धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, October 3, 2010

नोएडा की ढकी मूर्तियाँ

नोएडा से दिल्ली आते जाते दलित चेतना पार्क की ढकी मूर्तियाँ सबने देखी हैं. आते जाते इन मूर्तियों पे नज़र पड़ना और उसके बाद उसपर हुआ विवाद और खर्च ध्यान में अनायास आ जाता है. सब कुछ देखते समझते इन सबके लिए जिम्मेदार नेताओं से घिन आना भी स्वाभाविक है. उन मूर्तियों से बीते काल के महापुरुषों के गौरव से ज्यादा वर्तमान नेताओं की महत्वाकांक्षा दिखती है.
दलितों के नाम पर सत्ता हासिल कर सरकार ने उनका कितना उपकार किया है यह रोज़ाना अखबारों की सुर्ख़ियों से पता चलता है और इसे सभी जान और समझ रहे हैं. कभी समाज में शोषण का अधिकार कुछ चुनिन्दा लोगों के पास था, इस स्थिति में हुआ बदलाव भी चिन्तन पर मजबूर करता है. दलित समाज की स्थिति पर चिंतन करने से पता चलता है कि आज दलितों में ही एक शोषक वर्ग तैयार हो चुका है जो दलित चेतना के नाम पर समाज के एक बड़े तबके का शोषण करता है और बदले में उनके जेहन में समाज के अन्य तबको के बीच नफ़रत का भाव पैदा करने की कोशिश करता है. यह शोषक तबका उन्हें एक मंच प्रदान करता है जिसमें आम व्यक्ति के मन की पीड़ा भड़ास के रूप में विभिन्न जातियों पर निकलती है, इसके बाद वह व्यक्ति खुद को संतुष्ट महसूस करने लगता है जिससे दलितों के हित का मुद्दा गौड़ हो जाता है और नफ़रत बलवती.

वास्तव में दलित चेतना का जो उपयोग समाज में समरसता लाने के लिए होना चाहिए था वह नफ़रत फ़ैलाने का कार्य कर रहा है और उसके नकारात्मक प्रभाव समाज में दिखते रहते हैं. दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने अम्बेडकर का नाम ठीक वैसे ही अपनाया है जैसे गाँधी का नाम काँग्रेस ने और श्रीराम का नाम दक्षिणपंथी संगठनों ने. वास्तव में इन महापुरुषों के आदर्शो से इन दलों का कोई मेल नहीं.

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली से आते हुए इन मूर्तियों को देख कर मेरी बेटी बोली पापा जी भूत, मैंने कहा बेटा ये भूत नहीं, भूत कुछ नहीं होता. मेरी बेटी ने तपाक से दूसरा प्रश्न दागा. फिर ये कौन है पापा? तब से उसके प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ रहा हूँ जो शायद ढकी मूर्तियों का आवरण हटने पर मिले.......

2 comments:

----- श्रेष्ठ भारत ----- said...

3000 करोड़ खर्च हो चुके है फिर भी वो नरपिशाचिनी कहती है की पैसा नहीं है !
देश का दुर्भाग्य है ये की यू पी की देव भूमि की मुख्यमंत्री है ये सूर्पनखा !

निर्झर'नीर said...

पापा जी भूत,
sahi kaha hai bacche ne