धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, August 28, 2010

आतंक का कोई धर्म नहीं होता, फिर भगवा आतंक कैसे?

देश में हिंदुत्व विरोधी और तुष्टिकरण की राजनीति किस कदर हावी है, इसका उदाहरण नित्य ही देखने को मिलता रहता है. सरकार में कैसे लोग बैठे हैं इसका अंदाजा भी उनके द्वारा दिए गए बयानों से पता चलता है. वोटों की राजनीति के फेर में पड़े नेताओं का चरित्र कैसा है यह देशवासियों को बताने की जरूरत नहीं है.

हमारे गृहमंत्री चिदंबरम जी ने भगवा आतंकवाद से पुलिस प्रशासन को सावधान रहने की नसीहत दी है, उस पर समाज की कड़ी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है. जब बड़े गर्व से चिदंबरम भगवा को आतंक का प्रतीक बता रहे थे तब उन्होंने यह भी सोचने की आवश्यकता नहीं समझी की जिस देश के गृहमंत्री की हैसियत से वह भाषण दे रहें हैं, उस देश के ध्वज में भगवा रंग का स्थान ऊपर है. उनके इस गैर जिम्मेदाराना बयान का क्या अर्थ है? हमारे राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग को त्याग का प्रतीक बताया गया है, क्या अब हमें इसे आतंक के प्रतीक के रूप में स्वीकार करना होगा?.

चिंतन का विषय यह है वास्तव में पूरी दुनिया में कट्टरवाद और आतंक का पर्याय बन चुकी एक खास कौम को आतंकवाद से जोड़ने में इन्ही राजनेताओं की हिम्मत जवाब दे जाती है और सार्वजानिक रूप से इसे स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता. लेकिन सदियों से चली आ रही भगवा संस्कृति को बदनाम करने के लिए यही राजनेता मिलजुल कर प्रयास करते दिखते हैं. वास्तव में ये राजनेता किसी को प्रसन्न करने के लिए ऐसे अनावश्यक और गैर जिम्मेदाराना बयान देते रहते है. विश्लेषण करें तो चिदंबरम जी का यह बयान ऐसे ही नहीं आया है, इसकी पृष्टभूमि में जाएँ तो पता चलता है कि एक बार काँग्रेस आलाकमान के खासमखास दिग्यविजय सिंह जी ने आजमगढ़ की तीर्थयात्रा की थी उसके बाद वो चिदंबरम जी से मिले थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक कार्यों में बढ़ते योगदान और भारतीय प्रशासनिक सेवा में हिंदुत्व समर्थक लोगों की सफलता पर चिंता प्रकट की थी. मतलब साफ़ है चिदंबरम को स्पष्ट सन्देश दिया गया था और चिदंबरम का अब आया बयान उसी सन्देश एक बानगी भर है. लिंक देखें.

http://timesofindia.indiatimes.com/india/After-Naxal-spat-Diggy-meets-PC-over-RSS-in-social-sector/articleshow/5904099.cms
http://deshivicharak.blogspot.com/2010/05/blog-post_936.html

हमारे योग्य प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यको का है. भले ही यह अल्पसंख्यक देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अलगाववादी ही क्यों ना हो. और प्रतिक्षण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त क्यों ना हो. इस सबसे पता चलता है कि सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग किसी खास रणनीति के तहत ऐसा कर रहें हैं और उनपर ऐसा दबाव कौन डाल रहा है यह भी ध्यान देने योग्य बात है.

खैर, हमारी भगवा संस्कृति की यही विशेषता है कि जब जब इस पर अत्याचार हुए यह और पुष्ट होकर उभरी है, सदियों से अनेको अनेक ऋषियों एवं मनीषियों ने इस संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. आज भी अनेकोनेक देवी देवताओं को पूजते हुए भी हम सभी एक हैं. हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार शिवभक्त को विष्णुरुपी श्रीराम की भक्ति के बिना शिवकृपा नहीं मिल सकती तो स्वयं श्रीराम शिव की उपासना करते हैं. जब गणेश स्वयं शिव के पुत्र हैं तो शिवभक्त, रामभक्त या गणपति की भक्ति करने वाले में कैसे वैर होगा. देवी की पूजा करने वाले भी कहीं ना कहीं से शिव, विष्णु, गणेश आदि से जुड़े हुए हैं.

