धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, March 25, 2010

चाय वाला छोटू

मैं रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आने से एक घंटा पहले पहुँच गया था. पूछताछ की तो पता चला ट्रेन आधे घंटे देर से आएगी. शाम का समय था और चाय पीने की इच्छा हुई तो स्टेशन से थोड़ी दूर निकल आया. वैसे भी देश के रेलवे स्टेशनों या रेलगाड़ी में मिलने वाली चाय कभी भी मुझे आकर्षित नहीं कर सकी, मुझे क्या किसी को भी नहीं, बस लोग मजबूरी में पी लेते हैं.
मैं पैदल ही अपनी धुन में मस्त कोई आधा किमी चला आया, एक जलपान गृह पर थोड़ी भीड़ देख कर रुक गया, आम तौर पर भीड़ उन्ही दुकानों पर होती है जो  गुणवत्ता का थोडा ध्यान रखता है यही सोचकर मैं भी अन्दर जाकर बैठ गया. वहीँ काम करने वाले एक नवयुवक से मैंने एक चाय लाने की गुजारिश की. तभी अकस्मात् एक बच्चे की रोने की आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. बच्चे की उम्र सात आठ साल से ज्यादा न होगी और वह अपना सिर पकड़ कर रो रहा था. उसकी सूरत व कपडे देख कर आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता था की वह उसी दुकान में काम करता था. थोड़ी पूछताछ के बाद पता चला की किसी बात पर दुकान मालिक ने बच्चे के सिर पर किसी चीज़ से मारा था और बच्चा दर्द से कराह कर रो रहा था.
वहां जितने लोग थे उतनी बातें शुरू हो गयीं, नियम कानून से लेकर दुकान मालिक को जेल तक लेकिन किसी ने उठकर विरोध नहीं किया.
सरकार के बड़े बड़े विज्ञापनों और नेताओं के लच्छेदार भाषणों का सत्य आज मेरे सामने था, एक वाक्य में लिखूं तो सिर्फ यह कि किसी को उन बच्चो कि चिंता नहीं है. वहां कुछ पुलिस वाले भी थे लेकिन उन्होंने हट्टे कट्टे और रौबीले दुकान मालिक कुछ नहीं कहा. कुछ अन्य लोगों ने जरूर कुछ उपदेश दिए जिसे उसने अनसुना कर दिया. वस्तुतः यह उसका रोज़ का काम था.
यही सम्पूर्ण भारत देश कि कहानी है. मोटा मुनाफा कमाने वाले यह दुकान मालिक किसी वयस्क कि अपेक्षा छोटे बच्चों को ही काम पर रखतें हैं ताकि उन्हें वेतन भी कम देना पड़े और आसानी से शोषण भी कर सकें.
राजनीतिक दल हो या प्रशासन के लोग किसी को वास्तव में इन बच्चो कि चिंता नहीं है. जन कल्याण के असली मुद्दे को अनदेखा करके अन्य मुद्दों पर एक दूसरे को घेरने कि कोशिश करते हैं. जब भी कभी जनता कि बात होती है सारे बेशर्म दल असली मुद्दे से जनता का ध्यान बाँट कर किसी अन्य मुद्दे पर ले जाते हैं और देश का बुद्धिजीवी वर्ग उन झूठे मुद्दों पर चर्चा.
मैंने विरोध के लिए चाय नहीं पी. बच्चे से उसका नाम पूछा लेकिन उसने बताया नहीं शायद मालिक के खौफ ने उसकी जुबान बंद कर रखी थी, तभी मालिक कि आवाज़ आई, छोटू!! चल गिलास उठा. और छोटू उठकर जूठे गिलास उठाने लगा. मुझे उसका नाम पता चल चुका था लेकिन मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था.
इधर मेरी ट्रेन का समय हो रहा था और मैं भारी मन से  बिना चाय पिए हुए ही स्टेशन कि तरफ चल पड़ा, मन ही मन में यह सोचते हुए कि शायद स्टेशन कि चाय इस चाय से अच्छी होती. वहां लोग चाय पीकर सिर्फ चाय वाले को गाली देतें हैं और वहां छोटू कि दशा देखकर पता नहीं किस किस को गाली देने का मन करता है. खुद को भी मैं समाज से अलग नहीं कर पा रहा था और अपने आप पर तरस भी आ रहा था.
लेकिन अगर वास्तव में सरकार और प्रशासन को बालश्रम रोकने कि दिशा में कुछ काम करना है तो गली कुचे के इन जलपान गृहों और भोजनालयों पर पहले ध्यान देना होगा, ऐसा करने से बच्चो को उनका बचपन और वयस्कों को रोज़गार दोनों मिल सकेगा. चाहे जूठे बर्तन उठाने व धोने का रोज़गार हो या ऐसे बर्तन बनाने का रोज़गार जिसका उपयोग कर फेंक दिया जाय. कुछ भी हो ऐसे शोषण करने वाले व्यापारियों का बहिष्कार होना ही चाहिए जो मैंने किया और आगे भी करता रहूँगा. आपसे भी मेरी यही प्रार्थना है कि कम से कम ऐसे व्यापारियों का विरोध करें जो बच्चों का बचपन छीनकर उनसे काम लेते हैं.

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