजे विवाद ने किसानों के नये नये नेता पैदा कर दिये हैं. जिसे देखो वही खुद को किसानों का नेता साबित करना चाहता है. देश की राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा तक बन रहे यमुना एक्सप्रेस वे के आसपास की जमीन पर प्रदेश सरकार और बिल्डरों की ललचाई नज़र ने यहाँ के किसानों को विभिन्न प्रलोभनों द्वारा अपनी जमीन बेचने के लिये सोचने पर विवश कर दिया है. जिस देश की अर्थव्यस्था में कृषि का सबसे ज्यादा महत्व हो उस देश में गंगा-यमुना के दोआब में स्थित इस उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण आने वाले समय के लिये बहुत ही घातक सिद्ध होने वाला है.

राहत की बात यह है कि अभी माननीय उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय ने इस साठगाँठ पर विराम लगाते हुए, ग्रेटर नोएडा के कुछ गाँवों की भूमि का अधिग्रहण रद्द कर दिया है. किसानों को मिला यह न्याय किसी नेता ने नहीं खुद उनके द्वारा लडी गयी लडाई ने दिलाया है.

किसानों की वास्तविक समस्याओं पर गौर करें तो दिल्ली के आसपास हुआ अधिग्रहण वास्तव में उत्तर प्रदेश के सभी किसानों की समस्या नहीं, यहाँ के किसान तो खुद अपनी जमीन विभिन्न प्राधिकरणों को बेचना चाहते हैं, यहाँ की असली समस्या यह है, किसानों से बेहद सस्ते दर पर जमीन खरीद, बिना कुछ किये हुए प्राधिकरण ने उस जमीन को बिल्डर को 10 गुने दाम पर बेच दिया और बिल्डर ने उसी जमीन को फिर से मोटे मुनाफे पर खुले मार्केट पर बेचना शुरु कर दिया. मतलब किसानों को उनकी जमीन का प्रति वर्ग मीटर मूल्य मिला लगभग 1000 रुपये, बिल्डर ने उस जमीन को प्राधिकरण से खरीदा 10000 रुपये में और फिर उसी जमीन को 15000 रुपये में खुले मार्केट में बेचना शुरु कर दिया. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि उस जमीन पर अभी विकास कार्य शुरु भी नही हुआ था. इसी वजह से किसानों को अपने ठगे जाने का एहसास हुआ और उन्होने आंदोलन की राह पकड ली. वास्तव में यह समस्या किसानों की नही, व्यापरियों बने किसानों, बिल्डरों और प्रदेश सरकार के एजेन्ट प्राधिकरणों के बीच मुनाफे को लेकर हुई रस्साकसी है. किसानों की असली समस्या तो यह तब होती जब किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देना ही नही चाह रहे होते.

वास्तव में प्रदेश की जनता को यह समझने की जरूरत है कि किसानों के नये नेता के रूप में अपनी ताजपोसी कराने वाले राहुल गाँधी पहले विदर्भ जाकर वहाँ के किसानों की समस्या सुलझाते, लेकिन वहाँ उनकी अपनी सरकार ही किसानों के उपर जुल्म ढा रही है और अमूल बेबी के नाम से विख्यात राहुल बाबा को किसानों की वह समस्या नहीं दिखाई दे रही.

मुझे याद है कि 12-15 वर्ष पहले तक उत्तर प्रदेश के किसानों के लिये गन्ना बेचना सबसे बडी समस्या थी. उस समय गन्ना दफ्तर पर किसानों को गन्ना बेचने के लिये पर्चियाँ मिलती थीं, जिसे गन्ना माफिया, बाबू और दलाल मिलकर असली किसान तक पहुचनें ही नहीं देते थे और अपना गन्ना बेचकर भुगतान ले लेते थे. मतलब पर्ची किसी गरीब किसान की, और गन्ना बेचकर भुगतान लेते थे माफिया.  मैने यह भी देखा है जब साल भर से खडी फसल को किसान न बिकने की स्थिति में पछताते और रोते हुए खुद जला देते और फिर गन्ना न बोने की कसमें खाते थे. लेकिन जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी तो सरकार ने किसानों को देय राशि का भुगतान सरकारी बैंको से किये जाने की व्यवस्था की और सरकार का यह कदम प्रदेश में गन्ना किसानों के लिये सबसे बडी राहत लेकर आया. उस दूरदर्शी निर्णय के कारण किसानों में गन्ना बोने के लिये विश्वास जगा और प्रदेश में बहुत सारी चीनी मिलें स्थापित हुई. आज प्रदेश में गन्ना बेचने और उसका भुगतान लेने में किसान को लगभग कोई समस्या नहीं आती. किसानों के हित में उठाये गये अपनी सरकार के इस कदम को भाजपा खुद ही भूल गयी और अपने आपसी झगडे में इसका लाभ नहीं ले पा रही.

किसानों के हित में लिया गया एक अन्य दूरदर्शी निर्णय भी भाजपा (एनडीए) की केन्द्र सरकार द्वारा लिया गया था, जब उसने 1998-1999 में किसान क्रेडिट कार्ड सुविधा शुरु की थी. फसल की बुवाई के समय महाजनों से ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लेने वाला किसान फसल के पैदा होने के बाद मूलधन के साथ ब्याज के रूप में मुनाफे का बडा हिस्सा चुकाता था. फसल बर्बाद होने की स्थिति में यही कर्ज किसान को जान देने पर मजबूर भी करता था. किसान क्रेडिट कार्ड के आने से किसानों की यह समस्या भी लगभग हल हो गयी है, लेकिन भाजपा इसका भी प्रचार नहीं कर पायी और जाहिर है जब प्रचार नहीं तो लाभ नहीं.


किसानों को स्वावलम्बी बनाने के उपरोक्त दोनों निर्णय ऐसे हैं जिनकी कोई काट नहीं, लेकिन भाजपा इन्हे खुद ही भूल गयी है, तभी तो महलों में रहने वाले लोग किसानों के स्वयंभू नेता बन रहे हैं और मीडिया के सहयोग से खुद को प्रचारित प्रसारित करवा रहे है हैं, जनता भी इनका तमाशा देख रही है. तभी तो राहुल गाँधी की अलीगढ में हुई किसान पंचायत में किसान कम और नेता ज्यादा थे.

इतना सब कुछ हो रहा है लेकिन फिर भी किसानों के हित के लिये अपना जीवन लगाने वाले लोग चुपचाप अपना कार्य कर रहे हैं. अनूकूल परिस्थितियाँ आते ही आपको किसानों के हित में कुछ ऐसे ही दूरगामी परिणाम वाले निर्णय फिर से देखने को मिलेगें. बस जरूरत है इन दोमुहें नेताओं से बचकर रहने की, जिन्हे महाराष्ट्र के किसानों की असली समस्यायें नहीं दिखाई देती लेकिन उत्तरप्रदेश में किसानों के नाम पर राजनीति चमकानी खूब आती है.

Friday, June 24, 2011

उत्तर प्रदेश का जंगलराज!! जिम्मेदार कौन? (Law and Order issue in UP, Who's responsible)

मीडिया में आज कल उत्तरप्रदेश छाया हुआ है, यहाँ जिनके ऊपर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी है वही उसे पलीता लगा रहे हैं, अचानक ही अपराध की खबरों का ग्राफ बहुत उपर चढ गया है, जैसे विगत चार वर्षों से प्रदेश शान्त रहा हो और अब एकाएक अपराधों की बाढ सी आ गयी हो. लेकिन इसका उत्तर तो निश्चय ही नहीं है. वास्तव में अपराध का स्तर तो पिछले दशक से घटने की बजाय और बढता जा रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में कोई भी सरकार अपराध पर नियंत्रण करने में असमर्थ ही होगी ऐसा जान पडता है.

मीडिया में खबरें बनने का कारण अपराध नहीं, प्रदेश का चुनावी माहौल है. बडा से बडा नेता छोटी से छोटी घटनाओं पर हो हल्ला मचा रहा है और उसका राजनीतिक लाभ लेने के लिये उसे मीडिया के द्वारा खूब प्रचारित प्रसारित करवा रहा है. इस मामले में काँग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा लाभ की स्थिति में है और उसका देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया पर अघोषित नियंत्रण है. इसलिये उसके नेताओं को मीडिया में प्रमुखता से कवरेज दी जा रही है. भट्टा पारसोल और मीडिया के दम पर काँग्रेस पार्टी प्रदेश की चुनावी राजनीति में मुख्य लडाई में आ गयी है और अब मीडिया के सहयोग से अगले विधानसभा चुनावों तक कमोवेश यही स्थिति बनी रहेगी.