मानस की निम्नलिखित पंक्ति का अवलोकन करने पर पता चलता है कि मुग़ल काल में हिन्दू समाज को एकत्रित करने के लिए गोस्वामी जी ने विष्णु रूपी राम भक्तों और शिव भक्तों को कैसा सन्देश देने कि कोशिश की है. दो विभिन्न सम्प्रदायों में ऐसा सामंजस्य सिर्फ भगवा संस्कृति में ही मिल सकता है अन्य कहीं नहीं.

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥
 
यही कारण है कि हिन्दू समाज में कभी पूजा पद्यतियों को लेकर विरोधाभास नहीं देखने को मिलता. सभी स्वतंत्र हैं और किसी एक देव के भक्ति कर वे सबकी कृपा प्राप्त कर लेते हैं. आदि शंकराचार्य ने गौतम बुद्ध को बुद्धावतार बता उन्हें भी भगवा संस्कृति का अंश बताया था. ऐसी जोड़ने वाली संस्कृति को उसी के देश में आतंकवादी संस्कृति कह कर उसका अपमान किया जा रहा है और उसको मानने वाले मनुष्य सो रहें हैं. क्या यह पतन की निशानी नहीं है?. 

आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा, इस देश के मनुष्यों का स्वाभिमान कब जागेगा. वस्तुतः अपने में मस्त हिन्दू समाज आने वाली पीढी के परवाह किये बिना लक्ष्य विहीन जीवन जी रहा है. इतने सालों गुलाम रहने के बाद हमारी मानसिकता गुलाम हो चुकी है और हम बिना प्रतिरोध के हर एक अत्याचार को सह लेते हैं.

आज जरूरत है समाज के लोगों को इस अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने की, व्यक्ति व्यक्ति का स्वाभिमान जगाने की आवश्यकता है, जब तक इस पुण्यभूमि के प्रत्येक व्यक्ति का स्वाभिमान नहीं जागेगा, तब तक कभी बाबर, कभी औरंगजेब, कभी नेहरु, कभी दिग्यविजय तो कभी चिदंबरम जैसे व्यक्ति इस प्राचीन "वसुधैव कुटुम्बकम" वाली संस्कृति का अपमान करते रहेंगे.

ऐसा तभी संभव है जब हम अपने इतिहास और भूगोल से मुँह ना मोड़ें, आज विद्यालयों में भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास को भुला सिर्फ गुलामी के वर्षों की शिक्षा दी जाती है. निश्चित ही यह शिक्षा बालपन में ही स्वाभिमान को मारने वाली है. आप खुद सोचिये, क्या हमारी शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति का निर्माण होना चाहिए जो निजी स्वार्थ के लिए देश और समाज के हितों की अनदेखी करते हैं?.

Tuesday, August 24, 2010

बारिश वाली राखी

रक्षाबंधन को पूनम बहुत उत्साहित रहती थी. राखी के दिन वह मायके जाकर भैया को राखी जरूर बांधती थी. अपनों के बीच पहुँच कर राखी की खुशियाँ कई गुना बढ़ जाती हैं. आज भी सुबह पूनम ने घर के सारे काम निपटा लिए थे और मायके जाने की तैयारी कर ली थी. लेकिन ईश्वर को शायद कुछ और मंजूर था. झमाझम बारिश पूनम जैसी कितनी ही बहनों के अरमानो पर पानी फेर रही थी.
बारिश की बूंदे और पूनम के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. बड़े चाव से उसने खोये के पेड़े बनाये थे. वह जानती थी कि भैया को उसके हाथ के बने पेड़े बहुत अच्छे लगते थे. भैया हरदम कहते की मेरी बहना जब अपने घर चली जाएगी तो मुझे पेड़ों के लिए तरसना पड़ेगा. उसकी विदाई पर भी भैया फूट फूट कर रोये थे और कहते जा रहे थे कि अब मुझे पेड़े कौन खिलायेगा. पूनम ने उसी दिन संकल्प ले लिया था कि राखी पर भैया को अपने हाथ से बने पेड़े ही खिलाऊँगी. 
देखते ही देखते शाम होने को आ गयी लेकिन बारिश नहीं रुकी. पति और बच्चे पूनम को ढाढस बंधा रहे थे लेकिन पूनम जानती थी कि अब कोई चमत्कार ही उसकी मंशा पूरी कर सकता था. वह भगवान के सामने जाकर बैठ गयी. चौखट पर आहट से उसकी तन्द्रा टूटी तो देखा कि सर से पांव तक पानी से सराबोर भैया दरवाजे पर खड़े थे.
अगले ही क्षण घर का माहौल बदल गया था वही बारिश के बूंदे भाई बहन के अगाध प्रेम की गवाही दे रहीं थी.

