धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Tuesday, April 27, 2010

नैतिक और अनैतिक का ध्यान: एक बोध कथा

गुजरात के एक गाँव में रहने वाले सभी लोग बहुत ज्यादा धार्मिक प्रवृति के थे, सभी लोग प्रतिदिन वैदिक संस्कृति के अनुसार हवन पूजन किया करते थे और प्रसन्न थे. संयोग वश एक दिन सुबह गाँव की एक महिला अपने घर में दातुन कर रही थी कि उसी समय एक कुत्ता घर में आ गया जिसे भगाते वक्त महिला ने अनजाने में हवन कुण्ड में थूक दिया और उसे साफ करना भूल गयी. निश्चित समय पर उसी कुण्ड में हवन किया गया और महिला को भी ध्यान नहीं रहा कि हवन कुण्ड गन्दा था.अगले दिन हवन कुण्ड साफ करते वक्त महिला को कुण्ड में कुछ स्वर्ण मिला, महिला ने सोचा कि शायद यह थूक का ही चमत्कार है. अब उसके मन में लालच आ गया और उसने उस रोज़ भी कुण्ड में थूक दिया. अगले दिन कुण्ड को साफ़ करते हुए उसे फिर से स्वर्ण मिला. महिला ने अपने पति को सारी बात बताई, पति ने उसे ऐसा करने से मना करते हुए हिदायत दी कि वह किसी और से इस घटना के बारे में कुछ न बताये.
महिला ने पति की बात से असहमति जताते हुए न सिर्फ उसी प्रकार स्वर्ण बनाना जारी रखा अपितु सारे गाँव वालों को भी घटना के बारे में बताया. अब क्या था सारे गाँव वालों ने भी लालच के वशीभूत होकर उसी तरीके से स्वर्ण बनाना शुरू कर दिया और सदियों से चली आ रही अपनी परंपरा को भूल गए.
गाँव के एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को ऐसा करने से मना करते हुए कहा कि अगर वो ऐसे तरीके से स्वर्ण अर्जित करने का प्रयास करेगी तो वह उसे छोड़कर अन्यत्र चला जायेगा. अब गाँव में सिर्फ वही एक घर बचा था जो नियमित रूप से शुद्ध सात्विक तरीके से हवन पूजन करता था, बाकि सब लोग अवांछित तरीके से धन संपदा अर्जित करने के चक्कर में अपने द्वारा पूर्व में किये गए पुण्य भी गवां चुके थे.देखते ही देखते गाँव में बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं खड़ी हो गयी और गाँव के लोगों के पास सुख सुविधा के सारे साधन उपलब्ध हो गए.
अब गाँव में सिर्फ वही व्यक्ति गरीब था, जिसने थूक से स्वर्ण बनाने से इनकार कर दिया था. उसकी पत्नी ने कहा अगर हम ऐसे ही जीना है तो हमें यहाँ से कहीं दूर चले जाना चाहिए ताकि हमें नित्य ऐसे लोगों के दर्शन न करने पड़े जो नैतिक और अनैतिक का ध्यान किये बिना धन सम्पदा कमाने में व्यस्त हैं. पत्नी की बातों से सहमति जताते हुए पति ने कहा ठीक है, हम लोग कहीं अन्यत्र चलते है. ऐसा कह कर वह परिवार अपना सामान समेट कर गाँव से प्रस्थान कर गया. उनके गाँव की सीमा से बाहर निकलते ही एक चमत्कार हुआ और गाँव धू धू कर जलने लगा, शेष गाँव वाले और उनकी सम्पदा उसी आग में जलकर नष्ट हो गए.
वस्तुतः गाँव उन्ही पुण्यात्माओं की वजह से बचा हुआ था और उनके गाँव से निकलते ही ईश्वर के प्रकोप ने उस गाँव को खाक में मिला दिया.
ऐसे ही हमारी धरती पर भ्रष्टाचार चरम पर होते हुए भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पुण्य और अनैतिक तरीके से धन सम्पदा न अर्जित करने के प्रबल संकल्प ने धरती को बचा कर रखा है. हमें ऐसे व्यक्तियों का आभारी होना चाहिए एवं उन्ही के जैसा बनाने का प्रयास करना चाहिए.
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चलते चलते:
क्रिकेट के आई पी एल स्वरूप के थूक रूपी स्वर्ण ने अन्य सभी खेलों को हासिये पर लाकर छोड़ दिया है. कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग तो आई पी एल देखने से पहले सोचेगा तो की इस खेल में भ्रष्टाचार और अश्लीलता का ज़बरदस्त मिश्रण किन पैसों से बना है. सरकार तो संयुक्त संसदीय समिति से जांच करने से रही, दोषियों को सजा भी नहीं मिलेगी क्योंकि दोषी कोई होगा ही नहीं. इन सब की तो चर्चा भी नहीं हुई होती अगर अपने बडबोले मंत्री जी को त्यागपत्र न देनापड़ता.
लेकिन हम फिर भी उम्मीद करते हैं की शायद अब आई पी एल की उलटी और अन्य खेलों की क्रमिक गिनती शुरू हो.
जय हो.

