धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Monday, March 29, 2010

सावधान भारतीयों: मिशनरी स्कूलों कि शिक्षा बच्चों को ईसाईयत की ओर ले जा रही है.

प्रिय साथियों,

अगर आपका अपना, पडोसी, मित्र या रिश्तेदार का बच्चा किसी मिशनरी स्कूल में पढता हो तो सावधान हो जाएँ. मिशनरी स्कूलों कि शिक्षा आपके बच्चे को ईसाईयत की ओर धकेल रही है, आपका बच्चा जन्म, नाम और पूजा पद्यति से तो हिन्दू होगा लेकिन उसकी मानसिकता ईसाईयों की होगी. मतलब यह की वह हिन्दू सनातन संस्कृति को छोटा और विदेशी संस्कृति को बहुत अच्छा समझना शुरू कर देगा, उसे अपनी संस्कृति में बहुत सारी बुराइयाँ नज़र आने लगेंगी और अपनी संस्कृति कि अच्छाइयां नज़र नहीं आयेंगी.
एक दिन मैंने एक मित्र की मिशनरी स्कूल में पढ़ने वाली नौ वर्षीय बेटी से पूछा की भगवान राम और जीसस में कौन महान है, उसका उत्तर सुनकर सबके होश उड़ गए, उसने जीसस को महान बताया. मेरे मित्र भी भौचक्के रह गए, उनके यहाँ सुबह शाम रोज़ पूजा और आरती होती थी, बच्ची खुद भी पूजा में भाग लेती थी, लेकिन उसके बाल मन पर मिशनरी स्कूलों की शिक्षा भारी पड़ रही थी और उसे अपने धर्म से अलग कर रही थी. यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है की छोटे बच्चे को इसका बोध नहीं हो सकता लेकिन वह बोध कौन कराएगा इसका उत्तर किसी के पास नहीं है, आज के युग में दम्पति के पास इतना समय नहीं हो पाता या यह कहें की धन कमाने की अंधाधुंध प्रतियोगिता में हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहें है और अपने बच्चों को को उतना भी संस्कार नहीं दे पाते जितना हमें अपने माता पिता से मिला था.
ऐसे बच्चे जब बड़े होतें हैं, तो उन्हें अपनी संस्कृति से ज्यादा लगाव नहीं होता और उन्हें दूसरी संस्कृति में ढालना बेहद आसान होता है और वे हिन्दू संस्कृति को पिछड़ेपन की निशानी समझते हैं.
वैसे भी बहुत सारे भारतीय हिन्दू अंग्रेजी की मानसिक दासता स्वीकार कर चुके हैं. अभी भी समय है अपने बच्चों को हिन्दू स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजे, अगर किसी कारण वश मिशनरी स्कूल में भेजना ही पड़े तो बच्चे पर पूरी नज़र रखें और उसे संस्कारित करने की कोशिश करें. उन्हें वो सब किस्से कहानियां सुनाएँ जो आपने अपने माता पिता से सुनी थी. अपने बच्चे को श्रवण कुमार, सत्य हरिश्चंद्र, बालक आरुण, भगवान राम आदि महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ ताकि उनका इंसानियत के प्रति प्रेम बना रहें.
सावधान हो जाएँ की इसके पहले फिर कोई गज़नी या मैकाले आ कर हमारी संस्कृति पर हमला कर हमें अपना दास न बनाले.

आपका अपना
अवधेश.