Sunday, August 22, 2010

क्या धन अर्जित करना ही जीवन का उद्देश्य है.

बड़े महानगर हो या छोटे गाँव हर एक व्यक्ति पैसे के पीछे भागता प्रतीत होता है, नि:संदेह पैसा जीवन के लिए अति आवश्यक है लेकिन पैसे के लिए मूल्यों से समझौता कब तक? कब तक इंसान पैसे के लिए जीवन के वास्तविक सुख से वंचित रहेगा?

हम जिस पैसे के पीछे भागते हैं, क्या वास्तव में वही पैसा जीवन के सुख का आधार है. यह चिंतन का विषय है. बाल्यकाल से ही हम पढ़ते सुनते आ रहे हैं कि जीवन के लिए अन्य उपलब्ध साधनों में पैसे का महत्व सबसे कम है. धन गया तो समझो कुछ नहीं गया या पैसे से तुम बिस्तर खरीद सकते हो नींद नहीं आदि बातें आज भी अक्षरश: सत्य प्रतीत होती हैं.

आदि काल से ही धन का महत्व था, है और रहेगा. धन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन क्या धन अर्जित करने की कोई सीमा है? किसी से पूछो तो वह तपाक से उत्तर देगा कि मुझे तो ढेर सारा पैसा चाहिए, कितना उसे खुद भी नहीं पता. वस्तुतः व्यक्ति पैसे की कोई सीमा तय नहीं करता, जिसके पास जितना आता है उसकी भूख उतनी ही बढ़ती जाती है. देश समाज पर संकट आने की स्थिति में यही पैसे वाले लोग अधिकतम लाभ लेने के लिए वस्तु या सेवा का मूल्य कई गुना बढ़ा देतें हैं. इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष गवाह है. जैसे बाढ़ आदि आपदा आने में वहाँ के व्यापारी वस्तुओं के दाम कई गुना बढ़ा देते हैं, यह बात छोटे स्तर से लेकर बड़े बड़े उद्योगपतिओं पर लागू होती है. जैसे लगता है कि यही मौका है लूट लो.

आजकल मनुष्य मात्र का एक ही उद्देश्य रह गया है पैसा कमाना, भले ही उसके लिए कोई भी मूल्य चुकाना पड़े. पैसे के लिए लोग रिश्तो नातों की भी परवाह नहीं करते. छोटे से बच्चे को जीवन का लक्ष्य पैसा कमाना ही बताया जाता है जैसे अन्य कोई लक्ष्य हो ही नहीं.
मानस की निम्नलिखित पंक्तियों से पता चलता है की यह मनुष्य का शरीर बड़े ही भाग्य से मिला है.

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा.
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा , पाइ न जेहि परलोक सवारा.

हमारा यह मानव शरीर परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमें साधन के रूप में मिला है, किसी भी अन्य योनि यह सुविधा उपलब्ध नहीं, देवताओं को भी यह अवसर उपलब्ध नहीं.
फिर पैसा कमाने के लिए इस शरीर का दुरूपयोग क्यों? जब दुनिया की समस्त दौलत देकर भी व्यक्ति जीवन का एक क्षण नहीं खरीद सकता तो उस दौलत के लिए अपना पूरा जीवन लगाना कहाँ तक उचित है?

