धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, March 29, 2010

सावधान भारतीयों: मिशनरी स्कूलों कि शिक्षा बच्चों को ईसाईयत की ओर ले जा रही है.

प्रिय साथियों,

अगर आपका अपना, पडोसी, मित्र या रिश्तेदार का बच्चा किसी मिशनरी स्कूल में पढता हो तो सावधान हो जाएँ. मिशनरी स्कूलों कि शिक्षा आपके बच्चे को ईसाईयत की ओर धकेल रही है, आपका बच्चा जन्म, नाम और पूजा पद्यति से तो हिन्दू होगा लेकिन उसकी मानसिकता ईसाईयों की होगी. मतलब यह की वह हिन्दू सनातन संस्कृति को छोटा और विदेशी संस्कृति को बहुत अच्छा समझना शुरू कर देगा, उसे अपनी संस्कृति में बहुत सारी बुराइयाँ नज़र आने लगेंगी और अपनी संस्कृति कि अच्छाइयां नज़र नहीं आयेंगी.
एक दिन मैंने एक मित्र की मिशनरी स्कूल में पढ़ने वाली नौ वर्षीय बेटी से पूछा की भगवान राम और जीसस में कौन महान है, उसका उत्तर सुनकर सबके होश उड़ गए, उसने जीसस को महान बताया. मेरे मित्र भी भौचक्के रह गए, उनके यहाँ सुबह शाम रोज़ पूजा और आरती होती थी, बच्ची खुद भी पूजा में भाग लेती थी, लेकिन उसके बाल मन पर मिशनरी स्कूलों की शिक्षा भारी पड़ रही थी और उसे अपने धर्म से अलग कर रही थी. यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है की छोटे बच्चे को इसका बोध नहीं हो सकता लेकिन वह बोध कौन कराएगा इसका उत्तर किसी के पास नहीं है, आज के युग में दम्पति के पास इतना समय नहीं हो पाता या यह कहें की धन कमाने की अंधाधुंध प्रतियोगिता में हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहें है और अपने बच्चों को को उतना भी संस्कार नहीं दे पाते जितना हमें अपने माता पिता से मिला था.
ऐसे बच्चे जब बड़े होतें हैं, तो उन्हें अपनी संस्कृति से ज्यादा लगाव नहीं होता और उन्हें दूसरी संस्कृति में ढालना बेहद आसान होता है और वे हिन्दू संस्कृति को पिछड़ेपन की निशानी समझते हैं.
वैसे भी बहुत सारे भारतीय हिन्दू अंग्रेजी की मानसिक दासता स्वीकार कर चुके हैं. अभी भी समय है अपने बच्चों को हिन्दू स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजे, अगर किसी कारण वश मिशनरी स्कूल में भेजना ही पड़े तो बच्चे पर पूरी नज़र रखें और उसे संस्कारित करने की कोशिश करें. उन्हें वो सब किस्से कहानियां सुनाएँ जो आपने अपने माता पिता से सुनी थी. अपने बच्चे को श्रवण कुमार, सत्य हरिश्चंद्र, बालक आरुण, भगवान राम आदि महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ ताकि उनका इंसानियत के प्रति प्रेम बना रहें.
सावधान हो जाएँ की इसके पहले फिर कोई गज़नी या मैकाले आ कर हमारी संस्कृति पर हमला कर हमें अपना दास न बनाले.

आपका अपना
अवधेश.