चलते चलते उन लोगों के लिए, जिन्हें मेरा यह पोस्ट सांप्रदायिक लगता है.
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मानता हूँ की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन लोगों की धर्मनिरपेक्षता उस समय कहाँ चली जाती है, जब भारतीय संविधान एवं कानून का खुलेआम उलन्घन होता है. आपको शाह बानो प्रकरण याद ही होगा जब तुष्टिकरण के लिए सर्वोच्च न्यायलय तक की अवहेलना की गयी थी.
भारतीय संविधान के अनुसार सभी को धर्म का अधिकार मिला हुआ है, फिर हिन्दू हितों की अनदेखी क्यों. अभी बरेली में हुए दंगे इस बात के गवाह हैं की एक धर्म विशेष के दबाव के कारण सबूतों के होते हुए भी कुत्सित मानसिकता के साथ भाषण देने वाले धार्मिक नेता को छोड़ा गया, उस समय देश की धर्मनिरपेक्ष केंद्र सरकार और मीडिया या आप जैसे लोग क्यों बिल में घुसे रहे, क्या देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका दायित्व नहीं था की आप देश के कानून की धज्जियाँ उड़ते देख कुछ बोलते.
क्या आप मुझे यह विश्वास दिला सकते हो की भारतीय संविधान और कानून सबपर सामान रूप से लागू होगा और भारत देश में सभी धर्मो को बराबर समझा जायेगा?
आपको यह बात बहुत बुरी लगी और आपके सुझाव के अनुसार मुझे उस बच्चे से ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था, लेकिन मैं आपसे पूछता हूँ की क्या उन ईसाई स्कूलों का दायित्व नहीं है की बच्चों को भगवान राम, कृष्ण, श्रवण कुमार, विवेकानंद या अन्य महापुरुषों की कहानियां सुनाएँ.
मैं ईसाई स्कूलों के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन देश की हिन्दू जनता को ईसाईयत की तरफ धकेलने वाली कोशिश का विरोधी हूँ. एक सोची समझी साजिश के तहत बच्चों को अपनी संस्कृति अपने धर्म से दूर किया जा रहा है क्या आपको पता नहीं की ईसाई स्कूलों में सिर्फ बाइबिल का गुणगान होता रहता है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सिर्फ बाइबिल ही क्यों, कुरआन और गीता क्यों नहीं. लेकिन आप जैसे लोग धरमनिर्पेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण होते हुए देख कर खुश हो.
आज इस देश में हिन्दू होना, हिन्दू हित की बात करना या प्राचीन धर्मग्रंथों जैसे वेद-पुराण, उपनिषद, गीता या रामायण का साम्प्रदायिकता कहलाता है. क्या यही आपकी धर्म निरपेक्षता है. मुझे खुद आप जैसे लोगों के विचारों पर तरस आता है, जो एक तरफ बड़ी बड़ी बातें करते हैं वहीँ दूसरी ओर हिन्दू हित की बात करना आपको साम्प्रदायिकता लगता है.
इस देश में जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोटों की गन्दी राजनीति हो रही हो तो अपने बच्चों को सावधान करना ही एक मात्र उपाय है. प्रत्येक हिन्दू के लिए भारत उसकी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है, भारत को परम वैभव पर पहुचाना ही हमारा लक्ष्य है.
आप मुझे विश्वास दिला दो की आज से देश में सभी लोगों को समान अधिकार दिए जायेंगे, तुष्टिकरण के लिए फिर एक संविधान संशोधन नहीं होगा. देश में एक ही कानून होगा जो सब पर लागू होगा, अगर नहीं कर सकते तो मेरे साथ बोलो. "जागो तो एक बार हिन्दू जागो तो" 

Thursday, March 25, 2010

चाय वाला छोटू

मैं रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आने से एक घंटा पहले पहुँच गया था. पूछताछ की तो पता चला ट्रेन आधे घंटे देर से आएगी. शाम का समय था और चाय पीने की इच्छा हुई तो स्टेशन से थोड़ी दूर निकल आया. वैसे भी देश के रेलवे स्टेशनों या रेलगाड़ी में मिलने वाली चाय कभी भी मुझे आकर्षित नहीं कर सकी, मुझे क्या किसी को भी नहीं, बस लोग मजबूरी में पी लेते हैं.
मैं पैदल ही अपनी धुन में मस्त कोई आधा किमी चला आया, एक जलपान गृह पर थोड़ी भीड़ देख कर रुक गया, आम तौर पर भीड़ उन्ही दुकानों पर होती है जो  गुणवत्ता का थोडा ध्यान रखता है यही सोचकर मैं भी अन्दर जाकर बैठ गया. वहीँ काम करने वाले एक नवयुवक से मैंने एक चाय लाने की गुजारिश की. तभी अकस्मात् एक बच्चे की रोने की आवाज़ ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. बच्चे की उम्र सात आठ साल से ज्यादा न होगी और वह अपना सिर पकड़ कर रो रहा था. उसकी सूरत व कपडे देख कर आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता था की वह उसी दुकान में काम करता था. थोड़ी पूछताछ के बाद पता चला की किसी बात पर दुकान मालिक ने बच्चे के सिर पर किसी चीज़ से मारा था और बच्चा दर्द से कराह कर रो रहा था.
वहां जितने लोग थे उतनी बातें शुरू हो गयीं, नियम कानून से लेकर दुकान मालिक को जेल तक लेकिन किसी ने उठकर विरोध नहीं किया.
सरकार के बड़े बड़े विज्ञापनों और नेताओं के लच्छेदार भाषणों का सत्य आज मेरे सामने था, एक वाक्य में लिखूं तो सिर्फ यह कि किसी को उन बच्चो कि चिंता नहीं है. वहां कुछ पुलिस वाले भी थे लेकिन उन्होंने हट्टे कट्टे और रौबीले दुकान मालिक कुछ नहीं कहा. कुछ अन्य लोगों ने जरूर कुछ उपदेश दिए जिसे उसने अनसुना कर दिया. वस्तुतः यह उसका रोज़ का काम था.
यही सम्पूर्ण भारत देश कि कहानी है. मोटा मुनाफा कमाने वाले यह दुकान मालिक किसी वयस्क कि अपेक्षा छोटे बच्चों को ही काम पर रखतें हैं ताकि उन्हें वेतन भी कम देना पड़े और आसानी से शोषण भी कर सकें.
राजनीतिक दल हो या प्रशासन के लोग किसी को वास्तव में इन बच्चो कि चिंता नहीं है. जन कल्याण के असली मुद्दे को अनदेखा करके अन्य मुद्दों पर एक दूसरे को घेरने कि कोशिश करते हैं. जब भी कभी जनता कि बात होती है सारे बेशर्म दल असली मुद्दे से जनता का ध्यान बाँट कर किसी अन्य मुद्दे पर ले जाते हैं और देश का बुद्धिजीवी वर्ग उन झूठे मुद्दों पर चर्चा.
मैंने विरोध के लिए चाय नहीं पी. बच्चे से उसका नाम पूछा लेकिन उसने बताया नहीं शायद मालिक के खौफ ने उसकी जुबान बंद कर रखी थी, तभी मालिक कि आवाज़ आई, छोटू!! चल गिलास उठा. और छोटू उठकर जूठे गिलास उठाने लगा. मुझे उसका नाम पता चल चुका था लेकिन मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था.
इधर मेरी ट्रेन का समय हो रहा था और मैं भारी मन से  बिना चाय पिए हुए ही स्टेशन कि तरफ चल पड़ा, मन ही मन में यह सोचते हुए कि शायद स्टेशन कि चाय इस चाय से अच्छी होती. वहां लोग चाय पीकर सिर्फ चाय वाले को गाली देतें हैं और वहां छोटू कि दशा देखकर पता नहीं किस किस को गाली देने का मन करता है. खुद को भी मैं समाज से अलग नहीं कर पा रहा था और अपने आप पर तरस भी आ रहा था.
लेकिन अगर वास्तव में सरकार और प्रशासन को बालश्रम रोकने कि दिशा में कुछ काम करना है तो गली कुचे के इन जलपान गृहों और भोजनालयों पर पहले ध्यान देना होगा, ऐसा करने से बच्चो को उनका बचपन और वयस्कों को रोज़गार दोनों मिल सकेगा. चाहे जूठे बर्तन उठाने व धोने का रोज़गार हो या ऐसे बर्तन बनाने का रोज़गार जिसका उपयोग कर फेंक दिया जाय. कुछ भी हो ऐसे शोषण करने वाले व्यापारियों का बहिष्कार होना ही चाहिए जो मैंने किया और आगे भी करता रहूँगा. आपसे भी मेरी यही प्रार्थना है कि कम से कम ऐसे व्यापारियों का विरोध करें जो बच्चों का बचपन छीनकर उनसे काम लेते हैं.