उत्तरप्रदेश के विगत चुनावों मे मायाराज समाजवादी पार्टी के गुण्डाराज के विरुद्ध आया था और माया ने जाति व्यवस्था (जिसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया) और एक नारे "चढ गुण्डन की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर" के दम पर जनता का विश्वास जीता. यह गुण्डे कोई और नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के नेता लोग थे. आज भी देखें तो समाजवादी पार्टी इससे मुक्त होने का कोई विचार रखती है, ऐसा प्रतीत भी नहीं होता. लेकिन समाजवादी पार्टी को हराने के लिये माया ने भी जमकर गुण्डों का सहारा लिया था, जिसे अब प्रदेश की जनता भुगत रही है. बीते चार वर्षों में शासनकाल में प्रदेश के कई मंत्री व विधायक कानून को ठेंगा दिखा चुके हैं. यह बात और है कि बीएसपी में माया जैसा दूसरा नेता न होने की वजह से म‌ाया ने जिसे चाहा, बाहर फेंक दिया और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर उन्हे जेल भी भेजा. उनका यह निर्णय बहुत कुछ उनकी प्रतिष्ठा बचाने में उपयोगी साबित हुआ.

अपराध और राजनीति में के मूल में नेता अफसर और अपराधियों का गठजोड है, जिसने आम व्यक्ति को राजनीति से लगभग दूर कर दिया है. चुनाव में होने वाले खर्च और और जोखिम को देखते हुए राजनीति में आना आसान भी नहीं. जनता भी पोस्टर बैनर देखती है, व्यक्ति की नियत नहीं, इसलिये प्रचार प्रसार का खर्च वहन करना सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं, अत: जनता के पास चुनने के लिये विकल्प कम ही होते हैं. चुनावों में विभिन्न दलों और निर्दलीय किन्तु मजबूत प्रत्याशियों की हत्या होना भी उतरप्रदेश में आम बात है, जो एक आम व्यक्ति को राजनीति से दूर करती है. 2004 के लोकसभा चुनावों में गोण्डा से भाजपा प्रत्याशी घनश्याम शुक्ला की मौत की सीबीआई जाँच अभी भी अधूरी है इण्डियन जस्टिस पार्टी के बहादुर सोनकर की हत्या के राज से पर्दा उठेगा, यह कहना मुश्किल है. भाजपा तो घनश्याम शुक्ला की हत्या को भूल चुकी है तो उनकी पत्नी नन्दिता आज उसी समाजवादी पार्टी की विधायक हैं, जिसके नेता पर घनश्याम शुक्ला की हत्या का आरोप लगा था.

देश में बढते अपराध, भ्रष्टाचार आदि के लिये जिम्मेदार वह व्यक्ति नहीं जिसे आपने चुना है, जिम्मेदार वह लोग हैं, जिन्होने उस व्यक्ति को चुन कर अपना प्रतिनिधि बनाया है. मुझे बतायें कि कितने स्थानों पर जनता खुद जाकर किसी ईमानदार व्यक्ति से चुनाव लडने के लिये प्रेरित करती या कहती है. कितनी पार्टियाँ अपने ईमानदार कार्यकर्ता को टिकट देती हैं. वस्तुत: ईमानदार व्यक्ति को यह बताया जाता है कि राजनीति तुम्हारे लिये नहीं है. अब जब आप प्रामाणिक व्यक्ति को अपना जनप्रतिनिधि नहीं बना सकते तो बदले में एक अच्छी सरकार की कल्पना व्यर्थ है. सरकार का मुखिया चाहकर भी ऐसे अपराधी जनप्रतिनिधियों पर अंकुश नहीं लगा सकता और उत्तरप्रदेश सरकार इसका उदाहरण है.

वर्तमान में प्रदेश के राजनीतिक परिदृ्श्य को देखें तो हमें मुख्य रूप से चार दल बसपा, सपा, काँग्रेस और भाजपा नज़र आते हैं. पश्चिम में रालोद तो पूर्व में नवोदित पीस पार्टी की भूमिका सीमित ही होगी. सपा और बसपा में नेतृत्व संकट नहीं है, यहाँ निर्विवाद रूप से माया और मुलायम परिवार का ही कब्जा रहेगा. काँग्रेस तो राहुल के नेतृत्व में ही लडेगी, और जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री राहुल की ही पसंद का होगा, इसमें कोई संशय नहीं. सबसे दयनीय स्थिति भाजपा की है, अपने वास्तविक मुद्दों को तिलांजली देकर, बहुत से जनाधार विहीन नेताओं वाली यह पार्टी कल्याण सिंह का कोई विकल्प नहीं तैयार कर सकी. वर्तमान में योगी आदित्यनाथ को छोड कोई अन्य नेता अपनी भी सीट जीतने की स्थिति में नहीं दिखाई देता.

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर विष्लेषण करने से पता चलता है कि कम से कम आने वाले चुनाव में हमें विधानसभा में साफ सुथरे लोग दिखेंगे ऐसा असंभव सा लगता है, क्योकि सभी पार्टियों को चुनाव जिताऊ उम्मीदवार चाहिये, जनप्रतिनिधि नहीं. ऐसे में फिर से जिम्मेदारी जनता पर है कि वह अपने आने वाले समय को कैसा बनाना चाहती है, अगर विधानसभा में अपराधियों को भेजेगी तो लचर कानून व्यवस्था की जिम्मेदार वह खुद होगी कोई और नहीं. जनता का एक मन होना चाहिये कि किसी भी सूरत में अपराधी चुनाव न जीतने पायें. अगर अपराधी आपके प्रतिनिधि नहीं होंगे तो यकीनन प्रदेश की स्थिति में सुधार होना तय ही है और अगर फिर से अपराधी सदन में पहुचे तो क्या होगा यह आप देख सुन ही रहें हैं....

Sunday, June 19, 2011

काँग्रेस को संघ से क्यों डर लगता है. (Congress, RSS Fobia and Fear)

आजकल भ्रष्टाचार से लडाई चल रही है, सभी के निशाने पर केन्द्र की यूपीए सरकार और काँग्रेस पार्टी है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी ने कमर कस ली है. बाबा रामदेव जी हों या अन्ना हजारे, संघ ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई में सबको सहयोग और नैतिक समर्थन देने की बात की है. अब काँग्रेस और सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि इन सबके पीछे संघ है. वैसे तो संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि इन आंदोलनों को संघ का सिर्फ नैतिक समर्थन है. लेकिन अगर संघ या कोई भी अन्य संस्था भष्टाचार के विरुद्ध लडाई लड रही है या इसमें सहयोग कर रही है तो इसमे गलत क्या है?

अन्ना हजारे जी की जन लोकपाल की माँग में पेचीदा कुछ नहीं. क्या आपको अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेंविस्की प्रकरण याद नहीं जब अमेरीकी राष्ट्रपति को महाभियोग का सामना करना पडा था. जन-लोकपाल सिर्फ प्रधानमंत्री के गलत कार्यों की निगरानी करेगा, ठीक वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री के आयकर में कुछ गलत सूचना देने पर आयकर अधिकारी उनसे पूछताछ कर सकता है. अब अगर देश के लिये मह्त्वपूर्ण इस मुद्दे पर संघ अन्ना का समर्थन करता है तो इसमें क्या गलत है ?

बाबा रामदेव जी का काले धन के खिलाफ चलाया जा रहा आंदोलन नया नहीं है, न ही वर्तमान में हुए घोटालों से इसका संबंध है. यह आंदोलन पिछले २ वर्षों से सतत रूप से पूरे देश में चल रहा था, लेकिन नित नये खुलासों से त्रस्त जनता ने बाबा का समर्थन किया तो काँग्रेसी नेतृ्त्व के पसीने छूट गये. क्या काला धन को भारत से बाहर भेजे जाने पर रोक नहीं लगनी चाहिये और क्या गया धन वापस नहीं आना चाहिये. यह अवैध रूप से लूटी गयी जनता की सम्पत्ति है, इसे वापस लाने में अगर संघ बाबा रामदेव के साथ खडा है तो क्या गलत है. लेकिन देश के चाटुकार और ख्याति प्राप्त करने के लालच में लगे बुद्धिजीवी जनता को लगातार गुमराह कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि जनता अगर खुद से सोच विचार करने लगी तो टीवी पर चलने वाली इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकाने बंद हो जायेंगी.

कुल मिलाकर हम देखेंगे कि काँग्रेस के निशाने पर हमेशा संघ रहा है, इसका कारण संघ के पीछे हिन्दुत्व की वह विचारधारा है जो भारतीय जनमानस में या कहें कि भारत के कण कण में व्याप्त है. संघ ने अपनी कोई विचारधारा नहीं बनायी, वह उन्हीं विचारों को लेकर चला जिसे लोग सदियों से मानते थे, समझते थे और दैनिक जीवन में उसका पालन करते थे. संघ ने बस ऐसे ही लोगों को एकत्र कर एक अनुशासित संगठन का रूप दे दिया या यह कहें कि संघ ऐसे ही जागरुक व्यक्तियों के द्वारा समाज का निर्माण करने में लगा है.