चलते चलते उन लोगों के लिए, जिन्हें मेरा यह पोस्ट सांप्रदायिक लगता है.
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मानता हूँ की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन लोगों की धर्मनिरपेक्षता उस समय कहाँ चली जाती है, जब भारतीय संविधान एवं कानून का खुलेआम उलन्घन होता है. आपको शाह बानो प्रकरण याद ही होगा जब तुष्टिकरण के लिए सर्वोच्च न्यायलय तक की अवहेलना की गयी थी.
भारतीय संविधान के अनुसार सभी को धर्म का अधिकार मिला हुआ है, फिर हिन्दू हितों की अनदेखी क्यों. अभी बरेली में हुए दंगे इस बात के गवाह हैं की एक धर्म विशेष के दबाव के कारण सबूतों के होते हुए भी कुत्सित मानसिकता के साथ भाषण देने वाले धार्मिक नेता को छोड़ा गया, उस समय देश की धर्मनिरपेक्ष केंद्र सरकार और मीडिया या आप जैसे लोग क्यों बिल में घुसे रहे, क्या देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका दायित्व नहीं था की आप देश के कानून की धज्जियाँ उड़ते देख कुछ बोलते.
क्या आप मुझे यह विश्वास दिला सकते हो की भारतीय संविधान और कानून सबपर सामान रूप से लागू होगा और भारत देश में सभी धर्मो को बराबर समझा जायेगा?
आपको यह बात बहुत बुरी लगी और आपके सुझाव के अनुसार मुझे उस बच्चे से ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था, लेकिन मैं आपसे पूछता हूँ की क्या उन ईसाई स्कूलों का दायित्व नहीं है की बच्चों को भगवान राम, कृष्ण, श्रवण कुमार, विवेकानंद या अन्य महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ.
मैं ईसाई स्कूलों के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन देश की हिन्दू जनता को ईसाईयत की तरफ धकेलने वाली कोशिश का विरोधी हूँ. एक सोची समझी साजिश के तहत बच्चों को अपनी संस्कृति अपने धर्म से दूर किया जा रहा है क्या आपको पता नहीं की ईसाई स्कूलों में सिर्फ बाइबिल का गुणगान होता रहता है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सिर्फ बाइबिल ही क्यों, कुरआन और गीता क्यों नहीं. लेकिन आप जैसे लोग धरमनिर्पेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण होते हुए देख कर खुश हो.
आज इस देश में हिन्दू होना, हिन्दू हित की बात करना या प्राचीन धर्मग्रंथों जैसे वेद-पुराण, उपनिषद, गीता या रामायण का साम्प्रदायिकता कहलाता है. क्या यही आपकी धर्म निरपेक्षता है. मुझे खुद आप जैसे लोगों के विचारों पर तरस आता है, जो एक तरफ बड़ी बड़ी बातें करते हैं वहीँ दूसरी ओर हिन्दू हित की बात करना आपको साम्प्रदायिकता लगता है.
इस देश में जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोटों की गन्दी राजनीति हो रही हो तो अपने बच्चों को सावधान करना ही एक मात्र उपाय है. प्रत्येक हिन्दू के लिए भारत उसकी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है, भारत को परम वैभव पर पहुचाना ही हमारा लक्ष्य है.
आप मुझे विश्वास दिला दो की आज से देश में सभी लोगों को समान अधिकार दिए जायेंगे, तुष्टिकरण के लिए फिर एक संविधान संशोधन नहीं होगा. देश में एक ही कानून होगा जो सब पर लागू होगा, अगर नहीं कर सकते तो मेरे साथ बोलो. "जागो तो एक बार हिन्दू जागो तो" 

9 comments:

C___K said...

अवधेश जी.
नमस्कार!
आपने लिखा है की मिशिनरी स्कूलों में सांप्रदायिक ईसाइयत की शिक्षा दी जाती है .. क्योंकि जब आपने ९ साल की बच्ची से ये पूछा की राम और जीसस में महान कौन है तो उसका उत्तर आपको पसंद नही आया...
में पूछता हूँ की ये प्रश्न पूछ कर आप उस बच्ची को क्या साम्प्रदायिकता की तरफ नही धकेल रहे थे.. एक ९ साल की अबोध बच्ची जिसे संभवतः अभी यह भी ज्ञान नही होगा की हिन्दू और इसाई दोनों धर्मो में अंतर क्या है. . जो अभी तक सिर्फ यही समझ पाई होगी की हिन्दू और इसाई दोनों में अन्तर बस इतना ही है की एक मंदिर जाता है और दूसरा चर्च.. .. उसके मन में यह विष भरना की ... नही राम महान थे, जीसस नही... ये जरुरी है??..
जिसके मन-मस्तिक में बचपन से ही इस तरह की भावनाएं जहर की तरह भर दी जाएँ वो क्या हमारे महान राष्ट्र की महान पंथ-निरपेक्षता को कभी समझ पायेगा...