याद रखें हिन्दू जीवन पद्यति के मूल ग्रंथो एवं शास्त्रों में तीन तरह के आनंद बताये गए हैं.
१) विषयानंद: इस आनंद में भौतिक और दैहिक सुख जिसे अज्ञानतावश हम सबसे बड़ा आनंद समझते हैं.
२) ब्रह्मानंद: जब जीव को परमात्मा की अनुभूति होने लगती है.
३) परमानन्द: जब जीव का स्वयं परमात्मा से साक्षात्कार होता है.

हमें मिला मानुष तन परमात्मा की प्राप्ति के लिए एक साधन है, इस साधन का सद्युपयोग ना करने वाला जीव कभी समय को तो कभी अपने कर्म को या फिर ईश्वर के व्यर्थ ही दोष लगाता है.

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाईं
 
भारतीय चिंतन में जीव को आत्मा और शरीर में विभक्त किया गया है. शरीर की सोच सिर्फ स्वयं तक सीमित है, जैसे मेरा हाथ, मेरा पैर. किन्तु आत्मा, परमात्मा का भाग होने के कारण सबके लिये सोचती है. मतलब जैसे कड़ाके की ठंड में शरीर स्वयं के लिये रजाई की व्यवस्था कर निश्चिंत हो जायेगा किन्तु आत्मा सबके लिये व्यवस्था बनाने का उपाय सोचेगी.

कभी कभी हमारे संज्ञान में आता है कि एक एक पैसे के लिए जीतोड़ मेहनत करने वाले मनुष्य विभिन्न व्यसनों आदि में धन का दुरूपयोग करते हैं और सामाजिक कार्यो के लिए धन की कमी का रोना रोते हैं. कभी समय मिले तो सोचियेगा कि हम भारतीय सोने की लंका के मालिक रहे रावण के बजाय वनवासी राम की पूजा क्यों करते हैं?

इसके आगे इतना ही कहना है कि संत कबीरदास जी के निम्नलिखित दोहे को अपना आदर्श बनाईये और अपने पुण्य प्रताप से अर्जित मानुष तन का सदुपयोग करते हुए जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति करिए.

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय. मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.....

Friday, August 20, 2010

छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है.

असलम गंगा के किनारे एक छोटे से गाँव में रहता था, आमतौर पर गंगा किनारे रहने वालों के लिए गंगा वरदान से कम नहीं. नित्यक्रिया से लेकर खेती किसानी या अन्य रोज़ी रोज़गार भी गंगा किनारे आसानी से उपलब्ध हो जाता है, तो मृत्यु के बाद का अध्यात्मिक सुख भी गंगा मैया के किनारे अनायास ही उपलब्ध होता है.
असलम गाँव के अन्य बच्चों के साथ गंगा मैया की गोद में घंटो नहाया करता. गंगा मैया से उसे बहुत स्नेह था, कहता गंगा नहाना कभी ना छोडूंगा.
एक दिन असलम को अपने मामू की शादी में प्रयाग जाना पड़ा, गंगा मैया को देखकर उसकी नहाने की इच्छा हुई, असलम ने वहाँ अपनी उम्र के अन्य लड़कों से गंगा नहाने को कहा, जवाब में लडको ने असलम से कहा कि छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है. वास्तव में बच्चों का कहना भी सत्य से परे ना था, प्रयाग में हिन्दू श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण गंगा मैली हो चुकी थी और गन्दगी से बेपरवाह सनातनी अपने द्वारा किये गए पापों को गंगा में धुल रहे थे और अवशेष घाटों पर विखेर रहे थे.
असलम को काटो तो खून नहीं, जिस गंगा को वह अपनी माँ समान समझ घंटो उसकी गोदी में खेला करता था, आज वही उससे दूर हो रही थी. ऐसे में असलम के मन में द्वन्द उठा, कभी सोचता कि गंगा तो हिन्दुओं की है अतः उसे गंगा को हिन्दुओं के भरोसे छोड़कर उसे भी गंगा में नहाना बंद कर देना चाहिए तो कभी लगता कि जिस गंगा मैया की गोदी में वह घंटो खेलता है उसकी मैल साफ़ करने में उसे अभी जुट जाना चाहिए.
अंततः प्रेम की विजय हुई और असलम अकेला ही गंगा के घाटों की सफाई के लिए निकल पड़ा. देखते ही देखते अन्य उत्साही लोग भी उसके साथ जुड़ गए और कुछ समय पश्चात् वहाँ गन्दगी का नामों निशान मिट गया.
सफाई के बाद का गंगा स्नान असलम को असीम संतोष दे रहा था, आखिर उसने आज माँ के प्रति अपने कर्तव्य का पालन जो किया था.
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लघुकथा: प्रिय मित्र विवेक कृष्ण जी की प्रेरणा से (सत्य घटना और कल्पना का मिश्रण)

