धर्मो रक्षति रक्षितः
रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
:- मनुस्मृति


जब सनातन धर्म का क्षरण होता है, तब राष्ट्र का क्षरण होता है। :- महर्षि अरविन्द

बहवो यत्र नेतार:, सर्वे पण्डित मानिना:। सर्वे मह्त्व मिच्छंति, तद् राष्ट्र भव सीदति ।।

जिस राष्ट्र में नेतृ्त्व करने वाले बहुत हो जाते हैं एवं अपने को बुद्धिमान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेष्ठ पद की आकांक्षा रखता है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है.

Tuesday, January 26, 2016

बालगीत:हिन्दुस्तान हमारा प्यारा:डा. रघुवीर शरण मित्र

हिन्दुस्तान हमारा प्यारा, सब देशों से न्यारा है.
हम हैं इसके फूल और यह, सुन्दर बाग हमारा है.

यहीं राम की मर्यादा है, यहीं कृष्ण की गीता है,
अग्नि परीक्षा देने वाली, यहीं हुई माँ सीता है,
यहीं हुए उपदेश बुद्ध के, जिनमें अमर उजाला है,
यहीं भगीरथ गंगा लाये, यहाँ धूप में ज्वाला है,
चन्द्रगुप्त की विजय यहीं है, यहीं सिकंदर हारा है,


हिन्दुस्तान हमारा प्यारा, सब देशों से न्यारा है.
हम हैं इसके फूल और यह, सुन्दर बाग हमारा है.


यहीं तपस्या की थी ध्रुव ने, सत्य यहाँ का संबल है,
कर्म यहाँ निष्काम कर्म है, धर्म यहाँ का उज्ज्वल है,
फूल-फूल पर लिखी हुई है, यहाँ कहानी वीरों की,
शूलों पर खेला करती है, यहाँ जवानी वीरों की,
आओ दुनिया वालों आओ, यहाँ प्रेम की धारा है,


हिन्दुस्तान हमारा प्यारा, सब देशों से न्यारा है.
हम हैं इसके फूल और यह, सुन्दर बाग हमारा है.


इसकी मिट्टी में चंदन है, नदी नदी में गाने हैं,
इसके जलते हुए दीप पर, हम बालक परवाने हैं,
नहीं बुझेगा दीप यहाँ का, बरसाती तूफानों से,
तलवारों की धारें काटी, हमने मीठे गानों से,
काश्मीर की क्यारी इसमें, स्वर्ग यहाँ से हारा है,


हिन्दुस्तान हमारा प्यारा, सब देशों से न्यारा है.
हम हैं इसके फूल और यह, सुन्दर बाग हमारा है.

Sunday, December 6, 2015

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का मंदिर सांस्कृतिक भारत के पुनरुत्थान के लिये आवश्यक आवश्यकता ram temple

श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, हमारी संस्कृति के आदर्श हैं. समूचे भारत में उनके चिन्ह हैं. वह समाज के सभी वर्गों को जोड़ते हैं. राजकुमार होते हुए भी 14 वर्ष तक समाज के सामान्य पुरुष की तरह रहना सहर्ष स्वीकार करते हैं. वह शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं. रावण को हराने में अकेले सक्षम होते हुए भी स्थानीय नर-वानर-भालुओं का सहयोग लेते हैं. वह रावण के भाई विभीषण को सहर्ष शरण देते हैं. स्वर्णमयी लंका को जीतने के बाद वहाँ से कुछ नहीं लेते और राज्य विभीषण को सौंपकर अपनी जन्मभूमि वापस लौट आते हैं.


ऐसे यशस्वी राजा का स्मृति मंदिर उनके जन्म स्थान श्री अयोध्या जी में था. बिना वह प्रतीक चिन्ह ढ़्हाये भारत की संस्कृति को मिटाना असंभव था. अत: सन 1528 ईसवी में विदेशी आक्रमणकारी बाबर के वंशजो ने भव्य राममंदिर तोड़कर उसके स्थान पर एक ढ़ाचा बना दिया. राष्ट्र के जागे स्वाभिमान के कारण 6 दिसंबर 1992 को वह ढ़ाचा गिरा दिया गया.


कायदे से तो यह बहुत सामान्य सी अराजनैतिक बात होनी चाहिये थी. कारण कि इस देश में रहने वाले सभी पंथो-वर्गो के पूर्वज राम हैं, बाबर नहीं. उनका मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहाँ बनेगा.


वर्तमान में रामलला तम्बू में विराजमान हैं. भारत सहित समूचे विश्व के सत्य सनातन धर्म के अनुयायियों के लिये यह मंदिर श्रद्धा का केन्द्र है. यदि यह मंदिर भव्य बनता है, तो एक बड़े भूभाग की आर्थिक संरचना भी बदल जायेगी. सोचिये कि प्रतिदिन कितने लोग वहाँ दर्शन करने को आयेंगे. उन्हे कितने लीटर दूध चाहिये, कितनी सब्जियाँ, पुष्प अथवा अन्य वस्तुये चाहिये होंगी. यह वहाँ के किसान ही तो देंगे. वहाँ स्थित धर्मशालायें, होटल, भोजनालय, परिवहन सहित अन्य सेवाओं की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये लाखों युवक-युवतियों को रोज़गार भी मिलेगा.

