धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, May 14, 2010

जाति आधारित जनगणना:प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो

आज के आधुनिक दौर में जब सामाजिक समरसता स्थापित हो रही है, तब हमारी सरकार समाज को फिर विभिन्न वर्गों में बाँटने के लिए जाति आधारित जनगणना कराने के लिए संकल्पित दिख रही है. अंग्रेजो ने फूट का जो बीज बोया था, उसका परिणाम हम भुगत चुके हैं. अब फिर से हमारे समाज को बाँटने की कोशिश की जा रही है, इसी विषय पर अपने मन की भावना को मैंने एक कविता रूप में उतारने का प्रयास किया है. 

देशभक्त बन्धु देश की एकता की बात करते हैं,
और कुछ लोग समाज को बाँटकर राज करते हैं.
समरसता के दौर में, जब जाति भेद मिटने लगा,
वोट के सौदागरों का, तब खेल बिगड़ने लगा.


बाँट कर समाज को, राज जो करते रहे,
पिछड़े और दलित में, वो शब्द जोड़ते रहे.
उनकी घिनौनी बात से, जब लोग उबने लगे,
क्या करें फिर से नया, मंत्री जी सोचने लगे.

भर रहा जो जख्म है, फिर से वही कुरेद लो,
संख्या बल में बाँट कर, रोटी अपनी सेंक लो.
सरकार चलाता हूँ मैं भैया, बात मेरी सब मान लो,
नए सिरे से जनगणना कर, जाति सबकी जान लो.

देश विरोधी हैं ये मंत्री, निजी स्वार्थ के लिए बने,
जागे रक्षक भागे भक्षक , जनता अपनी राह चुने.
सावधान हो बन्धु मेरे, भेद-भाव का नाम ना हो,
प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो.

3 comments:

Farming Imagination and Desires said...

Very well said....

rach said...

Too true!
Bahut achhe kavi ho awadhesh

निर्झर'नीर said...

aamiin



देश विरोधी हैं ये मंत्री, निजी स्वार्थ के लिए बने,
जागे रक्षक भागे भक्षक , जनता अपनी राह चुने.
सावधान हो बन्धु मेरे, भेद-भाव का नाम ना हो,
प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो.