धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, August 20, 2010

छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है.

असलम गंगा के किनारे एक छोटे से गाँव में रहता था, आमतौर पर गंगा किनारे रहने वालों के लिए गंगा वरदान से कम नहीं. नित्यक्रिया से लेकर खेती किसानी या अन्य रोज़ी रोज़गार भी गंगा किनारे आसानी से उपलब्ध हो जाता है, तो मृत्यु के बाद का अध्यात्मिक सुख भी गंगा मैया के किनारे अनायास ही उपलब्ध होता है.
असलम गाँव के अन्य बच्चों के साथ गंगा मैया की गोद में घंटो नहाया करता. गंगा मैया से उसे बहुत स्नेह था, कहता गंगा नहाना कभी ना छोडूंगा.
एक दिन असलम को अपने मामू की शादी में प्रयाग जाना पड़ा, गंगा मैया को देखकर उसकी नहाने की इच्छा हुई, असलम ने वहाँ अपनी उम्र के अन्य लड़कों से गंगा नहाने को कहा, जवाब में लडको ने असलम से कहा कि छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है. वास्तव में बच्चों का कहना भी सत्य से परे ना था, प्रयाग में हिन्दू श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण गंगा मैली हो चुकी थी और गन्दगी से बेपरवाह सनातनी अपने द्वारा किये गए पापों को गंगा में धुल रहे थे और अवशेष घाटों पर विखेर रहे थे.
असलम को काटो तो खून नहीं, जिस गंगा को वह अपनी माँ समान समझ घंटो उसकी गोदी में खेला करता था, आज वही उससे दूर हो रही थी. ऐसे में असलम के मन में द्वन्द उठा, कभी सोचता कि गंगा तो हिन्दुओं की है अतः उसे गंगा को हिन्दुओं के भरोसे छोड़कर उसे भी गंगा में नहाना बंद कर देना चाहिए तो कभी लगता कि जिस गंगा मैया की गोदी में वह घंटो खेलता है उसकी मैल साफ़ करने में उसे अभी जुट जाना चाहिए.
अंततः प्रेम की विजय हुई और असलम अकेला ही गंगा के घाटों की सफाई के लिए निकल पड़ा. देखते ही देखते अन्य उत्साही लोग भी उसके साथ जुड़ गए और कुछ समय पश्चात् वहाँ गन्दगी का नामों निशान मिट गया.
सफाई के बाद का गंगा स्नान असलम को असीम संतोष दे रहा था, आखिर उसने आज माँ के प्रति अपने कर्तव्य का पालन जो किया था.
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लघुकथा: प्रिय मित्र विवेक कृष्ण जी की प्रेरणा से (सत्य घटना और कल्पना का मिश्रण)

6 comments:

Tausif Hindustani said...

बहुत ही अच्छा लिखा है , काश हम सभी हिन्दुस्तानियो को ये सुध आती तो अज गंगा इतनी मैली न होती . हमने कुदरत के वरदान को अभिशाप बना दिया है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी और प्रेरक कहानी।

विश्‍व गौरव said...

काश हम सभी हिन्दुस्तानियो को ये सुध आती तो अज गंगा इतनी मैली न होती

nitin tyagi said...

गंगा की सफाई व् पूरे देश की सफाई तब ही संभव है ,जब हमारी सरकार इसके लिए जागरूक हो |गंगा या देश को मैला करने वाले हिन्दू नहीं अपितु जनता होती है |सरकार की तरफ से व्यवस्था अच्छी न हो तो ही गंदगी फैलती ही है |
जब ये ही हिन्दू बहार विदेश मैं नौकरी करने जाता है, तो वहां पर बहुत सफाई का ख्याल रखता है, क्योकि वहां पर एक व्यवस्था है,और डंडा है ,सरकार का |
लेकन भारत में हमारे नेता सिर्फ अपना ख्याल ही रखते है देश का नहीं |
फूट डालो राज करो की तर्ज़ पर हमारे नेता मज़े ले रहें हैं |

निर्झर'नीर said...

ek acchi prernadayak kahani ke liye ...aapka or krishna ji ka aabhar .

झंडागाडू said...

achha likha.