अच्छा.. एक बात स्पष्ट कीजियेगा..कहीं आप भारतीय संस्कृति को 'बस हिन्दू संस्कृति' समझ लेने की भूल तो नही कर रहे हैं??
दोस्त, भारत की संस्कृति 'अनेकता में एकता' में है.. इस अनेकता का खंडन करना, इस एकता का खंडन करना.. ये गलत है..खिलाफ है हमारी संस्कृति के.. ये भारत की महानता है की हमारी संस्कृति में हर रंग है.. और विश्वास रखिये अवधेश जी.. कई रंग मिलके इन्द्रधनुष बनते हैं.. बशर्ते हम लोगो को चेतना का ये समग्र रूप दिखा सके...

और एक खास बात.. मैंने कुछ मिशिनरी स्कूलों को बहुत समीप से देखा है.. और बचपन में आर.एस.एस. से जुड़े रहने के कारन उसे भी अच्छी तरह समझा ही है... वास्तव में मुझे नही लगता की भारतीय शिक्षा को एक सम्मान पूर्ण स्तर देने में मिशिनरी स्कूलों की जो भूमिका रही है उसे धर्म की संकीर्णता से देखना चाहिए... और विशेष कर मै यह प्रश्न उठाना चाहूँगा की आर.एस.एस. की जन शाखा मै क्या कट्टर हिंदुत्व की शिक्षा नही दी जाती.. क्या वहां उन्हें यह नही सिखाया जाता की इन मुस्लिमो और ईसाईयों ने तुम पे ४०० सालो तक शासन और शोषण किया है...?? क्यों आज तक आर.एस.एस ये स्वीकार नही कर पायी है की भारत एक हिन्दू राष्ट्र नही पंथ निरपेक्ष राष्ट्र है?????

Shivam Kesari said...

अवधेश जी ,
मैं आपसे एक बात पूछना चाहुह्न्गा - आपने उस बच्ची से पूछ कर तो ये साबित कर दिया की मिशिनेरी स्कूल में बच्चो को ईसाई धर्म की तरफ धकेल रहे हैं. लेकिन आप शायद ये बात भूल गए की ऐसा सवाल करके आप अपने तुच्छ मंसियत को दर्शा रहे हैं.
आप अपने को भारत का नागरिक कहते हैं? लेकिन ये भी भूल जाते हैं की भारत एक धम्र निर्पेक्च देश है.
आपके बच्ची से पूछे गए सवाल पर ही मुझे हंसी आती है !!
भगवान बड़ा की जीसस. आपने तो भारत, इंडिया और हिंदुस्तान में ही फर्क कर दिया.

अब मैं अपनी बात बताता हूँ -- मैं किसी भागवान में नहीं विश्वास रखता, लेकिन भारत की जो संस्कृति है उसकी मैं खूब आदर करता हूँ और मुझे ख़ुशी होती है की भारत के संस्कृति में दुसरे देश की संस्कृति घुल मिल जाती है, और यही भारत की संस्कृति है.

"जागो भाई जागो "
धन्यवाद .

शिवम् केसरी
द्वितीय वर्ष , खनन अभ्यान्त्रिकी
इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस,

Awadhesh Pandey said...

