धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Sunday, May 23, 2010

ब्लॉग जगत में भी धर्म एक बिकाऊ माल है

ब्लॉग जगत में बहुत सारे लोग हैं, भीड़ से अलग दिखने वाले और भीड़ में शामिल, बहुत सारे धर्मनिरपेक्ष ब्लोगर भी हैं तो कुछ ऐसे  भी हैं जो अपने धर्म की अच्छाईयाँ और अन्य धर्मों की बुराइयाँ निकालने में बहुत आगे रहते हैं. धर्म के पक्ष में बोलने वाले लोग तो हैं ही अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले लोग भी धर्म से ऊपर नहीं उठ पाते हैं. दिखावे के लिए उनकी कुछ अन्य पोस्ट भी आती रहती हैं.
हाँ कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने लगातार प्रयास करते हुए अपने आप को स्थापित किया है.
लेकिन विश्लेषण करने से पता चलता है की सिर्फ राजनीति में ही नहीं ब्लॉग जगत में भी धर्म एक बिकाऊ माल है.
हिट होने का शक्ति वर्धक फार्मूला......

Saturday, May 22, 2010

वेतन में अपेक्षित वृद्धि ना होने से दुखी सहयोगियों को समर्पित कविता

वेतन बढ़त की थी वर्षा रे भैया, तमन्ना संजोयी थी भीगेंगे अबकी,
अरमान टूटे मिले सबको आंसू, आशा ना पूरी हुई आज सबकी.
बादल थे गरजे बहुत धीरे धीरे, मन में वो संशय मचाते रहे थे.
थोड़ी सी छीटें हम पर भी आयीं, पवन सारे अरमान उड़ाते रहे थे.
मंहगाई हम सबको भारी पड़ी है, मुश्किल हुआ है इन आँखों का सपना,
बेवश बेचारे अब हम हो गए हैं, प्रभु कोई मारग हमें तुम सुझाना.
किसी ने तो दिल को सहारा दिया है, शायद फिर से बरस जाये पानी,
इसी आस में अब बैठे हैं सारे, उम्मीदों की अपनी अलग है कहानी.
जरा सोचो तुम उनका भी प्यारे, जिन्हें काम से कल निकाला गया था,
मिटे थे किसी के जीवन के लक्षण, तिनके ने किसको किनारा दिया था.
बुझाने चलोगे अगर प्यास को तुम, रास्ता है कैसा जरा देख लेना,
थोड़ी सी जल्दी पड़ सकती भारी, निराशा में आशा की लौ ढूंढ़ लेना,
नहीं मानेंगे कोई बन्धु हमारे, अपनी दिशा वो नयी सी चुनेंगे,
हमारा अभी तो यहीं है समर्पण, इसी राह सोचा है आगे बढ़ेंगे.

Wednesday, May 19, 2010

असफल प्रेम का सुखद अंत

असफल प्रेम के पश्चात् जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि सच्चा प्रेम जीने की ताकत देता है. किसी का बाग़ उजाड़ कर अपना घर बसाने से अच्छा है की अपना नया घर बसाया जाये और उसे ही सुन्दर फूलों से सजाया जाये. आज के वातावरण में लोग प्रेम में असफल होने पर अपना या अपने प्रेमी/प्रेमिका का जीवन संकट में डाल देते हैं और आने वाले सुखद पलों से अनायास ही वंचित हो जाते हैं. इस कविता में एक प्रेमी के ह्रदय के उद्गार द्वारा उन्ही लोगों को सन्देश देने की कोशिश की है.

कोई था दिल ने जिसे हरदम समझा अपना,
अधुरा था जिनके बिना मेरा हर एक सपना.
मंदिरों में जिनके लिए, की थी मैंने पूजा,
पसंद था उनको, साथी कोई और दूजा.
प्रेम किया था मैंने उनसे, पल पल उसे निभाया,
शायद उनकी मजबूरी थी, जो प्यार मेरा ठुकराया.
क्रोध प्रेम का द्वन्द उठा जब, विजय प्रेम ने पायी,
दुनिया अपनी अलग हुई जब, आँख मेरी भर आयी.
वो खुश हैं अब घर पर अपने, हम भी खुश अपनी बगिया में
सच्चे प्यार का अर्थ है जीवन, एक सत्य है इस दुनिया में.