Sunday, August 15, 2010

बिना खड्ग बिना ढाल की आज़ादी का असली सच.

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल।

उपरोक्त गीत बचपन में मुझे बड़ा कर्णप्रिय लगता था और अनेकों बार वाद विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेकर मैंने इसी गीत के द्वारा बापू का गुणगान किया था। आज़ादी का सच जानने निकला तो पता चला कि ना जाने कितने अमर सपूतों ने मातृभूमि के लिए हँसते हँसते गोलियां खायीं या फाँसी का फंदा चूम लिया। अब उपरोक्त गीत उन क्रान्तिकारियों का अपमान सा लगता है, जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष कर सर्वोच्च बलिदान किया या अपना लहू बहाया।

१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर के पूर्व से ही अनगिनत सूरमाओं ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और समय के बदलते चक्र के कारण हम भारतवासियों ने उन्हें विसार दिया। क्या मंगल पाण्डेय, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, बिस्मिल, अशफाक जैसे अनगिनत वीर सपूतों का बलिदान कोई काम ना आया जो हमें लगता है कि आज़ादी हमें अहिंसा से मिली है। अगर हम इसी को सच समझते हैं तो यह सरासर गलत है। क्या यह सही नहीं की भगत सिंह के बलिदान ने समूचे देश को हिला दिया था और अहिंसा के सूरमाओं ने उन्हें पथभ्रष्ट युवा कह कर माफ़ी दिलाने से इनकार कर दिया था। हैरानी की बात तो यह है अब अहिंसा के पुजारियों की पार्टी के सुरमा अफजल गुरु की फांसी का विरोध कर रहे हैं।

भारत माता के स्वाधीनता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुचाने वाले अमर हुतात्मा मदनलाल धींगरा का नाम किसी देश भक्त के लिए परिचय का मोहताज़ नहीं है, १०१ वर्ष पूर्व आज ही के दिन (१७ अगस्त १९०९) को उन्होंने वन्देमातरम और भारतमाता की जय कहते हुए फांसी का फंदा चूम लिया था।


सरकारी प्रचार तंत्र ऐसे कितने ही वीर हुतात्माओं के बलिदान को भुला देने के लिए कटिबद्ध दिखता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे बलिदानियों की याद का दीप जलाये रखते है ताकि जिज्ञासु व्यक्ति को शीघ्र ज्ञान का प्रकाश मिल सके।

आज हमें वैसी ही आज़ादी मिली है जैसी नेहरु ने देखी थी और वो थी सत्ता की आज़ादी, शायद इसलिए आज़ाद भी वही दिखते हैं जिनके हाथ में सत्ता है। आम आदमी आज भी दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में व्यस्त है उसे अन्य बातें सोचने की फुर्सत नहीं। हमारे अमर क्रांतिकारियों ने सत्ता के लिए अपने प्राण नहीं दिए उन्होंने देश समाज के लिए अपने प्राण दिए। देश समाज की हालत देखकर लगता है कि अभी भी हमारे अमर क्रांतिकारियों का आज़ादी का सपना अधूरा है और तब तक अधूरा रहेगा जब तक देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वह देश के किसी भी कोने में रहता हो अपने आप को आजाद और सुरक्षित महसूस न करे।

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अमर हुतात्मा मदन लाल धींगरा और उनकी यादों का चिराग जलाये रखने वाले सपूतों को समर्पित।