पीछे कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो समाज स्वयं ही अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध खडा होने लगा है, चाहे जम्मू में बाबा अमरनाथ के लिये भूमि आंदोलन हो,  दक्षिण में हुआ रामसेतु आंदोलन हो या अभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन, इन आंदोलनों का नेतृ्त्व करने वाले आम समाज के लोग हैं, जिन्हे संघ ने अपना नैतिक समर्थन दिया है.

देश के विकास में संघ का योगदान विद्या भारती द्वारा चलाये जा रहे २८ हजार से ज्यादा विद्यालयों से समझा जा सकता है जिसमें लाखों विद्यार्थी उचित शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र निर्माण में लगे हैं. पूरे देश में १.५ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प चलाने वाला यह संगठन देश समाज को नयी दिशा देने में लगा है और यही काँग्रेस की सबसे बडी परेशानी है. आदिवासियों के बीच वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य हो या आसपास की बस्तियों में किया जाने वाला सेवा कार्य, संघ के स्वयंसेवकों का नि:स्वार्थ भाव से किया गया कार्य सबका मन मोह लेता है. चाहे चीन के साथ युद्ध हो या चरखी दादरी का विमान दुर्घटना काण्ड हो, देश समाज पर आने वाले संकट के समय भी संघ के स्वयंसेवकों की सेवा एवं त्याग भावना अद्वितीय है. चीन के साथ युद्ध के समय स्वयंसेवको के योगदान को देखते हुए काँग्रेसी प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने संघ के स्वयंसेवकों को गणतन्त्र दिवस के अवसर पर होने वाली परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया था और अल्पकालीन सूचना पर भी ३००० स्वयंसेवकों ने परेड में हिस्सा भी लिया था.

सुबह लगने वाली प्रभात शाखा में भाग लेने से लेकर अपने घर, पास पडोस और कार्यालयों में एक स्वयंसेवक अपने दैनिक क्रिया कलापों के द्वारा समाज में एक अमिट छाप छोडता है और समाज को अपना बनाने में कोई कसर नहीं छोडता,  इन्ही कारणों से समाज हमेशा संघ के साथ रहता है और संघ के स्वयंसेवकों  को इस बात का गर्व भी होता है और स्वयंसेवक हमेशा इस बात का ध्यान भी रखता है कि उसे अपने क्रिया कलाप द्वारा समाज में एक आदर्श प्रतिस्थापित करना होता है.

पूर्वोत्तर में अलगाववाद से जूझती कांग्रेस सरकार और देशी मीडीया को भले ही यह सांप्रदायिक लगता हो, लेकिन संघ ने विभिन्न स्थानों पर पूर्वोत्तर के छात्रों के लिये आवासीय विद्यालयों की स्थापना की है, जिसमें पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को आधुनिक एवं रोज़गार परक शिक्षा के साथ साथ भारत माता की जय बोलना सिखाया जाता है. इसका जीता जागता प्रमाण मेरठ के शताब्दी विहार में स्थित माधव कुन्ज में देखा जा सकता है. आप खुद सोचिये, मेरठ में भारत माता की जय बोलना सीखकर एक बच्चा पूर्वोत्तर के अपने राज्य में जाकर जब अपनी रोज़ी रोटी कमाता हुए भारत माता की जय बोलेगा तो आपको कैसा लगेगा. क्या यह अलगाववाद पर एक कारगर प्रहार नहीं है.

जागरूक जनता पर शासन करना आसान नहीं इसलिये भारत माता की जय, और वन्देमातरम जैसे क्रांतिकारी शब्द काँग्रेस को सांप्रदायिक लगते है और इन्ही कारणो से एक सशक्त विचारधारा वाला यह संगठन काँग्रेस की नज़र मे खटकता रहता है और काँग्रेस नेतृ्त्व इसे बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडना चाहता.
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी त्याग, बलिदान और सेवा के प्रतीक स्वयंसेवकों एवं जीवनव्रती प्रचारकों के दम पर अपना लोहा मनवाने वाला यह संगठन देश को परम वैभव पर ले जाने के लिये कृ्त संकल्पित है.
मन मस्त फकीरी धारी है, बस एक ही धुन है जय भारत.
भारत माता की जय.

Sunday, June 12, 2011

लोकतंत्र के हत्यारे और उनका लूटतंत्र

हमारा देश भारत गणराज्य कहने को तो विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है, लेकिन यहाँ लोकतंत्र की धज्जियाँ रोज़ उडते हुए देखी जा सकती हैं. रामलीला मैदान पर सोये हुए निहत्थे लोगों पर पुलिसिया प्रहार इसकी बानगी भर है. रोज़मर्रा के जीवन में हमें हमारा अधिकार कितना मिलता है, यह सोचनीय है.

जिस देश का प्रधानमंत्री कहता है कि अपनी ही जनता पर लठियाँ चलाने के आलावा उसके पास कोई विकल्प नहीँ था, तो उससे बडा धोखेबाज व्यक्ति कोई दूसरा नहीं. बाबा रामदेव और उनके साथ अनशन पर बैठी जनता ने ऐसा क्या गलत माँगा जिसे पूरा करना प्रधानमंत्री के बस की बात नहीं थी. सिर्फ अपने आका और सरकार में शामिल भ्रष्ट लोगों एवं खुद को बचाने के लिये लिये गये निर्णय को मजबूरी का नाम देना तर्कसंगत नहीं. बाबा रामदेव ने जब से अनशन का एलान किया तभी से, सरकार और भ्रष्ट लोग उनके खिलाफ आग उगल रहें रहे हैं, बिना यह बताये हुए वह क्या गलत माँग रहे हैं.

जनता को लोकपाल बिल का सपना दिखाने वाले अन्ना हजारे, बाबा को आंदोलन के लिये अनुपयुक्त बता रहे हैं, मुझे तो लगता है कि अन्ना को अपनी टोपी उतार वहीं चले जाना चाहिये जहाँ से वह आये थे. उन्हे अपना खुद का इतिहास देखना चाहिये कि उन्हे इस मुकाम पर पहुचाने में किसकी भूमिका रही. क्या वह अनुभव लेकर पैदा हुए थे. मेरी नज़र में तो ऐसे समाजसेवी को शर्म से डूब मरना चाहिये जो यह सोचता है कि अनुभवहीन व्यक्ति को घर में चुप बैठ जाना चाहिये और उसे आंदोलन या उसका नेतृ्त्व नहीं करना चाहिये. बाबा रामदेव कि माँग में कुछ गलत नहीं, रही नेतृ्त्व की बात तो जैसे सूरज का प्रकाश अपना मार्ग ढूँढ लेता है, वैसे ही इस आंदोलन से निकले हजारों लोग अपना रास्ता खुद ढूँढ लेंगे. जेपी आंदोलन की उपज रहे कई नेता यूपी और बिहार की राजनीति में काँग्रेस को धूल चटा चुके हैं.

सर्वविदित है कि हम उस देश में रहते हैं जहाँ रत्नाकर अपने अच्छे कर्मों की वजह से बाल्मिकि बन कर पूजे जाते हैं तो बाबा रामदेव पर इतने आरोप क्यों? बाबा रामदेव के आलोचक इसका क्या जबाब देंगे, क्या वह इस बात से सहमत नहीं कि काला धन देश में वापस आये?.

बाबा रामदेव के आलोचकों में या तो वे काँग्रेसी हैं जिनका काला धन विदेशों में जमा है या वह नेता जो आने वाले समय में सत्ता प्राप्त कर जनता को लूटने का मंसूबा पाले हुए हैं. भले ही बाबा का अनशन टूट चुका है लेकिन आम जनता के दिल में तो बाबा रामदेव जगह बना चुके हैं और जनता लोकतंत्र के लूटेरों को सबक जरूर सिखायेगी, इसमें कोई संशय नहीं.

Saturday, June 11, 2011

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Bismil), बाबा रामदेव जी (Baba Ramdev) और देश की बेचारी जनता

11 जून यानि पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जन्म दिवस, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. देश के लिये सर्वोच्च बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों और वास्तविक आज़ादी का सपना देखने वाले भारत माता के सपूतों मे बिस्मिल का नाम बडे ही आदर के साथ लिया जाता है. मेरे इस लेख का ध्येय यह नहीं कि आप सभी का बिस्मिल के जीवन से परिचय कराया जाये, बस मैं यह चाहता हूँ कि हम उन परिस्थितियों पर गौर करें, जब बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों को सर्वोच्च बलिदान करना पडा था.

डा. मदन लाल वर्मा जी 'क्रांत'  के प्रयास से
ग्रेटर नोएडा के एक उद्यान का नामकरण
बिस्मिल के नाम पर किया गया.

हमने जवाहर लाल नेहरू का नाम खूब सुना है लेकिन लाला जगत नारायण मुल्ला का नाम बहुत नहीं सुना,  आपको बता दूं कि लाला जगत नारायण नेहरू के साले साहब थे. अब लाला जी और बिस्मिल का संबध यहाँ देखें.

