धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Tuesday, September 14, 2010

मातृभाषा से दूर होना असंभव

हिंदी बोलने, लिखने या समझने वाली अधिकांश जनता शायद जानती भी ना हो कि हिंदी दिवस भी कोई चीज़ है. भारतीय अपना स्वाभिमान भूल, गुलामी के प्रतीक को गले लगाने के लिए आतुर दिखते हैं. हिंदी के दम पर करोड़ों के वारे न्यारे करने वाले फ़िल्मी सितारे हों या लच्छेदार भाषण से जनता को लुभाने वाले नेता, परदे से उतरते ही इनकी जुबान अंग्रेजी हो जाती है. बहुत सारे लोग तर्क देते हैं कि अंग्रेजी रोज़गार की भाषा है, लेकिन वही लोग इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते कि अंग्रेजी को रोज़गार की भाषा बनाया किसने? हिंदी के बलबूते जीवन में सफल व्यक्ति किस मजबूरी के नाते अंग्रेजी के अग्रदूत बने हुए हैं?. और तो और हिंदी के अध्यापक का रोज़गार आदि के लिए अंग्रेजी से लेश मात्र सम्बन्ध ना होने पर भी उनके जीवन में अंग्रेजियत का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में जाना हुआ, मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी बड़े भाई साहब का मंचन था, लगभग सारा कार्यक्रम हिंदी में था, आयोजक और मंच पर आने वाले लोग भी मिश्रित हिंदी "हिंगलिश" बोल रहे थे. मेरे पास भी कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र आया था, खोल कर देखा तो पत्र की भाषा अंग्रेज़ी थी. खैर, मुझे कोई विस्मय नहीं हुआ क्योंकि आजकल विशुद्ध भारतीय संस्कारों के कार्यक्रमों के निमंत्रणपत्र अंग्रेजी में ही छपते हैं. कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए लगाये गए विभिन्न प्रतीक और संकेत भी अंग्रेजी में थे और तो और मंच पर भी कहीं हिंदी का नाम निशान नहीं था. मेरे साथ कार्यक्रम में गए मित्र ने पूछा कि जब सबकुछ अंग्रेजी में है तो संचालन और मंचन हिंदी में क्यों?

कारण स्पष्ट है भारतीय जनमानस दिखावे के लिए तो अंग्रेजी को अपना चुका है लेकिन दिखावे की दुनिया और वास्तविक दुनिया में बड़ा फर्क होता है क्योंकि भाव तो सिर्फ मातृभाषा में ही आ सकते हैं.

एक बार अकबर के दरबार में एक व्यक्ति आया जिसे कई भाषाओँ में समान रूप से महारत हासिल थी. उसने दावा किया कि कोई भी व्यक्ति उसकी मातृभाषा नहीं बता सकता, बादशाह के दरबार में बीरबल भी थे, उन्होंने व्यक्ति से कहा कि मैं आपकी मातृभाषा जानता हूँ और कल आपको बता दूंगा. अगले दिन बड़े सवेरे बीरबल व्यक्ति के पास पहुंचे, उसे सोता देख बीरबल ने उसके ऊपर एक बाल्टी पानी डाल दी. व्यक्ति अपनी मातृभाषा में बडबडाता हुआ उठा और सामने बीरबल को देख उसे बोध हुआ कि बीरबल मेरी मातृभाषा जान चुके हैं.

ऐसे ही हमारा भारतीय समाज अंग्रेजी को चाहे जितना अपना ले उसके लिए मातृभाषा से दूर होना असंभव प्रतीत होता है. देर सबेर उसे जरूर बोध होगा कि वह अपने आप को बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं छल सकता. बेहतर है कि वास्तविकता स्वीकार कर अपने जीवन से दिखावापन निकाल कर आने वाली पीढी को स्वाभिमानी बनाने की पहल शुरू करे.

2 comments:

sarvesh said...

Awadhesh ji jab tak..hamare aap jaise log rahenge..apni matribhasha din dooni raat chauguni unnati karegi......

nitin tyagi said...

बिना स्वाभिमान के कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता, तो हम दूसरों की भाषा के साथ कहाँ से स्वाभिमान लायेग??????????????????????????????????