Saturday, May 15, 2010

गरीब की जाति

जनगणना करने आया अधिकारी मेरे गाँव में,
बैठ गया वो मंदिर पर पीपल की छाँव में,
बोला ग्रामवासियों से अपनी जाति मुझे बताओ,
मौका है प्रिय बन्धु आज फिर से इसे भुनाओ.

उठा एक व्यक्ति बोला, पूरी बात मुझे समझाओ,
गरीब की कोई जाति हो तो उसको मुझे बताओ.
कब तक हमको ऐसा  भेद भाव सिखाओगे,
कितने वर्षों के बाद हमें हिन्दुस्तानी बनाओगे.

अधिकारी बोला भैया मेरे फरमान ऊपर से लाया हूँ,
बोया है जो बीज तुमने फल उसका देने  आया हूँ.
जब तक जाति के नाम पर तुम वोट देते रहोगे,
हिन्दुस्तानी बनने के लिए वर्षों तरसते रहोगे.

Friday, May 14, 2010

जाति आधारित जनगणना:प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो

आज के आधुनिक दौर में जब सामाजिक समरसता स्थापित हो रही है, तब हमारी सरकार समाज को फिर विभिन्न वर्गों में बाँटने के लिए जाति आधारित जनगणना कराने के लिए संकल्पित दिख रही है. अंग्रेजो ने फूट का जो बीज बोया था, उसका परिणाम हम भुगत चुके हैं. अब फिर से हमारे समाज को बाँटने की कोशिश की जा रही है, इसी विषय पर अपने मन की भावना को मैंने एक कविता रूप में उतारने का प्रयास किया है. 

देशभक्त बन्धु देश की एकता की बात करते हैं,
और कुछ लोग समाज को बाँटकर राज करते हैं.
समरसता के दौर में, जब जाति भेद मिटने लगा,
वोट के सौदागरों का, तब खेल बिगड़ने लगा.


बाँट कर समाज को, राज जो करते रहे,
पिछड़े और दलित में, वो शब्द जोड़ते रहे.
उनकी घिनौनी बात से, जब लोग उबने लगे,
क्या करें फिर से नया, मंत्री जी सोचने लगे.

भर रहा जो जख्म है, फिर से वही कुरेद लो,
संख्या बल में बाँट कर, रोटी अपनी सेंक लो.
सरकार चलाता हूँ मैं भैया, बात मेरी सब मान लो,
नए सिरे से जनगणना कर, जाति सबकी जान लो.

देश विरोधी हैं ये मंत्री, निजी स्वार्थ के लिए बने,
जागे रक्षक भागे भक्षक , जनता अपनी राह चुने.
सावधान हो बन्धु मेरे, भेद-भाव का नाम ना हो,
प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो.

Sunday, May 9, 2010

संघ के सामाजिक कार्य और दिग्गी राजा की चिंता

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर आई है, जिसमें श्री दिग्विजय सिंह जी माननीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिलकर सामाजिक कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा  में संघ द्वारा संचालित शिक्षण केन्द्रों के प्रतियोगियों की बड़ी सफलता पर चिंतित है. दिग्विजय जी की चिंता को मैंने कविता का रूप दे दिया है, जो कुछ इस प्रकार है.

संघ का बढ़ता रूप देखकर, डर गए दिग्गी राजा,
बोले जाकर चिदंबरम से, बज गया अपना बाजा.
संघवृक्ष है बहुत निराला, इससे मुझे बचाओ,
लहराते है परचम अपना, कोई जुगत लगाओ.

प्रतियोगी का ज्ञान बढाकर, काबिल उन्हें बनाता है,
बहुत सफल प्रतियोगी होकर, सेवा में आ जाता है.
संघ शक्ति का बोध कराकर, अच्छा भाव सिखाता है,
राष्ट्र भावना सर्वोपरि कर,  सच्चा मार्ग दिखाता है.


आगे बहुत हो रहे संघी. सन्देश यही मैं लाया हूँ,
पीड़ा बहुत हो रही मुझको, चिंतन करने आया हूँ.
चिदंबरम फिर बोले बाबू, इसका पता लगाऊंगा,
क्षमता है पर जिसके अन्दर, रोक उसे क्या पाउँगा.