"सन् १९१६ के काँग्रेस अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष जगतनारायण 'मुल्ला' के आदेश की धज्जियाँ बिखेरते हुए रामप्रसाद ने जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में शोभायात्रा निकाली तो सभी नवयुवकों का ध्यान उनकी दृढता की ओर गया।"

यह अवश्य बताना चाहुँगा कि अपने समय में लोकमान्य जितने लोकप्रिय थे, उतने गाँधी जी कभी नही रहे.

आप सभी यह भी जानते हैं कि अमर हुतात्माओं बिस्मिल, अशफाक, राजेन्द्र लहिडी और ठाकुर रोशन सिंह को काकोरी कांड में फाँसी की सजा हुई थी, लेकिन सजा दिलाने में योगदान किसका था, आप यह भी देखें.

"इस एतिहासिक मुकदमे में सरकारी खर्चे से हरकरननाथ मिश्र को क्रान्तिकारियों का वकील नियुक्त किया गया जबकि जवाहरलाल नेहरू के साले जगतनारायण 'मुल्ला' को एक सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत सरकारी वकील बनाया गया जिन्होंने अपनी ओर से सभी क्रान्तिकारियों को कड़ी से कडी सजा दिलवाने में कोई कसर बाकी न रक्खी। यह वही जगतनारायण थे जिनकी मर्जी के खिलाफ सन् १९१६ में बिस्मिल ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा पूरे लखनऊ शहर में निकाली थी."

विकिपीडिया में जाकर सब आप सब कुछ देख सकते हैं कि कैसे लाला जगत नारायण ने एक कांग्रेसी बनारसी लाल को वादामाफ गवाह बना कर देश के वीर सपूतों को असमय चिर निद्रा में सुला दिया था. देशवासियों के कल के लिये उन्होने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था. ज्यादा जानकारी के लिंक देखें.
 http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_'%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2'

वास्तव में अगर देश की स्वतन्त्रता और उसके बाद का सही इतिहास देखें तो नेहरू-गांधी परिवार से घिन आने लगेगी. लेकिन फिर भी यह परिवार भारत भाग्य विधाता बना हुआ है. चाहे बिस्मिल को मिली फाँसी की सजा हो, आज़ाद की अल्फ्रेड पार्क में हुई मौत हो या सरदार भगत सिंह को पथभ्रष्ट युवा कह कर बचाने से इंकार करना हो. प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं यही परिवार जुडा नज़र आता है. आज़ादी के बाद डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री,  दीन दयाल उपाध्याय आदि नेताओं की मृ्त्यु के प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं.

अब अगर हम विगत 5 जून को हुए रामलीला मैदान काण्ड की बात करें तो हमें कांग्रेस का घिनौना चेहरा फिर सामने दिखता है. अभी भी आपातकाल की यादें लोगों के जेहन में ताज़ा हैं. पिछले एक वर्ष से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरी कांग्रेस ने अब जनतंत्र पर ही हमला बोल दिया है. आधी रात को सोते हुए लोगों पर पुलिसिया अत्याचार किसी भी राष्ट्र के लिये कलंक से कम नहीं और दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में ऐसी घटना घटे तो उस राष्ट्र के शासन तंत्र को डूब मरना चाहिये, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. 121 करोड भारतीयों का प्रतिनिधि अगर विकल्पहीन हो कर अपनी ही जनता पर अत्याचार शुरु कर दे तो इसे क्या कहेंगे.

उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसोल में विगत दिनों जो कुछ भी हुआ, वह निंदनीय था. लेकिन अब प्रदेश सरकार पर मनगंढत झूठे आरोप लगा खुद को शर्मिन्दा भारतीय कहने वाले राहुल बाबा नदारद हो गये हैं. रामलीला मैदान के अहिंसक आंदोलन को कुचलने के बाद उन्हे भारतीय होने पर गर्व महसूस हो रहा होगा. राज ठाकरे के लोग जब बिहार के युवकों पर मुंबई में अत्याचार कर रहे थे तब भी यही युवराज गर्व महसूस कर रहे थे. यानि खुद करें तो सब कुछ अच्छा और दूसरों के दोष निकालाना कोई इनसे पूछे.

आज देश की जनता को वास्तविकता का एहसास हो रहा है, लेकिन अब भी वह घर में बैठी है. काँग्रेस के विरोध का माहौल है, लेकिन सडक पर कोई नहीं उतर रहा. भाजपा के नेता भी लगभग चुप हैं, मीडिया के सामने आलोचना कर देने से राजनीति नहीं हो सकती. दुर्भाग्य से यह प्रमुख विपक्षी दल ऐसे नेताओं के हाथ में है, जिनका जनता से सीधे संवाद नहीं है. जनता की आवाज बनने की बजाय भाजपा के नेता फोटो सेशन और नाचने गाने में व्यस्त है. जिस मुद्दे पर काँग्रेस को सफाई देनी थी, वहाँ काँग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने भाजपा से पूछ लिया कि राजघाट पर ऐसी कौन सी खुशी की बात थी कि सुषमा और अनुराग ठाकुर नाच गा रहे थे. उसके बाद आयी सुषमा की सफाई भी चौंकाने वाली थी. भाजपा के नितिन गडकरी जी से सिर्फ इतना कहना सही रहेगा कि लोकतंत्र की मृ्त्यु पर देशभक्ति गीत गाकर नाच गाना करने वाले लोग देश का भविष्य नहीं लिख सकते. इन्हे यह समझने की जरूरत है कि 70 करोड से ज्यादा युवाओं वाला देश इन नेताओं को कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा और आने वाले समय में इनसे नेतृ्त्व ही छीन लेगा.

अंत में बिस्मिल की देशवासियों के नाम लिखित इन अंतिम पक्तियों को देखें.

लिंक:

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी यही तो हृदय पर आघात लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी दल खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राणरक्षा के लिये एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी पाने का मुझे कोई भी शोक नहीं क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।


मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो अधिक उपयोगी सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति अनुकूल न होने से ऐसे आन्दोलनों से अधिकतर परिश्रम व्यर्थ जाता है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों से यही अन्तिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिल कर करें, और सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७ ई०

क्या 1927 और 2011 में अंतर नहीं?. क्या हम अब भी अशिक्षित हैं? क्या हमें बाबा जी और अन्ना के द्वारा हमारे लिये चलाये गये आंदोलन में चुप बैठना चाहिय?. अगर उत्तर नहीं है तो हे मेरे देशवासियों. उठो, जागो और निकलो सडक पर, लोकतंत्र पर हमले को बर्दाश्त मत करो, वर्ना एक दिन ऐसा आयेगा कि यही नेता अपने स्वार्थ के लिये देश को बेच देंगे.
...... अवधेश