प्रिय C___K एवं शिवम् जी.
मानता हूँ की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन आप जैसे लोगों की धर्मनिरपेक्षता उस समय कहाँ चली जाती है, जब भारतीय संविधान एवं कानून का खुलेआम उलन्घन होता है. आपको शाह बानो प्रकरण याद ही होगा जब तुष्टिकरण के लिए सर्वोच्च न्यायलय तक की अवहेलना की गयी थी.
भारतीय संविधान के अनुसार सभी को धर्म का अधिकार मिला हुआ है, फिर हिन्दू हितों की अनदेखी क्यों. अभी बरेली में हुए दंगे इस बात के गवाह हैं की एक धर्म विशेष के दबाव के कारण सबूतों के होते हुए भी कुत्सित मानसिकता के साथ भाषण देनेवाले धार्मिक नेता को छोड़ा गया, उस समय देश की धर्मनिरपेक्ष केंद्र सरकार और मीडिया या आप जैसे लोग क्यों बिल में घुसे रहे, क्या देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका दायित्व नहीं था की आप देश के कानून की धज्जियाँ उड़ते देख कुछ बोलते.
क्या आप मुझे यह विश्वास दिला सकते हो की भारतीय संविधान और कानून सबपर सामान रूप से लागू होगा और भारत देश में सभी धर्मो को बराबर समझा जायेगा?
आपको यह बात बहुत बुरी लगी और आपके सुझाव के अनुसार मुझे उस बच्चे से ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था, लेकिन मैं आपसे पूछता हूँ की क्या उन ईसाई स्कूलों का दायित्व नहीं है की बच्चों को भगवान राम, कृष्ण, श्रवण कुमार, विवेकानंद या अन्य महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ.
मैं ईसाई स्कूलों के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन देश की हिन्दू जनता को ईसाईयत की तरफ धकेलने वाली कोशिश का विरोधी हूँ. एक सोची समझी साजिश के तहत बच्चों को अपनी संस्कृति अपने धर्म से दूर किया जा रहा है क्या आपको पता नहीं की ईसाई स्कूलों में सिर्फ बाइबिल का गुणगान होता रहता है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सिर्फ बाइबिल ही क्यों, कुरआन और गीता क्यों नहीं. लेकिन आप जैसे लोग धरमनिर्पेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण होते हुए देख कर खुश हो.
आज इस देश में हिन्दू होना, हिन्दू हित की बात करना या प्राचीन धर्मग्रंथों जैसे वेद-पुराण, उपनिषद, गीता या रामायण का साम्प्रदायिकता कहलाता है. क्या यही आपकी धर्म निरपेक्षता है. मुझे खुद आप जैसे लोगों के विचारों पर तरस आता है, जो एक तरफ बड़ी बड़ी बातें करते हैं वहीँ दूसरी ओर हिन्दू हित की बात करना आपको साम्प्रदायिकता लगता है.
इस देश में जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोटों की गन्दी राजनीति हो रही हो तो अपने बच्चों को सावधान करना ही एक मात्र उपाय है. प्रत्येक हिन्दू के लिए भारत उसकी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है, भारत को परम वैभव पर पहुचाना ही हमारा लक्ष्य है.
आप मुझे विश्वास दिला दो की आज से देश में सभी लोगों को समान अधिकार दिए जायेंगे, तुष्टिकरण के लिए फिर एक संविधान संशोधन नहीं होगा. देश में एक ही कानून होगा जो सब पर लागू होगा, अगर नहीं कर सकते तो मेरे साथ बोलो. "जागो तो एक बार हिन्दू जागो तो"

Vivek Krishna said...

ईसाई स्कूल धर्मांतरण का प्रयास करते है यह नई बात नही है. स्कूल के पिता और बहन ईसा मसीह की कहानिया तो सुनते है ही कुछ पत्रक भी समय समय पर उपलब्ध करते है ताकि बच्चो की आस्था ईसाइयत की तरफ़ बढ़े. लेकिन हिंदू धर्म अपने आंतरिक शक्ति के कारण इन प्रयासो को विफल कर देता है. कुछ लोग इनके चपेट मे आ जाते है उनका भी इनसे मो ह भंग हो जाता है क्योकि ये लोग निष्टा वान नही होते . अतः घबराने की ज़रूरत नही है ये अंत में विफल होना है.

rahul said...

