धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, October 2, 2010

अयोध्या करती है आह्वान

आखिर एक बेहद अहम मुकदमे का फैसला आ गया, भारतवासियो ने फैसले को स्वीकार भी किया. मुकदमे से जुडे विभिन्न पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में जाने का मन भी बना चुके है जिसमे कोइ असामान्य बात नही और यह उनका अधिकार है.

फैसले के पूर्व देश के विभिन्न दलो, बुद्धिजीवियों और मीडिया द्वारा आम जनता से अपील की जा रही थी कि वो माननीय उच्चन्यायालय के फैसले का सम्मान करे, किन्तु अफसोस कि फैसला आने के बाद देश की जनता ने तो जिम्मेदारी का परिचय दिया लेकिन शान्ति की अपील करने वाले नेता, देश की गैरजिम्मेदार इलेक्ट्रोनिक मीडिया और कुछ बुद्धिजीवियों ने फैसले को स्वीकार नही किया. ऐसा दोगलापन सिर्फ भारतवर्ष मे ही सम्भव है और कहीं नहीं. दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाने वाले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने एक विवादस्पद बयान के कारण दुनिया को सन्देश देने में लगें हैं कि वो बाइबिल के आदर्शो का पालन करने वाले सच्चे ईसाई हैं कुछ और नहीं. वास्तव में आम जनता इस विवाद को यहीं ख़त्म कर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहती है लेकिन कुछ लोग इसे पचा नहीं पा रहें है और वे जनता की अभूतपूर्व एकता को खंडित करना चाहते हैं.

देश की जनता की नज़र में यह फैसला ऐतिहासिक है जिसने जन जन के आराध्य प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया. अभी सबको याद है कि कुछ वर्षों पूर्व रामसेतु मुद्दे पर देश की केंद्र सरकार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में तो करूणानिधि जैसे नेताओं ने जनता के बीच में इतिहास पुरुष श्रीराम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था. तीनो न्यायाधीशों का यह निर्णय ऐसे राजनेताओं के मुख पर झन्नाटेदार तमाचा है जिसकी गूंज इनको मरते दम तक सुनाई देगी.

इतिहास की बात का कुतर्क देने वाले लोग भारत के कुछ सौ वर्षो के इतिहास को इतिहास मान रहे हैं. उन्हें पुरातत्व विभाग की खुदाई में निकले हिन्दू मंदिर के अवशेष भी नहीं दिखाई दे रहे जो चीख चीख कर देश की तत्काल्लीन जनता पर हुए अत्याचार की गवाही दे रहे हैं. पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट यह साबित करती है कि सैकड़ो वर्षों से हिन्दू जिस मंदिर के लिए लड़ रहे थे वह अकारण नहीं था और उसका दर्द पीढी दर पीढी आगे बढ़ता जा रहा था जिसे हिन्दू मानस ने स्वेक्षा से कभी स्वीकार नहीं किया एवं अपना अनवरत संघर्ष जारी रखा. लेकिन इस फैसले के बल पर अपनी रोटी सेकने की तैयारी में बैठे लोग तिलमिला गए हैं उनके बयान, लेख और चर्चा आदि उनकी हताशा का परिणाम हैं जिसका आम जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा और देश की जिम्मेदार जनता ने सदभावना का परिचय देते हुए एकता की मिसाल पेश की. विद्वान् न्यायाधीशों के दूरदर्शी निर्णय ने तमाम राजनीतिक दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है और इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं.

कुछ ऐसी प्रतिक्रया भी आती रहती है कि देश का युवा मंदिर-मस्जिद के झमेले में नहीं पढ़ना चाहता और वह तरक्की चाहता है, अव्वल तो ऐसे लोग युवाओं से कोसों दूर है और उन्हें युवाओं की भावना का पता नहीं, दूसरे देश का युवा ही नहीं देश का आम व्यक्ति भी राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण से आक्रोशित हो राजनीति और राजनेताओं से भी घृणा करता है लेकिन क्या ऐसे नेता नैतिक बल का परिचय देते हुए राजनीति और भ्रष्टाचार को अलविदा कहेंगे. निश्चय ही यह प्रश्न देश की संसद में भी अनुत्तरित रहेगा इसमे कोई संशय नहीं.

कुछ उत्साही हिन्दुओं की प्रतिक्रया ऐसी भी रही कि जन्मस्थान के तीन हिस्से क्यों? लेकिन वो यह भूल गए कि राम जिस हिन्दू संस्कृति के आदर्श हैं वो सबका सम्मान करती है, सबको प्रसन्न देखना चाहती है, अतः उन्हें इससे बाज़ आना चाहिए और अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को आदर्श मानकर रामराज्य की स्थापना कि दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए जिससे सब सुखी हों.

देश के समस्त नागरिकों से विनती है कि वो आस्था और विश्वास का सम्मान करते हुए राम की नगरी में एक भव्य मंदिर के निर्माण की दिशा में सहयोग करें जिससे इसका आध्यात्मिक गौरव और बढ़ सके एवं राम के आदर्शों के अनुरूप इस विश्वनगरी में सौहार्द बना रहे. राम किसी धर्म विशेष के नहीं पूरे राष्ट्र के नायक हैं तदनुरूप अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर आपसी सौहार्द का प्रतीक होना चाहिए विजय-पराजय का नहीं.