Sunday, May 29, 2011

इण्डिया अगेंस्ट करप्शन और जन लोकपाल आन्दोलन

विगत दिनो श्री अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को खूब समर्थन मिला. मिलना भी चाहिये था, क्योकि जनता भ्रष्टाचार पर होने वाले रोज रोज के खुलासे से परेशान थी. लेकिन अब आन्दोलन पर सवाल भी हो रहे हैं. आंदोलन के बाद राजनेता भी परेशान थे, क्योकि अन्ना ने सबको भ्रष्ट बता दिया था. इसका मतलब यह था कि ए. राजा और और आज भी झोली में डायरी पेन लेकर चलने वाले नेता बराबर हैं.
अन्ना के आन्दोलन के पीछे कौन है और कौन नही, इस विवाद से आम लोगो का क्या लेना देना. यह तो राजनीतिज्ञ सोचे कि किसका लाभ हुआ और किसकी हानि, लेकिन क्रिकेट का विश्वकप जीतने के बाद और आईपीएल के पहले तक पूरे आन्दोलन का प्रबन्धन जिस प्रकार से किया गया, उसमे कुछ न कुछ अस्वाभविक जरूर है. मीडिया ने आन्दोलन के पक्ष मे हवा बनायी और कुछ लोगो ने इसके जरिये अपना खूब प्रचार प्रसार किया.
भ्रष्टाचार की सारी सीमाये तोडने वाली काँग्रेस सरकार इस आन्दोलन के बाद सबसे ज्यादा फ़ायदे मे दिखी और अन्ना की सभी माँगे स्वीकार कर ली गयी. मतलब अन्ना ने जन लोकपाल नहीं एक कमेटी माँगी और कमेटी के सदस्य माँगे. काँग्रेस का क्या बिगडा? कुछ नहीं, उसके सदस्य तो कमेटी में बने ही हैं, कमेटी की बात करें तो एक शब्द आता है सिविल सोसाईटी, अब सोचिये यह सोसाईटी क्या है?  क्या ये जनता के प्रतिनिधि हैं, जब उत्तर नहीं है तो ये जनता के लिये जवाबदेह होंगे क्या? अरे जब आपने जिसे चुन कर संसद और विधानसभा में भेजा वही आपके प्रति जवाबदेह नही तो सिविल सोसाईटी क्या कर लेगी. फिर भी जनता को लग रहा था कि उसे बहुत कुछ मिल गया, और वास्तव मे सरकार के प्रति जनता का आक्रोश अब पहले जैसा नही रहा. अभी पिछले महीने एक विचार गोष्ठी मे युवाओ ने कहा कि भ्रष्टाचार अब समस्या नही रहेगा, जैसे इस दानव पर विजय प्राप्त कर ली गयी हो. कुल मिलाकर सरकार और काँग्रेस ने स्थिति अपने नियन्त्रण मे कर ली थी. मीडिया भी आन्दोलन का समर्थन कर खूब वाहवाही लूटी और अन्ना ने उसे फ़िर लोक तन्त्र के चौथे स्थान पर बैठा दिया था. लेकिन मेरे दिल मे टीस रह गयी थी, कि देश और जनता से छल करने वालो के नकाब को उतार फ़ेकने वाले डा. सुब्रमण्यम स्वामी के या देश भर मे भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबा रामदेव और स्वर्गीय् श्री राजीव जी दीक्षित के पक्ष मे यह मीडिया कभी इस तरह खडा नही दिखा.
अब फिर से आंदोलन की परिस्थितियों पर गौर करें, तो पता चलेगा कि उस समय बाबा रामदेव की सभाओं में भारी भीड उमड रही थी, बाबाजी दिल्ली में एक बड़ी सभा कर अपनी योजनाओं का संकेत दे चुके थे,  ईजिप्ट में तब तक क्रांति हो चुकी थी और कुछ कुछ वैसी ही परिस्थितियाँ भारत में भी बन रही थी. फिर अचानक एक आंदोलन हुआ और मीडिया ने उसे खूब हवा दी. मुख्य विपक्ष गैर राजनीतिक संगठन हो गया और बाबा रामदेव एक दम से हासिये पर पहुच गये. जिस सरकार के पास भ्रष्टाचार के मामले में बोलने के लिये कुछ नही था, उसने एकदम से सिविल सोसाईटी और जन लोकपाल के माध्यम से जनता को संदेश दिया कि सरकार भ्रष्टाचार से लडने को गंभीर है. जनता से छल करने का यह काँग्रेसी खेल बहुत पहले से चला आ रहा है और आगे भी काँग्रेस का आपदा नियत्रंण तंत्र ऐसे ही काम करता रहेगा, क्योकि जनता फिर से अपनी रोजी रोटी में मस्त हो गयी है.
अभी विगत दिनों अन्ना गुजरात गये, उन्होने जाते ही मोदी सरकार पर तड़ से आरोप भी जड़ दिये, लेकिन जनता को विश्वास नही हुआ. जनता के इसी विश्वास के कारण मोदी जी अपने विरोधियों को कई बार धूल चटा चुके हैं. इसके बाद लोगो का इण्डिया अगेंस्ट करप्शन पर से विश्वास घटता जा रहा है. बेचारे अग्निवेश जी को तो थप्पड़ भी खाना पड़ गया. बाकी सबकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लग रहा है.
वास्तव में भारत की विडम्बना यही है कि यहाँ सब कुछ इंडिया के लिये होता है, भारत के लिये नहीं, करप्शन के विरुद्ध इंडिया खड़ा हुआ और शान्त भी हो गया. भारत तो बाबा रामदेव के साथ है, इसलिये सरकार को भी खतरा दिख रहा है, और बाबा जी के आंदोलन की राह में बाधायें पैदा की जा रही हैं, क्योंकि बाबाजी पर काँग्रेस का कोई दाँव काम करेगा इसकी उम्मीद कम ही है. 
पहले अन्ना और फिर बाबाजी के द्वारा लड़ी जा रही लडा़ई को जनता का अपार सहयोग मिल रहा है और इन आंदोलनों की परिणीति के रूप में देश में एक सशक्त वर्ग तैयार हो रहा है. यही वह समय है कि देश का राजनीतिक नेतृ्त्व यह समझ ले कि अगर वो अभी भी नहीं चेता तो देश का यही सशक्त वर्ग उनसे नेतृ्त्व ही छीन लेगा इसमें मुझे कोई संशय नही़.

Sunday, May 8, 2011

भारत तो ब्रिटिश देश लगता है (India looks like a british country)

अभी मेरे एक फ्रांसीसी मित्र कम्पनी के कार्य से भारत आये थे, कल उन्हे जाना था अत: बचे समय में उन्होने मुझसे दिल्ली घूमने की इच्छा जाहिर की, उनके पास मात्र कुछ घंटे थे और कुछ खरीददारी भी करनी थी. समय कम था अत: मैं उन्हे सबसे पहले इंडिया गेट ले गया. मैने उन्हे बताया कि यहाँ 24 घंटे जलती अमर जवान ज्योति देश के लिये बलिदान हुए लोगों को समर्पित है, मैने उन्हे पत्थरों पर खुदे नाम भी दिखाये. उन्होने इस बात का संज्ञान लेते हुए पूछा, कि यह नाम व सूचना किसी भारतीय भाषा में क्यों नही हैं?. उनका यह प्रश्न मुझे असहज करने के लिये काफी था. वास्तव में देखा जाये तो इंडिया गेट ब्रिटिश राज्य के लिये बलिदान हुए लोगों की स्मृ्ति में बनायी गयी इमारत है, लेकिन हम गुलामी की निशानियों को सजोने में अव्वल हैं और इस पर गर्व महसूस करते हैं, इसलिये यह इमारत हमारे लिये अब भी बहुत महत्वपूर्ण है.
इंडिया गेट के बाद हमने बाहर से राष्ट्रपति भवन देखा और फिर स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर गये. मंदिर की चाक चौबंद सुरक्षा  देख कर वह विस्मित से हो गये, उन्हे यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी सुंदर इमारत और करोडो लोगों के आस्था के केन्द्र को कोइ नुकसान भी पहुँचा सकता है. जनपथ पर भोजन और कुछ खरीददारी करने के बाद जब मैं उन्हे पुन: उसके होटल छोडने गया तो मैने उनसे पूछा कि अभी तक देखा गया भारत आपको कैसा लगा, उन्होने बहुत सीधा सादा उत्तर दिया कि भारत एक ब्रिटिश देश लगता है, जबकि यह स्वतंत्र है. उन्होने कहा यहाँ सब कुछ अंग्रेज़ी में है, लोग एक दूसरे से अंग्रेज़ी में बात करते हैं और बताया कि फ्राँस में ऐसा नही है, वहाँ आपस में लोग अंग्रेज़ी में बात करना पसन्द नहीं करते.
फ्राँसीसी मित्र की यह बातें सत्य ही हैं, हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं. अंग्रेजियत ने सही अर्थों में हमारा स्वाभिमान छीन लिया है. इससे बचने के लिये अंग्रेजियत का खात्मा जरूरी है, हमें अमेरिका के लिये नहीं भारत के लिये इंजीनियर बनाने चाहिये. ऐसे संस्थानों को बन्द करना चाहिये जिसका फायदा विदेशी अर्थव्यवस्था को हो रहा है. आखिर हम कब जागेंगे. सोचो अगर चंद पैसों के लिये डा. कलाम जैसे लोग अमेरिका चले गये होते तो क्या देश इतना ताकतवर होता. क्या ये सही नहीं कि देश के सबसे अच्छे इंजीनियर अपने भविष्य की शुरुआत ही विदेशी धरती पर करना चाहते हैं. मूल्यों में हो रही गिरावट के कारण ही अपराध और भ्रष्टाचार पनप रहे हैं. आखिर कब तक हम नकल करके पास होते रहेंगे. क्या नकल करके पास होने वाला व्यक्ति आपकी नज़रों में सम्मान प्राप्त कर सकता है. अगर नहीं तो अंग्रेजियत की नकल करके भारत देश विश्व में अपना सम्मान कैसे बचा सकता है?.