Awadhesh ji

You said very true that missionaries have definitely some wrong motives. In the name spreading the education they try to impose western culture. they try to convert the Hindu into their religion, and tribal people easily becomes their victim. they serve only those people who can be converted into their religion. we should aware of this fact.
this is your good effort in order to make people conscious.

Rahul K. Jha.

Harsh Vardhan said...

AAP EK SACHE DESH BAKT HAI
AUR HINDUSTAN KO AAP KI JARURAT AHAI
TAAKI HAMRA DESH PHIR SE EK HO SAKT
MUJHE VISVAAS HAI KI AAP KI LAGAN
IS KAAM KO JARUR PURA KAREGI

SYNNER said...

क्या धर्म इतनी बड़ी चीज है?
मेरी नज़र में ये सारे धर्म सिर्फ लड़ने/ बांटने के बहाने हैं.
मै ९ साल मिशनरी स्कूल में पढ़ा और मुझे किसी ने हिंदू से ईसाई बनाने की कोशिश नहीं की.
हाँ मै इस लायक हो गया कि धर्म से ऊपर उठ गया.

"आपको यह बात बहुत बुरी लगी और आपके सुझाव के अनुसार मुझे उस बच्चे से ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था, लेकिन मैं आपसे पूछता हूँ की क्या उन ईसाई स्कूलों का दायित्व नहीं है की बच्चों को भगवान राम, कृष्ण, श्रवण कुमार, विवेकानंद या अन्य महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ."
"धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सिर्फ बाइबिल ही क्यों, कुरआन और गीता क्यों नहीं"
"जो एक तरफ बड़ी बड़ी बातें करते हैं वहीँ दूसरी ओर हिन्दू हित की बात करना आपको साम्प्रदायिकता लगता है."
"प्रत्येक हिन्दू के लिए भारत उसकी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है, भारत को परम वैभव पर पहुचाना ही हमारा लक्ष्य है."


इन सब विचारों का एक ही जवाब मुझे सूझता है;
'क्या धर्म इतनी बड़ी चीज है कि इसके लिए इतना resource, इतने लोग इतना समय बर्बाद किया जाये ?'
आप एक intellectual हैं और सबसे बड़ी परेशानी इस देश कि आपको धर्म परिवर्तन लगी?
"Simple common man of India who is searching his identity and want to contribute in line with development of rural India. I want to work in field of basic education and agriculture."

ये आपके ही शब्द हैं..... आपसे ये expect नहीं किया जा सकता कि ऐसे ब्लॉग से आप अपने मकसद कि ओर बढ़ रहे हैं ...

मै मिशनरी कि बड़ाई नहीं कर रहा लेकिन हमारी परेशानियाँ इन छोटी बातों से कहीं बड़ी हैं| हमे इन बातों को किनारे कर के basic problems पर ध्यान देना चाहिए .....

वो चाय वाले वाला ब्लॉग एक socially responsible ब्लॉग था ...... ये वाला नहीं|


जिन के पास खाने को कुछ नहीं है उसका हिंदू या मुस्लिम होना उसे भूखे मरने से नहीं बचायेगा.
हिंदू सनातन धर्म है: अगर आप पैदा हुए तो आप हिंदू हो गए.... बाकी धर्म तो इंसानों के बनाये हुए हैं|

Awadhesh Pandey said...

