धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Thursday, December 9, 2010

खतरे में लोकतंत्र

देश की वर्तमान परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं. विपक्ष २जी घोटाले की जांच सयुंक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार इसे लगातार अस्वीकार कर रही है, जाहिर है सरकार जेपीसी को अस्वीकार कर सच पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. जनता यह भी अच्छी तरह जानती है कि दोषियों को दंड कभी नहीं मिलेगा, लेकिन फिर भी वह दोषियों के चेहरे बेनकाब होते देखना चाहती है. लोकतंत्र में जनता की भावना की अनदेखी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को खतरे में डालने का प्रयास है.
लोकतंत्र के प्रथम स्तम्भ की चर्चा करें तो विधायिका, जिसे सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए था वह किसी और के प्रति उत्तरदायी है और उसे जनता और जनता के पैसों की चिंता बिलकुल नहीं. सरकार के प्रमुख प्रधानमंत्री जी की निष्ठा संसद और जनता के प्रति न होकर परिवार विशेष के प्रति है ऐसा सभी को पता है. उन्हें न तो प्रधानमंत्री पद के गौरव का ध्यान है न खुद के आत्मस्वाभिमान का.
लोकतंत्र के द्वितीय स्तम्भ कार्यपालिका की चर्चा करें तो वहाँ अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, जनता को विश्वास हो चुका है कि बिना पैसे दिए उसका कोई काम नहीं होगा, उदाहरण किसी भी सरकारी कार्यालय या पब्लिक प्लेस पर मिल जाता है.
देश की न्यायपालिका की चर्चा करते हुए सिर्फ यह कहना चाहूँगा कि न्यायपालिका के द्वारा दिए गए आदेशों के पालन की जिम्मेदारी कार्यपालिका की है लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनदेखी जितनी इस सरकार ने की वैसा करने की हिम्मत देश की किसी भी सरकार में नहीं थी और शायद आगे भी ऐसा करना मुश्किल है, "न भूतो न भविष्यति".
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली पत्रकारिता ही जब उपरोक्त के लिए जिम्मेदार हो तो लोकतंत्र के पास अपने हाल पर आंसू न बहाए तो क्या करे. बीते कुछ दिनों में, बड़ी बड़ी बातें कर जनता को भ्रमित करने वाले पत्रकारिता के नामी गिरामी चेहरे भी जनता के सामने बेनकाब हो गए. जनता की आवाज़ उठाने वाला मीडिया ही जनता को भ्रमित करता रहा. जमीनी राजनीति से कोसों दूर राजनेता और समाज का तथाकथित पढ़ालिखा वर्ग इलेक्ट्रोनिक मीडिया के भरोसे बैठा रहा, वही देखा जो मीडिया ने दिखाया और उसी को सच मान खुद को जागरूक समझता रहा. क्या ऐसी स्थितियों में देश में लोकतंत्र बचा रह सकता है?.
इन सबके बीच विपक्ष का एकजुट होकर सरकार से जेपीसी बनाने की मांग पर अड़े रहना, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में दखल देना और समय समय पर सुब्रमण्यम स्वामी जी जैसे, जनता की आवाज़ उठाने वाले लोग, लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत का काम भी कर रहे हैं. देश को अघोषित राजशाही की तरफ बढ़ने से रोकने वाले ऐसे लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं.

Saturday, December 4, 2010

मम्मी का ऑफिस किचन में है.

ऑफिस जाते समय अक्सर बच्चे पूछते हैं, कि पापा! आपका ऑफिस कहाँ हैं? और लोग अपने बच्चे को बड़े प्रेम से जवाब भी देते हैं. ऐसे ही एक दिन मेरी बेटी ने मुझसे पूछा कि पापा! आपका ऑफिस कहाँ है? हमेशा की तरह मैंने से अपनी कंपनी का नाम बता दिया. लेकिन उसने तुरंत अगला सवाल दागा. पापा! मम्मी का ऑफिस कहाँ है? मैंने मजाक में कह दिया किचन में. अब मेरी बेटी हमेशा बोलती है पापा मम्मी का ऑफिस किचन में है.
मेरे द्वारा मजाक में कही यह बात देश के अधिकांशतः परिवारों के लिए सत्य है. मुझे याद कि मेरी माँ का सारा दिन किचन और उसके काम ने निकाल जाता था, श्रीमती जी का भी हाल वही है, सुबह की चाय से लेकर रात में सोते समय दूध के गिलास तक लगातार काम करना. रात में भी जरूरत पड़ने पर पानी, दूध आदि की व्यवस्था करना. घर में कोई सदस्य बीमार हो जाता है तो उनकी जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं. बिना साप्ताहिक अवकाश व पगार के लगातार काम करना ही जैसे उनका नसीब हो.
इतना सब कुछ करने के बाद भी उन्हें नॉन वर्किंग कहा जाता है. यह हमारे सभ्य समाज का दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है. मनुस्मृति की एक पंक्ति ने जो बात कह दी है, वो बड़े से बड़ा अभियान नहीं कह सकता. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता. इसका मतलब यह कि जहाँ नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं, इसको ऐसे समझने की आवश्यकता है कि जहाँ नारी का सम्मान हो वहां रहने वाले लोग स्वयं देवस्वरुप हो जाते हैं.

Wednesday, December 1, 2010

हमाम में सब नंगे

देश में होने वाले नित नए खुलासों ने आम आदमी को विस्मित कर दिया है, कल तो जो आदर्श थे वही आज भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार दिखाई दे रहे हैं, राजनेता, उद्योगपति, पत्रकार, अफसर सब कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, सार्वजनिक रूप से साफ़ सुथरे दिखने वाले लोग भी अपने फायदे के लिए सरकार को इस्तेमाल करते रहें हैं.
वस्तुतः भ्रष्टाचार को बढ़ावा हमेशा ऊपर से मिलता रहता है, ऐसे माहौल में ईमानदार व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है और स्वार्थियों को प्रोत्साहन मिलता रहता है. घटनाक्रम को देखते हुए यह लगता है वास्तव में सरकार चलाने वाले लोग ऐसे हैं जिनके बारे में हम जैसे लोगों को कुछ नहीं पता. देश-प्रदेश में जब किसी पार्टी की सरकार बनती है तो आम कार्यकर्त्ता सोचता है कि मेरी सरकार बन गयी लेकिन हकीकत यह है कि सभी सरकारें कार्पोरेट जगत की दुकान मात्र हैं. विपक्षीदल एवं जनता १०, जनपथ को केन्द्रीय सत्ता का वास्तविक केंद्र मानते रहे लेकिन बिका हुआ मीडिया और सफेदपोश व्यापारी देश को अपने मनमाफिक नचाते रहे और दूसरों को कमजोर एवं खुद को मजबूत बताने वाले नेता भी सत्ता के लिए इनके रहमोकरम पर निर्भर रहे.
संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार की नाक में दम करने वाला विपक्ष अपने नेताओं के भ्रष्टाचार को सहन कर रहा है. बिहार की जनता के मत को कोई भी पार्टी समझ नहीं पा रही. अब समय आ गया है कि सभी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ हिंदुस्तान की जनता को सन्देश दे, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत यहाँ से हो सकती है, लेकिन यह तब होगा जब वास्तव में उनके अन्दर देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करने की भावना होगी. नितीश कुमार जी ने इस दिशा में सार्थक प्रयास किया है, लेकिन अफसोस कि बिहार में भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध ९०% सफलता का स्वाद चखने वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा भी देश की जनता को कोई ठोस सन्देश नहीं दे सकी.
बेशक देश में भ्रष्टाचार की जनक कांग्रेस पार्टी है, लेकिन भारत माता की जय जैसे गगनभेदी नारे लगाने वाले लोग मौका पाते ही जब भारत माता को लूटने लगते हैं तो अपार कष्ट होता है.  आज़ादी के पहले और बाद में असंख्य लोगों ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया और आगे भी करते रहेंगे, अब देखना यह है उनका त्याग कब तक भ्रष्ट लोगों के लिए सत्ता की सीढी बन देश को कंगाल करता रहेगा. कब तक बाग़ को उजाड़ने के लिए जिम्मेदार लोग बाग़ के माली बने रहेंगे. देश में भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि माननीय उच्चतम न्यायालय की भी अनदेखी की जा रही है. देश की जनता को किसी भी जांच पर विश्वास नहीं रहा. लगता है दोषी छूट जायेंगे या फिर परिणाम आने में इतना विलम्ब होगा की दोषी फैसला सुनने से पहले ही दुनिया से रुखसत हो जाएगा.
जब तक सत्ता का आदर्श गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपाई नहीं होगी तब तक जनता ऐसे ही त्रश्त रहेगी इसमे कोई संशय नहीं.
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी.....

चलते चलते
हमारे नेताओं में देश के लिए कितना सम्मान है यह अभी २६/११ को मुंबई में देखने को मिला जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री राष्ट्रगान की धुन को अनसुना कर चलते बने.

Saturday, November 13, 2010

भारत माता को गाली बर्दाश्त, लेकिन सोनिया माता पर टिप्पणी बर्दाश्त नहीं

संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन जी की एक टिप्पणी से बौखलाए कांग्रेसियों ने पूरे देश में तांडव मचा रखा है, सड़क पर घूमते खूंखार काँग्रेसी क्या किसी आतंकी से कम लगते हैं. इससे पहले संघ को आतंकी संगठन तथा आईएसआई का एजेंट जैसी उपमा देने वाले कांग्रेसियों ने कभी अपने गिरेबान में झाँक कर नहीं देखा.

सप्रंग-२ के कार्यकाल पर नज़र डाले तो सरकार ने घोटालों, अलगावाद, आतंकवादियों, नक्सलियों, मंहगाई आदि को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश की जनता मंहगाई से त्राहिमाम करती रही लेकिन इन कांग्रेसियों का दिल नहीं पसीजा. भ्रष्टाचार के दलदल में काँग्रेस के एक के बाद एक नेता फंसते गए और हालात यहाँ तक पहुंचे कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के लिए जिस नेता का चयन किया गया, उसके दामन पर भी दाग लगें हैं. 2G घोटाले में दूर संचार मंत्री ए. राजा ने कैग की रिपोर्ट के अनुसार देश को १.७६ लाख करोड़ का चूना लगाया लेकिन किसी काँग्रेसी नेता ने सड़क पर उतरना तो दूर उसका विरोध तक नहीं किया. उलटे सरकार कह रही है कि सब कुछ सामान्य प्रक्रिया के तहत किया गया. कामनवेल्थ खेलों के बहाने देश की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वाले कांग्रेसी नेताओ का कभी विरोध नहीं हुआ और बेशर्म नेता अभी तक कुर्सी से चिपके हुए हैं. आदर्श सोसाइटी घोटाले में कारगिल के बलिदानियों के परिवार को जो मकान दिए जाने थे और उनपर कितनी बेशर्मी से ये काबिज हो गए यह देश की जनता ने देखा और सुना. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे काँग्रेसी एक के बाद एक सरकारी संस्थानों को अपने चपेटे में लेते जा रहे हैं, यहाँ तक कि उन्होंने सेना को भी नहीं बख्शा. आलम यह है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई ने भी जनता का भरोसा खो दिया है.

इतने सारे घोटालो की जांच विपक्ष सयुंक्त संसदीय समिति से कराने की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार विपक्ष के नेताओं पर मन गढ़ंत आरोप लगा, अपने पापों पर पर्दा डालने की कोशिश में लगी है. यह सब इसलिए हो रहा है की देश की जनता के सामने घोटालेबाजों का सच न आ सके नहीं तो बहुत से सभ्य चेहरे हमाम में नंगे दिखेंगे.हमारे धृतराष्ट्र रुपी प्रधानमंत्री कुर्सी रूपी कौरवों के मोह में फंस कर सब कुछ देख रहें हैं, इसके लिए देश की जनता उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगी.

२०००० लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को भगाने में तत्कालीन कांग्रेसी तंत्र कैसे लगा था यह भी हमने देखा और सुना लेकिन कितनी कार्यवाही हुई यह चिंता का विषय है. काँग्रेसी नेता अपराध कर रहे हैं, जनता एवं  विपक्ष के विरोध को दबाया जा रहा है. जनतंत्र को कुचलने की घटना नयी नहीं. यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में आपातकाल के रूप में हो चुकी है, लेकिन इसके जिम्मेदार लोगों का महिमामंडन अभी भी जारी है.

आतंक को प्रश्रय देने में भी कांग्रेसियों का जबाब नहीं, काँग्रेस महासचिव दिग्यविजय सिंह, राहुल की प्रस्तावित यात्रा के लिए माहौल बनाने हेतु तीर्थयात्रा करने आजमगढ़ भी गए थे और आतंकियों के परिवार से मिल कर आये थे, काँग्रेस आतंकियों को कितना प्रश्रय देती है यह इस बात से साफ़ है कि दिग्यविजय ने बटला एनकाउन्टर में सर्वोच्च बलिदान करने वाले इ. मोहन चंद शर्मा के बलिदान पर भी सवाल उठा दिए थे.