Friday, April 29, 2011

"भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार आवश्यक" प्रस्ताव पर उचित कार्यवाही शुरु करे संघ

विगत दिनों से भ्रष्टाचार पर खूब हमला हो रहा है, अन्ना हजारे जी का आंदोलन भी हुआ, मीडिया ने भी आंदोलन को खूब हवा दी. 4 दिनों बाद अन्ना की माँगे मान ली गयी, जैसे लगा जनता की कितनी बडी जीत हुई, चैनलों पर 9 अप्रैल को ऎतिहासिक दिन बताया जाने लगा. जनलोकपाल बिल के लिये एक कमेटी बनायी गयी जिसमें काँग्रेस के लोग और तथा कथित सिविल सोसाइटी के लोग बैठ गये, लेकिन असल में आम जनता को वहाँ भी प्रतिनिधित्व नहीं मिला. जनता को लगा कि अब भ्रष्टाचार के दिन लद गये. अब तो जन लोकपाल आयेगा और भ्रष्टाचारी सलाखों के अंदर होंगे. यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि लोगों में सरकार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जो गुस्सा था, उसकी आग शान्त होने लगी थी. एक बैठक में मुझसे एक युवा इन्जीनियर ने कहा कि जनलोकपाल बिल आने से अब भ्रष्टाचार देश की बडी समस्या नहीं रही.
प्रथम दृ्ष्टया सरकार और कांग्रेस दोनों इस आंदोलन के पश्चात लाभ की स्थिति में रही. अन्ना के जूस पीते ही काँग्रेस और केन्द्र सरकार प्रसन्न हो गये क्योंकि उन्होने जनता के आक्रोश को नयी और गैर राजनीतिक दिशा देकर विपक्ष खासतौर पर भाजपा को इसका लाभ लेने से वंचित कर दिया. इसके लिये कहीं न कहीं भाजपा भी दोषी है, समय रहते भाजपा ने जनता के मिजाज को नहीं समझा और काँग्रेस येदुरप्पा पर आरोप लगा, जनता को यह बताने में सफल रही कि भाजपा भी दूध की धुली नहीं है. खैर आरोप तो सिविल सोसाइटी के भी सदस्यो पर लगने शुरु हो गये, लेकिन जैसे तैसे सिविल सोसाइटी अभी तक अपना अस्तित्व बचाये हुए है. लेकिन जनता फिर से सोने लगी है. अब अन्ना हजारे जी का इन्डिया अगेंस्ट करप्शन क्या कर रहा है, इसमें जनता की रुचि घटने लगी है, वह फिर से अपने रोजी रोटी में मस्त है, मीडिया को भी उसके कार्य का इनाम मिल चुका होगा. अत: उसे अब ज्यादा हो हल्ला मचाने की जरूरत नहीं रही और भ्रष्टाचारी खुले आम जनतन्त्र का मजाक उडा रहे हैं. अभी कल पीएसी की बैठक में मचा हो हल्ला और उसके बाद पीएसी की जाँच रिपोर्ट खारिज होना इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है. जिस तरह से काँग्रेस, द्रमुक, सपा और बसपा ने एक सोची समझी रणनीति के तहत पीएसी का अपमान किया, वह वास्तव में शर्मनाक है.
उपरोक्त घटना क्रम को देखते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि अब समय आ गया है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में पारित प्रस्ताव - 1 (12.03.11) "भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार आवश्यक" पर उचित कार्यवाही शुरु करे. संघ के किसी व्यक्ति विशेष के पीछे चलने से देश की जनता को भ्रष्टाचार के दंश से मुक्ति मिलना असंभव है. वर्तमान राजनीतिक दलों के अधिकांश नेता भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबे हुए हैं. अन्ना हजारे जी का आन्दोलन कमजोर पड चुका है. देश को वर्तमान परिस्थितियों से निकालने की जिम्मेदारी संघ की है, समूचा राष्ट्र संघ की तरफ देख रहा है. मैं राष्ट्र के एक आम नागरिक के नाते माननीय सरकार्यवाह जी से निवेदन करता हूँ कि अब विलम्ब न करें. देश को भ्रष्टाचारी  राक्षसों से मुक्त कराने के लिये अतिशीघ्र जन आंदोलन की शुरुआत का विगुल बजना जरूरी है.

Sunday, February 13, 2011

क्रांति का आह्वान (Call To Revolution!)

लोकतंत्र के नाम पे देखो, वंशवाद फलफूल रहा,
किचन सम्हाले था जो बैठा, बत्ती पाकर झूम रहा.
हिस्सा देकर राजाजी को, सत्ता इनकी चलती है,
चापलूस बन गए योग्य हैं, जनता हर क्षण पिसती है.

भ्रष्टाचारी नोच रहे हैं, सोने की चिडिया के पर,
महगाई से चीख रहे जन, कैसे चलता है अब घर,
न्याय की देवी परेशान है, दुखिया जनता भी हैरान,
देश लूट कर खाय रही है, गोरों की काली सन्तान.

भारत माँ को भूमि समझ कर, बाँटा जिसने देश को,
आज तलक हैं नायक अपने, भूले हम निज गौरव को.
काश्मीर की पुण्य स्थली, दुश्मन के दी हाथ में,
समय आ अब हे! बन्धु, मिल जाओ सब साथ में.

उठो! देश के वीर सपूतों, पौरुष अब तुम दिखलाओ,
सीखो तो कुछ मिस्र देश से, क्रांति नयी फिर कर जाओ.
भारत माता की जय बोलो, लक्ष्य नया हो अब अपना,
वैभव माँ को दे दो वापस, पूरा कर दो हर सपना.

पुण्य भूमि के अपराधी जो, सत्य मार्ग से हटे हुए,
अनुगामी हो संतो के जो, सत्कर्मों पर डटे हुए.
प्राणी मात्र  को सुखी करो तुम, धर्म ध्वजा की लहराओ,
प्रेम समर्पण फिर से फैले, विश्व बन्धु तुम बन जाओ.

