धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, August 28, 2010

आतंक का कोई धर्म नहीं होता, फिर भगवा आतंक कैसे?

देश में हिंदुत्व विरोधी और तुष्टिकरण की राजनीति किस कदर हावी है, इसका उदाहरण नित्य ही देखने को मिलता रहता है. सरकार में कैसे लोग बैठे हैं इसका अंदाजा भी उनके द्वारा दिए गए बयानों से पता चलता है. वोटों की राजनीति के फेर में पड़े नेताओं का चरित्र कैसा है यह देशवासियों को बताने की जरूरत नहीं है.

हमारे गृहमंत्री चिदंबरम जी ने भगवा आतंकवाद से पुलिस प्रशासन को सावधान रहने की नसीहत दी है, उस पर समाज की कड़ी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है. जब बड़े गर्व से चिदंबरम भगवा को आतंक का प्रतीक बता रहे थे तब उन्होंने यह भी सोचने की आवश्यकता नहीं समझी की जिस देश के गृहमंत्री की हैसियत से वह भाषण दे रहें हैं, उस देश के ध्वज में भगवा रंग का स्थान ऊपर है. उनके इस गैर जिम्मेदाराना बयान का क्या अर्थ है? हमारे राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग को त्याग का प्रतीक बताया गया है, क्या अब हमें इसे आतंक के प्रतीक के रूप में स्वीकार करना होगा?.

चिंतन का विषय यह है वास्तव में पूरी दुनिया में कट्टरवाद और आतंक का पर्याय बन चुकी एक खास कौम को आतंकवाद से जोड़ने में इन्ही राजनेताओं की हिम्मत जवाब दे जाती है और सार्वजानिक रूप से इसे स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता. लेकिन सदियों से चली आ रही भगवा संस्कृति को बदनाम करने के लिए यही राजनेता मिलजुल कर प्रयास करते दिखते हैं. वास्तव में ये राजनेता किसी को प्रसन्न करने के लिए ऐसे अनावश्यक और गैर जिम्मेदाराना बयान देते रहते है. विश्लेषण करें तो चिदंबरम जी का यह बयान ऐसे ही नहीं आया है, इसकी पृष्टभूमि में जाएँ तो पता चलता है कि एक बार काँग्रेस आलाकमान के खासमखास दिग्यविजय सिंह जी ने आजमगढ़ की तीर्थयात्रा की थी उसके बाद वो चिदंबरम जी से मिले थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक कार्यों में बढ़ते योगदान और भारतीय प्रशासनिक सेवा में हिंदुत्व समर्थक लोगों की सफलता पर चिंता प्रकट की थी. मतलब साफ़ है चिदंबरम को स्पष्ट सन्देश दिया गया था और चिदंबरम का अब आया बयान उसी सन्देश एक बानगी भर है. लिंक देखें.

http://timesofindia.indiatimes.com/india/After-Naxal-spat-Diggy-meets-PC-over-RSS-in-social-sector/articleshow/5904099.cms
http://deshivicharak.blogspot.com/2010/05/blog-post_936.html

हमारे योग्य प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यको का है. भले ही यह अल्पसंख्यक देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अलगाववादी ही क्यों ना हो. और प्रतिक्षण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त क्यों ना हो. इस सबसे पता चलता है कि सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग किसी खास रणनीति के तहत ऐसा कर रहें हैं और उनपर ऐसा दबाव कौन डाल रहा है यह भी ध्यान देने योग्य बात है.

खैर, हमारी भगवा संस्कृति की यही विशेषता है कि जब जब इस पर अत्याचार हुए यह और पुष्ट होकर उभरी है, सदियों से अनेको अनेक ऋषियों एवं मनीषियों ने इस संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. आज भी अनेकोनेक देवी देवताओं को पूजते हुए भी हम सभी एक हैं. हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार शिवभक्त को विष्णुरुपी श्रीराम की भक्ति के बिना शिवकृपा नहीं मिल सकती तो स्वयं श्रीराम शिव की उपासना करते हैं. जब गणेश स्वयं शिव के पुत्र हैं तो शिवभक्त, रामभक्त या गणपति की भक्ति करने वाले में कैसे वैर होगा. देवी की पूजा करने वाले भी कहीं ना कहीं से शिव, विष्णु, गणेश आदि से जुड़े हुए हैं.

