धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, May 6, 2010

क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने

आज के सामाजिक घटनाक्रम में एक उच्च शिक्षित बेटी सारे परिवार को अपने गर्भवती होने की सूचना देकर हतप्रभ कर देती है और अपने उस प्रेमी को सही मानती है जिसने विवाह की रस्म निभाने से पहले ही सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं. उस माँ कर दर्द बयाँ करने की एक कोशिश निम्न पंक्तियों में की है.


माँ की ममता क्या होती है, शायद जाना था ना तुमने, 
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.  
जब तुम जीवन में थी आयी, खुशियों की सौगात थी लाई.
जीवन पूर्ण लगा था मुझको, मातृशक्ति थी मैंने पाई.
मधुर स्पर्श कोमल अंगो का, मीठा दर्द उठा था मुझमें.
पिता तुम्हारे बेहद खुश थे, जैसे सब कुछ पाया तुममें.

उत्साहित थे घर में हम सब, वस्त्र खिलौने सब कुछ लाये.
वक्त चला था धीरे धीरे, क्षण क्षण अपना प्रेम जगाये.
आखिर वह बेला भी आयी, सूक्ष्म कलि सी तुम मुस्काई,
मित्र, सम्बन्धी और पडोसी, बोले घर में लक्ष्मी आयी.

तुम लक्ष्मी हो यही मानकर, आदर भाव दिया था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

पालन पोषण और शिक्षा का, हर पल ध्यान रखा था हमने,
रीति नीति की बात हमेशा, प्रतिदिन समझाया था सबने.
मधुर स्वप्न थे बड़े सुहाने, सच माना था दिल में मैंने.
प्रतिभा कौशल के दम पर ही, मेरा मान रखा था तुमने.

मर्यादा का पालन करनामस्तक सबका ऊँचा रखना,
बुरे भले का ध्यान भी करना, दादाजी का था यह कहना.
आंखे नम थी भीगी पलकें, दूर शहर को जब तुम आयी.
बहना जल्दी लौट के आना, भैया ने आवाज़ लगाई.

पहली बार अलग थी हमसे, कैसे दिन काटा था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

उच्च शिखर पर जब तुम पहुची, भूल गयी थी नैतिक शिक्षा,
रोये थे तब पिता तुम्हारे, ली थी तुमने अग्नि परीक्षा,
भैया का तो हाल बुरा था, वर्षों का था साथ तुम्हारा,
क्षण में तोडा था तुमने जब, दुनिया का ये रिश्ता न्यारा.

क्या सोचा था एक बार भी, हम भी हैं इस दुनिया में,
सामाजिक हैं ताने बाने, रहना हमको भी है इसमें,
चंद माह का रिश्ता भारी, वर्षों के लालन पालन पर,
फिर भी रहो सदा तुम बेटी, अपनी बगिया में खुश होकर.

भूल हुयी थी कहाँ पर हमसे, जिसकी सजा दिलाई तुमने,
तुम क्या जानो दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

3 comments:

अनामिका की सदाये...... said...

wah nahi kahungi...par bahut marmik rachna..puri bhaavnaye nichod kar rakh di hai.

honesty project democracy said...

मन को छूती अभिवयक्ति भावनाओं की छटा बिखेरती पोस्ट के लिए धन्यवाद /

vivek said...

माँ के दर्द की अभिव्यक्ति निःसंदेह आपने काफी मार्मिक ढंग से प्रस्तुत की है .माँ की ममता का यह उदबोधन मन को छूता है