धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, September 25, 2010

मंत्रियों की अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार का दंश

अभी कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री जी ने अपने मंत्रिमंडल को नेहरु और इंदिरा से ज्यादा एक जुट बताया था, लेकिन क्या उनके दावे हवाई नहीं लगते? यह कहना अतिशयोक्ति ना होगी कि केंद्र सरकार के मंत्रियों में भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की होड़ लगी हुई है. सरकार के बड़े से बड़े मंत्रियों के दामन दागदार हो चुके हैं और ये मंत्री देश की प्रत्येक समस्या के सामने बेवश प्रतीत होते हैं. प्रायः सभी महत्वपूर्ण मंत्री अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से ना निभाते हुए अपनी अकर्मण्यता का दोष कभी प्रकृति, कभी संगठन, कभी सहयोगी मंत्रियों तो कभी जनता पर डाल कर बच निकलने का मार्ग ढूंढते रहते हैं.

अपने आप को बंगाल की जनता का प्रतिनिधि मानने वाली ममता बनर्जी और किसानो के मसीहा शरद पवार जैसों को मंत्री पद चाहिए और वो भी महत्वपूर्ण विभागों का, जबकि ये मंत्री मंत्रालय से उलट अन्य कार्यों में लगे हुए हैं. महगाई आसमान पर है तो देश में रेल दुर्घटनाएं आम हो चुकी हैं और निर्दोष जनता इनके कुकर्मो का फल भुगत रही है.

चिदंबरम के गृह मंत्रालय की कारस्तानी देखिये, एक विदेशी पत्रकार द्वारा खेलगांव में विस्फोटक लेकर पहुचने की घटना को हवा में उड़ाते हुए कहते हैं कि यह घटना तब की है जब खेलगांव में सुरक्षा इंतजाम पुख्ता नहीं थे, इसका मतलब ये हुआ कि दिल्ली में कोई कहीं भी विस्फोटक ले कर जा सकता है वे तो सिर्फ खेलगांव के जिम्मेदार हैं. घटना पर शर्मसार होने के बजाय गृहमंत्रालय लीपापोती में लगा हुआ है. कश्मीर और नक्सल समस्या की तो बात करना ही बेमानी है जहाँ देश के वीर सपूतों का मनोबल गिराने वाली बातें प्रायः होती रहती हैं और दिग्विजय सिंह जैसे अविस्वश्नीय लोग उसका समर्थन करते हैं.

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे ए राजा हों, देश की इज्जत को दांव पर लगाने वाले खेल मंत्री गिल हो या शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी, इन्हें अपना स्थान केबिनेट में सुरक्षित दीखता है. जो राष्ट्रमंडल खेल देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए लाये गए थे वही देश की बदनामी का सबब बन गए हैं. ऊपर से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बयान आग में घी डालने का कार्य करते है जब वो कहती हैं कि सब कुछ सामान्य है.

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का उनकी सरकार के अन्य मंत्रियों से तालमेल नहीं बैठता दीख रहा है. पर्यावरण के नाम पर कई विकास योजनायें लटकाई जा रहीं है लेकिन पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण खूब फलफूल रहें हैं. सरकार के मंत्रियों की कुछ ना कुछ कहानी जरूर है लेकिन निश्चित ही वह कहानी देश हित में नहीं दिख रही है.

सोनिया और राहुल सरकार के अंग नहीं हैं लेकिन परदे के पीछे का खेल उन्ही का है. उन्हें बोलने के लिए मुद्दे चुनने की आज़ादी है, वह कभी राष्ट्र की समस्याओं के बारे में बात नहीं करते, वे भोपाल गैस त्रासदी, महगाई, नक्सल समस्या आदि विषयों पर बात नहीं करते, मंत्री किस कदर भ्रष्ट हैं उन बेचारों को नहीं पता. राष्ट्रमंडल खेल के बारे में कुछ नहीं बोलते, या ये कहें कि बिका हुआ मीडिया उनसे सवाल पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता. वे बेदाग हैं. किसी भी कांग्रेसी से पूछिये उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य राहुल को प्रधान मंत्री बनाना है और उसके लिए वो कुछ भी कर सकता है. जैसे देश राहुल के बाद आता है.

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा सरकार के लिए गंभीर चुनौती होगा, लेकिन प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकारने वाली सरकार अपने पाप धुलने के लिए राम की शरण में जाने की पूरी तैयारी कर ली है. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि सरकार के पाप धुलते हैं या नहीं.

2 comments:

निर्झर'नीर said...

अवधेश जी
बहुत सार्थक और हकीक़त का आइना है आपका ये लेख

इन लोगो की सबसे पहली सज़ा ये होनी चाहिए की इन सबकी सारी चल अचल संपत्ति कुर्क कर ली जाये ...फिर इनपर inquiry बिठाई जाये .

----- श्रेष्ठ भारत ----- said...

कॉंग्रेस के मंत्रिमंदल मे एक ही मर्द का बच्चा है जो जयराम रमेश है, भगवान करे उनकी बुद्धि सही रास्ते पर आए और गद्दार कॉंग्रेस को छोड़ हिन्दू विचारधारा मे प्रवेश करे, तब वे और चमकेंगे !