धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, August 15, 2010

बिना खड्ग बिना ढाल की आज़ादी का असली सच.

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल।

उपरोक्त गीत बचपन में मुझे बड़ा कर्णप्रिय लगता था और अनेकों बार वाद विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेकर मैंने इसी गीत के द्वारा बापू का गुणगान किया था। आज़ादी का सच जानने निकला तो पता चला कि ना जाने कितने अमर सपूतों ने मातृभूमि के लिए हँसते हँसते गोलियां खायीं या फाँसी का फंदा चूम लिया। अब उपरोक्त गीत उन क्रान्तिकारियों का अपमान सा लगता है, जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष कर सर्वोच्च बलिदान किया या अपना लहू बहाया।

१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर के पूर्व से ही अनगिनत सूरमाओं ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और समय के बदलते चक्र के कारण हम भारतवासियों ने उन्हें विसार दिया। क्या मंगल पाण्डेय, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, बिस्मिल, अशफाक जैसे अनगिनत वीर सपूतों का बलिदान कोई काम ना आया जो हमें लगता है कि आज़ादी हमें अहिंसा से मिली है। अगर हम इसी को सच समझते हैं तो यह सरासर गलत है। क्या यह सही नहीं की भगत सिंह के बलिदान ने समूचे देश को हिला दिया था और अहिंसा के सूरमाओं ने उन्हें पथभ्रष्ट युवा कह कर माफ़ी दिलाने से इनकार कर दिया था। हैरानी की बात तो यह है अब अहिंसा के पुजारियों की पार्टी के सुरमा अफजल गुरु की फांसी का विरोध कर रहे हैं।

भारत माता के स्वाधीनता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुचाने वाले अमर हुतात्मा मदनलाल धींगरा का नाम किसी देश भक्त के लिए परिचय का मोहताज़ नहीं है, १०१ वर्ष पूर्व आज ही के दिन (१७ अगस्त १९०९) को उन्होंने वन्देमातरम और भारतमाता की जय कहते हुए फांसी का फंदा चूम लिया था।


सरकारी प्रचार तंत्र ऐसे कितने ही वीर हुतात्माओं के बलिदान को भुला देने के लिए कटिबद्ध दिखता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे बलिदानियों की याद का दीप जलाये रखते है ताकि जिज्ञासु व्यक्ति को शीघ्र ज्ञान का प्रकाश मिल सके।

आज हमें वैसी ही आज़ादी मिली है जैसी नेहरु ने देखी थी और वो थी सत्ता की आज़ादी, शायद इसलिए आज़ाद भी वही दिखते हैं जिनके हाथ में सत्ता है। आम आदमी आज भी दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में व्यस्त है उसे अन्य बातें सोचने की फुर्सत नहीं। हमारे अमर क्रांतिकारियों ने सत्ता के लिए अपने प्राण नहीं दिए उन्होंने देश समाज के लिए अपने प्राण दिए। देश समाज की हालत देखकर लगता है कि अभी भी हमारे अमर क्रांतिकारियों का आज़ादी का सपना अधूरा है और तब तक अधूरा रहेगा जब तक देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वह देश के किसी भी कोने में रहता हो अपने आप को आजाद और सुरक्षित महसूस न करे।

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अमर हुतात्मा मदन लाल धींगरा और उनकी यादों का चिराग जलाये रखने वाले सपूतों को समर्पित।

4 comments:

nitin tyagi said...

likhte rahen v hamara margdarshan ke liye dhanyawad

Rahul said...

bahut accha likha apne. keep writing.

thanks
http://indihub.com

Rahul said...

bahut accha likha apne. please keep writing.

thanks
http://indihub.com

निर्झर'नीर said...

अहिंसा के सूरमाओं ने उन्हें पथभ्रष्ट युवा कह कर माफ़ी दिलाने से इनकार कर दिया था।

सुभाष चन्द्र बोश जी इसी बात को लेकर गाँधी से नाराज थे और अपने रास्ते से उन्हें अलग रखा