Tuesday, February 1, 2011

नव चैतन्य शिविर (Nav Chaitanya Shivir) : एक अविस्मरणीय अनुभव

संघ के स्वयंसेवक के लिए किसी भी शिविर में जाना एक सुखद अनुभव होता है, लेकिन २८/२९/३० जनवरी २०११ को मेरठ में आयोजित नव चैतन्य शिविर में जाना एक अविस्मरणीय अनुभव रहा. शिविर का उद्देश्य युवाओं में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाकर उन्हें देश समाज का एक जिम्मेदार एवं जागरूक नागरिक बनाना था और शिविर से लौटते हुए युवाओं के जोश एवं भारत माता की जय तथा वन्देमातरम जैसे गगन भेदी नारों को देखते हुए लगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मेरठ प्रान्त द्वारा आयोजित यह शिविर युवाओं में नव चैतन्य जगाने में सफल रहा. शिविर में स्नातक अथवा उसके ऊपर की कक्षाओं में अध्ययनरत लगभग ३००० विद्यार्थियों एवं युवा प्रवक्ताओं ने भाग लिया.
मेरा परम सौभाग्य कि मैं भी शिविर का एक घटक था, विद्यार्थियों को शिविर में जाने के लिए उत्साहित कर उनसे शुल्क लेना भी एक अद्वितीय अनुभव रहा एवं इससे कई सारी बातें सीखने को मिली. जिला प्रचारक श्री नागेन्द्र जी, सह जिला कार्यवाह श्री विवेक जी, जो नव चैतन्य शिविर के कार्यवाह भी रहे तथा डा. विनोद जी जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों से संपर्क करने के नए तरीकों का भी ज्ञान हुआ. कुल मिलाकर आशा निराशा के बीच विद्यार्थियों से मिलकर उनसे मित्रता करना एक सुखद अनुभव रहा.
२ जनवरी २०११ को मेरठ के शताब्दी नगर में भूमिपूजन में आये हुए प्रान्त के विभिन्न जिलों एवं नगरों से आये हुए कार्यकर्ताओं के जोश को देखकर प्रतीत हो गया था कि शिविर अपने आप में अद्वितीय होगा. कई कार्यकर्ता तो उसी दिन अपना बिस्तर लेकर आये थे, जो शिविर के समाप्त होने के बाद तक वही रुके होंगे ऐसा मेरा विश्वास है.
शिविरार्थियों को अपना बिस्तर, भोजन पात्र एवं अन्य जरूरत की वस्तुए स्वयं ले जानी थी क्योंकि शिविर में प्लास्टिक या कागज़ के पात्रों के उपयोग की सख्त मनाही थी एवं शिविर की रचना पूर्ण रूपेण पर्यावरण के अनुकूल थी. २८ जनवरी २०११ को सायं चार बजे शिविर में पहुचना था, लेकिन सब कुछ व्यवस्थित करते हुए देर हो गयी और मैं शिविर में ४ घंटे विलम्ब से रात लगभग ८ बजे पहुचा और उस दिन सायं छः बजे होने वाली जिलाशः बैठक में मै भाग नहीं ले सका. शिविर में विभाग के अनुसार नगर बने हुए थे, हम कारगिल युद्ध के नायक रहे १९ वर्ष की आयु में परमवीर चक्र विजेता (जीवित) योगेन्द्र यादव नगर में थे, शिविर में अन्य विभागों के नगरों के नाम  भी ऐसे ही प्रेरणादायक राष्ट्रनायकों के नाम पर थे. शिविर में नगरों के नाम मेजर संदीप उन्नीकृष्णन नगर (मेरठ महानगर), कुमार आनंद नगर (मेरठ विभाग), तथागत तुलसी नगर (लक्ष्मी नगर विभाग), सचिन तेंदुलकर नगर (गाज़ियाबाद विभाग), संत सीचेवाल नगर (मुरादाबाद विभाग), अधीश कुमार (सहारनपुर विभाग), प्रो. विजय भाटकर  (बिजनौर विभाग) एवं कोठारी बन्धु नगर (व्यवस्था) थे. नगर के बाहर उन राष्ट्र नायकों के बारे में जानकारी भी थी जिससे युवाओं को उन जैसा बनने की प्रेरणा मिले. प्रत्येक नगर में १६ पटकुटियाँ थीं जिसमे शिविरार्थियों के रुकने, व्यवस्था कक्ष, संघ वस्तु भण्डार, प्राथमिक चिकित्सा, संचालन कक्ष आदि थे. प्रत्येक नगर के मध्य में एक सभागार भी था. सभागार के ठीक पीछे की तरफ थोड़ी दूर पर पाकशाला भी थी, जिसमे नगर के लिए भोजन, जलपान आदि के लिए व्यवस्था थी. सबसे पीछे की तरफ स्नानागार और शौचालय थे. जल के अपव्यय को रोकने के लिए टंकिया भी थी तथा ज्ञात हुआ कि स्नान आदि में खर्च जल को पुनः भूमि में अन्दर डालने की व्यवस्था भी की गयी थी. खैर हमने वहां तम्बुओं में अपना बिस्तर लगाया. उसके बाद हमें तत्काल रात्रि भोजन के लिए जाने का आदेश हुआ, भोजन में चूल्हे की गरमागरम रोटी, दाल, सब्जी, तहरी, सलाद व गुड सम्मिलित थे. हम तो वैसे ही भूख से बेहाल थे भोजन करके ही मन तृप्त हुआ.
भोजन के पश्चात हम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मुख्य सभागार में गए. यह शिविर के मध्य में स्थित विशाल पंडाल था जिसमे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन एवं सामूहिक बौद्धिक वर्ग आदि कार्यक्रम होने थे. वहां उपयुक्त स्थानों पर प्रेरणा दायक आदर्श ध्येय वाक्य भी लिखे हुए थे. जब मैं पहुचा तो ज्ञात हुआ कि उद्योगपति श्री रामनिवास जी भारत माता, डा. हेडेगेवार एवं गुरु जी के चित्र पर दीप प्रज्जवलित करके कार्यक्रम का शुभारम्भ कर चुके थे. मैं जब पंहुचा तो माननीय क्षेत्र प्रचारक शिवप्रकाश जी का उद्बोधन चल रहा था उन्होंने युवाओं को राष्ट्रीय विचाराधारा की तरफ अग्रसर होने का संदेश देते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र का जीवन लक्ष्य होता है अतः युवा अपना लक्ष्य तय कर राष्ट्र निर्माण में योगदान करें. जोश से भरे युवा भारत माता की जय, वन्दे मातरम् जैसे गगनभेदी नारों से शिविर को आंदोलित कर रहे थे. युवा कवि गजेन्द्र सोलंकी के कविता पाठ से भी युवाओं में उबाल आ रहा था. कविता पाठ के बाद जैसे ही बाबा सत्यनारायण मौर्य के आने की घोषणा हुई, स्वयंसेवकों ने उनके सम्मान में रास्ते में फूल बिछा दिए. बाबा ने आते ही अपनी ओज पूर्ण गीतों जैसे मेरे देश वासियों..बोलो वंदे मातरम् आदि से शिविर के माहौल को अविस्मरणीय बना दिया. बाबा ने देश भक्ति के गीत गाते हुए स्वामी विवेकानंद, वीर शिवाजी, हनुमान जी आदि के चित्र भी बनाए. बाबा के मेरा रंग से बसन्ती चोला गीत पर जोश में भरे युवाओं ने नृत्य करना प्रारंभ कर दिया. पूरे कार्यक्रम में उन्होंने कभी गीत, कभी कविता तो कभी रामायण की चौपाई सुनाते हुए प्राचीन भारतीय संस्कृति की जानकारी दे युवाओं का मार्ग दर्शन किया. कार्यक्रम के अंत में उन्होंने भारत माता की आरती गाते हुए उनका चित्र भी बनाया.
रात्रि विश्राम के लिए मुख्य सभागार से वापस अपने नगरों में लौटते शिविरार्थियों के विभिन्न उद्घोषों से शिविर स्थल गूँज रहा था. हमारे टेंट में भी उत्साहित युवा कार्यक्रम एवं शिविर की प्रसंशा कर रहे थे. चर्चाओं का क्रम देर रात तक जारी था. लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे नींद आ गयी.
सुबह साढ़े चार बजे एक युवा उमेश कुमार जी 'उस दिन मेरे गीतों का त्यौहार मनाया जायेगा' गीत के माध्यम से जागरण का कार्य कर रहे थे. पांच बजे की सीटी के साथ ही मैं भी उठा एवं नित्यक्रिया के पश्चात सुबह की चाय पी. सुबह ६:१५ पर नगरशः बैठके थीं. सभी को एकात्मता स्तोत्र का पाठ कराया गया. तत्पश्चात माननीय विभाग प्रचारक अनिल जी (बुलंदशहर विभाग) ने मुझसे बैठक लेने आये श्री विजय शंकर जी संपादक भारतीय धरोहर का परिचय कराने को कहा. पहले विभाग संपर्क प्रमुख श्री हरीश जी, जो योगेन्द्र नगर के प्रमुख भी थे ने मेरा परिचय कराया फिर मैंने विजय शंकर जी एवं विवेक जी (शिविर कार्यवाह) का शिविरार्थियों से परिचय कराया. अपने उद्बोधन में विजय शंकर जी ने भारत के गौरवमयी इतिहास पर प्रकाश डालते हुए प्राचीन भारतीयों द्वारा किये गए आविष्कारों की जानकारी दी.
बैठक के बाद जलपान तथा उसके बाद शिविरार्थी शारीरिक के लिए नगर के संघ स्थान पर गए. उनके जाने के पश्चात् मैंने और जिलाप्रचारक श्री नागेन्द्र जी ने शिविर में अपने जिले गौतमबुद्ध नगर के शिविरार्थियों की सूची तैयार की. व्यवस्था वाले बंधुओं को मिलाकर कुल १५२ लोग अपने जिले से शिविर में आये. फिर शारीरिक खेलों के पश्चात् शिविरार्थियों ने स्नान किया और फिर १२ बजे से दोपहर के भोजन के लिए अपने अपने पात्र लेकर चल पड़े. भोजन के पश्चात अपने पात्र सभी को स्वयं धोने पड़ते थे. चूँकि सभी अपने लिए पात्र लेकर आये थे अतः नगर का माहौल साफ़ सुथरा था. वर्ना इतने बड़े आयोजन के बाद कचरे का ढेर लग जाता और धन की बर्बादी होती सो अलग.
भोजन के पश्चात कुछ शिविरार्थियों से मिलना हुआ. लगभग ६०%  ऐसे थे जो संघ को जानते भी नहीं थे. पहली बार नेकर पहनने का सबका अनुभव भी रोचक था. दोपहर १:४५ बजे से श्रेणीवार बैठक थी. अभियंता, सामान्य स्नातक, प्रबंधन, परास्नातक आदि विभिन्न श्रेणियां थी. मुझे गाजियावाद के विभाग कार्यवाह श्री सुशील जी साथ परास्नातक श्रेणी में बैठक के लिए भेजा. परिचय के पश्चात् सुशील जी ने शिविरार्थियों से देश की समस्याओं और उनके समाधान के बारे में बात की. बैठक के बाद फिर सभी शाखा में गए, वहाँ उन्हें योग-व्यायाम का प्रशिक्षण दिया गया.
शाम को अल्पाहार के पश्चात सभी मुख्य सभागार में बौद्धिक के लिए गए. अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख श्री भागय्या जी ने बताया कि कैसे संघ के धुर विरोधी रहे समग्र क्रांति के प्रणेता श्री जय प्रकाश नारायण संघ के सेवा कार्य से प्रभावित हुए. उन्होंने गांधी जी के वर्धा शिविर में आगमन और उनके शिविर में जाति भेद आदि न होने से प्रभावित होने की चर्चा की. मैंने भागय्या जी का पूरा बौद्धिक लिख डाला. जो कुल ७ पेज का हुआ.
बौद्धिक के पश्चात् रात्रि भोजन एवं फिर मुख्य सभागार में प्रसिद्द क्रिकेटर चेतन चौहान जी ने युवाओं से कहा कि जो करो मन से करो. मेमोरी गुरु श्री सुधांशु सिंहल जी से मेमोरी टिप्स भी मिले. कार्यक्रम के पश्चात् सभी अपने अपने टेंटो में रात्रि विश्राम के लिए चले गए.
अगले दिन प्रातः नित्यक्रिया के पचात चाय और फिर एकात्मता स्त्रोत का पाठ हुआ. नगरशः बैठक के क्रम में बजरंग दल के क्षेत्र संयोजक श्री मनोज जी ने शिविरार्थियों का उत्साहवर्धन किया. उन्होंने शिविरार्थियों से देश की ज्वलंत समस्याओं एवं उनके समाधान के लिए बात की.
बैठक के बाद जलपान और फिर सभी शाखा के लिए मुख्य संघ स्थान गए. वहां सभी शिविरार्थियों ने एक साथ मिलकर समापन कार्यक्रम में होने वाले व्यायाम का अभ्यास किया.
इस बीच मैंने भी मौका देखकर स्नान किया और फिर प्रदर्शनी देखने के लिए गया. यह मुख्य सभागार के ठीक पीछे थी. वहाँ विभिन्न भारतीय राष्ट्रनायकों जैसे नव धनकुबेरों, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, योग गुरु बाबा रामदेव जैसे लोगों के बारे में जानकारी थी. जिससे शिविरार्थियों को उनके जैसा बनने की प्रेरणा मिले. वहाँ संस्कृत भारती द्वारा उपलब्ध पुरातन जानकारियाँ भी रोचक थी. प्रदर्शनी में ही मेरी मुलाकात माननीय क्षेत्र प्रचारक श्री शिव प्रकाश जी से हुई.
प्रदर्शनी देखने के पश्चात मैं भी संघ स्थान गया. वहां मैं विकिर तक रहा और सबके साथ प्रार्थना भी की. प्रार्थना के पश्चात अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डा. दिनेश जी से मिलने का सौभाग्य मिला. वही प्रेरणा नोएडा के संस्थापक श्री आशुतोष जी से भी मिलना हुआ.
संघ स्थान से लौटकर शिविरार्थियों ने स्नान किया. फिर जिलाशः बैठक थी, जिला प्रचारक श्री नागेन्द्र जी ने शिविरार्थियों से वार्ता की और फिर वहां उपस्थित शिविरार्थियों ने शिक्षा दान, रक्तदान, नेत्र दान, देह दान, पर्यावरण रक्षा, जल रक्षा, समय दान जैसे संकल्प लिए. सभी ने संकल्प पत्र भी भरे.
बैठक के पश्चात भोजन के वितरण की जिम्मेदारी हमारे जिले की थी. भोजन वितरण दो पालियों में होना था. हमने पहले से ही जिम्मेदारियां बाँट दी थी, अतः सब कुछ ठीक प्रकार से हो गया.
भोजन के पश्चात हमारे पास एक घण्टे का समय था, मैने समय का सदुपयोग करते हुए विद्यार्थियो को प्रतिभा प्रदर्शन के लिये नगर के मध्य भाग मे स्थित पन्डाल मे बुलाया फ़िर क्या था, विद्यार्थियो मे होड मच गयी और एक एक बाद एक कवि, व्यङ्ग्कार और गायक निकल कर आये. शायद ऐसा कार्यक्रम अन्य नगरो मे भी हुआ हो. कार्यक्रम तो शायद कई घण्टे चलता लेकिन सीटी के साथ ही आदेश पाते ही सभी लोग मुख्य संघ स्थान के लिये चल पडे.
नये एवं पुराने स्वयमसेवको का अनुशासन देखते ही बनता था, मैने स्वयम् सबसे पीछे जाकर वहा मेरठ महानगर के स्वयमसेवको के साथ वहा आये विभिन्न लोगो की बैठने की व्यवस्था मे सहयोग किया.