आतंकियों के मुंबई हमले में बलिदान हुए पुलिसवालों के परिवार से पूछिये कि उनपर क्या गुज़री होगी जब उन्हें पता चला होगा कि देश के लिए मर मिटने वाले पुलिस कर्मियों की रक्षाकवच बुलेटप्रूफ जैकेट नकली थी. क्या कभी कांग्रेसियों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया? उसके जिम्मेदार लोग अभी भी खुले आम घूम रहे होंगे.

हमारे देश के वीर जवान और जनता नक्सलियों के हाथो मारे जा रहें हैं लेकिन इनके कान पर जूँ नहीं रेंगी, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे मैनो परिवार के सदस्य नहीं. इतिहास गवाह है कि एक बार १९८४ में कांग्रेसी सड़क पर उतरे थे और तब देश का सिख समाज कांग्रेसियों के उत्पात और दंगो की भेंट चढ़ा था. उस बार भी संकट देश पर नहीं परिवार पर आया था और दंगों में मुख्य भूमिका निभाने वाले लोग मालामाल हो गए. देश में फिर वैसी स्थितियां बनाने की कोशिश की गयी, लेकिन इस बार इन दंगाइयों को पहले इलाहाबाद और फिर लखनऊ में मुहतोड़ जबाब मिला.

कैसी विडम्बना है कि गिलानी और अरुंधती जैसे देशद्रोही दिल्ली में आकर खुलेआम अलगाव का समर्थन करते हैं, तो उमर अब्दुल्ला विधानसभा में कश्मीर के विलय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं, देशघाती बयानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बर्दाश्त करने वाली काँग्रेस का दोहरा चरित्र देखिये, भारत माता को गाली बर्दाश्त है, लेकिन सोनिया माता पर टिप्पणी बर्दाश्त नहीं.

इतिहास में जाएँ तो ऐसे हजारों उदाहरण मिलेंगे जब देश की जनता त्राहिमाम करती रही लेकिन इन कांग्रेसियों का दिल नहीं पसीजा, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ का नारा देने वाली काँग्रेस का हाथ हमेशा से आम आदमी के गले पर रहा. बचपन में कई सारे नारे सुने थे जिनमे से एक था, खा गयी शक्कर, पी गयी तेल, यह देखो कांग्रेस का खेल. क्या यह नारा आज भी प्रासंगिक नहीं. एक कांग्रेसी की बेशर्म जुबान में कहे तो: मैं एक कांग्रेसी, भ्रष्टाचार मेरा धर्म, तुष्टिकरण मेरी पूजा, चापलूसी मेरा कर्म.

अभी बीते दिनों में दो धरने और प्रदर्शन हुए, एक संघ ने किया, दूसरा कांग्रेस ने. संघ ने अपने ऊपर लगे आरोपों और सरकार द्वारा हिन्दुओं को आतंकवादी घोषित किये जाने के विरोध में देश के सभी जिलों में एक साथ दो घंटे का धरना दिया. कहीं से कोई अप्रिय समाचार नहीं आया, संघ के किसी व्यक्ति ने कोई क़ानून नहीं तोडा. धरना देश की अस्मिता, संस्कृति, अखंडता और स्वाभिमान के लिए दिया गया.

वही काँग्रेस का धरना एंटोनिया मैनो (सोनिया) की चापलूसी के लिए हुआ, देश भर में संघ कार्यालयों पर कांग्रेसियों का आतंक दिखा, खुलेआम कानून हाथ में लिया गया, जबकि संघ ने खुद को सुदर्शन जी के बयान से अलग कर लिया था. काँग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि अगर काँग्रेसी कुछ गलत करते हैं तो इसकी जिम्मेदार पार्टी नहीं होगी, उन्होंने यह भी कहा कि टिप्पणी करने वालों को ऐसा जबाब दे कि फिर कोई फिर कुछ बोलने की हिम्मत ना करे. यह कांग्रेसियों को उग्र प्रदर्शन के लिए उकसावा था जिसका पालन कांग्रेसियों ने मैनो परिवार की नज़र में अपना नंबर बढ़ाने के लिए बखूबी किया. देश की समस्याओं पर चुप रहने वाले चापलूस सोनिया पर टिप्पणी के विरोध में सड़क पर दिखे, यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है. आप खुद सोचें कि जिन कांग्रेसियों के लिए देश से बड़ा परिवार है वो घोटाले नहीं तो और क्या करेंगे.

इन दोनों प्रदर्शनों को हिंदुस्तान की जनता ने देखा और सुना, जनता खुद फैसला करे की आतंकी कौन है, देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाले संघी या देश को चूल्हे में झोंक कर मैनो परिवार की चापलूसी करने वाले काँग्रेसी.

आज देश में क्रान्तिकारियों की कमी नहीं, जरूरत है उन्हें एक मंच पर लाने की, निश्चित ही एक दिन ऐसा आएगा जब देश की जनता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, पं दीन दयाल उपाध्याय जैसे नेताओं की असमय मौत का रहस्य जानना चाहेगी और जब यह राज खुलेंगे तो देश में भूचाल आएगा और वो भूचाल देश को परम वैभव पर ले जाएगा, इसमे कोई शक नहीं.

Sunday, October 10, 2010

संघ विचारधारा और राहुल गांधी

अभी कुछ दिनों पूर्व काँग्रेस के युवराज राहुल बाबा ने वैचारिक रूप से संघ और सिमी को एक समान बताया था. सिमी कि तुलना संघ से करने का कोई औचित्य नहीं बनता. सिमी से प्रतिबन्ध हटाने या संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की हिम्मत पिछले छः वर्षों के शासन में युवराज की पार्टी अभी तक नहीं कर सकी. समान विचारधारा वाले संगठनो से ऐसा भेदभाव क्यों?

बडबोले राहुल बाबा का थिंक टैंक उन्हें जो कहता है वो उसे वह बड़े आत्मविश्वास से बोलते हैं, कभी भ्रष्टाचार, कभी वंशवाद, कभी सीबीआई तो कभी राजनीति में युवाओं के प्रवेश पर लेकिन वो समाधान का हिस्सा कभी नहीं बनते. अभी तक देश के लिए उनका योगदान क्या है सिर्फ यह कि वह देश की कई समस्यायों के जनक नेहरु के वंशज हैं.

डा. हेडगेवार जी ने उन कारणों और कारको पर गहन चिंतन किया था जिन्होंने देश को बार बार गुलाम बनाया और उसके बाद संघ की स्थापना एक सशक्त संगठन के रूप में की थी. आज भी उनके विचार, उनके आदर्श और उनके द्वारा बताये गए रास्ते पर चलने वाले स्वयंसेवकों की संख्या उनके महत्त्व का प्रमाण है. राहुल की पार्टी की बात करे तो यही लगता है की गांधी जी का नाम तो काँग्रेस ने अपना लिया लेकिन उनकी विचारधारा से दूरी बना ली.

संघ को अपने सामाजिक कार्यों, देशभक्ति आदि का सबूत पेश करने की जरूरत नहीं. हिन्दू संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, मानस आदि में विभिन्न मनीषीयों द्वारा समाज हित में कही बातें संघ के कार्यों का आधार हैं. संघ पर राहुल की टिप्पणी वस्तुतः इन ग्रंथो पर सीधा प्रहार है क्योंकि संघ की विचारधारा का आधार यही ग्रन्थ हैं. नगरों, कस्बों एवं गावों के खुले स्थानों में लगने वाली दैनिक शाखाएं संघ का प्राण है और ऐसी किसी भी शाखा में जाकर संघ को जाना जा सकता है. संघ पर टिप्पणी करने से पहले राहुल ऐसी किसी शाखा में गए होंगे क्या?

संघ पर राहुल की टिप्पणी यह भी सिद्ध करती है की भारत के बारे में उनका व उनके सलाहकारों का ज्ञान शून्य है जो राहुल के खुद के भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत भी है. यह भी हो सकता है संघ पर राहुल के द्वारा की गयी टिप्पणी अयोध्या पर आये फैसले से उपजी  हताशा हो ताकि काँग्रेस का बचा खुचा मुस्लिम वोट बैंक इस टिप्पणी पर खुश हो जाये, पहले भी राहुल इस तरह का बयान दे चुके हैं कि अगर गांधी परिवार का कोई व्यक्ति सत्ता में होता तो ६ दिसंबर की घटना नहीं घटित होती. लेकिन इसबार मुस्लिम धर्मगुरुओं और नेताओं ने उनकी आशा पर पानी फेरने का ही काम किया है जिससे उनकी राजनीतिक लाभ लेने की इच्छा पुरी नहीं हो सकी.

काँग्रेस के युवराज को मीडिया ने मुद्दे चुनने की आज़ादी दे रही है. क्या आपने कभी राहुल को किसी कश्मीरी शरणार्थी कैम्प में देखा, कभी राहुल उनका दुःख दर्द सुनने गए, राहुल गुजरात में हुए दंगो की बात करते हैं लेकिन दिल्ली में १९८४ में हुए सिख दंगो की बात नहीं करते. राष्ट्रमंडल खेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सभी बोले लेकिन राहुल क्या बोले कुछ नहीं पता चला. पूर्वोत्तर की समस्या भी राहुल को कभी आकर्षित नहीं कर सकी. वो नक्सलवादियों व अलगाववादियों से काँग्रेस का मंच साझा कर सकते हैं लेकिन हिंदुत्व की विचारधारा वाले व्यक्ति का काँग्रेस में स्थान नहीं, क्या यह लोकतंत्र का काला अध्याय नहीं कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी में राजशाही चल रही है.

राहुल कहते हैं की राजनीति में युवाओं का स्वागत है लेकिन युवाओं के नाम पर राहुल काँग्रेसी चाटुकार नेताओं के बेटे-बेटियों और गुंडे मवालियों को जोड़ रहे हैं प्रतिभाशाली युवाओं को वह पहले ही बता चुके हैं की राजनीति में प्रवेश के लिए मजबूत आधार जरूरी है जो काँग्रेस में सिर्फ वंशवाद से आती है बाहर से नहीं.

संघ की सशक्त विचारधारा सत्तालोलुपो को हमेशा डराती रही है और राहुल भी उसका अपवाद नहीं बन सके जैसे जैसे वह सत्ता के करीब आते जा रहें है उनका डर बढ़ता जा रहा है, संघ के सामाजिक कार्य राहुल के लिए चिंता का विषय हैं, पहले यह विभाग चाटुकार दिग्यविजय सिंह के पास था लेकिन लगता है राहुल ने कमान अपने हाथ में ले ली है. इन सबके विरोध के वावजूद संघ अपने उद्देश्यों की तरफ लगातार बढ़ता जा रहा है और उसकी प्रेरणा से भारतीय राजनीति में सकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं और जनता ने खुद आगे आकर आन्दोलनों का नेतृत्व किया है, जम्मू में हुआ आन्दोलन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है.

जब राहुल ने संघ की विचारधारा पर सवाल किया तो क्या मीडिया का यह दायित्व नहीं बनता था की वह संघ की किसी शाखा में जाकर दूध का दूध और पानी का पानी करे, संघ, उसके आनुषांगिक संगठनो या उसकी विचारधारा की प्रेरणा से किये जा रहे अच्छे-बुरे कार्यो को कितने चैनलों ने दिखाया, राहुल की छींक को भी हेड लाइन बनाने वाला मीडिया इस विषय पर प्रतिक्रियाओं से आगे क्यों नहीं बढ़ा, यह विचारणीय बात है.

देश और समाज के लिए जीने वाले स्वयंसेवकों के रास्ते में कई बाधाएं आयीं, आती हैं और आयेंगी लेकिन ऐसी बाधाओं का सीना चीरकर संघ देश को परम वैभव पर ले जाएगा इसमे कोई शक नहीं.......

Sunday, October 3, 2010

नोएडा की ढकी मूर्तियाँ

नोएडा से दिल्ली आते जाते दलित चेतना पार्क की ढकी मूर्तियाँ सबने देखी हैं. आते जाते इन मूर्तियों पे नज़र पड़ना और उसके बाद उसपर हुआ विवाद और खर्च ध्यान में अनायास आ जाता है. सब कुछ देखते समझते इन सबके लिए जिम्मेदार नेताओं से घिन आना भी स्वाभाविक है. उन मूर्तियों से बीते काल के महापुरुषों के गौरव से ज्यादा वर्तमान नेताओं की महत्वाकांक्षा दिखती है.
दलितों के नाम पर सत्ता हासिल कर सरकार ने उनका कितना उपकार किया है यह रोज़ाना अखबारों की सुर्ख़ियों से पता चलता है और इसे सभी जान और समझ रहे हैं. कभी समाज में शोषण का अधिकार कुछ चुनिन्दा लोगों के पास था, इस स्थिति में हुआ बदलाव भी चिन्तन पर मजबूर करता है. दलित समाज की स्थिति पर चिंतन करने से पता चलता है कि आज दलितों में ही एक शोषक वर्ग तैयार हो चुका है जो दलित चेतना के नाम पर समाज के एक बड़े तबके का शोषण करता है और बदले में उनके जेहन में समाज के अन्य तबको के बीच नफ़रत का भाव पैदा करने की कोशिश करता है. यह शोषक तबका उन्हें एक मंच प्रदान करता है जिसमें आम व्यक्ति के मन की पीड़ा भड़ास के रूप में विभिन्न जातियों पर निकलती है, इसके बाद वह व्यक्ति खुद को संतुष्ट महसूस करने लगता है जिससे दलितों के हित का मुद्दा गौड़ हो जाता है और नफ़रत बलवती.