Monday, August 9, 2010

सोने की चिडिया की स्वाधीनता और काँग्रेसी लुटेरे

हम भारत के लोग बडे ही हर्षोल्लास से १५ अगस्त को स्वाधीनता दिवस मनाते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम लोगों को यह भान होगा कि इससे एक दिन पूर्व यानि १४ अगस्त १९४७ को भारत माता के दो टुकडे कर दिये गये।  असंगठित हिन्दू समाज और उसका दूर-दृष्टिहीन नेतृत्व (गाँधी, नेहरु आदि ) जो अलगाववादियों के तुष्टिकरण व पुष्टिकरण में वर्षों से लगा था, उन्ही की भूलों ने हमें यह गहरा घाव दिया. बीस लाख लोग मारे गए. विभाजन के द्वारा भारत की साढ़े नौ लाख वर्ग किलोमीटर भूमि (कुल भूमि का २३%)  १९% लोगों को दे दी गयी. काँग्रेस नेत्रित्व ने अपना वोट बैंक बनाये रखने के लिए २.५ करोड़  अलगाववादियों को यहीं रोक लिया. ये वही लोग थे जिन्होंने १९४६ के चुनाव में विभाजन के पक्ष में मुस्लिम लीग को वोट दिया था. जरा सोचिये! जिन्होंने अपने लिए अलग देश माँगा था उनका शेष खंडित भारत में  रहने का क्या हक़ बनता था?.
अहिंसा के कथित पुजारी मोहन दास करम चंद गाँधी की गलत नीतियों के कारण लाखों लोग असमय काल के गाल में समां गए थे. गोरे और काले अंग्रेजों  ने उसी गाँधी को राष्ट्रपिता की पूजनीय उपाधि से विभूषित किया ताकि कोई उसके बारे में कुछ बोले नहीं. गाँधी की अहिंसा नीति का समर्थन करने की बात करने वाले विदेशी भारत से अहिंसा की अपेक्षा करते है और खुद जब चाहे जहाँ चाहे आक्रमण कर देते हैं.
अब वो समय आ गया है कि देश की युवा पीढ़ी गाँधी के बारे में उपलब्ध सरकारी साहित्य से अलग पढ़कर जानकारी हासिल करे और फिर किसी ठोस आधार पर गाँधी का मूल्याङ्कन करे. यह भी ध्रुव सत्य है कि आने वाली पीढ़ी इतिहास पुरुषो का फिर से मूल्याङ्कन करेगी. और खुद फैसला करेगी कि नेताजी सुभाष, सरदार भगत सिंह, आज़ाद, विस्मिल, असफाक उल्ला खान, लाला लाजपत राय, तिलक आदि देश के आदर्श होंगे या गाँधी नेहरु राजवंश.
अगर समाचार पत्रों और मीडिया आदि पर गौर करें तो सरकार एवं काँग्रेस पार्टी उस राजीव गाँधी का गुणगान करने में लगी दिखती है जिनका नाम १९८४ के सिख दंगे, बोफोर्स घोटाले, बीस हज़ार से ज्यादा मौतों के जिम्मेदार एंडरसन आदि को भगाने आदि विषयों पर आता है.
शास्त्री जी भी उसी काँग्रेस में थे लेकिन कोई उन्हें काँग्रेसी उन्हें अपना आदर्श बनाएगा ऐसा प्रतीत नहीं होता. काँग्रेस के किसी पोस्टर को उठा कर देखिये, उसमे नेहरु राजवंश ही दिखेगा, पटेल या शास्त्री जैसा नेता नहीं. काँग्रेस के पोस्टरों पर प्रियंका बढेरा भी खूब दिखती है लेकिन देश और काँग्रेस के लिए उनका योगदान आज तक नहीं दिखा. मीडिया में राहुल का ग्लैमर भी खूब बिकता है, लेकिन देश और समाज के लिए उनका योगदान सिर्फ नौटंकी से आगे नहीं दिखता. जिसमें कभी किसी दलित के यहाँ भोजन तो कभी खाली टोकरी और गद्देदार जूते पहनकर मेहनत करने का नाटक ही दिखता है. काँग्रेस पार्टी आज देश में भ्रष्टाचार और चाटुकारिता की पर्याय बन चुकी है.
