धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, December 9, 2010

खतरे में लोकतंत्र

देश की वर्तमान परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं. विपक्ष २जी घोटाले की जांच सयुंक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार इसे लगातार अस्वीकार कर रही है, जाहिर है सरकार जेपीसी को अस्वीकार कर सच पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. जनता यह भी अच्छी तरह जानती है कि दोषियों को दंड कभी नहीं मिलेगा, लेकिन फिर भी वह दोषियों के चेहरे बेनकाब होते देखना चाहती है. लोकतंत्र में जनता की भावना की अनदेखी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को खतरे में डालने का प्रयास है.
लोकतंत्र के प्रथम स्तम्भ की चर्चा करें तो विधायिका, जिसे सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए था वह किसी और के प्रति उत्तरदायी है और उसे जनता और जनता के पैसों की चिंता बिलकुल नहीं. सरकार के प्रमुख प्रधानमंत्री जी की निष्ठा संसद और जनता के प्रति न होकर परिवार विशेष के प्रति है ऐसा सभी को पता है. उन्हें न तो प्रधानमंत्री पद के गौरव का ध्यान है न खुद के आत्मस्वाभिमान का.
लोकतंत्र के द्वितीय स्तम्भ कार्यपालिका की चर्चा करें तो वहाँ अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, जनता को विश्वास हो चुका है कि बिना पैसे दिए उसका कोई काम नहीं होगा, उदाहरण किसी भी सरकारी कार्यालय या पब्लिक प्लेस पर मिल जाता है.
देश की न्यायपालिका की चर्चा करते हुए सिर्फ यह कहना चाहूँगा कि न्यायपालिका के द्वारा दिए गए आदेशों के पालन की जिम्मेदारी कार्यपालिका की है लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनदेखी जितनी इस सरकार ने की वैसा करने की हिम्मत देश की किसी भी सरकार में नहीं थी और शायद आगे भी ऐसा करना मुश्किल है, "न भूतो न भविष्यति".
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली पत्रकारिता ही जब उपरोक्त के लिए जिम्मेदार हो तो लोकतंत्र के पास अपने हाल पर आंसू न बहाए तो क्या करे. बीते कुछ दिनों में, बड़ी बड़ी बातें कर जनता को भ्रमित करने वाले पत्रकारिता के नामी गिरामी चेहरे भी जनता के सामने बेनकाब हो गए. जनता की आवाज़ उठाने वाला मीडिया ही जनता को भ्रमित करता रहा. जमीनी राजनीति से कोसों दूर राजनेता और समाज का तथाकथित पढ़ालिखा वर्ग इलेक्ट्रोनिक मीडिया के भरोसे बैठा रहा, वही देखा जो मीडिया ने दिखाया और उसी को सच मान खुद को जागरूक समझता रहा. क्या ऐसी स्थितियों में देश में लोकतंत्र बचा रह सकता है?.
इन सबके बीच विपक्ष का एकजुट होकर सरकार से जेपीसी बनाने की मांग पर अड़े रहना, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में दखल देना और समय समय पर सुब्रमण्यम स्वामी जी जैसे, जनता की आवाज़ उठाने वाले लोग, लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत का काम भी कर रहे हैं. देश को अघोषित राजशाही की तरफ बढ़ने से रोकने वाले ऐसे लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं.

1 comment:

निर्झर'नीर said...

अवदेश जी ..लोकतंत्र केबचने की उम्मीद तो कम ही है बाकीइश्वर मालिक है ...आपका ये प्रयास सराहनीय है