SYNNER जी,
मेरा ब्लॉग पढ़ने और उस पर अपने बहुमूल्य विचार देने के लिए धन्यवाद.
आपके विचारों को पढ़ कर मेरे ब्लॉग को और बल मिला है, आप कुछ वर्षों की मिशनरी शिक्षा में इतने ज्ञानी हो गए कि धर्म से ऊपर उठ गए.
धर्म से ऊपर उठने से पहले धर्म को समझना भी शायद आपने जरूरी नहीं समझा. आपने धर्म का वह चेहरा देखा जहाँ दंगे फसाद होते है लेकिन धर्म का एक पहलु यह भी है कि धर्म से हमें जीवन के मूल्य, शिक्षा, संस्कृति, आदि विरासत में मिलतें है.
धर्म के अस्तित्व को उस देश में नकारा नहीं जा सकता जिस देश में धर्म के नाम पर पिछले १००० वर्षो से हिन्दुओं का उत्पीडन हो रहा हो. हिन्दुकुश पर्वत के इस पार पहले अफगानिस्तान फिर पाकिस्तान और अब कश्मीर में हिन्दुओं पर किये गए अत्याचार शायद आप देखना ही नहीं चाहते. कश्मीर से विस्थापित पंडितों का दोष सिर्फ इतना था कि वो जन्म से सनातनी थे और उन्होंने किसी भी अन्य धर्म को अपनाने से इनकार कर दिया.
मैं इसका उत्तर आप पर छोड़ता हूँ कि क्या उन्हें अपनी वर्षो पुरानी सभ्यता और संस्कृति को छोड़ कर आंक्राताओं के धर्म और संस्कृति को स्वीकार कर लेना चाहिए था?
जब हम कहते है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है तो क्या हमें अपने ही देश में शरणार्थी बने लोगों से उनका दर्द नहीं पूछना चाहिए. देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक के नाते आप किसी कश्मीरी शरणार्थी कैम्प में जाएँ और वहां रहने वाले कश्मीरियो से उनका दर्द पूछे फिर बताएं मुझे बताएं कि क्या आप सही हैं?
निश्चित रूप से देश में अन्य मूल समस्यायें है लेकिन ऐसी समस्या हर युग में और हर देश में है. हमें इससे लड़ना है और ऐसी प्रेरणा भी मुझे मेरा धर्म ही देता है.
सनातन धर्म का मूल वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना पर चलता है, अतः मुझे अपने धर्म पर गर्व है और मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं सनातन धर्म का पालन करने वाला हिन्दू हूँ तथा हिन्दू समाज में जाग्रति लाकर, व्यक्तित्व निर्माण कर सर्वसमाज के लिए अच्छे कार्य कि प्रेरणा देना मेरा एक लक्ष्य है.
नीचे लिखा एक सुभाषित किसी अन्य संस्कृति में हो या न हो लेकिन वैदिक संस्कृति में है. ऐसे सभ्य, सुन्दर, संस्कृति और संस्कारों से परिपूर्ण धर्म से दूर होने वाले गुमराह व्यक्तियों को सही रास्ते पर लाकर उन्हें समाजोपयोगी बनाना अगर अपराध है तो मुझे यह अपराध जन्मो जन्मो तक करना है.
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥

Rohit said...

I am in total agreement with Synner. Why we need to understand whats written in religious books. After all they are also written by humans and they are liable to be improved and/or changed.

The stories of people stated above tells us to be good and have good conduct. Love, peace, morality etc are taught by such stories, not the religion.

No religion can be perfect as it will always be man-made. If Hinduism is perfect, then why did we have caste system (there are articles in your blog criticising them - thus you are criticising the Hinduism. Am I right in saying so?)

Also the people are referred to as Hindu when communal riots etc were discussed. Please refer the below link:

http://www.hinduwebsite.com/hinduism/h_meaning.asp

And as well some research can be done on the etymology of the word. you will surely be surprised.

Coming back to the point made by Synner, rising beyond the religion. No one needs to commit a wrong deed to understand that it is wrong. The religion is for the weak people who cant think good on their own. They need religion as a support system.

Hinduism says God is in every particle, so My body is made up of God only. Then do I need any mentoring to be good. I just need to think, thats all.

We all fight on the name of religion, simply because no one understands the objective of the religion.

Imagine a world with only one country, what would be the development then. Now imagine the world with One religion.