पंक्तियाँ टाइम्स आफ इंडिया के निम्नांकित खबर लिंक पर आधारित हैं.
http://timesofindia.indiatimes.com/india/After-Naxal-spat-Diggy-meets-PC-over-RSS-in-social-sector/articleshow/5904099.cms

मातृ दिवस पर विशेष

विदेशी संस्कृति को अपनाने की होड़ में हमने माँ के वात्सल्य को सिर्फ एक दिन तक सीमित कर दिया है. अपनी भावना को कविता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ. प्रसंग मेरे मित्र का है, उन्होंने मुझे माँ को कुछ उपहार देने का सुझाव दिया था.

धन्यवाद दो प्रिय सखे, सादर प्रेम विधाता का,
मित्र मेरे मुझसे बोले, आज दिवस है माता का.

जन्म दिया है माँ ने तुमको, त्याग तुम्हारे लिए किया,
अपने रक्त से सींचा तुमको, पालन पोषण प्यार किया.

एहसान मानकर उनका तुम, उपहार कोई ले आना,
सादर श्रद्धा से माता की, चरणों में शीश झुकाना.

मै बोला उनसे मित्र मेरे, उपकार मानना धर्म है,
पर दिवस एक क्या वर्ष में, आदर्श पुत्र का कर्म है.

जीवन में माँ के क़र्ज़ को, मैं कभी उतार जो पाऊं,
प्रतिदिन हरक्षण प्रिय सखे, मैं मातृ दिवस मनाऊं.

ना माँगेगी माता तुमसे, रक्त का अपने मोल सखे,
दे सकते हो तो दे देना, मधुर प्रेम के बोल सखे.

Thursday, May 6, 2010

क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने

आज के सामाजिक घटनाक्रम में एक उच्च शिक्षित बेटी सारे परिवार को अपने गर्भवती होने की सूचना देकर हतप्रभ कर देती है और अपने उस प्रेमी को सही मानती है जिसने विवाह की रस्म निभाने से पहले ही सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं. उस माँ कर दर्द बयाँ करने की एक कोशिश निम्न पंक्तियों में की है.


माँ की ममता क्या होती है, शायद जाना था ना तुमने, 
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.  
जब तुम जीवन में थी आयी, खुशियों की सौगात थी लाई.
जीवन पूर्ण लगा था मुझको, मातृशक्ति थी मैंने पाई.
मधुर स्पर्श कोमल अंगो का, मीठा दर्द उठा था मुझमें.
पिता तुम्हारे बेहद खुश थे, जैसे सब कुछ पाया तुममें.

उत्साहित थे घर में हम सब, वस्त्र खिलौने सब कुछ लाये.
वक्त चला था धीरे धीरे, क्षण क्षण अपना प्रेम जगाये.
आखिर वह बेला भी आयी, सूक्ष्म कलि सी तुम मुस्काई,
मित्र, सम्बन्धी और पडोसी, बोले घर में लक्ष्मी आयी.

तुम लक्ष्मी हो यही मानकर, आदर भाव दिया था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

पालन पोषण और शिक्षा का, हर पल ध्यान रखा था हमने,
रीति नीति की बात हमेशा, प्रतिदिन समझाया था सबने.
मधुर स्वप्न थे बड़े सुहाने, सच माना था दिल में मैंने.
प्रतिभा कौशल के दम पर ही, मेरा मान रखा था तुमने.

मर्यादा का पालन करनामस्तक सबका ऊँचा रखना,
बुरे भले का ध्यान भी करना, दादाजी का था यह कहना.
आंखे नम थी भीगी पलकें, दूर शहर को जब तुम आयी.
बहना जल्दी लौट के आना, भैया ने आवाज़ लगाई.

पहली बार अलग थी हमसे, कैसे दिन काटा था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

उच्च शिखर पर जब तुम पहुची, भूल गयी थी नैतिक शिक्षा,
रोये थे तब पिता तुम्हारे, ली थी तुमने अग्नि परीक्षा,
भैया का तो हाल बुरा था, वर्षों का था साथ तुम्हारा,
क्षण में तोडा था तुमने जब, दुनिया का ये रिश्ता न्यारा.

क्या सोचा था एक बार भी, हम भी हैं इस दुनिया में,
सामाजिक हैं ताने बाने, रहना हमको भी है इसमें,
चंद माह का रिश्ता भारी, वर्षों के लालन पालन पर,
फिर भी रहो सदा तुम बेटी, अपनी बगिया में खुश होकर.

भूल हुयी थी कहाँ पर हमसे, जिसकी सजा दिलाई तुमने,
तुम क्या जानो दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.