Wednesday, January 26, 2011

एक क्रांति की राह पर उत्सव शर्मा (Utsav Sharma on the way of revolution)

पहले पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर और अब डा. राजेश तलवार पर हमला कर उत्सव शर्मा ने खुद के क्रांतिवीर होने का परिचय दे दिया है. राठौर और तलवार कौन हैं इसकी चर्चा की जरूरत नहीं, मन में पीड़ा इस बात की होती है ऊँची पहुँच वाले भ्रष्ट लोगों से मिलकर देश की न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ाते है और आम आदमी मन मसोस कर रह जाता है. उत्सव शर्मा का उपरोक्त दोनों व्यक्तियों पर हमला देश की उस पंगु व्यवस्था पर हमला है, जिसके बारे में गंभीरता से चिंतन करना अत्यंत आवश्यक हो चुका है.
उत्सव शर्मा के बारे में खोजें तो पता चलता है कि वह होनहार एवं प्रतिभाशाली युवा है, उसके माता-पिता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में ऊँचे ओहदे पर कार्यरत हैं. इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उसने एनआईडी अहमदाबाद से पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा प्रोग्राम इन एनीमेशन फिल्म डिजाइन का कोर्स भी किया है। (लिंक देंखे)
http://www.bhaskar.com/article/NAT-talwar-attacker-is-gold-medalist-from-bhu-1789800.html
इसके आलावा उसने कई एनीमिशन फिल्मो पर काम भी किया है. (विडिओ देंखे)
http://www.ndtv.com/video/player/news/video-story/127362
साफ़ है की उत्सव शर्मा एक शिक्षित एवं जिम्मेदार परिवार से है. वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं, लेकिन उसका कृत्य उसके क्रांतिकारी होने का परिचय देता है. मेरा कहने का मतलब यह नहीं की उत्सव ने जो किया वह सही है लेकिन उसे ऐसा करने की जरूरत क्यों पडी, यह विचारणीय विषय है. जब प्रजातंत्र के स्तंभों ( विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, और मीडिया) पर से आम आदमी का विश्वास उठ चुका हो तो इस पुण्य भूमि भारत में ऐसे क्रांतिवीर पैदा होना कोई अचरज की बात नहीं. यहाँ इसका भी उल्लेख करना ठीक होगा कि आजकल सुर्ख़ियों में ऐसे युवा भी होते हैं जो स्वयं के स्वार्थ के लिए अपने माता पिता या समाज से बगावत करते हैं और उत्सव जैसे भी हैं जिन्होंने समाज के लिए बगावत कर खुद का अस्तित्व मिटा दिया.
देश का बिकाऊ मीडिया ४० से ज्यादा बसंत पार कर चुके राहुल गांधी को युवाओं का नेता मानता है, तिरंगा यात्रा से चर्चा में आये हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के पुत्र एवं सांसद अनुराग ठाकुर भी युवाओं के नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं. देश की इन्हें कितनी चिंता है यह इन ख़बरों से पता चलता है कि एक अपना जन्मदिन मनाने लन्दन जाता है, तो दूसरा भाजयुमो अध्यक्ष बनने के जश्न में इतना व्यस्त होता है कि उसे पता नहीं चलता कि बगल में देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले एक वीर सैनिक की चिता जल रही है.
मैंने तो अपने मन की पीड़ा को लेख के रूप में उतार दिया, लेकिन उत्सव शर्मा अभी कारागार में है, उसका केस भी उसी न्यायपालिका एवं पुलिस व्यवस्था के पास जाएगा जिसके कारण वह क्रांतिकारी बना. अगली बार जब उत्सव टीवी पर आये तो गौर से देखिएगा क्या पता आपको उसके चेहरे में सरदार भगत सिंह, आज़ाद, विस्मिल या अशफाक उल्ला खान जैसे किसी महान क्रांतिकारी का अक्स दिख जाए.

Sunday, January 9, 2011

कम्बल वाले मसीहा

आजकल जबरदस्त सर्दी का मौसम चल रहा है, कुछ नेता जिन्हें अपनी राजनीति चमकानी होती है वो शहर के आसपास की झुग्गियों में कम्बल बाँटते हैं. उनका यह कदम बेहद सराहनीय है. वास्तव में सच भी है इस ठण्ड में अगर कम्बल मिल जाए तो क्या कहने. कुछ समाजसेवी जो वास्तव में जन कल्याण में लगे होते हैं, जब हजारों कम्बल बाँटते हैं तो आम लोगों को नहीं पता चलता, लेकिन छुटभैये नेता १-२ दर्जन कम्बल बाँटकर सुर्ख़ियों में छा जाते हैं. इसके लिए वह बाकायदा मीडिया को सूचित करते हैं कि आज हम कम्बल बाँटने जा रहें हैं, अगले दिन क्षेत्रीय समाचार पत्रों में नेताजी तस्वीर के साथ गरीबों के मसीहा बन जाते हैं.
जनसेवा में आगे बढ़ा नेताजी का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसका फायदा वही झुग्गी वाले उठा पाते हैं जो शहर के बिलकुल पास रहते हैं, शहर के पास वाले गरीब हर एक ठंडी में दसियों कम्बल और गरम कपडे झटक लेते हैं और शहर से थोड़ी दूरी पर रहने वालों को इंतज़ार होता है ऐसे समाजसेवी का, जिसका मकसद कम्बल बाँटना हो सुर्खियाँ बटोरना नहीं.
खैर, नेताजी हों या समाजसेवी, सर्दी शरू होते ही गरीबों को कम्बल बाँटने वाले लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं, क्योंकि लोग सर्दी से नहीं गरीबी से मरते हैं, अमीर देशों में ऋणात्मक तापमान होने पर भी लोग मस्त रहते हैं और हमारे देश में पारा लुढ़कते ही शामत आ जाती है.