धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Friday, March 12, 2010

नव भारत निर्माण की ज़िम्मेदारी हमारी है

अभी तक ज़िन्दगी लक्ष्य विहीन थी बस भीड़ का चेहरा बना हुआ था, सांसारिक मोह माया में फंसी हुई ज़िन्दगी कब कहाँ ले जाएगी यह पता नहीं था. लेकिन जब आंखे खुली तो समाज में अपने अस्तित्व की तलाश शुरू हुई. धन, बड़े शहरों में मकान, बड़ी कार, अपना परिवार इत्यादि यही है मेरे पास या कुछ वर्षों पश्चात् यही अर्जित कर सकूंगा. फिर ख्याल आया नहीं मुझे इन सबसे ऊपर उठना है और अपने राष्ट्र, अपने समाज, अपनी संस्कृति आदि के लिए कुछ करना है.
आज कल उसी योजना में लगा हूँ, किन्तु अब लक्ष्य स्पष्ट है, राष्ट्र का निर्माण ही ध्येय है. जानता हूँ की इतने बड़े राष्ट्र के लिए मेरा योगदान बिंदु से ज्यादा नहीं होगा लेकिन शुरुआत करनी है. अमूल्य विचारो पर अमल करना है. बूंद बूंद से सिन्धु बनता है.
आइये हम सब मिलकर भारत निर्माण करें, अपने अस्तित्व को तलाशें, अपने आप से प्रश्न करें, हम क्यों जी रहें है. हमारा लक्ष्य क्या है. आने वाले कुछ वर्षो में हम क्या हासिल कर पाएंगे. शिक्षा, साहित्य, रक्षा, कृषि, तकनीकी, वाणिज्य, उद्यमिता, स्वास्थ्य, संविधान या अन्य किसी क्षेत्र में हमारा योगदान क्या है. अगर हम ऐसा सोचकर अपना अस्तित्व तलाशने की कोशिश करेंगे तो निश्चय ही हम देश को विकसित राष्ट्रों की सूची में पाएंगे. आइये राष्ट्र के निर्माण में जितना योगदान कर सकते है उतना ही करे. विचार करें क्या सही है, वही करें. एक करदाता के रूप में कर देकर अपनी ज़िम्मेदारी से इतिश्री न करें.
नव भारत निर्माण की ज़िम्मेदारी हमारी है, हम ही इसका निर्माण करेंगे. इस संकल्प के साथ दिन की शुरुआत करें. कुछ अच्छा करने की कोशिश करें.
किसी भी सुझाव या विचार का स्वागत है. कृपया मुझे बताएं आप क्या करना चाहते हैं या मैं क्या करूं, जिससे राष्ट्र का भला हो.

2 comments:

Vivek Krishna said...

Bharat ek dev bhoomi hai jise logo ne apavitra kar diya hai. phir se is desh ko us purane isthiti me lane ke liye ek bhagirath prayas karna hoga. Lekin rog itna gahra hai ki ek bhagirath se kam nahi chalega har waykti ko prayas karne honge. Apne jo sankalp liya hai uske liye aap sadhuwad ke kabil hain. Asha hai aam log aapke is prayas me bhagidar honge
vivek krishna

निर्झर'नीर said...

Vivek Krishna ji se sahmat hun

ek accha lekh ..aabhar