धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, July 16, 2010

रोज़गार का हक़ किसका

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो इंसान को अन्दर तक झकझोर देते हैं. ऐसा ही एक संस्मरण आप लोगों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ. मैं यह नहीं कह रहा कि यह विचार सहीं हैं पर यह अटल सत्य है कि इनसे आज के समाज का भौतिकवादी चेहरा ध्यान में आता है.
आदि  काल से ही सिफारिश आजीविका प्राप्ति का एक प्रभावी साधन रहा है और जब तब विभिन्न व्यक्तियों एवं संस्थानों द्वारा सफलता पूर्वक प्रयोग किया जाता रहा है. आज कल इसका एक बिगड़ा रूप सामने आ रहा है और समर्थ व्यक्ति अपने लोगों को उनकी पात्रता और जरूरत को देखे बिना आजीविका में लगाते रहते हैं. सही भी है हर एक व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने का अधिकार है किन्तु इसका एक पहलु यह भी है कि भारत जैसे देश में सरकार और अन्य संगठनो के विभिन्न प्रयासों के बाद भी बेरोज़गारी का आंकड़ा कम नहीं हो रहा है और लोगों को आजीविका के लिए दर दर भटकना पड़ रहा है.
मेरे एक ऐसे ही समर्थ मित्र विवेक कृष्ण जी से किसी ने अपने मित्र की पत्नी कि नौकरी कि सिफारिश की. विवेक जी समर्थ थे लेकिन उन्होंने उक्त महिला की पात्रता का परीक्षण किया तो पाया कि महिला के पति एक सरकारी फर्म में बड़े अधिकारी थे और महिला सिर्फ समय काटने के लिए नौकरी करना चाहती थी. ऐसे ही गौर करने पर विभिन्न उदहारण ध्यान में आते हैं जब सिर्फ भौतिकवादी सुख सुविधा के लिए पति-पत्नी दोनों आजीविका कमाना चाहते हैं.
विवेक जी ने तो उन मित्र के सामने एक रोज़गार के लिए संघर्षरत व्यक्ति का उदाहरण देकर कहा कि इस नौकरी कि आवश्यकता किसको है आप स्वयं परखे और मुझे बताएं. खैर! विवेक जी के वो मित्र बहुत शर्मिंदा हुए और आगे से सिर्फ जरूरतमंदों की सिफारिश करने का प्रण किया.
वास्तव में समाज की जरूरत भी यही है कि सिर्फ समय पास या शौक के लिए जीविका कमाने से बेहतर है किसी जरूरतमंद व्यक्ति को कार्य करने का अवसर दिया जाय. इससे उस व्यक्ति कि उत्पादकता भी बढ़ेगी और उसके सामाजिक मूल्य भी.
पर क्या करें. सब कुछ देखते समझते, सिफारिश के द्वारा लगे शौकिया नौकरी करने वाले लोगों और रोज़गार के लिए भटकते हुए व्यक्तियों के देख कर गोस्वामी जी की इस निम्लिखित पंक्तियों का ध्यान आ जाता है.
प्रारब्ध पहिले रचा पीछे रचा शरीर !
आप स्वयं सोचें क्या उपयुक्त है. एक शौकिया नौकरी या किसी जरूरतमंद की जीविका.

सादर वन्दे.

3 comments:

Saurabh Garg said...

You are thinking abt it But nobody else bother...

Arvind Vidrohi said...

bahut badhiya vichar hai.yahi natikta ke beej parivaar va samaj mein bone ki jarurat hai...

निर्झर'नीर said...

पांडे जी अपने विचार भी आपसे और विवेक जी से मिलते है हम भी ऐसा ही प्रण करते है