धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Saturday, April 17, 2010

आतंकवाद, कश्मीर समस्या, कथित नक्सलवाद और चाटुकार राजनीतिज्ञ

आपको ब्लॉग का शीर्षक थोडा सा असामान्य लग रहा होगा लेकिन मुझे कोई और शीर्षक समझ नहीं आया जिसमें राष्ट्र की ज्वलंत समस्याओं पर अपने विचार रख सकूं. ब्लॉग और लेखन जगत में नया हूँ, सीख रहा हूँ इसलिए कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें.
आतंकवाद की चर्चा करते हुए अफजल गुरु, कसाब आदि का नाम अनायास आ जाता है, जिसमें कसाब तो रोज़ रोज़ हमारी न्याय पद्यति को मुँह चिढ़ाता रहा है और अफजल गुरु को लेकर न्याय की आस में बैठे हुए भारतीयों की मनोकामना कब पूरी होगी न्याय की देवी को खुद नहीं पता.
अभी कुछ दिन पहले बटला हॉउस मुठभेड़ पर सवाल उठाने और एक धर्म विशेष के वोट लेने की तड़प ने आजमगढ़ को तीर्थस्थान बना दिया है,  देश पर शासन कर रही पार्टी के एक ज़िम्मेदार नेताजी वहां जाकर अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा चुके हैं और मुठभेड़ पर प्रश्नचिन्ह भी लगा चुके हैं. संयोगवश बरेली में दंगे हो गए और उत्तर प्रदेश सरकार पर सबूतों के होते हुए भी धार्मिक नेता को  छोड़ने के आरोप के कारण वहां जाने वाले श्रद्धालुओं में कुछ कमी आई है वरना 2014 के प्रधानमंत्री पद के कथित दावेदार भी वहां जाकर श्रद्धा से शीश झुकाने वाले थे ऐसा सुनने में आया था. खैर देश के हालात और उठ रहे विरोध के कारण नेता जी वहां नहीं गए और चर्चा पर विराम लग गया है.
सरकार सीमापार प्रशिक्षण लेने गए आतंकवादियों को वापस लाकर उन्हें पेंशन देने की योजना बना रही है लेकिन कश्मीर के विस्थापित पंडितों कि सुध लेने वाला कोई नहीं है. कश्मीर के अन्य भागों से विस्थापित पंडित पहले श्रीनगर आकर बसे लेकिन फिर वहां से भी भगा दिए गए थे. क्या राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि कश्मीरी पंडितों को फिर से उनका खोया हुआ मान सम्मान और जायदाद वापस दिलाये.
दंतेवाडा की घटना ने नक्सलवाद पर बहस छेड़ रखी है. वैसे तो नक्सलवाद के जनक रहे नेता ही नक्सली आन्दोलन को ख़त्म हुआ मान चुके हैं लेकिन कुछ दरिन्दे नक्सलवाद की आड़ में खूनी खेल खेल रहें है और उन्हें देश के चंद राजनीतिज्ञों का समर्थन भी मिल रहा है, देश के दुर्भाग्य से ये राजनीतिज्ञ जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और देश और सरकार में बड़े पदों पर आसीन हैं. प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने इस मुद्दे पर सरकार को पूरा समर्थन दे रखा है, लेकिन सरकार के अपने लोग ही नहीं तय कर पा रहें है कि इन दरिंदों से कैसे लड़ा जाये. देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की राय भी विभिन्न है और सार्वजानिक भी है. इससे यह पता चलता है कि दंतेवाडा के दरिंदों के विरुद्ध सरकार के पास अभी तक कोई ठोस रणनीति नहीं है. देश के कुछ बुद्धिजीवी इन असुरों के खेल को सही ठहराते हैं लेकिन उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं होता कि ये कथित नक्सली बात करने को क्यों नहीं तैयार होते और जब देश और प्रदेश में जनता कि चुनी हुयी सरकार है तो सशस्त्र क्रांति का क्या मतलब है?
दंतेवाडा में देश के जो 76 वीर सपूत शहीद हुए हैं उनकी सुध लेने कि फ़िक्र चाटुकार नेताओं और उनके मालिकों को नहीं है, उन वीर सपूतों के घर, जहाँ वो पले बढे और खेले, क्या आतंकवादियों के घर की तुलना में कम हैसियत रखतें हैं? लेकिन वोटों की राजनीति और अम्बेडकर जी की विरासत कि लड़ाई में उलझे हुए नेता दंतेवाडा के शहीदों को भूल गए.
ज़रा सोचिये इन राजनीतिज्ञों का स्तर क्या है जिन्हें देश के शहीदों के घर जाते हुए शर्म आती है, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा जैसे शहीदों की शहादत पर सवाल उठाते हैं और आतंकवादियों के घर को तीर्थस्थान समझते हैं, क्या वास्तव में यह देश के प्रतिनिधि बनने लायक हैं?
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चलते चलते: आज कल देश में कहीं कुछ भी होता है तो मीडिया और समाज के चाटुकार लोग नरेन्द्र भाई मोदी का नाम अकारण ही घसीट रहें है, ऐसे लोगों से सावधान रहें और पूरी जांच पड़ताल के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुचें.
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2 comments:

Ajay said...

you are right,and keep writing...

zeal said...

there is some problem in sending comments