धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Tuesday, June 29, 2010

देश के जिम्मेदार नागरिक

मेरी एक रेल यात्रा के दौरान मुरादाबाद में ट्रेन में दो युवक चढ़े, उन्हें रामपुर जाना था. मिनरल वाटर की बोतल से आखिरी घूँट पीते हुए एक युवक ने बोतल को तोडना शुरू किया और बोला, देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैं इस बोतल को तोड़ रहा हूँ ताकि इसका कोई गलत प्रयोग ना कर सके. दूसरे ने भी सहमति जताई. उनके इस कृत्य को देख कर मेरे मन में भी दोनों के  लिए सम्मान का भाव आ गया.  लेकिन यह क्या? अगले ही क्षण उसने मुड़ी तुड़ी बोतल प्लेटफार्म पर फेंक दी एवं मैं विस्मित सा उसकी ओर देखता रह गया.
खैर बात आई गयी हो गयी और ट्रेन चल पड़ी, थोड़ी देर में चल टिकट परीक्षक (TTE ) महोदय आ गए और अपना कार्य करने लगे. उन युवको के पास उपयुक्त टिकट भी नहीं था, फिर उन्होंने अपने किसी परिचित का हवाला देकर परीक्षक महोदय से उन्हें छोड़ने की गुजारिश की, किन्तु उनकी दाल नहीं गली और परीक्षक ने उन्हें टायलेट के पास वाले गलियारे में बुलाया और शायद कुछ सुविधा शुल्क लेकर उन्हें यात्रा करने की मौखिक सहमति दे दी. अब वे युवक विजयी मुद्रा में आकर मेरे सामने उसी स्थान पर बैठ गए.
यह भारतीय रेल में बहुत सामान्य सी बात है और तुम भी खुश हम भी खुश की पद्यति पर चलता है. उन युवकों ने भी इसी चिर परिचित शैली को अपना कर अपनी यात्रा आसान कर ली थी.
रामपुर आते ही दोनों ट्रेन से उतर गए, मैं दूर तक भारत देश के दोनों जिम्मेदार नागरिको को देखता रहा और वो हँसते हुए जैसे भारतीय रेल को मुह चिढ़ा रहे हों, मेरी दृष्टि क्षमता से बाहर निकल गए.
तभी से बोतल पर " CHRUSH THE BOTTLE AFTER USE "  लिखा देख कर अनायास ही मुझे उन देश के जिम्मेदार नागरिको की याद आ जाती है जो सिर्फ बोतल तोड़ कर अपने कर्तव्य से इति श्री कर लेते हैं और देश समाज की अन्य परिस्थितियों के बारे में सोचते भी नहीं.

10 comments:

रौशन जसवाल विक्षिप्त said...

आपके ब्लोग पर आ कर अच्छा लगा! ब्लोगिग के विशाल परिवार में आपका स्वागत है! अन्य ब्लोग भी पढ़ें और अपनी राय लिखें! हो सके तो follower भी बने! इससे आप ब्लोगिग परिवार के सम्पर्क में रहेगे! अच्छा पढे और अच्छा लिखें! हैप्पी ब्लोगिग!

आनंद said...

बहुत सीधे और सरल तरीके से आपने अपनी चिंता लिखी है। इसे बनाए रखें। शुभकामनाएँ।

- आनंद

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS said...

यही तो इस देश की वर्तमान पीढी का असली चरित्र है, जिसे सिखाया है, पिछली पीढी ने, अन्यथा कोई कारण नहीं कि इस देश की वर्तमान पीढी ऐसी होती। हर समस्या के लिये किसी न किसी रूप में पुरानी पीढी जिम्मेदार होती है। फिर भी सरकार को इस सबके लिये आसानी से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। एक वाकया, बेहतरीन शब्दावली में लिखने के लिये साधुवाद। शुभकामनाओं सहित।
-आपका-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३२८ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS said...

जिन्दा लोगों की तलाश!
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
http://presspalika.blogspot.com/
http://baasindia.blogspot.com/

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

राकेश कौशिक said...

सच्चा और बहुत अच्छा आलेख तथा सन्देश भी - शुभकामनाएं

प्रतुल कहानीवाला said...

मित्र,
अधिकांश लोग नैतिक मूल्यों को दैनिक जीवन में मज़ाक के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं. वे राष्ट्रीयता, सामाजिकता, शिष्टाचार आदि गुणों को मन से आत्मसात करने में तौहीन मानने लगे हैं. वे जानते तो हैं कि क्या अच्छाई है, किन्तु उसे स्थायी रूप से अपनाना उसे पिछड़ापन महसूस होता है. इसलिए वे नाटक के तौर पर, क्षणिक हास-परिहास के तौर पर अपनाते हैं और दूसरे ही क्षण बदल जाते हैं कि कोई उन्हें ग़ैर-आधुनिक ना समझने लगे.
आपके संस्मरण की ही भाँति ही दैनिक जीवन में [रोजाना] तमाम प्रकरण ऐसे देखने को मिल जाते हैं. कहाँ तक बयाँ करें. मूक-दर्शक बने रहने के अलावा कर भी क्या सकते हैं?

हिमान्शु मोहन said...

देशी विचार और विचारकों की बड़ी आवश्यकता है। बस कुछ देशी-कर्मी और मिल जाएँ। अच्छा लगा आपका ब्लॉग, हिंदी में लेखन के लिए बधाई।
स्वागत है!

संगीता पुरी said...

इस चिट्ठे के साथ हिंदी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

" बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
जनोक्ति.कॉम www.janokti.com एक ऐसा हिंदी वेब पोर्टल है जो राज और समाज से जुडे विषयों पर जनपक्ष को पाठकों के सामने लाता है . हमारा प्रयास रोजाना 400 नये लोगों तक पहुँच रहा है . रोजाना नये-पुराने पाठकों की संख्या डेढ़ से दो हजार के बीच रहती है . 10 हजार के आस-पास पन्ने पढ़े जाते हैं . आप भी अपने कलम को अपना हथियार बनाइए और शामिल हो जाइए जनोक्ति परिवार में !