वास्तव में दलित चेतना का जो उपयोग समाज में समरसता लाने के लिए होना चाहिए था वह नफ़रत फ़ैलाने का कार्य कर रहा है और उसके नकारात्मक प्रभाव समाज में दिखते रहते हैं. दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने अम्बेडकर का नाम ठीक वैसे ही अपनाया है जैसे गाँधी का नाम काँग्रेस ने और श्रीराम का नाम दक्षिणपंथी संगठनों ने. वास्तव में इन महापुरुषों के आदर्शो से इन दलों का कोई मेल नहीं.

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली से आते हुए इन मूर्तियों को देख कर मेरी बेटी बोली पापा जी भूत, मैंने कहा बेटा ये भूत नहीं, भूत कुछ नहीं होता. मेरी बेटी ने तपाक से दूसरा प्रश्न दागा. फिर ये कौन है पापा? तब से उसके प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ रहा हूँ जो शायद ढकी मूर्तियों का आवरण हटने पर मिले.......

Saturday, October 2, 2010

अयोध्या करती है आह्वान

आखिर एक बेहद अहम मुकदमे का फैसला आ गया, भारतवासियो ने फैसले को स्वीकार भी किया. मुकदमे से जुडे विभिन्न पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में जाने का मन भी बना चुके है जिसमे कोइ असामान्य बात नही और यह उनका अधिकार है.

फैसले के पूर्व देश के विभिन्न दलो, बुद्धिजीवियों और मीडिया द्वारा आम जनता से अपील की जा रही थी कि वो माननीय उच्चन्यायालय के फैसले का सम्मान करे, किन्तु अफसोस कि फैसला आने के बाद देश की जनता ने तो जिम्मेदारी का परिचय दिया लेकिन शान्ति की अपील करने वाले नेता, देश की गैरजिम्मेदार इलेक्ट्रोनिक मीडिया और कुछ बुद्धिजीवियों ने फैसले को स्वीकार नही किया. ऐसा दोगलापन सिर्फ भारतवर्ष मे ही सम्भव है और कहीं नहीं. दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाने वाले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने एक विवादस्पद बयान के कारण दुनिया को सन्देश देने में लगें हैं कि वो बाइबिल के आदर्शो का पालन करने वाले सच्चे ईसाई हैं कुछ और नहीं. वास्तव में आम जनता इस विवाद को यहीं ख़त्म कर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहती है लेकिन कुछ लोग इसे पचा नहीं पा रहें है और वे जनता की अभूतपूर्व एकता को खंडित करना चाहते हैं.

देश की जनता की नज़र में यह फैसला ऐतिहासिक है जिसने जन जन के आराध्य प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया. अभी सबको याद है कि कुछ वर्षों पूर्व रामसेतु मुद्दे पर देश की केंद्र सरकार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में तो करूणानिधि जैसे नेताओं ने जनता के बीच में इतिहास पुरुष श्रीराम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था. तीनो न्यायाधीशों का यह निर्णय ऐसे राजनेताओं के मुख पर झन्नाटेदार तमाचा है जिसकी गूंज इनको मरते दम तक सुनाई देगी.

इतिहास की बात का कुतर्क देने वाले लोग भारत के कुछ सौ वर्षो के इतिहास को इतिहास मान रहे हैं. उन्हें पुरातत्व विभाग की खुदाई में निकले हिन्दू मंदिर के अवशेष भी नहीं दिखाई दे रहे जो चीख चीख कर देश की तत्काल्लीन जनता पर हुए अत्याचार की गवाही दे रहे हैं. पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट यह साबित करती है कि सैकड़ो वर्षों से हिन्दू जिस मंदिर के लिए लड़ रहे थे वह अकारण नहीं था और उसका दर्द पीढी दर पीढी आगे बढ़ता जा रहा था जिसे हिन्दू मानस ने स्वेक्षा से कभी स्वीकार नहीं किया एवं अपना अनवरत संघर्ष जारी रखा. लेकिन इस फैसले के बल पर अपनी रोटी सेकने की तैयारी में बैठे लोग तिलमिला गए हैं उनके बयान, लेख और चर्चा आदि उनकी हताशा का परिणाम हैं जिसका आम जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा और देश की जिम्मेदार जनता ने सदभावना का परिचय देते हुए एकता की मिसाल पेश की. विद्वान् न्यायाधीशों के दूरदर्शी निर्णय ने तमाम राजनीतिक दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है और इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं.

कुछ ऐसी प्रतिक्रया भी आती रहती है कि देश का युवा मंदिर-मस्जिद के झमेले में नहीं पढ़ना चाहता और वह तरक्की चाहता है, अव्वल तो ऐसे लोग युवाओं से कोसों दूर है और उन्हें युवाओं की भावना का पता नहीं, दूसरे देश का युवा ही नहीं देश का आम व्यक्ति भी राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण से आक्रोशित हो राजनीति और राजनेताओं से भी घृणा करता है लेकिन क्या ऐसे नेता नैतिक बल का परिचय देते हुए राजनीति और भ्रष्टाचार को अलविदा कहेंगे. निश्चय ही यह प्रश्न देश की संसद में भी अनुत्तरित रहेगा इसमे कोई संशय नहीं.

कुछ उत्साही हिन्दुओं की प्रतिक्रया ऐसी भी रही कि जन्मस्थान के तीन हिस्से क्यों? लेकिन वो यह भूल गए कि राम जिस हिन्दू संस्कृति के आदर्श हैं वो सबका सम्मान करती है, सबको प्रसन्न देखना चाहती है, अतः उन्हें इससे बाज़ आना चाहिए और अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को आदर्श मानकर रामराज्य की स्थापना कि दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए जिससे सब सुखी हों.

देश के समस्त नागरिकों से विनती है कि वो आस्था और विश्वास का सम्मान करते हुए राम की नगरी में एक भव्य मंदिर के निर्माण की दिशा में सहयोग करें जिससे इसका आध्यात्मिक गौरव और बढ़ सके एवं राम के आदर्शों के अनुरूप इस विश्वनगरी में सौहार्द बना रहे. राम किसी धर्म विशेष के नहीं पूरे राष्ट्र के नायक हैं तदनुरूप अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर आपसी सौहार्द का प्रतीक होना चाहिए विजय-पराजय का नहीं.

Saturday, September 25, 2010

मंत्रियों की अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार का दंश

अभी कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री जी ने अपने मंत्रिमंडल को नेहरु और इंदिरा से ज्यादा एक जुट बताया था, लेकिन क्या उनके दावे हवाई नहीं लगते? यह कहना अतिशयोक्ति ना होगी कि केंद्र सरकार के मंत्रियों में भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की होड़ लगी हुई है. सरकार के बड़े से बड़े मंत्रियों के दामन दागदार हो चुके हैं और ये मंत्री देश की प्रत्येक समस्या के सामने बेवश प्रतीत होते हैं. प्रायः सभी महत्वपूर्ण मंत्री अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से ना निभाते हुए अपनी अकर्मण्यता का दोष कभी प्रकृति, कभी संगठन, कभी सहयोगी मंत्रियों तो कभी जनता पर डाल कर बच निकलने का मार्ग ढूंढते रहते हैं.

अपने आप को बंगाल की जनता का प्रतिनिधि मानने वाली ममता बनर्जी और किसानो के मसीहा शरद पवार जैसों को मंत्री पद चाहिए और वो भी महत्वपूर्ण विभागों का, जबकि ये मंत्री मंत्रालय से उलट अन्य कार्यों में लगे हुए हैं. महगाई आसमान पर है तो देश में रेल दुर्घटनाएं आम हो चुकी हैं और निर्दोष जनता इनके कुकर्मो का फल भुगत रही है.

चिदंबरम के गृह मंत्रालय की कारस्तानी देखिये, एक विदेशी पत्रकार द्वारा खेलगांव में विस्फोटक लेकर पहुचने की घटना को हवा में उड़ाते हुए कहते हैं कि यह घटना तब की है जब खेलगांव में सुरक्षा इंतजाम पुख्ता नहीं थे, इसका मतलब ये हुआ कि दिल्ली में कोई कहीं भी विस्फोटक ले कर जा सकता है वे तो सिर्फ खेलगांव के जिम्मेदार हैं. घटना पर शर्मसार होने के बजाय गृहमंत्रालय लीपापोती में लगा हुआ है. कश्मीर और नक्सल समस्या की तो बात करना ही बेमानी है जहाँ देश के वीर सपूतों का मनोबल गिराने वाली बातें प्रायः होती रहती हैं और दिग्विजय सिंह जैसे अविस्वश्नीय लोग उसका समर्थन करते हैं.

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे ए राजा हों, देश की इज्जत को दांव पर लगाने वाले खेल मंत्री गिल हो या शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी, इन्हें अपना स्थान केबिनेट में सुरक्षित दीखता है. जो राष्ट्रमंडल खेल देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए लाये गए थे वही देश की बदनामी का सबब बन गए हैं. ऊपर से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बयान आग में घी डालने का कार्य करते है जब वो कहती हैं कि सब कुछ सामान्य है.

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का उनकी सरकार के अन्य मंत्रियों से तालमेल नहीं बैठता दीख रहा है. पर्यावरण के नाम पर कई विकास योजनायें लटकाई जा रहीं है लेकिन पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण खूब फलफूल रहें हैं. सरकार के मंत्रियों की कुछ ना कुछ कहानी जरूर है लेकिन निश्चित ही वह कहानी देश हित में नहीं दिख रही है.

सोनिया और राहुल सरकार के अंग नहीं हैं लेकिन परदे के पीछे का खेल उन्ही का है. उन्हें बोलने के लिए मुद्दे चुनने की आज़ादी है, वह कभी राष्ट्र की समस्याओं के बारे में बात नहीं करते, वे भोपाल गैस त्रासदी, महगाई, नक्सल समस्या आदि विषयों पर बात नहीं करते, मंत्री किस कदर भ्रष्ट हैं उन बेचारों को नहीं पता. राष्ट्रमंडल खेल के बारे में कुछ नहीं बोलते, या ये कहें कि बिका हुआ मीडिया उनसे सवाल पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता. वे बेदाग हैं. किसी भी कांग्रेसी से पूछिये उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य राहुल को प्रधान मंत्री बनाना है और उसके लिए वो कुछ भी कर सकता है. जैसे देश राहुल के बाद आता है.

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा सरकार के लिए गंभीर चुनौती होगा, लेकिन प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकारने वाली सरकार अपने पाप धुलने के लिए राम की शरण में जाने की पूरी तैयारी कर ली है. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि सरकार के पाप धुलते हैं या नहीं.

Tuesday, September 14, 2010

मातृभाषा से दूर होना असंभव

हिंदी बोलने, लिखने या समझने वाली अधिकांश जनता शायद जानती भी ना हो कि हिंदी दिवस भी कोई चीज़ है. भारतीय अपना स्वाभिमान भूल, गुलामी के प्रतीक को गले लगाने के लिए आतुर दिखते हैं. हिंदी के दम पर करोड़ों के वारे न्यारे करने वाले फ़िल्मी सितारे हों या लच्छेदार भाषण से जनता को लुभाने वाले नेता, परदे से उतरते ही इनकी जुबान अंग्रेजी हो जाती है. बहुत सारे लोग तर्क देते हैं कि अंग्रेजी रोज़गार की भाषा है, लेकिन वही लोग इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते कि अंग्रेजी को रोज़गार की भाषा बनाया किसने? हिंदी के बलबूते जीवन में सफल व्यक्ति किस मजबूरी के नाते अंग्रेजी के अग्रदूत बने हुए हैं?. और तो और हिंदी के अध्यापक का रोज़गार आदि के लिए अंग्रेजी से लेश मात्र सम्बन्ध ना होने पर भी उनके जीवन में अंग्रेजियत का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

पिछले दिनों एक कार्यक्रम में जाना हुआ, मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी बड़े भाई साहब का मंचन था, लगभग सारा कार्यक्रम हिंदी में था, आयोजक और मंच पर आने वाले लोग भी मिश्रित हिंदी "हिंगलिश" बोल रहे थे. मेरे पास भी कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र आया था, खोल कर देखा तो पत्र की भाषा अंग्रेज़ी थी. खैर, मुझे कोई विस्मय नहीं हुआ क्योंकि आजकल विशुद्ध भारतीय संस्कारों के कार्यक्रमों के निमंत्रणपत्र अंग्रेजी में ही छपते हैं. कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए लगाये गए विभिन्न प्रतीक और संकेत भी अंग्रेजी में थे और तो और मंच पर भी कहीं हिंदी का नाम निशान नहीं था. मेरे साथ कार्यक्रम में गए मित्र ने पूछा कि जब सबकुछ अंग्रेजी में है तो संचालन और मंचन हिंदी में क्यों?

कारण स्पष्ट है भारतीय जनमानस दिखावे के लिए तो अंग्रेजी को अपना चुका है लेकिन दिखावे की दुनिया और वास्तविक दुनिया में बड़ा फर्क होता है क्योंकि भाव तो सिर्फ मातृभाषा में ही आ सकते हैं.

