धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, August 22, 2010

क्या धन अर्जित करना ही जीवन का उद्देश्य है.

बड़े महानगर हो या छोटे गाँव हर एक व्यक्ति पैसे के पीछे भागता प्रतीत होता है, नि:संदेह पैसा जीवन के लिए अति आवश्यक है लेकिन पैसे के लिए मूल्यों से समझौता कब तक? कब तक इंसान पैसे के लिए जीवन के वास्तविक सुख से वंचित रहेगा?

हम जिस पैसे के पीछे भागते हैं, क्या वास्तव में वही पैसा जीवन के सुख का आधार है. यह चिंतन का विषय है. बाल्यकाल से ही हम पढ़ते सुनते आ रहे हैं कि जीवन के लिए अन्य उपलब्ध साधनों में पैसे का महत्व सबसे कम है. धन गया तो समझो कुछ नहीं गया या पैसे से तुम बिस्तर खरीद सकते हो नींद नहीं आदि बातें आज भी अक्षरश: सत्य प्रतीत होती हैं.

आदि काल से ही धन का महत्व था, है और रहेगा. धन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन क्या धन अर्जित करने की कोई सीमा है? किसी से पूछो तो वह तपाक से उत्तर देगा कि मुझे तो ढेर सारा पैसा चाहिए, कितना उसे खुद भी नहीं पता. वस्तुतः व्यक्ति पैसे की कोई सीमा तय नहीं करता, जिसके पास जितना आता है उसकी भूख उतनी ही बढ़ती जाती है. देश समाज पर संकट आने की स्थिति में यही पैसे वाले लोग अधिकतम लाभ लेने के लिए वस्तु या सेवा का मूल्य कई गुना बढ़ा देतें हैं. इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष गवाह है. जैसे बाढ़ आदि आपदा आने में वहाँ के व्यापारी वस्तुओं के दाम कई गुना बढ़ा देते हैं, यह बात छोटे स्तर से लेकर बड़े बड़े उद्योगपतिओं पर लागू होती है. जैसे लगता है कि यही मौका है लूट लो.

आजकल मनुष्य मात्र का एक ही उद्देश्य रह गया है पैसा कमाना, भले ही उसके लिए कोई भी मूल्य चुकाना पड़े. पैसे के लिए लोग रिश्तो नातों की भी परवाह नहीं करते. छोटे से बच्चे को जीवन का लक्ष्य पैसा कमाना ही बताया जाता है जैसे अन्य कोई लक्ष्य हो ही नहीं.
मानस की निम्नलिखित पंक्तियों से पता चलता है की यह मनुष्य का शरीर बड़े ही भाग्य से मिला है.

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा.
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा , पाइ न जेहि परलोक सवारा.

हमारा यह मानव शरीर परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमें साधन के रूप में मिला है, किसी भी अन्य योनि यह सुविधा उपलब्ध नहीं, देवताओं को भी यह अवसर उपलब्ध नहीं.
फिर पैसा कमाने के लिए इस शरीर का दुरूपयोग क्यों? जब दुनिया की समस्त दौलत देकर भी व्यक्ति जीवन का एक क्षण नहीं खरीद सकता तो उस दौलत के लिए अपना पूरा जीवन लगाना कहाँ तक उचित है?

याद रखें हिन्दू जीवन पद्यति के मूल ग्रंथो एवं शास्त्रों में तीन तरह के आनंद बताये गए हैं.
१) विषयानंद: इस आनंद में भौतिक और दैहिक सुख जिसे अज्ञानतावश हम सबसे बड़ा आनंद समझते हैं.
२) ब्रह्मानंद: जब जीव को परमात्मा की अनुभूति होने लगती है.
३) परमानन्द: जब जीव का स्वयं परमात्मा से साक्षात्कार होता है.

हमें मिला मानुष तन परमात्मा की प्राप्ति के लिए एक साधन है, इस साधन का सद्युपयोग ना करने वाला जीव कभी समय को तो कभी अपने कर्म को या फिर ईश्वर के व्यर्थ ही दोष लगाता है.

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाईं
 
भारतीय चिंतन में जीव को आत्मा और शरीर में विभक्त किया गया है. शरीर की सोच सिर्फ स्वयं तक सीमित है, जैसे मेरा हाथ, मेरा पैर. किन्तु आत्मा, परमात्मा का भाग होने के कारण सबके लिये सोचती है. मतलब जैसे कड़ाके की ठंड में शरीर स्वयं के लिये रजाई की व्यवस्था कर निश्चिंत हो जायेगा किन्तु आत्मा सबके लिये व्यवस्था बनाने का उपाय सोचेगी.

कभी कभी हमारे संज्ञान में आता है कि एक एक पैसे के लिए जीतोड़ मेहनत करने वाले मनुष्य विभिन्न व्यसनों आदि में धन का दुरूपयोग करते हैं और सामाजिक कार्यो के लिए धन की कमी का रोना रोते हैं. कभी समय मिले तो सोचियेगा कि हम भारतीय सोने की लंका के मालिक रहे रावण के बजाय वनवासी राम की पूजा क्यों करते हैं?

इसके आगे इतना ही कहना है कि संत कबीरदास जी के निम्नलिखित दोहे को अपना आदर्श बनाईये और अपने पुण्य प्रताप से अर्जित मानुष तन का सदुपयोग करते हुए जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति करिए.

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय. मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.....

1 comment:

निर्झर'नीर said...

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय. मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.

avdesh ji humne to bana liya yaa yun kahiye ki itni kabliyat nahi ki dunia ko mutthi mein kar saken ,

sundar lekh