देश की आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश के समस्त संसाधनों पर यही मुट्ठी भर लोग कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और जनता के एक बड़े हिस्से को दो जून भरपेट रोटी भी नसीब नहीं. आम जनता मंहगाई से त्रस्त है, मिलावट का धंधा जोरों पर है. जिस देश में दूध दही की नदियाँ बहती थी वहाँ कोई भी वस्तु शुद्ध मिलने का भरोसा नहीं.
हमारा देश सोने की चिड़िया था, है और आगे भी रहेगा, लेकिन जरूरत है उसे लुटेरों से बचा कर रखने की.
देश को पहले मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लूटा, फिर गोरे अंग्रेजों ने और अब काले अँगरेज़ और उनके चाटुकार लूट रहें हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से सम्बंधित विभिन्न घोटाले इसका ताज़ा प्रमाण हैं कि सोने की चिड़िया के पंख किस कदर लूटे जा रहें हैं.
देश के इतिहास पर गौर करें तो ज्यादातर समस्यायें काँग्रेस की गलत नीतियों की देन है, देश के सामने विकराल रूप में खड़ी कश्मीर समस्या भी हमारे देश के अदूरदर्शी भाग्यविधाताओं की देन है.
आज भी देश में तुष्टिकरण की नीति बेधड़क चल रही है. हिन्दू हित की बात करना इस देश में साम्प्रदायिकता कहलाता है. एक चुने हुए जनता के प्रतिनिधि को देश के दूसरे हिस्से में जाने से रोकने का दबाव बनाया जाता है ताकि एक खास वोट बैंक नाराज़ ना हो जाये.
क्या वो समय अभी नहीं आया कि देश का बौद्धिक वर्ग सरकार की भ्रष्ट, चाटुकार, तुष्टिकरण और सीबीआई जैसे साधनों का दुरुपयोग आदि विषयों पर अपनी बात रखे और हर स्तर पर गलत नीतियों का विरोध करे, अगर ऐसा नहीं किया गया तो ये मुट्ठी भर भ्रष्ट लोग हम सबकी जीवन रेखा का आधार भारत रूपी सोने की चिड़िया के पंख तब तक निचोड़ते रहेंगे जब तक उसके प्राण पखेरू उड़ ना जाएँ.
इतना कुछ होने पर भी देश की जनता का बड़ा हिस्सा सो रहा है, याद रखें यह देश हमारा घर है, अपने घर की रक्षा करने कोई विदेशी नहीं आएगा. इसकी रक्षा हमें ही करने होगी. आप लोगों से अनुरोध है कि देश की समस्याओं पर चुप ना बैठे, उठें, खुद जागें और दूसरों को भी जगाएं. 

Wednesday, August 4, 2010

देश की तस्वीर

देश की तस्वीर अब बदल रही है,
सभी कहते हैं कि दूरी सिमट रही है.
बड़ी बड़ी इमारतें कुछ कहानी कह रहीं हैं.
कुर्बानी की सारी दास्ताँ बयान कर रहीं है.

मिलकर सबको जोड़ने का तार,
विकसित हो बेतार हो गया है.
पडोसी से बात करने के लिए,
मोबाइल का आविष्कार हो गया है.

अस्पतालों में भीड़ बढ़ती जा रही है,
दवाओं से ज्यादा अब बीमारी आ रही हैं.
रोगी को बचाने की औषधि आ गयी है,
हंसते परिवार को मारने दुर्घटना छा गयी है.

कैसे हो गए हैं आज देश के कर्णधार,
अपने आप में खोये खोये से रहते हैं.
बगावत नहीं करते कभी समाज के लिए,
खुद के लिए समाज से बगावत करते हैं.

लोग कहते हैं भारत गाँवों में बसता है,
ग्रामीणों के दिल में प्रेम रमता है.
बदली तस्वीर देखने पहुंचा जो गाँव में,
दिल की तस्वीर बदलने का पता चलता है.