एक बार अकबर के दरबार में एक व्यक्ति आया जिसे कई भाषाओँ में समान रूप से महारत हासिल थी. उसने दावा किया कि कोई भी व्यक्ति उसकी मातृभाषा नहीं बता सकता, बादशाह के दरबार में बीरबल भी थे, उन्होंने व्यक्ति से कहा कि मैं आपकी मातृभाषा जानता हूँ और कल आपको बता दूंगा. अगले दिन बड़े सवेरे बीरबल व्यक्ति के पास पहुंचे, उसे सोता देख बीरबल ने उसके ऊपर एक बाल्टी पानी डाल दी. व्यक्ति अपनी मातृभाषा में बडबडाता हुआ उठा और सामने बीरबल को देख उसे बोध हुआ कि बीरबल मेरी मातृभाषा जान चुके हैं.

ऐसे ही हमारा भारतीय समाज अंग्रेजी को चाहे जितना अपना ले उसके लिए मातृभाषा से दूर होना असंभव प्रतीत होता है. देर सबेर उसे जरूर बोध होगा कि वह अपने आप को बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं छल सकता. बेहतर है कि वास्तविकता स्वीकार कर अपने जीवन से दिखावापन निकाल कर आने वाली पीढी को स्वाभिमानी बनाने की पहल शुरू करे.

Saturday, August 28, 2010

आतंक का कोई धर्म नहीं होता, फिर भगवा आतंक कैसे?

देश में हिंदुत्व विरोधी और तुष्टिकरण की राजनीति किस कदर हावी है, इसका उदाहरण नित्य ही देखने को मिलता रहता है. सरकार में कैसे लोग बैठे हैं इसका अंदाजा भी उनके द्वारा दिए गए बयानों से पता चलता है. वोटों की राजनीति के फेर में पड़े नेताओं का चरित्र कैसा है यह देशवासियों को बताने की जरूरत नहीं है.

हमारे गृहमंत्री चिदंबरम जी ने भगवा आतंकवाद से पुलिस प्रशासन को सावधान रहने की नसीहत दी है, उस पर समाज की कड़ी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है. जब बड़े गर्व से चिदंबरम भगवा को आतंक का प्रतीक बता रहे थे तब उन्होंने यह भी सोचने की आवश्यकता नहीं समझी की जिस देश के गृहमंत्री की हैसियत से वह भाषण दे रहें हैं, उस देश के ध्वज में भगवा रंग का स्थान ऊपर है. उनके इस गैर जिम्मेदाराना बयान का क्या अर्थ है? हमारे राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग को त्याग का प्रतीक बताया गया है, क्या अब हमें इसे आतंक के प्रतीक के रूप में स्वीकार करना होगा?.

चिंतन का विषय यह है वास्तव में पूरी दुनिया में कट्टरवाद और आतंक का पर्याय बन चुकी एक खास कौम को आतंकवाद से जोड़ने में इन्ही राजनेताओं की हिम्मत जवाब दे जाती है और सार्वजानिक रूप से इसे स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता. लेकिन सदियों से चली आ रही भगवा संस्कृति को बदनाम करने के लिए यही राजनेता मिलजुल कर प्रयास करते दिखते हैं. वास्तव में ये राजनेता किसी को प्रसन्न करने के लिए ऐसे अनावश्यक और गैर जिम्मेदाराना बयान देते रहते है. विश्लेषण करें तो चिदंबरम जी का यह बयान ऐसे ही नहीं आया है, इसकी पृष्टभूमि में जाएँ तो पता चलता है कि एक बार काँग्रेस आलाकमान के खासमखास दिग्यविजय सिंह जी ने आजमगढ़ की तीर्थयात्रा की थी उसके बाद वो चिदंबरम जी से मिले थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक कार्यों में बढ़ते योगदान और भारतीय प्रशासनिक सेवा में हिंदुत्व समर्थक लोगों की सफलता पर चिंता प्रकट की थी. मतलब साफ़ है चिदंबरम को स्पष्ट सन्देश दिया गया था और चिदंबरम का अब आया बयान उसी सन्देश एक बानगी भर है. लिंक देखें.

http://timesofindia.indiatimes.com/india/After-Naxal-spat-Diggy-meets-PC-over-RSS-in-social-sector/articleshow/5904099.cms
http://deshivicharak.blogspot.com/2010/05/blog-post_936.html

हमारे योग्य प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यको का है. भले ही यह अल्पसंख्यक देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अलगाववादी ही क्यों ना हो. और प्रतिक्षण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त क्यों ना हो. इस सबसे पता चलता है कि सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग किसी खास रणनीति के तहत ऐसा कर रहें हैं और उनपर ऐसा दबाव कौन डाल रहा है यह भी ध्यान देने योग्य बात है.

खैर, हमारी भगवा संस्कृति की यही विशेषता है कि जब जब इस पर अत्याचार हुए यह और पुष्ट होकर उभरी है, सदियों से अनेको अनेक ऋषियों एवं मनीषियों ने इस संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. आज भी अनेकोनेक देवी देवताओं को पूजते हुए भी हम सभी एक हैं. हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार शिवभक्त को विष्णुरुपी श्रीराम की भक्ति के बिना शिवकृपा नहीं मिल सकती तो स्वयं श्रीराम शिव की उपासना करते हैं. जब गणेश स्वयं शिव के पुत्र हैं तो शिवभक्त, रामभक्त या गणपति की भक्ति करने वाले में कैसे वैर होगा. देवी की पूजा करने वाले भी कहीं ना कहीं से शिव, विष्णु, गणेश आदि से जुड़े हुए हैं.

मानस की निम्नलिखित पंक्ति का अवलोकन करने पर पता चलता है कि मुग़ल काल में हिन्दू समाज को एकत्रित करने के लिए गोस्वामी जी ने विष्णु रूपी राम भक्तों और शिव भक्तों को कैसा सन्देश देने कि कोशिश की है. दो विभिन्न सम्प्रदायों में ऐसा सामंजस्य सिर्फ भगवा संस्कृति में ही मिल सकता है अन्य कहीं नहीं.

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥
 
यही कारण है कि हिन्दू समाज में कभी पूजा पद्यतियों को लेकर विरोधाभास नहीं देखने को मिलता. सभी स्वतंत्र हैं और किसी एक देव के भक्ति कर वे सबकी कृपा प्राप्त कर लेते हैं. आदि शंकराचार्य ने गौतम बुद्ध को बुद्धावतार बता उन्हें भी भगवा संस्कृति का अंश बताया था. ऐसी जोड़ने वाली संस्कृति को उसी के देश में आतंकवादी संस्कृति कह कर उसका अपमान किया जा रहा है और उसको मानने वाले मनुष्य सो रहें हैं. क्या यह पतन की निशानी नहीं है?. 

आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा, इस देश के मनुष्यों का स्वाभिमान कब जागेगा. वस्तुतः अपने में मस्त हिन्दू समाज आने वाली पीढी के परवाह किये बिना लक्ष्य विहीन जीवन जी रहा है. इतने सालों गुलाम रहने के बाद हमारी मानसिकता गुलाम हो चुकी है और हम बिना प्रतिरोध के हर एक अत्याचार को सह लेते हैं.

आज जरूरत है समाज के लोगों को इस अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने की, व्यक्ति व्यक्ति का स्वाभिमान जगाने की आवश्यकता है, जब तक इस पुण्यभूमि के प्रत्येक व्यक्ति का स्वाभिमान नहीं जागेगा, तब तक कभी बाबर, कभी औरंगजेब, कभी नेहरु, कभी दिग्यविजय तो कभी चिदंबरम जैसे व्यक्ति इस प्राचीन "वसुधैव कुटुम्बकम" वाली संस्कृति का अपमान करते रहेंगे.

ऐसा तभी संभव है जब हम अपने इतिहास और भूगोल से मुँह ना मोड़ें, आज विद्यालयों में भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास को भुला सिर्फ गुलामी के वर्षों की शिक्षा दी जाती है. निश्चित ही यह शिक्षा बालपन में ही स्वाभिमान को मारने वाली है. आप खुद सोचिये, क्या हमारी शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति का निर्माण होना चाहिए जो निजी स्वार्थ के लिए देश और समाज के हितों की अनदेखी करते हैं?.

Tuesday, August 24, 2010

बारिश वाली राखी

रक्षाबंधन को पूनम बहुत उत्साहित रहती थी. राखी के दिन वह मायके जाकर भैया को राखी जरूर बांधती थी. अपनों के बीच पहुँच कर राखी की खुशियाँ कई गुना बढ़ जाती हैं. आज भी सुबह पूनम ने घर के सारे काम निपटा लिए थे और मायके जाने की तैयारी कर ली थी. लेकिन ईश्वर को शायद कुछ और मंजूर था. झमाझम बारिश पूनम जैसी कितनी ही बहनों के अरमानो पर पानी फेर रही थी.
बारिश की बूंदे और पूनम के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. बड़े चाव से उसने खोये के पेड़े बनाये थे. वह जानती थी कि भैया को उसके हाथ के बने पेड़े बहुत अच्छे लगते थे. भैया हरदम कहते की मेरी बहना जब अपने घर चली जाएगी तो मुझे पेड़ों के लिए तरसना पड़ेगा. उसकी विदाई पर भी भैया फूट फूट कर रोये थे और कहते जा रहे थे कि अब मुझे पेड़े कौन खिलायेगा. पूनम ने उसी दिन संकल्प ले लिया था कि राखी पर भैया को अपने हाथ से बने पेड़े ही खिलाऊँगी. 
देखते ही देखते शाम होने को आ गयी लेकिन बारिश नहीं रुकी. पति और बच्चे पूनम को ढाढस बंधा रहे थे लेकिन पूनम जानती थी कि अब कोई चमत्कार ही उसकी मंशा पूरी कर सकता था. वह भगवान के सामने जाकर बैठ गयी. चौखट पर आहट से उसकी तन्द्रा टूटी तो देखा कि सर से पांव तक पानी से सराबोर भैया दरवाजे पर खड़े थे.
अगले ही क्षण घर का माहौल बदल गया था वही बारिश के बूंदे भाई बहन के अगाध प्रेम की गवाही दे रहीं थी.

Sunday, August 22, 2010

क्या धन अर्जित करना ही जीवन का उद्देश्य है.

बड़े महानगर हो या छोटे गाँव हर एक व्यक्ति पैसे के पीछे भागता प्रतीत होता है, नि:संदेह पैसा जीवन के लिए अति आवश्यक है लेकिन पैसे के लिए मूल्यों से समझौता कब तक? कब तक इंसान पैसे के लिए जीवन के वास्तविक सुख से वंचित रहेगा?

हम जिस पैसे के पीछे भागते हैं, क्या वास्तव में वही पैसा जीवन के सुख का आधार है. यह चिंतन का विषय है. बाल्यकाल से ही हम पढ़ते सुनते आ रहे हैं कि जीवन के लिए अन्य उपलब्ध साधनों में पैसे का महत्व सबसे कम है. धन गया तो समझो कुछ नहीं गया या पैसे से तुम बिस्तर खरीद सकते हो नींद नहीं आदि बातें आज भी अक्षरश: सत्य प्रतीत होती हैं.

आदि काल से ही धन का महत्व था, है और रहेगा. धन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन क्या धन अर्जित करने की कोई सीमा है? किसी से पूछो तो वह तपाक से उत्तर देगा कि मुझे तो ढेर सारा पैसा चाहिए, कितना उसे खुद भी नहीं पता. वस्तुतः व्यक्ति पैसे की कोई सीमा तय नहीं करता, जिसके पास जितना आता है उसकी भूख उतनी ही बढ़ती जाती है. देश समाज पर संकट आने की स्थिति में यही पैसे वाले लोग अधिकतम लाभ लेने के लिए वस्तु या सेवा का मूल्य कई गुना बढ़ा देतें हैं. इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष गवाह है. जैसे बाढ़ आदि आपदा आने में वहाँ के व्यापारी वस्तुओं के दाम कई गुना बढ़ा देते हैं, यह बात छोटे स्तर से लेकर बड़े बड़े उद्योगपतिओं पर लागू होती है. जैसे लगता है कि यही मौका है लूट लो.

आजकल मनुष्य मात्र का एक ही उद्देश्य रह गया है पैसा कमाना, भले ही उसके लिए कोई भी मूल्य चुकाना पड़े. पैसे के लिए लोग रिश्तो नातों की भी परवाह नहीं करते. छोटे से बच्चे को जीवन का लक्ष्य पैसा कमाना ही बताया जाता है जैसे अन्य कोई लक्ष्य हो ही नहीं.
मानस की निम्नलिखित पंक्तियों से पता चलता है की यह मनुष्य का शरीर बड़े ही भाग्य से मिला है.

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा.
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा , पाइ न जेहि परलोक सवारा.

हमारा यह मानव शरीर परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमें साधन के रूप में मिला है, किसी भी अन्य योनि यह सुविधा उपलब्ध नहीं, देवताओं को भी यह अवसर उपलब्ध नहीं.
फिर पैसा कमाने के लिए इस शरीर का दुरूपयोग क्यों? जब दुनिया की समस्त दौलत देकर भी व्यक्ति जीवन का एक क्षण नहीं खरीद सकता तो उस दौलत के लिए अपना पूरा जीवन लगाना कहाँ तक उचित है?