Friday, March 12, 2010

नव भारत निर्माण की ज़िम्मेदारी हमारी है

अभी तक ज़िन्दगी लक्ष्य विहीन थी बस भीड़ का चेहरा बना हुआ था, सांसारिक मोह माया में फंसी हुई ज़िन्दगी कब कहाँ ले जाएगी यह पता नहीं था. लेकिन जब आंखे खुली तो समाज में अपने अस्तित्व की तलाश शुरू हुई. धन, बड़े शहरों में मकान, बड़ी कार, अपना परिवार इत्यादि यही है मेरे पास या कुछ वर्षों पश्चात् यही अर्जित कर सकूंगा. फिर ख्याल आया नहीं मुझे इन सबसे ऊपर उठना है और अपने राष्ट्र, अपने समाज, अपनी संस्कृति आदि के लिए कुछ करना है.
आज कल उसी योजना में लगा हूँ, किन्तु अब लक्ष्य स्पष्ट है, राष्ट्र का निर्माण ही ध्येय है. जानता हूँ की इतने बड़े राष्ट्र के लिए मेरा योगदान बिंदु से ज्यादा नहीं होगा लेकिन शुरुआत करनी है. अमूल्य विचारो पर अमल करना है. बूंद बूंद से सिन्धु बनता है.
आइये हम सब मिलकर भारत निर्माण करें, अपने अस्तित्व को तलाशें, अपने आप से प्रश्न करें, हम क्यों जी रहें है. हमारा लक्ष्य क्या है. आने वाले कुछ वर्षो में हम क्या हासिल कर पाएंगे. शिक्षा, साहित्य, रक्षा, कृषि, तकनीकी, वाणिज्य, उद्यमिता, स्वास्थ्य, संविधान या अन्य किसी क्षेत्र में हमारा योगदान क्या है. अगर हम ऐसा सोचकर अपना अस्तित्व तलाशने की कोशिश करेंगे तो निश्चय ही हम देश को विकसित राष्ट्रों की सूची में पाएंगे. आइये राष्ट्र के निर्माण में जितना योगदान कर सकते है उतना ही करे. विचार करें क्या सही है, वही करें. एक करदाता के रूप में कर देकर अपनी ज़िम्मेदारी से इतिश्री न करें.
नव भारत निर्माण की ज़िम्मेदारी हमारी है, हम ही इसका निर्माण करेंगे. इस संकल्प के साथ दिन की शुरुआत करें. कुछ अच्छा करने की कोशिश करें.
किसी भी सुझाव या विचार का स्वागत है. कृपया मुझे बताएं आप क्या करना चाहते हैं या मैं क्या करूं, जिससे राष्ट्र का भला हो.