धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, May 22, 2010

वेतन में अपेक्षित वृद्धि ना होने से दुखी सहयोगियों को समर्पित कविता

वेतन बढ़त की थी वर्षा रे भैया, तमन्ना संजोयी थी भीगेंगे अबकी,
अरमान टूटे मिले सबको आंसू, आशा ना पूरी हुई आज सबकी.
बादल थे गरजे बहुत धीरे धीरे, मन में वो संशय मचाते रहे थे.
थोड़ी सी छीटें हम पर भी आयीं, पवन सारे अरमान उड़ाते रहे थे.
मंहगाई हम सबको भारी पड़ी है, मुश्किल हुआ है इन आँखों का सपना,
बेवश बेचारे अब हम हो गए हैं, प्रभु कोई मारग हमें तुम सुझाना.
किसी ने तो दिल को सहारा दिया है, शायद फिर से बरस जाये पानी,
इसी आस में अब बैठे हैं सारे, उम्मीदों की अपनी अलग है कहानी.
जरा सोचो तुम उनका भी प्यारे, जिन्हें काम से कल निकाला गया था,
मिटे थे किसी के जीवन के लक्षण, तिनके ने किसको किनारा दिया था.
बुझाने चलोगे अगर प्यास को तुम, रास्ता है कैसा जरा देख लेना,
थोड़ी सी जल्दी पड़ सकती भारी, निराशा में आशा की लौ ढूंढ़ लेना,
नहीं मानेंगे कोई बन्धु हमारे, अपनी दिशा वो नयी सी चुनेंगे,
हमारा अभी तो यहीं है समर्पण, इसी राह सोचा है आगे बढ़ेंगे.

5 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया इस्तेमाल धनाक्षरी छंद का..प्रभावित किया रचना ने अपनी बात कहते हुए. बेहतरीन!

कविता रावत said...

थोड़ी सी जल्दी पड़ सकती भारी, निराशा में आशा की लौ ढूंढ़ लेना,
नहीं मानेंगे कोई बन्धु हमारे, अपनी दिशा वो नयी सी चुनेंगे,
हमारा अभी तो यहीं है समर्पण, इसी राह सोचा है आगे बढ़ेंगे.
.....बहुत गहरे भाव ..
मन में आशा ही तो है जो जीने को प्रेरित करती है वरना दिल तो कब का टूट जाता..
सार्थक रचना के लिए धन्यवाद.

RAJ said...

badhiya bhai!

avdhesh said...

Bhahut badiya hai Pandeyji..

निर्झर'नीर said...

जरा सोचो तुम उनका भी प्यारे, जिन्हें काम से कल निकाला गया था,
मिटे थे किसी के जीवन के लक्षण, तिनके ने किसको किनारा दिया था.



bhai jaan kavita ka marm bahut gahra hai ...lekin gunjaish bahut thii ras bharne ki ,jo aap yakinan kar sakte hai ,,,,,,,,,kuch sringaar kijiye dulhan ki tarah lagegi kavita