याद रखें हिन्दू जीवन पद्यति के मूल ग्रंथो एवं शास्त्रों में तीन तरह के आनंद बताये गए हैं.
१) विषयानंद: इस आनंद में भौतिक और दैहिक सुख जिसे अज्ञानतावश हम सबसे बड़ा आनंद समझते हैं.
२) ब्रह्मानंद: जब जीव को परमात्मा की अनुभूति होने लगती है.
३) परमानन्द: जब जीव का स्वयं परमात्मा से साक्षात्कार होता है.

हमें मिला मानुष तन परमात्मा की प्राप्ति के लिए एक साधन है, इस साधन का सद्युपयोग ना करने वाला जीव कभी समय को तो कभी अपने कर्म को या फिर ईश्वर के व्यर्थ ही दोष लगाता है.

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाईं
 
भारतीय चिंतन में जीव को आत्मा और शरीर में विभक्त किया गया है. शरीर की सोच सिर्फ स्वयं तक सीमित है, जैसे मेरा हाथ, मेरा पैर. किन्तु आत्मा, परमात्मा का भाग होने के कारण सबके लिये सोचती है. मतलब जैसे कड़ाके की ठंड में शरीर स्वयं के लिये रजाई की व्यवस्था कर निश्चिंत हो जायेगा किन्तु आत्मा सबके लिये व्यवस्था बनाने का उपाय सोचेगी.

कभी कभी हमारे संज्ञान में आता है कि एक एक पैसे के लिए जीतोड़ मेहनत करने वाले मनुष्य विभिन्न व्यसनों आदि में धन का दुरूपयोग करते हैं और सामाजिक कार्यो के लिए धन की कमी का रोना रोते हैं. कभी समय मिले तो सोचियेगा कि हम भारतीय सोने की लंका के मालिक रहे रावण के बजाय वनवासी राम की पूजा क्यों करते हैं?

इसके आगे इतना ही कहना है कि संत कबीरदास जी के निम्नलिखित दोहे को अपना आदर्श बनाईये और अपने पुण्य प्रताप से अर्जित मानुष तन का सदुपयोग करते हुए जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति करिए.

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय. मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये.....

Friday, August 20, 2010

छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है.

असलम गंगा के किनारे एक छोटे से गाँव में रहता था, आमतौर पर गंगा किनारे रहने वालों के लिए गंगा वरदान से कम नहीं. नित्यक्रिया से लेकर खेती किसानी या अन्य रोज़ी रोज़गार भी गंगा किनारे आसानी से उपलब्ध हो जाता है, तो मृत्यु के बाद का अध्यात्मिक सुख भी गंगा मैया के किनारे अनायास ही उपलब्ध होता है.
असलम गाँव के अन्य बच्चों के साथ गंगा मैया की गोद में घंटो नहाया करता. गंगा मैया से उसे बहुत स्नेह था, कहता गंगा नहाना कभी ना छोडूंगा.
एक दिन असलम को अपने मामू की शादी में प्रयाग जाना पड़ा, गंगा मैया को देखकर उसकी नहाने की इच्छा हुई, असलम ने वहाँ अपनी उम्र के अन्य लड़कों से गंगा नहाने को कहा, जवाब में लडको ने असलम से कहा कि छि! गंगा मैली है, वहाँ तो हिन्दू नहाते है. वास्तव में बच्चों का कहना भी सत्य से परे ना था, प्रयाग में हिन्दू श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण गंगा मैली हो चुकी थी और गन्दगी से बेपरवाह सनातनी अपने द्वारा किये गए पापों को गंगा में धुल रहे थे और अवशेष घाटों पर विखेर रहे थे.
असलम को काटो तो खून नहीं, जिस गंगा को वह अपनी माँ समान समझ घंटो उसकी गोदी में खेला करता था, आज वही उससे दूर हो रही थी. ऐसे में असलम के मन में द्वन्द उठा, कभी सोचता कि गंगा तो हिन्दुओं की है अतः उसे गंगा को हिन्दुओं के भरोसे छोड़कर उसे भी गंगा में नहाना बंद कर देना चाहिए तो कभी लगता कि जिस गंगा मैया की गोदी में वह घंटो खेलता है उसकी मैल साफ़ करने में उसे अभी जुट जाना चाहिए.
अंततः प्रेम की विजय हुई और असलम अकेला ही गंगा के घाटों की सफाई के लिए निकल पड़ा. देखते ही देखते अन्य उत्साही लोग भी उसके साथ जुड़ गए और कुछ समय पश्चात् वहाँ गन्दगी का नामों निशान मिट गया.
सफाई के बाद का गंगा स्नान असलम को असीम संतोष दे रहा था, आखिर उसने आज माँ के प्रति अपने कर्तव्य का पालन जो किया था.
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लघुकथा: प्रिय मित्र विवेक कृष्ण जी की प्रेरणा से (सत्य घटना और कल्पना का मिश्रण)

Sunday, August 15, 2010

बिना खड्ग बिना ढाल की आज़ादी का असली सच.

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल।

उपरोक्त गीत बचपन में मुझे बड़ा कर्णप्रिय लगता था और अनेकों बार वाद विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेकर मैंने इसी गीत के द्वारा बापू का गुणगान किया था। आज़ादी का सच जानने निकला तो पता चला कि ना जाने कितने अमर सपूतों ने मातृभूमि के लिए हँसते हँसते गोलियां खायीं या फाँसी का फंदा चूम लिया। अब उपरोक्त गीत उन क्रान्तिकारियों का अपमान सा लगता है, जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष कर सर्वोच्च बलिदान किया या अपना लहू बहाया।

१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर के पूर्व से ही अनगिनत सूरमाओं ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और समय के बदलते चक्र के कारण हम भारतवासियों ने उन्हें विसार दिया। क्या मंगल पाण्डेय, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, बिस्मिल, अशफाक जैसे अनगिनत वीर सपूतों का बलिदान कोई काम ना आया जो हमें लगता है कि आज़ादी हमें अहिंसा से मिली है। अगर हम इसी को सच समझते हैं तो यह सरासर गलत है। क्या यह सही नहीं की भगत सिंह के बलिदान ने समूचे देश को हिला दिया था और अहिंसा के सूरमाओं ने उन्हें पथभ्रष्ट युवा कह कर माफ़ी दिलाने से इनकार कर दिया था। हैरानी की बात तो यह है अब अहिंसा के पुजारियों की पार्टी के सुरमा अफजल गुरु की फांसी का विरोध कर रहे हैं।

भारत माता के स्वाधीनता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुचाने वाले अमर हुतात्मा मदनलाल धींगरा का नाम किसी देश भक्त के लिए परिचय का मोहताज़ नहीं है, १०१ वर्ष पूर्व आज ही के दिन (१७ अगस्त १९०९) को उन्होंने वन्देमातरम और भारतमाता की जय कहते हुए फांसी का फंदा चूम लिया था।


सरकारी प्रचार तंत्र ऐसे कितने ही वीर हुतात्माओं के बलिदान को भुला देने के लिए कटिबद्ध दिखता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे बलिदानियों की याद का दीप जलाये रखते है ताकि जिज्ञासु व्यक्ति को शीघ्र ज्ञान का प्रकाश मिल सके।

आज हमें वैसी ही आज़ादी मिली है जैसी नेहरु ने देखी थी और वो थी सत्ता की आज़ादी, शायद इसलिए आज़ाद भी वही दिखते हैं जिनके हाथ में सत्ता है। आम आदमी आज भी दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में व्यस्त है उसे अन्य बातें सोचने की फुर्सत नहीं। हमारे अमर क्रांतिकारियों ने सत्ता के लिए अपने प्राण नहीं दिए उन्होंने देश समाज के लिए अपने प्राण दिए। देश समाज की हालत देखकर लगता है कि अभी भी हमारे अमर क्रांतिकारियों का आज़ादी का सपना अधूरा है और तब तक अधूरा रहेगा जब तक देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वह देश के किसी भी कोने में रहता हो अपने आप को आजाद और सुरक्षित महसूस न करे।

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अमर हुतात्मा मदन लाल धींगरा और उनकी यादों का चिराग जलाये रखने वाले सपूतों को समर्पित।

Monday, August 9, 2010

सोने की चिडिया की स्वाधीनता और काँग्रेसी लुटेरे

हम भारत के लोग बडे ही हर्षोल्लास से १५ अगस्त को स्वाधीनता दिवस मनाते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम लोगों को यह भान होगा कि इससे एक दिन पूर्व यानि १४ अगस्त १९४७ को भारत माता के दो टुकडे कर दिये गये।  असंगठित हिन्दू समाज और उसका दूर-दृष्टिहीन नेतृत्व (गाँधी, नेहरु आदि ) जो अलगाववादियों के तुष्टिकरण व पुष्टिकरण में वर्षों से लगा था, उन्ही की भूलों ने हमें यह गहरा घाव दिया. बीस लाख लोग मारे गए. विभाजन के द्वारा भारत की साढ़े नौ लाख वर्ग किलोमीटर भूमि (कुल भूमि का २३%)  १९% लोगों को दे दी गयी. काँग्रेस नेत्रित्व ने अपना वोट बैंक बनाये रखने के लिए २.५ करोड़  अलगाववादियों को यहीं रोक लिया. ये वही लोग थे जिन्होंने १९४६ के चुनाव में विभाजन के पक्ष में मुस्लिम लीग को वोट दिया था. जरा सोचिये! जिन्होंने अपने लिए अलग देश माँगा था उनका शेष खंडित भारत में  रहने का क्या हक़ बनता था?.
अहिंसा के कथित पुजारी मोहन दास करम चंद गाँधी की गलत नीतियों के कारण लाखों लोग असमय काल के गाल में समां गए थे. गोरे और काले अंग्रेजों  ने उसी गाँधी को राष्ट्रपिता की पूजनीय उपाधि से विभूषित किया ताकि कोई उसके बारे में कुछ बोले नहीं. गाँधी की अहिंसा नीति का समर्थन करने की बात करने वाले विदेशी भारत से अहिंसा की अपेक्षा करते है और खुद जब चाहे जहाँ चाहे आक्रमण कर देते हैं.
अब वो समय आ गया है कि देश की युवा पीढ़ी गाँधी के बारे में उपलब्ध सरकारी साहित्य से अलग पढ़कर जानकारी हासिल करे और फिर किसी ठोस आधार पर गाँधी का मूल्याङ्कन करे. यह भी ध्रुव सत्य है कि आने वाली पीढ़ी इतिहास पुरुषो का फिर से मूल्याङ्कन करेगी. और खुद फैसला करेगी कि नेताजी सुभाष, सरदार भगत सिंह, आज़ाद, विस्मिल, असफाक उल्ला खान, लाला लाजपत राय, तिलक आदि देश के आदर्श होंगे या गाँधी नेहरु राजवंश.
अगर समाचार पत्रों और मीडिया आदि पर गौर करें तो सरकार एवं काँग्रेस पार्टी उस राजीव गाँधी का गुणगान करने में लगी दिखती है जिनका नाम १९८४ के सिख दंगे, बोफोर्स घोटाले, बीस हज़ार से ज्यादा मौतों के जिम्मेदार एंडरसन आदि को भगाने आदि विषयों पर आता है.
शास्त्री जी भी उसी काँग्रेस में थे लेकिन कोई उन्हें काँग्रेसी उन्हें अपना आदर्श बनाएगा ऐसा प्रतीत नहीं होता. काँग्रेस के किसी पोस्टर को उठा कर देखिये, उसमे नेहरु राजवंश ही दिखेगा, पटेल या शास्त्री जैसा नेता नहीं. काँग्रेस के पोस्टरों पर प्रियंका बढेरा भी खूब दिखती है लेकिन देश और काँग्रेस के लिए उनका योगदान आज तक नहीं दिखा. मीडिया में राहुल का ग्लैमर भी खूब बिकता है, लेकिन देश और समाज के लिए उनका योगदान सिर्फ नौटंकी से आगे नहीं दिखता. जिसमें कभी किसी दलित के यहाँ भोजन तो कभी खाली टोकरी और गद्देदार जूते पहनकर मेहनत करने का नाटक ही दिखता है. काँग्रेस पार्टी आज देश में भ्रष्टाचार और चाटुकारिता की पर्याय बन चुकी है.
देश की आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश के समस्त संसाधनों पर यही मुट्ठी भर लोग कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और जनता के एक बड़े हिस्से को दो जून भरपेट रोटी भी नसीब नहीं. आम जनता मंहगाई से त्रस्त है, मिलावट का धंधा जोरों पर है. जिस देश में दूध दही की नदियाँ बहती थी वहाँ कोई भी वस्तु शुद्ध मिलने का भरोसा नहीं.
हमारा देश सोने की चिड़िया था, है और आगे भी रहेगा, लेकिन जरूरत है उसे लुटेरों से बचा कर रखने की.
देश को पहले मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लूटा, फिर गोरे अंग्रेजों ने और अब काले अँगरेज़ और उनके चाटुकार लूट रहें हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से सम्बंधित विभिन्न घोटाले इसका ताज़ा प्रमाण हैं कि सोने की चिड़िया के पंख किस कदर लूटे जा रहें हैं.
देश के इतिहास पर गौर करें तो ज्यादातर समस्यायें काँग्रेस की गलत नीतियों की देन है, देश के सामने विकराल रूप में खड़ी कश्मीर समस्या भी हमारे देश के अदूरदर्शी भाग्यविधाताओं की देन है.
आज भी देश में तुष्टिकरण की नीति बेधड़क चल रही है. हिन्दू हित की बात करना इस देश में साम्प्रदायिकता कहलाता है. एक चुने हुए जनता के प्रतिनिधि को देश के दूसरे हिस्से में जाने से रोकने का दबाव बनाया जाता है ताकि एक खास वोट बैंक नाराज़ ना हो जाये.
क्या वो समय अभी नहीं आया कि देश का बौद्धिक वर्ग सरकार की भ्रष्ट, चाटुकार, तुष्टिकरण और सीबीआई जैसे साधनों का दुरुपयोग आदि विषयों पर अपनी बात रखे और हर स्तर पर गलत नीतियों का विरोध करे, अगर ऐसा नहीं किया गया तो ये मुट्ठी भर भ्रष्ट लोग हम सबकी जीवन रेखा का आधार भारत रूपी सोने की चिड़िया के पंख तब तक निचोड़ते रहेंगे जब तक उसके प्राण पखेरू उड़ ना जाएँ.
इतना कुछ होने पर भी देश की जनता का बड़ा हिस्सा सो रहा है, याद रखें यह देश हमारा घर है, अपने घर की रक्षा करने कोई विदेशी नहीं आएगा. इसकी रक्षा हमें ही करने होगी. आप लोगों से अनुरोध है कि देश की समस्याओं पर चुप ना बैठे, उठें, खुद जागें और दूसरों को भी जगाएं. 

