धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, May 9, 2010

मातृ दिवस पर विशेष

विदेशी संस्कृति को अपनाने की होड़ में हमने माँ के वात्सल्य को सिर्फ एक दिन तक सीमित कर दिया है. अपनी भावना को कविता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ. प्रसंग मेरे मित्र का है, उन्होंने मुझे माँ को कुछ उपहार देने का सुझाव दिया था.

धन्यवाद दो प्रिय सखे, सादर प्रेम विधाता का,
मित्र मेरे मुझसे बोले, आज दिवस है माता का.

जन्म दिया है माँ ने तुमको, त्याग तुम्हारे लिए किया,
अपने रक्त से सींचा तुमको, पालन पोषण प्यार किया.

एहसान मानकर उनका तुम, उपहार कोई ले आना,
सादर श्रद्धा से माता की, चरणों में शीश झुकाना.

मै बोला उनसे मित्र मेरे, उपकार मानना धर्म है,
पर दिवस एक क्या वर्ष में, आदर्श पुत्र का कर्म है.

जीवन में माँ के क़र्ज़ को, मैं कभी उतार जो पाऊं,
प्रतिदिन हरक्षण प्रिय सखे, मैं मातृ दिवस मनाऊं.

ना माँगेगी माता तुमसे, रक्त का अपने मोल सखे,
दे सकते हो तो दे देना, मधुर प्रेम के बोल सखे.

3 comments:

nilesh mathur said...

बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है, मदर्स डे की शुभकामना!

निर्झर'नीर said...

बात बहुत ही सुन्दर है, उपकार मानना धर्म है,
पर एक दिवस क्या वर्ष में, आदर्श पुत्र का कर्म है.

जीवन में माँ के क़र्ज़ को, मैं कभी उतार जो पाऊं,
प्रतिदिन हरक्षण प्रिय सखे, मैं मातृ दिवस मनाऊं.

अवधेश जी ..जवाब नहीं लाजवाब
सागर में गागर

ABHISHEK said...

wow....its awesome......touchint to my heart.....