धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, October 10, 2010

संघ विचारधारा और राहुल गांधी

अभी कुछ दिनों पूर्व काँग्रेस के युवराज राहुल बाबा ने वैचारिक रूप से संघ और सिमी को एक समान बताया था. सिमी कि तुलना संघ से करने का कोई औचित्य नहीं बनता. सिमी से प्रतिबन्ध हटाने या संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की हिम्मत पिछले छः वर्षों के शासन में युवराज की पार्टी अभी तक नहीं कर सकी. समान विचारधारा वाले संगठनो से ऐसा भेदभाव क्यों?

बडबोले राहुल बाबा का थिंक टैंक उन्हें जो कहता है वो उसे वह बड़े आत्मविश्वास से बोलते हैं, कभी भ्रष्टाचार, कभी वंशवाद, कभी सीबीआई तो कभी राजनीति में युवाओं के प्रवेश पर लेकिन वो समाधान का हिस्सा कभी नहीं बनते. अभी तक देश के लिए उनका योगदान क्या है सिर्फ यह कि वह देश की कई समस्यायों के जनक नेहरु के वंशज हैं.

डा. हेडगेवार जी ने उन कारणों और कारको पर गहन चिंतन किया था जिन्होंने देश को बार बार गुलाम बनाया और उसके बाद संघ की स्थापना एक सशक्त संगठन के रूप में की थी. आज भी उनके विचार, उनके आदर्श और उनके द्वारा बताये गए रास्ते पर चलने वाले स्वयंसेवकों की संख्या उनके महत्त्व का प्रमाण है. राहुल की पार्टी की बात करे तो यही लगता है की गांधी जी का नाम तो काँग्रेस ने अपना लिया लेकिन उनकी विचारधारा से दूरी बना ली.

संघ को अपने सामाजिक कार्यों, देशभक्ति आदि का सबूत पेश करने की जरूरत नहीं. हिन्दू संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, मानस आदि में विभिन्न मनीषीयों द्वारा समाज हित में कही बातें संघ के कार्यों का आधार हैं. संघ पर राहुल की टिप्पणी वस्तुतः इन ग्रंथो पर सीधा प्रहार है क्योंकि संघ की विचारधारा का आधार यही ग्रन्थ हैं. नगरों, कस्बों एवं गावों के खुले स्थानों में लगने वाली दैनिक शाखाएं संघ का प्राण है और ऐसी किसी भी शाखा में जाकर संघ को जाना जा सकता है. संघ पर टिप्पणी करने से पहले राहुल ऐसी किसी शाखा में गए होंगे क्या?

संघ पर राहुल की टिप्पणी यह भी सिद्ध करती है की भारत के बारे में उनका व उनके सलाहकारों का ज्ञान शून्य है जो राहुल के खुद के भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत भी है. यह भी हो सकता है संघ पर राहुल के द्वारा की गयी टिप्पणी अयोध्या पर आये फैसले से उपजी  हताशा हो ताकि काँग्रेस का बचा खुचा मुस्लिम वोट बैंक इस टिप्पणी पर खुश हो जाये, पहले भी राहुल इस तरह का बयान दे चुके हैं कि अगर गांधी परिवार का कोई व्यक्ति सत्ता में होता तो ६ दिसंबर की घटना नहीं घटित होती. लेकिन इसबार मुस्लिम धर्मगुरुओं और नेताओं ने उनकी आशा पर पानी फेरने का ही काम किया है जिससे उनकी राजनीतिक लाभ लेने की इच्छा पुरी नहीं हो सकी.

काँग्रेस के युवराज को मीडिया ने मुद्दे चुनने की आज़ादी दे रही है. क्या आपने कभी राहुल को किसी कश्मीरी शरणार्थी कैम्प में देखा, कभी राहुल उनका दुःख दर्द सुनने गए, राहुल गुजरात में हुए दंगो की बात करते हैं लेकिन दिल्ली में १९८४ में हुए सिख दंगो की बात नहीं करते. राष्ट्रमंडल खेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सभी बोले लेकिन राहुल क्या बोले कुछ नहीं पता चला. पूर्वोत्तर की समस्या भी राहुल को कभी आकर्षित नहीं कर सकी. वो नक्सलवादियों व अलगाववादियों से काँग्रेस का मंच साझा कर सकते हैं लेकिन हिंदुत्व की विचारधारा वाले व्यक्ति का काँग्रेस में स्थान नहीं, क्या यह लोकतंत्र का काला अध्याय नहीं कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी में राजशाही चल रही है.

राहुल कहते हैं की राजनीति में युवाओं का स्वागत है लेकिन युवाओं के नाम पर राहुल काँग्रेसी चाटुकार नेताओं के बेटे-बेटियों और गुंडे मवालियों को जोड़ रहे हैं प्रतिभाशाली युवाओं को वह पहले ही बता चुके हैं की राजनीति में प्रवेश के लिए मजबूत आधार जरूरी है जो काँग्रेस में सिर्फ वंशवाद से आती है बाहर से नहीं.

संघ की सशक्त विचारधारा सत्तालोलुपो को हमेशा डराती रही है और राहुल भी उसका अपवाद नहीं बन सके जैसे जैसे वह सत्ता के करीब आते जा रहें है उनका डर बढ़ता जा रहा है, संघ के सामाजिक कार्य राहुल के लिए चिंता का विषय हैं, पहले यह विभाग चाटुकार दिग्यविजय सिंह के पास था लेकिन लगता है राहुल ने कमान अपने हाथ में ले ली है. इन सबके विरोध के वावजूद संघ अपने उद्देश्यों की तरफ लगातार बढ़ता जा रहा है और उसकी प्रेरणा से भारतीय राजनीति में सकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं और जनता ने खुद आगे आकर आन्दोलनों का नेतृत्व किया है, जम्मू में हुआ आन्दोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है.

जब राहुल ने संघ की विचारधारा पर सवाल किया तो क्या मीडिया का यह दायित्व नहीं बनता था की वह संघ की किसी शाखा में जाकर दूध का दूध और पानी का पानी करे, संघ, उसके आनुषांगिक संगठनो या उसकी विचारधारा की प्रेरणा से किये जा रहे अच्छे-बुरे कार्यो को कितने चैनलों ने दिखाया, राहुल की छींक को भी हेड लाइन बनाने वाला मीडिया इस विषय पर प्रतिक्रियाओं से आगे क्यों नहीं बढ़ा, यह विचारणीय बात है.

देश और समाज के लिए जीने वाले स्वयंसेवकों के रास्ते में कई बाधाएं आयीं, आती हैं और आयेंगी लेकिन ऐसी बाधाओं का सीना चीरकर संघ देश को परम वैभव पर ले जाएगा इसमे कोई शक नहीं.......

Sunday, October 3, 2010

नोएडा की ढकी मूर्तियाँ

नोएडा से दिल्ली आते जाते दलित चेतना पार्क की ढकी मूर्तियाँ सबने देखी हैं. आते जाते इन मूर्तियों पे नज़र पड़ना और उसके बाद उसपर हुआ विवाद और खर्च ध्यान में अनायास आ जाता है. सब कुछ देखते समझते इन सबके लिए जिम्मेदार नेताओं से घिन आना भी स्वाभाविक है. उन मूर्तियों से बीते काल के महापुरुषों के गौरव से ज्यादा वर्तमान नेताओं की महत्वाकांक्षा दिखती है.
दलितों के नाम पर सत्ता हासिल कर सरकार ने उनका कितना उपकार किया है यह रोज़ाना अखबारों की सुर्ख़ियों से पता चलता है और इसे सभी जान और समझ रहे हैं. कभी समाज में शोषण का अधिकार कुछ चुनिन्दा लोगों के पास था, इस स्थिति में हुआ बदलाव भी चिन्तन पर मजबूर करता है. दलित समाज की स्थिति पर चिंतन करने से पता चलता है कि आज दलितों में ही एक शोषक वर्ग तैयार हो चुका है जो दलित चेतना के नाम पर समाज के एक बड़े तबके का शोषण करता है और बदले में उनके जेहन में समाज के अन्य तबको के बीच नफ़रत का भाव पैदा करने की कोशिश करता है. यह शोषक तबका उन्हें एक मंच प्रदान करता है जिसमें आम व्यक्ति के मन की पीड़ा भड़ास के रूप में विभिन्न जातियों पर निकलती है, इसके बाद वह व्यक्ति खुद को संतुष्ट महसूस करने लगता है जिससे दलितों के हित का मुद्दा गौड़ हो जाता है और नफ़रत बलवती.

वास्तव में दलित चेतना का जो उपयोग समाज में समरसता लाने के लिए होना चाहिए था वह नफ़रत फ़ैलाने का कार्य कर रहा है और उसके नकारात्मक प्रभाव समाज में दिखते रहते हैं. दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने अम्बेडकर का नाम ठीक वैसे ही अपनाया है जैसे गाँधी का नाम काँग्रेस ने और श्रीराम का नाम दक्षिणपंथी संगठनों ने. वास्तव में इन महापुरुषों के आदर्शो से इन दलों का कोई मेल नहीं.

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली से आते हुए इन मूर्तियों को देख कर मेरी बेटी बोली पापा जी भूत, मैंने कहा बेटा ये भूत नहीं, भूत कुछ नहीं होता. मेरी बेटी ने तपाक से दूसरा प्रश्न दागा. फिर ये कौन है पापा? तब से उसके प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ रहा हूँ जो शायद ढकी मूर्तियों का आवरण हटने पर मिले.......

Saturday, October 2, 2010

अयोध्या करती है आह्वान

आखिर एक बेहद अहम मुकदमे का फैसला आ गया, भारतवासियो ने फैसले को स्वीकार भी किया. मुकदमे से जुडे विभिन्न पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में जाने का मन भी बना चुके है जिसमे कोइ असामान्य बात नही और यह उनका अधिकार है.

फैसले के पूर्व देश के विभिन्न दलो, बुद्धिजीवियों और मीडिया द्वारा आम जनता से अपील की जा रही थी कि वो माननीय उच्चन्यायालय के फैसले का सम्मान करे, किन्तु अफसोस कि फैसला आने के बाद देश की जनता ने तो जिम्मेदारी का परिचय दिया लेकिन शान्ति की अपील करने वाले नेता, देश की गैरजिम्मेदार इलेक्ट्रोनिक मीडिया और कुछ बुद्धिजीवियों ने फैसले को स्वीकार नही किया. ऐसा दोगलापन सिर्फ भारतवर्ष मे ही सम्भव है और कहीं नहीं. दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाने वाले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने एक विवादस्पद बयान के कारण दुनिया को सन्देश देने में लगें हैं कि वो बाइबिल के आदर्शो का पालन करने वाले सच्चे ईसाई हैं कुछ और नहीं. वास्तव में आम जनता इस विवाद को यहीं ख़त्म कर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहती है लेकिन कुछ लोग इसे पचा नहीं पा रहें है और वे जनता की अभूतपूर्व एकता को खंडित करना चाहते हैं.

देश की जनता की नज़र में यह फैसला ऐतिहासिक है जिसने जन जन के आराध्य प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया. अभी सबको याद है कि कुछ वर्षों पूर्व रामसेतु मुद्दे पर देश की केंद्र सरकार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में तो करूणानिधि जैसे नेताओं ने जनता के बीच में इतिहास पुरुष श्रीराम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था. तीनो न्यायाधीशों का यह निर्णय ऐसे राजनेताओं के मुख पर झन्नाटेदार तमाचा है जिसकी गूंज इनको मरते दम तक सुनाई देगी.

इतिहास की बात का कुतर्क देने वाले लोग भारत के कुछ सौ वर्षो के इतिहास को इतिहास मान रहे हैं. उन्हें पुरातत्व विभाग की खुदाई में निकले हिन्दू मंदिर के अवशेष भी नहीं दिखाई दे रहे जो चीख चीख कर देश की तत्काल्लीन जनता पर हुए अत्याचार की गवाही दे रहे हैं. पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट यह साबित करती है कि सैकड़ो वर्षों से हिन्दू जिस मंदिर के लिए लड़ रहे थे वह अकारण नहीं था और उसका दर्द पीढी दर पीढी आगे बढ़ता जा रहा था जिसे हिन्दू मानस ने स्वेक्षा से कभी स्वीकार नहीं किया एवं अपना अनवरत संघर्ष जारी रखा. लेकिन इस फैसले के बल पर अपनी रोटी सेकने की तैयारी में बैठे लोग तिलमिला गए हैं उनके बयान, लेख और चर्चा आदि उनकी हताशा का परिणाम हैं जिसका आम जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा और देश की जिम्मेदार जनता ने सदभावना का परिचय देते हुए एकता की मिसाल पेश की. विद्वान् न्यायाधीशों के दूरदर्शी निर्णय ने तमाम राजनीतिक दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है और इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं.

कुछ ऐसी प्रतिक्रया भी आती रहती है कि देश का युवा मंदिर-मस्जिद के झमेले में नहीं पढ़ना चाहता और वह तरक्की चाहता है, अव्वल तो ऐसे लोग युवाओं से कोसों दूर है और उन्हें युवाओं की भावना का पता नहीं, दूसरे देश का युवा ही नहीं देश का आम व्यक्ति भी राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण से आक्रोशित हो राजनीति और राजनेताओं से भी घृणा करता है लेकिन क्या ऐसे नेता नैतिक बल का परिचय देते हुए राजनीति और भ्रष्टाचार को अलविदा कहेंगे. निश्चय ही यह प्रश्न देश की संसद में भी अनुत्तरित रहेगा इसमे कोई संशय नहीं.

कुछ उत्साही हिन्दुओं की प्रतिक्रया ऐसी भी रही कि जन्मस्थान के तीन हिस्से क्यों? लेकिन वो यह भूल गए कि राम जिस हिन्दू संस्कृति के आदर्श हैं वो सबका सम्मान करती है, सबको प्रसन्न देखना चाहती है, अतः उन्हें इससे बाज़ आना चाहिए और अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को आदर्श मानकर रामराज्य की स्थापना कि दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए जिससे सब सुखी हों.

देश के समस्त नागरिकों से विनती है कि वो आस्था और विश्वास का सम्मान करते हुए राम की नगरी में एक भव्य मंदिर के निर्माण की दिशा में सहयोग करें जिससे इसका आध्यात्मिक गौरव और बढ़ सके एवं राम के आदर्शों के अनुरूप इस विश्वनगरी में सौहार्द बना रहे. राम किसी धर्म विशेष के नहीं पूरे राष्ट्र के नायक हैं तदनुरूप अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर आपसी सौहार्द का प्रतीक होना चाहिए विजय-पराजय का नहीं.