Wednesday, August 4, 2010

देश की तस्वीर

देश की तस्वीर अब बदल रही है,
सभी कहते हैं कि दूरी सिमट रही है.
बड़ी बड़ी इमारतें कुछ कहानी कह रहीं हैं.
कुर्बानी की सारी दास्ताँ बयान कर रहीं है.

मिलकर सबको जोड़ने का तार,
विकसित हो बेतार हो गया है.
पडोसी से बात करने के लिए,
मोबाइल का आविष्कार हो गया है.

अस्पतालों में भीड़ बढ़ती जा रही है,
दवाओं से ज्यादा अब बीमारी आ रही हैं.
रोगी को बचाने की औषधि आ गयी है,
हंसते परिवार को मारने दुर्घटना छा गयी है.

कैसे हो गए हैं आज देश के कर्णधार,
अपने आप में खोये खोये से रहते हैं.
बगावत नहीं करते कभी समाज के लिए,
खुद के लिए समाज से बगावत करते हैं.

लोग कहते हैं भारत गाँवों में बसता है,
ग्रामीणों के दिल में प्रेम रमता है.
बदली तस्वीर देखने पहुंचा जो गाँव में,
दिल की तस्वीर बदलने का पता चलता है.

Thursday, July 29, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों का सच और काँग्रेस

आजकल राष्ट्रमंडल खेलों(CWG) के आयोजन की तैयारी मे पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। पानी भी बहुत कीमती है और उसे भी बर्बाद करने का हक हमें नही है,फ़िर देशवासियो की खून पसीने की कमाई की बरबाद करने का हक सरकार को कैसे मिला। काँग्रेस संगठन और सरकार के मन्त्री भी तैयारियो मे हुई देरी से बौखलाये हुए हैं,कोइ कुछ कहता है तो कोइ कुछ। अभी मणि शङ्कर अय्यर जी का बयान आया है कि CWG का आयोजन अगर असफ़ल होता है तो उन्हे बहुत खुशी होगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि आयोजन के लिए रिश्वत भी दी गयी है। विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें। 

http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2010/07/100727_aiyar_cwg_skj.shtml

सरकार और संगठन में गुटबाजी इतने चरम पर है कि कुछ लोग बाकायदा इन्द्रदेव से प्रार्थना कर रहे होंगे की दिल्ली में जमकर वर्षा हो और CWG की सफलता उसी में धुल जाये। अय्यर जी का यह बयान कितना गैर जिम्मेदाराना प्रतीत होता है कि देश कि थू थू हो और अय्यर जी प्रसन्न हो। ऐसा बयान कोई कांग्रेसी ही दे सकता है। वैसे तो उन्होने देश मे खेलों की वास्तविक स्थिति का सच कहने की हिम्मत दिखाई है लेकिन अब ऐसा कहना चाहे वो कोई भी हो उचित नही है। अय्यर जी का बयान निम्नलिखित पङ्क्ति को सार्थक करता है।

का वर्षा जब कृषि सुखाने।

CWG मे कितना पैसा बहाया जायेगा यह आने वाले वक्त मे पता चलेगा लेकिन सिर्फ़ समय से कार्य पूरा न होने की वजह से ही इसका बजट बढ गया है इसमे कोई शक नही है। जब मीडिया मे सरकार की खिचाई शुरु की तो आनन फ़ानन मे जवाहर लाल नेहरू क्रीडा स्थल का उद्घाटन कर दिया गया। इस आयोजन से देश को कितना फ़ायदा मिलेगा यह पता नही लेकिन सरकार के विभिन्न अंगों के द्वारा मीडिया मे प्रचारित खबरो से पता चलता है कि आयोजन में कोई ३५-४० हजार करोड रुपये तो लगेंगे ही। महगाई के बोझ तले दबी जनता त्राहिमाम कर रही है और सरकार तमाशे मे पैसा बहा रही है। हम सभी बचपन से ही एक कहावत सुनते आ रहे हैं कि

घर मे नही दाने अम्मा चली भुनाने।

सरकार इसी कहावत को चरितार्थ कर रही है। सभी लोग कहते हैं कि CWG के बहाने ही सही दिल्ली का विकास तो हो रहा है। मैं कहता हूँ कि विकास दिल्ली का ही नही देश के हर एक गाँव का होना चाहिये लेकिन सुनियोजित विकास और जल्दी बाज़ी के विकास मे बडा फ़र्क होता है और इस विकास के परिणाम स्वरुप पिछले कुछ वर्षो से दिल्ली वाले नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।

यह सब देखने के बाद भी समाज क्या करे आखिर वो उसकी ही चुनी हुई सरकार है,कभी कभी लगता है कि वैचारिक क्रान्ति का दौर प्रारम्भ हो गया है और विभिन्न उपलब्ध साधनों के द्वारा लोग सरकार का विरोध शुरु कर चुके है, लेकिन एकदम से कुछ नही बदलेगा क्योंकि इस पुण्यभूमि की सबसे बडी विडम्बना ही यही है कि हमारे योग्य प्रधानमंत्री जी का आदर्श मानस की निम्नलिखित चौपाई है।

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।

अब हमारे प्रधानमंत्री जी का या कहें कि देश का नाथ कौन है यह हम सभी जानते हैं.

Monday, July 26, 2010

परिवारवाद और रिश्ते नातों के विलुप्त होने का आभास

आज के युग में विदेशों में पारिवारिक रिश्तों खासकर वैवाहिक रिश्तों में अलगाववाद के कारण लोगों का आकर्षण हिन्दुस्तानी परिवारवाद की ओर बढ़ रहा है। यह हमारे लिए बहुत ख़ुशी की बात हो सकती है कि देर से ही सही दुनिया ने परिवारवाद के महत्त्व को समझा है। लेकिन हम भारतीय आज रिश्तों नातों और भाईचारे की महत्वता को नकार रहें हैं. छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा भले ही भौतिकतावादी युग में भला लगता हो लेकिन भारतीय संस्कृति पर सबसे बड़ा खतरा यही लेकर आया है ऐसा जान पड़ता है.


आज भारतवर्ष में एक खास वर्ग की जनसख्या का बहुत ही तीव्र गति बढ़ रही है. प्राकृतिक तरीके से तो बच्चे पैदा करने में ज्यादा समय लगता देखा तो पडोसी देशों से तैयार माल घुसपैठियों के रूप में अपने देश में प्रविष्ट करा उन्हें भारत का नागरिक बना दिया, यह सर्वविदित हैं की करोड़ों घुसपैठिये देश में रह रहें हैं जो बाकायदा देश के नागरिक हो चुके हैं. ऊपर से हमारे प्रधानमंत्री जी कहते घूमते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ उनका है. मतलब टैक्स हम दें और संसाधनों पर अधिकार बाहर से आये हुए घुसपैठियों का हो. इसे बड़ी विडम्बना हमारे समाज के लिए क्या हो सकती है?.
जनसख्या वृद्धि के लिए लव जिहाद का प्रयोग आज आम बात हो चुकी है और हिन्दू लड़कियां आसानी से जाल में फंस कर धर्म परिवर्तन कर रहीं हैं. माननीय उच्च न्यायालय भी इस विषय पर चिंता जता चुका है. यह लिंक देखें।


http://www.dnaindia.com/india/report_kerala-high-court-finds-signs-of-love-jihad-suggests-law-checks-it_1321955



सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि हम भौतिकतावाद के जाल में उलझ कर निरंतर अपने बच्चों कि संख्या में कमी करते जा रहें हैं. हम दो हमारे दो का नारा अब पुराना पड़ गया है और अब एक बच्चा संस्कृति का जमाना आ गया है. भारतवर्ष में लोकतंत्र है मतलब जिसके वोट ज्यादा उसी का राज. क्या यह चिंतन का विषय नहीं है कि वोट किसके ज्यादा होने जा रहें हैं?. एक बच्चा संस्कृति का पालन करने से हम तो कमजोर होंगे ही, बच्चे में भी सामाजिक सुरक्षा का अभाव होगा. एक बच्चे को हम पुलिस या अन्य सेवा में भेजेंगे यह बहुत मुश्किल जान पड़ता है, अर्ध सैनिक बल और सेना तो दूर की बात है. फिर पुलिस और सेना किसकी होगी यह भी चिंता का विषय है. देश व समाज की सुरक्षा से इतर परिवारवाद पर एक बच्चा संस्कृति का क्या प्रभाव पड़ने वाला है यह भी चिंतन का विषय है?. जब सबके एक ही बच्चा होगा तो भाई-बहन, साला-साली आदि का रिश्ता बिलुप्त हो जायेगा इसमें कोई शक नहीं है. जब भाई-बहन, साला-साली ही नहीं रहेंगे तो अगली पीढ़ी में मामा-मामी, मौसी-मौसा, बुआ-फूफा, चाची-चाचा, ताई-ताऊ आदि रहेंगे क्या?.


इस पुरातन भारतीय संस्कृति का क्या होने वाला है इसका आभास अभी से होने लगा है, अगर समय रहते नहीं चेते तो परिणाम भी आज की युवा पीढ़ी के जीवन काल में ही दिखने लगेगा, इसमें भी मुझे कोई शक नहीं.


देश व हिन्दू समाज की वर्तमान स्थिति पर चिंता करने वाले लोग बहुत से हैं और उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र व समाज को समर्पित कर दिया है लेकिन अपने समाज की मनोदशा देखकर गोस्वामी तुलसीदास जी की निम्नलिखित पक्तियां स्वतः याद आ जाती हैं।



फूलहिं फलहिं न बेंत, जद्यपि सुधा बरसहिं जलधि............

Friday, July 23, 2010

सर्वोच्च बलिदान के लिए शहीद शब्द का प्रयोग कितना उचित

देश के लिए आज तक अनगिनत लोगों ने हंसते हंसते अपने प्राण न्योछावर किये हैं और उन वीर सपूतों को सम्मान देने के लिए हम सबके मन में जो शब्द आता है वह है "शहीद"। यह शब्द ही अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। मानसिक चिंतन करते हुए मन में यह आकांक्षा जगी कि क्यों इस शब्द के मायने तलाशे जाएँ, यह कहाँ से आया, हमने उसे कैसे अपनाया आदि आदि.

इन्टरनेट कि दुनिया ने काफी कार्य आसान कर दिए हैंगूगल पर Shahid टाइप करके खोजा तो विकिपीडिया का यह लिंक मिला जिसने अंतर्मन को हिला दिया। आप भी देखें कि सर्वोच्च बलिदान के लिए यह शब्द हमें प्रयोग करना चाहिए या नहीं? यह ठीक है कि यह शब्द आज हिंदी शब्दकोष का एक अनिवार्य अंग है लेकिन उसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई और शब्द का वास्तव में किन अर्थों में प्रयोग किया जाता था यह भी ध्यान में रखना जरूरी है

यह लिंक देखें. http://en.wikipedia.org/wiki/Shahid


Shahid (Arabic: شَهيد ‎ šahīd, plural: شُهَداء šuhadā', also romanized as shaheed) is an Arabic word meaning "witness". It is a religious term in Islam, literally meaning "witness", but practically means a "martyr." It is used as a honorific for Muslims who have laid down their life fulfilling a religious commandment, or have died fighting in Jihad।


मतलब साफ़ है कि शहीद शब्द का प्रयोग उन मुस्लिमों का सम्मान करने के लिए किया जाता था जिन्होंने इस्लाम के जिए जिहाद कर अपने प्राण गवाएं थे.

अगर हम शहीद शब्द का वास्तविक अरबी अर्थ निकालें तो देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वीर सपूत अपने आप को शहीद कहलाना पसंद करेंगे इसमे मुझे संदेह है.