Saturday, April 17, 2010

आतंकवाद, कश्मीर समस्या, कथित नक्सलवाद और चाटुकार राजनीतिज्ञ

आपको ब्लॉग का शीर्षक थोडा सा असामान्य लग रहा होगा लेकिन मुझे कोई और शीर्षक समझ नहीं आया जिसमें राष्ट्र की ज्वलंत समस्याओं पर अपने विचार रख सकूं. ब्लॉग और लेखन जगत में नया हूँ, सीख रहा हूँ इसलिए कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें.
आतंकवाद की चर्चा करते हुए अफजल गुरु, कसाब आदि का नाम अनायास आ जाता है, जिसमें कसाब तो रोज़ रोज़ हमारी न्याय पद्यति को मुँह चिढ़ाता रहा है और अफजल गुरु को लेकर न्याय की आस में बैठे हुए भारतीयों की मनोकामना कब पूरी होगी न्याय की देवी को खुद नहीं पता.
अभी कुछ दिन पहले बटला हॉउस मुठभेड़ पर सवाल उठाने और एक धर्म विशेष के वोट लेने की तड़प ने आजमगढ़ को तीर्थस्थान बना दिया है,  देश पर शासन कर रही पार्टी के एक ज़िम्मेदार नेताजी वहां जाकर अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा चुके हैं और मुठभेड़ पर प्रश्नचिन्ह भी लगा चुके हैं. संयोगवश बरेली में दंगे हो गए और उत्तर प्रदेश सरकार पर सबूतों के होते हुए भी धार्मिक नेता को  छोड़ने के आरोप के कारण वहां जाने वाले श्रद्धालुओं में कुछ कमी आई है वरना 2014 के प्रधानमंत्री पद के कथित दावेदार भी वहां जाकर श्रद्धा से शीश झुकाने वाले थे ऐसा सुनने में आया था. खैर देश के हालात और उठ रहे विरोध के कारण नेता जी वहां नहीं गए और चर्चा पर विराम लग गया है.
सरकार सीमापार प्रशिक्षण लेने गए आतंकवादियों को वापस लाकर उन्हें पेंशन देने की योजना बना रही है लेकिन कश्मीर के विस्थापित पंडितों कि सुध लेने वाला कोई नहीं है. कश्मीर के अन्य भागों से विस्थापित पंडित पहले श्रीनगर आकर बसे लेकिन फिर वहां से भी भगा दिए गए थे. क्या राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि कश्मीरी पंडितों को फिर से उनका खोया हुआ मान सम्मान और जायदाद वापस दिलाये.
दंतेवाडा की घटना ने नक्सलवाद पर बहस छेड़ रखी है. वैसे तो नक्सलवाद के जनक रहे नेता ही नक्सली आन्दोलन को ख़त्म हुआ मान चुके हैं लेकिन कुछ दरिन्दे नक्सलवाद की आड़ में खूनी खेल खेल रहें है और उन्हें देश के चंद राजनीतिज्ञों का समर्थन भी मिल रहा है, देश के दुर्भाग्य से ये राजनीतिज्ञ जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और देश और सरकार में बड़े पदों पर आसीन हैं. प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने इस मुद्दे पर सरकार को पूरा समर्थन दे रखा है, लेकिन सरकार के अपने लोग ही नहीं तय कर पा रहें है कि इन दरिंदों से कैसे लड़ा जाये. देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की राय भी विभिन्न है और सार्वजानिक भी है. इससे यह पता चलता है कि दंतेवाडा के दरिंदों के विरुद्ध सरकार के पास अभी तक कोई ठोस रणनीति नहीं है. देश के कुछ बुद्धिजीवी इन असुरों के खेल को सही ठहराते हैं लेकिन उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं होता कि ये कथित नक्सली बात करने को क्यों नहीं तैयार होते और जब देश और प्रदेश में जनता कि चुनी हुयी सरकार है तो सशस्त्र क्रांति का क्या मतलब है?
दंतेवाडा में देश के जो 76 वीर सपूत शहीद हुए हैं उनकी सुध लेने कि फ़िक्र चाटुकार नेताओं और उनके मालिकों को नहीं है, उन वीर सपूतों के घर, जहाँ वो पले बढे और खेले, क्या आतंकवादियों के घर की तुलना में कम हैसियत रखतें हैं? लेकिन वोटों की राजनीति और अम्बेडकर जी की विरासत कि लड़ाई में उलझे हुए नेता दंतेवाडा के शहीदों को भूल गए.
ज़रा सोचिये इन राजनीतिज्ञों का स्तर क्या है जिन्हें देश के शहीदों के घर जाते हुए शर्म आती है, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा जैसे शहीदों की शहादत पर सवाल उठाते हैं और आतंकवादियों के घर को तीर्थस्थान समझते हैं, क्या वास्तव में यह देश के प्रतिनिधि बनने लायक हैं?
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चलते चलते: आज कल देश में कहीं कुछ भी होता है तो मीडिया और समाज के चाटुकार लोग नरेन्द्र भाई मोदी का नाम अकारण ही घसीट रहें है, ऐसे लोगों से सावधान रहें और पूरी जांच पड़ताल के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुचें.
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Thursday, April 8, 2010