मानस की निम्नलिखित पंक्ति का अवलोकन करने पर पता चलता है कि मुग़ल काल में हिन्दू समाज को एकत्रित करने के लिए गोस्वामी जी ने विष्णु रूपी राम भक्तों और शिव भक्तों को कैसा सन्देश देने कि कोशिश की है. दो विभिन्न सम्प्रदायों में ऐसा सामंजस्य सिर्फ भगवा संस्कृति में ही मिल सकता है अन्य कहीं नहीं.

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥
 
यही कारण है कि हिन्दू समाज में कभी पूजा पद्यतियों को लेकर विरोधाभास नहीं देखने को मिलता. सभी स्वतंत्र हैं और किसी एक देव के भक्ति कर वे सबकी कृपा प्राप्त कर लेते हैं. आदि शंकराचार्य ने गौतम बुद्ध को बुद्धावतार बता उन्हें भी भगवा संस्कृति का अंश बताया था. ऐसी जोड़ने वाली संस्कृति को उसी के देश में आतंकवादी संस्कृति कह कर उसका अपमान किया जा रहा है और उसको मानने वाले मनुष्य सो रहें हैं. क्या यह पतन की निशानी नहीं है?. 

आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा, इस देश के मनुष्यों का स्वाभिमान कब जागेगा. वस्तुतः अपने में मस्त हिन्दू समाज आने वाली पीढी के परवाह किये बिना लक्ष्य विहीन जीवन जी रहा है. इतने सालों गुलाम रहने के बाद हमारी मानसिकता गुलाम हो चुकी है और हम बिना प्रतिरोध के हर एक अत्याचार को सह लेते हैं.

आज जरूरत है समाज के लोगों को इस अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने की, व्यक्ति व्यक्ति का स्वाभिमान जगाने की आवश्यकता है, जब तक इस पुण्यभूमि के प्रत्येक व्यक्ति का स्वाभिमान नहीं जागेगा, तब तक कभी बाबर, कभी औरंगजेब, कभी नेहरु, कभी दिग्यविजय तो कभी चिदंबरम जैसे व्यक्ति इस प्राचीन "वसुधैव कुटुम्बकम" वाली संस्कृति का अपमान करते रहेंगे.

ऐसा तभी संभव है जब हम अपने इतिहास और भूगोल से मुँह ना मोड़ें, आज विद्यालयों में भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास को भुला सिर्फ गुलामी के वर्षों की शिक्षा दी जाती है. निश्चित ही यह शिक्षा बालपन में ही स्वाभिमान को मारने वाली है. आप खुद सोचिये, क्या हमारी शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति का निर्माण होना चाहिए जो निजी स्वार्थ के लिए देश और समाज के हितों की अनदेखी करते हैं?.

2 comments:

----- श्रेष्ठ भारत ----- said...

आप की लिखावट सच में प्रशंसनिय, स्वागत योग्य है, काफी शानदार है, लेकिन जरा लोगो को यह बताने में लगे रहे की कोंग्रेस में जिन्हें हम चाचा नेहरु कहते आ रहे है वो वास्तव में चाचा ही थे ! उनके दादा का क्या नाम था पता है ... गयासुद्दीन गाजी ...चौक गए न http://www.scribd.com/doc/17703823/Nehrus-Grandfather-Name-Was-Giyasuddin-Gazia-mughal-kafir-kiiler
http://jawaharlalnehru.rediffblogs.com/
http://www.topix.com/forum/world/pakistan/THV0SISB57MB10L27
http://www.krishnajnehru.blogspot.com/
http://agrasen.blogspot.com/2010/02/nehrus-grandfathers-name-was-giyasuddin.html
http://www.sikhsangat.com/index.php?/topic/44654-indira-gandhis-muslim-roots/
http://hinduonline.blogspot.com/2010/02/vivekajyoti-jawharlal-nehru-grandfather.हटमल
http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20081102024902AAB9H0v

nitin tyagi said...

sabse khatanak aatakwad hai गाँधी आतंकवाद