यह मेरे अपने विचार हैं, शहीदों का अपमान करना, चाहे वह इस्लाम के लिए ही क्यों हुए हो, मेरा मकसद नहीं हैशहीद शब्द जितना अरबी है उससे ज्यादा हिन्दुस्तानी है और हम हिन्दुस्तानी इसका मतलब अपने हिसाब से जानते हैं


कारगिल में सर्वोच्च बलिदान करने वालें वीर सपूतों को समर्पित

सादर वन्दे.

Friday, July 16, 2010

रोज़गार का हक़ किसका

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो इंसान को अन्दर तक झकझोर देते हैं. ऐसा ही एक संस्मरण आप लोगों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ. मैं यह नहीं कह रहा कि यह विचार सहीं हैं पर यह अटल सत्य है कि इनसे आज के समाज का भौतिकवादी चेहरा ध्यान में आता है.
आदि  काल से ही सिफारिश आजीविका प्राप्ति का एक प्रभावी साधन रहा है और जब तब विभिन्न व्यक्तियों एवं संस्थानों द्वारा सफलता पूर्वक प्रयोग किया जाता रहा है. आज कल इसका एक बिगड़ा रूप सामने आ रहा है और समर्थ व्यक्ति अपने लोगों को उनकी पात्रता और जरूरत को देखे बिना आजीविका में लगाते रहते हैं. सही भी है हर एक व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने का अधिकार है किन्तु इसका एक पहलु यह भी है कि भारत जैसे देश में सरकार और अन्य संगठनो के विभिन्न प्रयासों के बाद भी बेरोज़गारी का आंकड़ा कम नहीं हो रहा है और लोगों को आजीविका के लिए दर दर भटकना पड़ रहा है.
मेरे एक ऐसे ही समर्थ मित्र विवेक कृष्ण जी से किसी ने अपने मित्र की पत्नी कि नौकरी कि सिफारिश की. विवेक जी समर्थ थे लेकिन उन्होंने उक्त महिला की पात्रता का परीक्षण किया तो पाया कि महिला के पति एक सरकारी फर्म में बड़े अधिकारी थे और महिला सिर्फ समय काटने के लिए नौकरी करना चाहती थी. ऐसे ही गौर करने पर विभिन्न उदहारण ध्यान में आते हैं जब सिर्फ भौतिकवादी सुख सुविधा के लिए पति-पत्नी दोनों आजीविका कमाना चाहते हैं.
विवेक जी ने तो उन मित्र के सामने एक रोज़गार के लिए संघर्षरत व्यक्ति का उदाहरण देकर कहा कि इस नौकरी कि आवश्यकता किसको है आप स्वयं परखे और मुझे बताएं. खैर! विवेक जी के वो मित्र बहुत शर्मिंदा हुए और आगे से सिर्फ जरूरतमंदों की सिफारिश करने का प्रण किया.
वास्तव में समाज की जरूरत भी यही है कि सिर्फ समय पास या शौक के लिए जीविका कमाने से बेहतर है किसी जरूरतमंद व्यक्ति को कार्य करने का अवसर दिया जाय. इससे उस व्यक्ति कि उत्पादकता भी बढ़ेगी और उसके सामाजिक मूल्य भी.
पर क्या करें. सब कुछ देखते समझते, सिफारिश के द्वारा लगे शौकिया नौकरी करने वाले लोगों और रोज़गार के लिए भटकते हुए व्यक्तियों के देख कर गोस्वामी जी की इस निम्लिखित पंक्तियों का ध्यान आ जाता है.
प्रारब्ध पहिले रचा पीछे रचा शरीर !
आप स्वयं सोचें क्या उपयुक्त है. एक शौकिया नौकरी या किसी जरूरतमंद की जीविका.

सादर वन्दे.

Friday, July 2, 2010

हम तो हुए हैं काफ़िर, वो मुसलमान हो गए हैं.

अपने ही देश में सब, अनजान हो गए हैं,
हम तो हुए हैं काफ़िर, वो मुसलमान हो गए हैं,
जाति और धर्म की, इतनी चली है चर्चा,
कोई बना है बामन, कुछ पठान हो गए हैं.

कोई मिला पंजाबी,  फिर मिल गया बिहारी,
एक जो दिखा था कन्नड़, अगला था राजस्थानी,
कश्मीर से शरू कर , केरल तक  मैंने ढूंढा,
कोई मिला ना ऐसा, जो होवे हिन्दुस्तानी.

आज़ादी मिली कैसी, भूखे हम सो रहे हैं,
गोरे चले गए पर, गद्दार रह रहे हैं,
लुटा है देश जिसने, अब राज कर रहे हैं,
सड़कें हो या नगर सब, किस नाम बन रहें हैं.

कब याद हम करेंगे, जो महा पुरुष बिसारे,
अशफाक हो या विस्मिल, थे प्रेरणा हमारे,
नयी पीढ़ियों को, आदर्श किसका देंगे,
जब भक्त नहीं द्रोही, हैं बन गए सितारे.

तुम भाग्य के भरोसे, जब तक रहोगे सोते,
सच मानो मेरे प्यारे, मौका रहोगे खोते,
उखाड़ फेंको जल्दी, गद्दारों को देश से तुम,
पूजा करो करम की, कब तक रहोगे रोते.

Tuesday, June 29, 2010

देश के जिम्मेदार नागरिक

मेरी एक रेल यात्रा के दौरान मुरादाबाद में ट्रेन में दो युवक चढ़े, उन्हें रामपुर जाना था. मिनरल वाटर की बोतल से आखिरी घूँट पीते हुए एक युवक ने बोतल को तोडना शुरू किया और बोला, देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैं इस बोतल को तोड़ रहा हूँ ताकि इसका कोई गलत प्रयोग ना कर सके. दूसरे ने भी सहमति जताई. उनके इस कृत्य को देख कर मेरे मन में भी दोनों के  लिए सम्मान का भाव आ गया.  लेकिन यह क्या? अगले ही क्षण उसने मुड़ी तुड़ी बोतल प्लेटफार्म पर फेंक दी एवं मैं विस्मित सा उसकी ओर देखता रह गया.
खैर बात आई गयी हो गयी और ट्रेन चल पड़ी, थोड़ी देर में चल टिकट परीक्षक (TTE ) महोदय आ गए और अपना कार्य करने लगे. उन युवको के पास उपयुक्त टिकट भी नहीं था, फिर उन्होंने अपने किसी परिचित का हवाला देकर परीक्षक महोदय से उन्हें छोड़ने की गुजारिश की, किन्तु उनकी दाल नहीं गली और परीक्षक ने उन्हें टायलेट के पास वाले गलियारे में बुलाया और शायद कुछ सुविधा शुल्क लेकर उन्हें यात्रा करने की मौखिक सहमति दे दी. अब वे युवक विजयी मुद्रा में आकर मेरे सामने उसी स्थान पर बैठ गए.
यह भारतीय रेल में बहुत सामान्य सी बात है और तुम भी खुश हम भी खुश की पद्यति पर चलता है. उन युवकों ने भी इसी चिर परिचित शैली को अपना कर अपनी यात्रा आसान कर ली थी.
रामपुर आते ही दोनों ट्रेन से उतर गए, मैं दूर तक भारत देश के दोनों जिम्मेदार नागरिको को देखता रहा और वो हँसते हुए जैसे भारतीय रेल को मुह चिढ़ा रहे हों, मेरी दृष्टि क्षमता से बाहर निकल गए.
तभी से बोतल पर " CHRUSH THE BOTTLE AFTER USE "  लिखा देख कर अनायास ही मुझे उन देश के जिम्मेदार नागरिको की याद आ जाती है जो सिर्फ बोतल तोड़ कर अपने कर्तव्य से इति श्री कर लेते हैं और देश समाज की अन्य परिस्थितियों के बारे में सोचते भी नहीं.

Friday, June 4, 2010

भारतीय रेल: शयनयान में भूसा और भारतीय संस्कृति का मिलाप

निजी सवारी गाड़ीयों में भूसे कि तरह ठूंस ठूंस कर भरी हुई सवारियां तो खूब देखी हैं और यदाकदा ऐसी गाड़ियों में यात्रा भी करना पड़ा है, लेकिन गर्मी का मौसम प्रारम्भ होते ही रेलवे के आरक्षित डिब्बों में (सामान्य तो हमेशा भरी होती हैं) में भी सवारियां भर भर कर रेलवे खूब पैसा कमाती है. अब दिल्ली से यूपी बिहार जाना है तो रेल से ही जाना पड़ेगा, हवाई जहाज से जाएँ तो सारी बचत किराये में ही खर्च हो जाएगी और सडक मार्ग की हालत ऐसी है की पूछो मत. कहने का मतलब है कि रेलयात्रा मजबूरी है और इसी मजबूरी का फायदा निजी वाहन मालिकों की तरह रेलवे भी उठा रहा है.
ऐसी ही मजबूरी में मैंने भी शयनयान में यात्रा करने के लिए २ महीने से भी पहले टिकट ले लिया था. आर ए सी का टिकट २ महीने के बाद भी आर ए सी ही रहा. खैर जैसे तैसे अपनी बैठने की शायिका पर पहुंचा तो पता चला की पाँच लोग पहले से उसपर विराजमान हैं, एक तो वह व्यक्ति जिसको वह शायिका आर ए सी के रूप में मेरे साथ आरक्षित थी, दो अन्य युवा, एक बुजुर्ग तथा उनके साथ एक ७-८ साल का बच्चा. मुझे देख कर सबने टेढ़ा सा मुँह बनाया लेकिन फिर मैं भी आगे पीछे करके उसी में समायोजित हो गया या यूँ कहें की मेरी शायिका पर मेरा टिकने का जुगाड़ हो गया और फिर धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया.
भीड़ के बारे में पूछताछ की तो पता चला सामान्य प्रतीक्षा सूची लगभग ७०० तक गयी थी तथा तत्काल प्रतीक्षा सूची व अन्य की कोई जानकारी नहीं उपलब्ध हो सकी. इतनी लम्बी प्रतीक्षा सूची और ऊपर से अर्थदंड भर कर आये हुए सामान्य टिकट वाले यात्री और आरक्षित टिकटों वाले यात्रियों को मिलाकर संख्या इतनी थी कि डिब्बे में खड़े होने की जगह भी नहीं बची थी. कुछ बेटिकट भी होंगे तो रेलवे को क्या फर्क पड़ता है, ७२ शायिकाओं वाले डिब्बे में कम से कम २०० यात्री हो तो दो चार बेटिकट यात्रियों की परवाह रेलवे क्यों करेगा.
एक बुजुर्ग दंपत्ति भी उसी डिब्बे में कुली की मदद से आ गए थे. उन्हें दोनों ऊपर की शायिकाएं मिली थी, किसी प्रकार बुजुर्ग पुरुष तो ऊपर की शायिका पर जाने की हिम्मत जुटा पाए लेकिन महिला नहीं जा सकीं तो शयनयान के परिचारक महोदय से अनुनय विनय कर नीचे की शायिका देने को कहा. उन महोदय में ने अपनी मजबूरी प्रदर्शित करते हुए कहा कि नीचे की सारी शायिकाएं आर ए सी के रूप में दे दी गयीं हैं इसलिए मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. अब उन बेचारे दंपत्ति की हालत देखने लायक थी जिनकी शायिका होते हुए भी वो उसका उपयोग नहीं कर सकते थे.
दंपत्ति की दयनीय दशा देख कर दो व्यक्तियों ने जिनकी नीचे की शायिका आर ए सी के रूप में आरक्षित थी उक्त महिला को अपनी शायिका दे दी और खुद ऊपर चले गए. यह सब सिर्फ भारतीय संस्कृति में संभव है जहाँ बुजुर्गो का सम्मान करने का पाठ शुरू से पढाया जाता है. इधर ऊपर जाकर उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने जो किया उससे उनका भी भला हो गया. दरअसल बीच वाली शायिका के खुलने के पश्चात् वो बेचारे गर्दन झुका कर बड़ी मुश्किल से बैठ पा रहे थे और ऊपर जाते ही उनकी गर्दन सीधी हो गयी. मतलब तुम भी खुश हम भी खुश वाली बात हो गयी.
सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना देख कर मन प्रफुल्लित हो रहा था और इस घटना के बाद लोगों ने अपनी शायिकाओं पर एक दूसरे को समायोजित कर लिया और खचाखच भरे डिब्बे में लोग स्वेच्छा से बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की मदद कर रहे थे. देखकर लगा कि रेलयात्रियों की इसी भावना के कारण प्रत्येक वर्ष रेलवे के नाकाफी इंतजामों के बीच सबकी रेलयात्रा येन केन प्रकारेण पूरी हो जाती है, हाँ बीच बीच में कुछ शरारती तत्व भी अपना काम कर जातें हैं लेकिन फिर भी रेलयात्रियों का हौसला नहीं टूटता.
जो भी हो यात्री बेहाल थे और निश्चय ही उस समय ममता दीदी अपने कोलकाता स्थित आवास में खर्राटे भर रही होंगी. उन्हें दिल्ली आने जाने वालों से क्या मतलब? ऐसा रेलयात्री (यूपी बिहार वाला) जब उन्हें वोट नहीं दे सकता तो वो यात्रा करे चाहे भाड़ में जाये, दीदी से क्या मतलब, वोट नक्सली देतें है इसलिए दीदी को उनकी चिंता रहती है.  वैसे भी समस्या दिल्ली की है और दीदी का घर कोलकाता है, दीदी ने साफ कह भी दिया है...
उन्हें भला गोस्वामी जी की इन चौपाइयों से क्या सरोकार.
           जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी! सो नृप अवसि नरक अधिकारी!!