किन्तु यह सब रुका हुआ है कारण कि इस बड़े सामाजिक मुद्दे को उतना ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया है. श्रद्देय अशोक सिंहल जी जिन्होने राष्ट्र के जागे स्वाभिमान का नेतृ्त्व किया था, अब हमारे बीच नहीं हैं. प्रश्न यह है कि पुन: उतना ही बड़ा जनज्वार कौन उठायेगा, कौन कोटि कोटि जनता को श्रीराम जन्मभूमि के भव्य मंदिर का सामाजिक एवं आर्थिक महत्व समाझायेगा.

यह भी अखण्ड सत्य हैं कि राममंदिर बनना तय है, लेकिन इसका यश किसके भाग्य में लिखा है यह प्रश्न अनुत्तरित है.........


अवधेश पाण्डेय
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
9958092091   

Tuesday, October 6, 2015

सहानुभूति किसको :- गौरक्षक अथवा गौभक्षक (Feeling pain for Manoj_mishra)

पापा एक बार बोल दो, फिर कभी न बोलना पापा..... बलिदानी दरोगा मनोज मिश्र की आठ वर्षीय बेटी.




क्या मिला ईमानदारी का फल... जिंदगी से हाथ धो बैठे... बहुत ड्यूटी के पाबंद थे. मनोज मिश्र की पत्नी फिर दहाड़े मारकर शव से लिपट कर रोने लगती है.




गौ हत्यारों की गोली से उत्तर प्रदेश पुलिस के दरोगा कि मौत की खबर हमें तब पता चली हैं, जब भीड़ द्वारा पीटने से तथाकथित पशु तस्कर अखलाक की मौत हुई. मुख्य धारा की मीडिया और नेताओं ने हंगामा मचा कर इस घटना को विश्व मंच पर पहुँचा दिया है. मुआवजे की राशि भी पहले 10 लाख, फिर 20 लाख और उसके बाद 45 लाख तक पहुँच चुकी है. सोचता हूँ कि यह लोग कितने संगठित हैं. कितने ध्येय निष्ठ हैं. उनकी खातिर सभी बड़े नेताओं ने बिसहड़ा-दादरी का दौरा किया. राजनीति में कितना भूचाल आया. कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का काम है, लेकिन अपनी अपनी ही सरकार की बदनामी की परवाह किये बिना मुस्लिम मंत्री आज़म खान मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने की बात कह रहे हैं. अंधविश्वास के चलते प्रदेश के मुख्यंमत्री भले न गौतमबुद्ध नगर आये हों, लेकिन उन्होने परिवार को एमएलसी के माध्यम से अपने पास बुलवाया और भारी भरकम मुआवजे सहित न्याय देने की बात कही है. जबकि एक आरोपी का आरोप भी लगभग छुपा लिया गया है.




अब आप उत्तर प्रदेश पुलिस के इंस्पेक्टर मनोज मिश्र की मौत देखिये, मनोज अपना कर्तव्य निभा रहे थे, उन्हे अपने दायित्व की परवाह थी, बेचारे पिछली 9 सितंबर को मारे गये. घटना स्थानीय अखबारों में दब कर रह गयी. अंतिम संस्कार में कोई नेता नहीं पहुँचा, अपने प्रदेश में कुछ बड़े नेता हैं, चर्चित घटनाओं का लाभ लेने शीघ्र पहुँच जाते हैं, किन्तु मनोज मिश्र जैसों की मौत पर चर्चा कराने की चाह उनमें नहीं है. कारण कि उत्तर प्रदेश में जुगाडु राजनीति चलती है. बड़े नेताओं से आपका परिचय आपको उच्च सिंहासन पर बिठा सकता है. अत: लगभग प्रतिदिन नगर-जिला-प्रदेश के नेताओं को अपने से बड़े स्तर के नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाकर गौरवान्वित होते हुए देखता हूँ. इनमें राजनीतिक नेतृ्त्व करने वाले तो शामिल हैं हीं, सामाजिक एवं नैतिक नेतृ्त्व करने वाले भी शामिल हैं.


सोचता हूँ कि अखलाक की मौत का राजनीतिक लाभ लेने वाले नेताओं में यदि व्यापक हिन्दू हित अथवा गौरक्षा का अंश मात्र भी संकल्प होता तो क्या मनोज मिश्र का बलिदान व्यर्थ जाता. अत: कहना चाहता हूँ कि जिस दिन समाज ने अपने नेताओं को राष्ट्र और हिन्दुत्व की कसौटी पर कसना प्रारंभ किया अथवा हिन्दुत्व विरोधी नेता छल करते हुए किसी अखलाक की बजाय कर्तव्यनिष्ठ मनोज को भाव देने लगे, उस दिन झूठे और फरेबी नेताओं के दम पर खड़ी इमारत को धूल धूसरित होने में देर नहीं लगेगी. फिर भी आशा है कि जब कभी धर्मचक्र घूमेगा तो अच्छे लोगों के त्याग के कारण अपने राष्ट्र का पूर्ण वैभव के साथ फिर से खड़ा होना भी तय है. उस काल प्रतीक्षा करते हुए यक्ष प्रश्न यह है कि वह समय कब आयेगा और किनके भाग्य में इसका यश लिखा होगा.




अवधेश कुमार
सी-185, सेक्टर 37, ग्रेटर नोएडा.
मो. 9958092091