मीडिया और वास्तविक मुद्दे से उसका सरोकार

सानिया मिर्ज़ा, शोएब मालिक और आयशा की खबरे देखते और सुनते सुनते थक गया तो यह लेख लिखने को विवश हो गया. आम जनता के मुद्दे से मीडिया का कितना सरोकार है यह भी देखने को मिला, महगाई का मुद्दा हो, बरेली या हैदराबाद में हुए दंगे हों या आम जनता का पैसा गुलाम मंडल खेलों (कॉमन वेल्थ) में बरबाद करने वाली दिल्ली सरकार हो या ममता बनर्जी के दबाव में नक्सलियों के खिलाफ ढुलमुल रवैया. कहीं से भी देश का मीडिया ज़िम्मेदार नहीं दीखता.
एक पाकिस्तानी भारत आता है और मीडिया उसको सुपर हिट बना देता है, मीडिया उसकी शादी की ख़बरों को दिखाने में जनता का कितना समय व्यर्थ कर डालता है यह सोचकर लगता है की देश का बुद्दिजीवी वर्ग टीवी कैसे देखता होगा? और अगर देखता है तो सब कुछ कैसे सहता है.
अभी शादी में एक सप्ताह शेष है, फिर रिसेप्शन, सुहागरात, ससुराल, हनीमून आदि आदि ख़बरों से सारे के सारे चैनल भरे पड़े होंगे बेहूदगी की हद कहाँ तक होगी यह कल्पना भी नहीं की जा सकती.
नेहरू-गाँधी परिवार के दबाव में काम करने वाला मीडिया राहुल बाबा की शादी के समय क्या क्या करेगा इसका उत्तर मैं आपलोगों पर छोड़ता हूँ. आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.
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शोएब की आंधी में शिक्षा अधिकार बिल कहाँ गया पता ही नहीं चला.