Sunday, May 23, 2010

ब्लॉग जगत में भी धर्म एक बिकाऊ माल है

ब्लॉग जगत में बहुत सारे लोग हैं, भीड़ से अलग दिखने वाले और भीड़ में शामिल, बहुत सारे धर्मनिरपेक्ष ब्लोगर भी हैं तो कुछ ऐसे  भी हैं जो अपने धर्म की अच्छाईयाँ और अन्य धर्मों की बुराइयाँ निकालने में बहुत आगे रहते हैं. धर्म के पक्ष में बोलने वाले लोग तो हैं ही अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले लोग भी धर्म से ऊपर नहीं उठ पाते हैं. दिखावे के लिए उनकी कुछ अन्य पोस्ट भी आती रहती हैं.
हाँ कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने लगातार प्रयास करते हुए अपने आप को स्थापित किया है.
लेकिन विश्लेषण करने से पता चलता है की सिर्फ राजनीति में ही नहीं ब्लॉग जगत में भी धर्म एक बिकाऊ माल है.
हिट होने का शक्ति वर्धक फार्मूला......

Saturday, May 22, 2010

वेतन में अपेक्षित वृद्धि ना होने से दुखी सहयोगियों को समर्पित कविता

वेतन बढ़त की थी वर्षा रे भैया, तमन्ना संजोयी थी भीगेंगे अबकी,
अरमान टूटे मिले सबको आंसू, आशा ना पूरी हुई आज सबकी.
बादल थे गरजे बहुत धीरे धीरे, मन में वो संशय मचाते रहे थे.
थोड़ी सी छीटें हम पर भी आयीं, पवन सारे अरमान उड़ाते रहे थे.
मंहगाई हम सबको भारी पड़ी है, मुश्किल हुआ है इन आँखों का सपना,
बेवश बेचारे अब हम हो गए हैं, प्रभु कोई मारग हमें तुम सुझाना.
किसी ने तो दिल को सहारा दिया है, शायद फिर से बरस जाये पानी,
इसी आस में अब बैठे हैं सारे, उम्मीदों की अपनी अलग है कहानी.
जरा सोचो तुम उनका भी प्यारे, जिन्हें काम से कल निकाला गया था,
मिटे थे किसी के जीवन के लक्षण, तिनके ने किसको किनारा दिया था.
बुझाने चलोगे अगर प्यास को तुम, रास्ता है कैसा जरा देख लेना,
थोड़ी सी जल्दी पड़ सकती भारी, निराशा में आशा की लौ ढूंढ़ लेना,
नहीं मानेंगे कोई बन्धु हमारे, अपनी दिशा वो नयी सी चुनेंगे,
हमारा अभी तो यहीं है समर्पण, इसी राह सोचा है आगे बढ़ेंगे.

Wednesday, May 19, 2010

असफल प्रेम का सुखद अंत

असफल प्रेम के पश्चात् जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि सच्चा प्रेम जीने की ताकत देता है. किसी का बाग़ उजाड़ कर अपना घर बसाने से अच्छा है की अपना नया घर बसाया जाये और उसे ही सुन्दर फूलों से सजाया जाये. आज के वातावरण में लोग प्रेम में असफल होने पर अपना या अपने प्रेमी/प्रेमिका का जीवन संकट में डाल देते हैं और आने वाले सुखद पलों से अनायास ही वंचित हो जाते हैं. इस कविता में एक प्रेमी के ह्रदय के उद्गार द्वारा उन्ही लोगों को सन्देश देने की कोशिश की है.

कोई था दिल ने जिसे हरदम समझा अपना,
अधुरा था जिनके बिना मेरा हर एक सपना.
मंदिरों में जिनके लिए, की थी मैंने पूजा,
पसंद था उनको, साथी कोई और दूजा.
प्रेम किया था मैंने उनसे, पल पल उसे निभाया,
शायद उनकी मजबूरी थी, जो प्यार मेरा ठुकराया.
क्रोध प्रेम का द्वन्द उठा जब, विजय प्रेम ने पायी,
दुनिया अपनी अलग हुई जब, आँख मेरी भर आयी.
वो खुश हैं अब घर पर अपने, हम भी खुश अपनी बगिया में
सच्चे प्यार का अर्थ है जीवन, एक सत्य है इस दुनिया में.

Saturday, May 15, 2010

गरीब की जाति

जनगणना करने आया अधिकारी मेरे गाँव में,
बैठ गया वो मंदिर पर पीपल की छाँव में,
बोला ग्रामवासियों से अपनी जाति मुझे बताओ,
मौका है प्रिय बन्धु आज फिर से इसे भुनाओ.

उठा एक व्यक्ति बोला, पूरी बात मुझे समझाओ,
गरीब की कोई जाति हो तो उसको मुझे बताओ.
कब तक हमको ऐसा  भेद भाव सिखाओगे,
कितने वर्षों के बाद हमें हिन्दुस्तानी बनाओगे.

अधिकारी बोला भैया मेरे फरमान ऊपर से लाया हूँ,
बोया है जो बीज तुमने फल उसका देने  आया हूँ.
जब तक जाति के नाम पर तुम वोट देते रहोगे,
हिन्दुस्तानी बनने के लिए वर्षों तरसते रहोगे.

Friday, May 14, 2010

जाति आधारित जनगणना:प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो

आज के आधुनिक दौर में जब सामाजिक समरसता स्थापित हो रही है, तब हमारी सरकार समाज को फिर विभिन्न वर्गों में बाँटने के लिए जाति आधारित जनगणना कराने के लिए संकल्पित दिख रही है. अंग्रेजो ने फूट का जो बीज बोया था, उसका परिणाम हम भुगत चुके हैं. अब फिर से हमारे समाज को बाँटने की कोशिश की जा रही है, इसी विषय पर अपने मन की भावना को मैंने एक कविता रूप में उतारने का प्रयास किया है. 

देशभक्त बन्धु देश की एकता की बात करते हैं,
और कुछ लोग समाज को बाँटकर राज करते हैं.
समरसता के दौर में, जब जाति भेद मिटने लगा,
वोट के सौदागरों का, तब खेल बिगड़ने लगा.


बाँट कर समाज को, राज जो करते रहे,
पिछड़े और दलित में, वो शब्द जोड़ते रहे.
उनकी घिनौनी बात से, जब लोग उबने लगे,
क्या करें फिर से नया, मंत्री जी सोचने लगे.

भर रहा जो जख्म है, फिर से वही कुरेद लो,
संख्या बल में बाँट कर, रोटी अपनी सेंक लो.
सरकार चलाता हूँ मैं भैया, बात मेरी सब मान लो,
नए सिरे से जनगणना कर, जाति सबकी जान लो.

देश विरोधी हैं ये मंत्री, निजी स्वार्थ के लिए बने,
जागे रक्षक भागे भक्षक , जनता अपनी राह चुने.
सावधान हो बन्धु मेरे, भेद-भाव का नाम ना हो,
प्रेम सुधा की कर दो वर्षा, वैर-द्वेष का काम ना हो.

Sunday, May 9, 2010

संघ के सामाजिक कार्य और दिग्गी राजा की चिंता

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर आई है, जिसमें श्री दिग्विजय सिंह जी माननीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिलकर सामाजिक कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा  में संघ द्वारा संचालित शिक्षण केन्द्रों के प्रतियोगियों की बड़ी सफलता पर चिंतित है. दिग्विजय जी की चिंता को मैंने कविता का रूप दे दिया है, जो कुछ इस प्रकार है.

संघ का बढ़ता रूप देखकर, डर गए दिग्गी राजा,
बोले जाकर चिदंबरम से, बज गया अपना बाजा.
संघवृक्ष है बहुत निराला, इससे मुझे बचाओ,
लहराते है परचम अपना, कोई जुगत लगाओ.

प्रतियोगी का ज्ञान बढाकर, काबिल उन्हें बनाता है,
बहुत सफल प्रतियोगी होकर, सेवा में आ जाता है.
संघ शक्ति का बोध कराकर, अच्छा भाव सिखाता है,
राष्ट्र भावना सर्वोपरि कर,  सच्चा मार्ग दिखाता है.


आगे बहुत हो रहे संघी. सन्देश यही मैं लाया हूँ,
पीड़ा बहुत हो रही मुझको, चिंतन करने आया हूँ.
चिदंबरम फिर बोले बाबू, इसका पता लगाऊंगा,
क्षमता है पर जिसके अन्दर, रोक उसे क्या पाउँगा.

पंक्तियाँ टाइम्स आफ इंडिया के निम्नांकित खबर लिंक पर आधारित हैं.
http://timesofindia.indiatimes.com/india/After-Naxal-spat-Diggy-meets-PC-over-RSS-in-social-sector/articleshow/5904099.cms

मातृ दिवस पर विशेष

विदेशी संस्कृति को अपनाने की होड़ में हमने माँ के वात्सल्य को सिर्फ एक दिन तक सीमित कर दिया है. अपनी भावना को कविता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ. प्रसंग मेरे मित्र का है, उन्होंने मुझे माँ को कुछ उपहार देने का सुझाव दिया था.

धन्यवाद दो प्रिय सखे, सादर प्रेम विधाता का,
मित्र मेरे मुझसे बोले, आज दिवस है माता का.

जन्म दिया है माँ ने तुमको, त्याग तुम्हारे लिए किया,
अपने रक्त से सींचा तुमको, पालन पोषण प्यार किया.

एहसान मानकर उनका तुम, उपहार कोई ले आना,
सादर श्रद्धा से माता की, चरणों में शीश झुकाना.

मै बोला उनसे मित्र मेरे, उपकार मानना धर्म है,
पर दिवस एक क्या वर्ष में, आदर्श पुत्र का कर्म है.

जीवन में माँ के क़र्ज़ को, मैं कभी उतार जो पाऊं,
प्रतिदिन हरक्षण प्रिय सखे, मैं मातृ दिवस मनाऊं.

ना माँगेगी माता तुमसे, रक्त का अपने मोल सखे,
दे सकते हो तो दे देना, मधुर प्रेम के बोल सखे.

Thursday, May 6, 2010

क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने

आज के सामाजिक घटनाक्रम में एक उच्च शिक्षित बेटी सारे परिवार को अपने गर्भवती होने की सूचना देकर हतप्रभ कर देती है और अपने उस प्रेमी को सही मानती है जिसने विवाह की रस्म निभाने से पहले ही सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं. उस माँ कर दर्द बयाँ करने की एक कोशिश निम्न पंक्तियों में की है.


माँ की ममता क्या होती है, शायद जाना था ना तुमने, 
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.  
जब तुम जीवन में थी आयी, खुशियों की सौगात थी लाई.
जीवन पूर्ण लगा था मुझको, मातृशक्ति थी मैंने पाई.
मधुर स्पर्श कोमल अंगो का, मीठा दर्द उठा था मुझमें.
पिता तुम्हारे बेहद खुश थे, जैसे सब कुछ पाया तुममें.

उत्साहित थे घर में हम सब, वस्त्र खिलौने सब कुछ लाये.
वक्त चला था धीरे धीरे, क्षण क्षण अपना प्रेम जगाये.
आखिर वह बेला भी आयी, सूक्ष्म कलि सी तुम मुस्काई,
मित्र, सम्बन्धी और पडोसी, बोले घर में लक्ष्मी आयी.

तुम लक्ष्मी हो यही मानकर, आदर भाव दिया था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

पालन पोषण और शिक्षा का, हर पल ध्यान रखा था हमने,
रीति नीति की बात हमेशा, प्रतिदिन समझाया था सबने.
मधुर स्वप्न थे बड़े सुहाने, सच माना था दिल में मैंने.
प्रतिभा कौशल के दम पर ही, मेरा मान रखा था तुमने.

मर्यादा का पालन करनामस्तक सबका ऊँचा रखना,
बुरे भले का ध्यान भी करना, दादाजी का था यह कहना.
आंखे नम थी भीगी पलकें, दूर शहर को जब तुम आयी.
बहना जल्दी लौट के आना, भैया ने आवाज़ लगाई.

पहली बार अलग थी हमसे, कैसे दिन काटा था सबने,
क्या जानो तुम दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.

उच्च शिखर पर जब तुम पहुची, भूल गयी थी नैतिक शिक्षा,
रोये थे तब पिता तुम्हारे, ली थी तुमने अग्नि परीक्षा,
भैया का तो हाल बुरा था, वर्षों का था साथ तुम्हारा,
क्षण में तोडा था तुमने जब, दुनिया का ये रिश्ता न्यारा.

क्या सोचा था एक बार भी, हम भी हैं इस दुनिया में,
सामाजिक हैं ताने बाने, रहना हमको भी है इसमें,
चंद माह का रिश्ता भारी, वर्षों के लालन पालन पर,
फिर भी रहो सदा तुम बेटी, अपनी बगिया में खुश होकर.

भूल हुयी थी कहाँ पर हमसे, जिसकी सजा दिलाई तुमने,
तुम क्या जानो दर्द हमारा, कितना प्यार किया था हमने.